सुप्रीम कोर्ट ने पैदल चलने को मौलिक अधिकार बनाया, अब परीक्षा आगरा की है

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Opinion Desk, Taj News | Sunday, June 21, 2026, 07:45:07 PM IST

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Brij Khandelwal
बृज खंडेलवाल
वरिष्ठ पत्रकार
एवं पर्यावरणविद्
आगरा के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ पत्रकार और प्रतिष्ठित पर्यावरणविद् बृज खंडेलवाल ने वर्ष 1972 में ‘भारतीय जनसंचार संस्थान’ (IIMC, नई दिल्ली) से पत्रकारिता की शुरुआत की। वे ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’, ‘इंडिया टुडे’, ‘इंडिया एब्रॉड’, और अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी ‘IANS’ सहित देश-विदेश के कई शीर्ष media संस्थानों से जुड़े रहे हैं। ‘ब्रज मंडल हेरिटेज कंवर्जेशन सोसाइटी’ के संस्थापक खंडेलवाल ने यमुना और ताजमहल संरक्षण पर दो ऐतिहासिक पुस्तकें लिखी हैं तथा बीबीसी (BBC), सीएनएन (CNN) और नेशनल ज्योग्राफिक के अंतरराष्ट्रीय वृत्तचित्रों में ब्रज की पर्यावरणीय आवाज़ को मुखर किया है। वे डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा और केंद्रीय हिंदी संस्थान में पत्रकारिता के अध्यापन से भी जुड़े रहे हैं।
HIGHLIGHTS
  1. ऐतिहासिक विधिक घोषणा: १९ जून २०२६ को सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद १९(१)(डी) और २१ के तहत सुव्यवस्थित फुटपाथ पर चलने को नागरिकों का बुनियादी मौलिक अधिकार घोषित किया।
  2. अदालती आदेश की क्रोनोलॉजी: मई २०२५ में जस्टिस जे.बी. पारदीवाला की पीठ द्वारा दिए गए राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा बोर्ड के निर्देशों की अगली कड़ी के रूप में ओल्गा टेलिस केस का उल्लेख करते हुए गरिमापूर्ण जीवन का हिस्सा माना।
  3. ताजनगरी का कड़वा विरोधाभास: एम.जी. रोड, फतेहाबाद रोड और यमुना किनारा मार्ग पर रसूखदारों के अवैध कब्जों, खंभों और टूटे स्लैब के कारण विदेशी पर्यटकों, बुजुर्गों व दिव्यांगजनों के समक्ष गहराता संकट।
  4. प्रशासन की विधिक अग्निपरीक्षा: सड़कों पर पहला हक गाड़ियों का नहीं बल्कि इंसानों का होने के न्यायिक संदेश के बाद आगरा विकास प्राधिकरण (ADA) और नगर निगम की जवाबदेही तय करने की पुरज़ोर वकालत।

सुप्रीम कोर्ट ने पैदल चलने को मौलिक अधिकार बनाया, अब परीक्षा आगरा की है

सड़कों पर पहला हक मोटर वाहनों का नहीं, पैदल यात्री का है: न्यायपीठ का ऐतिहासिक उद्घोष

— बृज खंडेलवाल

आगरा में सुबह की सैर अब सैर नहीं, संघर्ष बन गई है। स्कूल जाते बच्चे तेज़ बाइकों से बचते हुए सड़क पार करते हैं, बुज़ुर्ग फुटपाथ न होने पर जान जोखिम में डालकर चलते हैं, और ताज देखने आए पर्यटक पार्क की गाड़ियों, आवारा पशुओं, ठेलों और खुले नालों के बीच रास्ता तलाशते हैं। प्रेम के इस शहर में पैदल चलना आज एक साहसिक एडवेंचर, काम बन गया है।

यह तस्वीर अब बदल सकती है। 19 जून 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा कि सुरक्षित, सुस्पष्ट और सुव्यवस्थित फुटपाथ पर चलना नागरिकों का मौलिक अधिकार है, संविधान के अनुच्छेद 19(1)(डी) और 21 के तहत। न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और ए.एस. चंदूरकर की पीठ ने स्पष्ट किया कि सड़क पर पहला हक मोटर वाहनों का नहीं, पैदल यात्री का है। पीठ ने दिव्यांगजनों के लिए सुगम सुविधाओं और एक अलग राष्ट्रीय पैदल-सुरक्षा कानून की सिफारिश की, और कहा कि उल्लंघन की स्थिति में नागरिक मोटर वाहन अधिनियम से स्वतंत्र मुआवज़े और कानूनी राहत के हकदार होंगे।

