मौत का लाइसेंस: ये हादसे नहीं, हस्ताक्षरित हत्याएँ हैं
मौत आती नहीं, बुलाई जाती है; निगरानी की नाकामी और जवाबदेही की कब्र पर खड़ा भारत
— बृज खंडेलवाल
आगरा चौपाटी पर झूले का जिप लॉक खुला, एक नौजवान ने स्वर्ग की यात्रा शुरू की। बेलनगंज क्षेत्र में मकान खुदाई में पूरी बैंक धंस गई। आए दिन जूता फैक्ट्रियों में आग लग रही है, घटिया मेंटिनेंस से लिफ्टों में लोग फंस रहे हैं। एक्सप्रेसवे पर डेली हादसों की संख्या गिनती से बाहर हो चली है। इस क्रूर व्यवस्था के चंगुल से बाहर सिर्फ नेता हैं, जो इत्तेफाकन हमेशा उठावनी या मृत्यु भोज में ही पहुंचते हैं।
रात गहरी होती है। शहर सो जाता है। लेकिन कहीं न कहीं एक इमारत ऐसी होती है जो आग का इंतजार कर रही होती है। कोई पुल होता है जो अपने आख़िरी सहारे पर टिका होता है। किसी फैक्ट्री का बॉयलर अपनी सीमा पार कर चुका होता है। किसी गोदाम में नियमों की धंज्जियाँ उड़ रही होती हैं। और किसी सरकारी फाइल पर वह आखिरी हस्ताक्षर हो चुका होता है जो सुनिश्चित करता है कि हादसा होने पर भी जिम्मेदार कोई नहीं होगा।
फिर सुबह अखबारों में खबर छपती है। हम उसे “दुर्घटना” कहते हैं। लेकिन सच यह है कि यह दुर्घटना नहीं होती। यह एक लंबी प्रक्रिया का अंतिम दृश्य होता है। एक ऐसी प्रक्रिया जिसमें लालच, लापरवाही और मिलीभगत वर्षों तक साथ-साथ चलते हैं। चार दशक पहले भोपाल गैस त्रासदी ने दुनिया को झकझोर दिया था। हजारों लोग जहरीली गैस के बादलों में घुटकर मर गए। दुनिया ने उस त्रासदी से सबक लिया। सुरक्षा नियम मजबूत हुए। कॉर्पोरेट जवाबदेही पर नए मानदंड बने। भारत ने क्या सीखा? यह सवाल आज भी उतना ही असहज है जितना 1984 में था।
मौत कभी अचानक नहीं आती
दिल्ली के एक होटल में इक्कीस लोग जिंदा जल गए। बाद में पता चला कि six कमरों के लाइसेंस पर पच्छीस कमरे चल रहे थे। फायर एनओसी नहीं थी। निकास द्वार अवरुद्ध थे। खिड़कियां बंद थीं। निरीक्षण भी हुए थे। कागज भी पूरे थे। फाइलें भी चलती रहीं। बस सुरक्षा कहीं नहीं थी। जब आग लगी तो लोगों के पास बचने का रास्ता नहीं था। इसे दुर्घटना कहना सच्चाई से भागना है। यह मौत को पहले से दिया गया निमंत्रण था।
छत्तीसगढ़ के बिजली संयंत्र में बॉयलर फटा। मजदूर मारे गए। गुजरात के मोरबी में मरम्मत के बाद खोला गया पुल टूट गया और 135 लोग नदी में समा गए। राजकोट के गेमिंग ज़ोन में आग लगी तो अवैध निर्माण की परतें खुलने लगीं। महाराष्ट्र और पंजाब में जहरीली शराब गरीबों की जान लेती रही। घटनाएं अलग-अलग थीं। कारण एक ही था—नियमों को बोझ समझने वाली व्यवस्था।
इतिहास बार-बार चेतावनी देता है
ताज न्यूज़ की रपट के अनुसार, 1995 में हरियाणा के डबवाली में स्कूल समारोह के दौरान पंडाल में आग लगी। तीन सौ से अधिक लोग मारे गए। अधिकांश बच्चे थे। 1997 में दिल्ली के उपहार सिनेमा में 59 लोग फिल्म देखने गए थे। वे लौटकर घर नहीं आए। बंद निकास, अवैध निर्माण और सुरक्षा नियमों की अनदेखी ने उन्हें मौत के हवाले कर दिया।
2001 में तमिलनाडु के एरवाडी में मानसिक रोगियों को जंजीरों से बांधकर रखा गया था। आग लगी तो वे भाग भी नहीं सके। 28 लोग जिंदा जल गए। 2004 में कुंभकोणम के स्कूल में फूस की छत और संकरी सीढ़ियां 94 बच्चों की चिता बन गईं। 2011 में कोलकाता का एएमआरआई अस्पताल, जो जीवन बचाने के लिए बना था, खुद मौत का जाल बन गया। 95 लोगों की दम घुटने से मौत हुई।
हर बार जांच बैठी। हर बार रिपोर्ट आई। हर बार वादे किए गए। और हर बार कुछ महीनों बाद सब कुछ सामान्य हो गया, मानो कुछ हुआ ही न हो। सिवाकासी की पटाखा फैक्ट्रियां आज भी समय-समय पर फटती हैं। अखबारों में तस्वीरें छपती हैं। नेता संवेदना व्यक्त करते हैं। मुआवजे घोषित होते हैं। फिर वही पुराना खेल शुरू हो जाता है।
एक राष्ट्रीय बीमारी
इसे मैं “भोपाल त्रासदी सिंड