यह फैसला अचानक नहीं आया। ठीक एक साल पहले, मई 2025 में, न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ केंद्र को फुटपाथ-दिशा-निर्देश और एक राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा बोर्ड बनाने का आदेश दे चुकी थी। मौजूदा फैसला उसी सिलसिले की अगली कड़ी है: अदालत ने मामले को अनुच्छेद 32 की याचिका के रूप में फिर दर्ज किया, केंद्र को पक्ष बनाया, और 1985 के ओल्गा टेलिस बनाम बॉम्बे म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन फैसले का हवाला देकर कहा कि फुटपाथ तक सुरक्षित पहुँच गरिमा से जीने के अधिकार का हिस्सा है।

आगरा के लिए यह चेतावनी है

यह शहर दशकों से वाहनों के हिसाब से बढ़ा, इंसानों के हिसाब से नहीं। सड़कें चौड़ी हुईं, फ्लाईओवर बने, पार्किंग बढ़ी; पर फुटपाथ या तो बने ही नहीं, या अतिक्रमण की भेंट चढ़ गए। एम.जी. रोड, फतेहाबाद रोड, सिकंदरा, शाहगंज और यमुना किनारा मार्ग पर एक ही कहानी दिखती है: दुकानों ने फुटपाथ निगल लिए हैं, वाहन उन पर खड़े हैं, बिजली के खंभे और टूटे स्लैब राह रोकते हैं, खुले मैनहोल जान जोखिम में डालते हैं। इसकी सबसे बड़ी कीमत वही चुकाते हैं जिनके पास निजी वाहन नहीं; बच्चे, महिलाएँ, बुज़ुर्ग, दिव्यांगजन।

ताज न्यूज़ की रपट के अनुसार, विरोधाभास भी चुभता है: हर साल लाखों पर्यटक ताज देखने आते हैं, पर शहर की सड़कों पर वे खुद को असुरक्षित पाते हैं। यह सिर्फ सुविधा का मामला नहीं। इसका असर सड़क सुरक्षा, जनस्वास्थ्य और पर्यावरण पर भी पड़ता है, क्योंकि पैदल चलना हतोत्साहित होने पर ट्रैफिक और प्रदूषण बढ़ते हैं।

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मांगें जो अब संवैधानिक ताकत पा गई हैं

शहर के नागरिक अधिकार कार्यकर्ता वर्षों से इस संकट को उठाते रहे हैं; लेखों, अभियानों और रिपोर्टों के ज़रिए फुटपाथों की कमी, तेज़ रफ्तार वाहनों, आवारा पशुओं और अव्यवस्थित यातायात के खतरे सामने लाते रहे हैं। उनकी मांग रही है: यमुना किनारा मार्ग समेत हर इलाके से अतिक्रमण हटाया जाए, भारतीय सड़क कांग्रेस के मानकों के अनुरूप फुटपाथ और साइकिल ट्रैक बनें, और अवैध पार्किंग पर सख्ती हो। सुप्रीम कोर्ट का फैसला अब इन्हीं मांगों को कानूनी आधार देता है।

रिपोर्ट के अनुसार, अब परीक्षा प्रशासन की है। देश की सर्वोच्च अदालत का संदेश साफ है: सड़कें सिर्फ गाड़ियों के लिए नहीं हैं, उन पर पहला हक पैदल चलने वालों का है। अब आगरा विकास प्राधिकरण, नगर निगम, लोक निर्माण विभाग और ट्रैफिक पुलिस की बारी है, हर नई सड़क परियोजना में सुरक्षित फुटपाथ, सुगम क्रॉसिंग, साइकिल ट्रैक और दिव्यांगजन-अनुकूल सुविधाएँ अनिवार्य करनी होंगी, पुराने मार्गों का पुनर्विकास करना होगा, और अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई लगातार चलानी होगी।

ताज न्यूज़ की रपट के अनुसार, जो शहर अपने पैदल यात्रियों की रक्षा नहीं कर सकता, वह खुद को स्मार्ट या विश्वस्तरीय नहीं कह सकता। आगरा ने दशकों मशीनों के लिए सड़कें बनाई हैं। अब समय इंसानों के लिए रास्ते बनाने का है, क्योंकि हर नागरिक और हर पर्यटक को बिना डर के चलने का अधिकार है। असली सवाल यह है कि यह अदालती आदेश कागज़ों तक सीमित तो नहीं रह जाएगा। जवाबदेही अब केवल नैतिक नहीं, क़ानूनी भी है। आगरा के नागरिक संगठनों, मीडिया और स्थानीय निकायों को इस मौके का इस्तेमाल प्राधिकरणों से स्पष्ट समय-सीमा और जवाबदेही माँगने के लिए करना चाहिए, ताकि यह ऐतिहासिक फैसला सिर्फ एक और रिपोर्ट बनकर फाइलों में दफ़न न हो जाए।

(लेखक आगरा के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ पत्रकार, चिंतक एवं ब्रज मंडल हेरिटेज कंजर्वेशन सोसाइटी के संस्थापक हैं।)

Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News

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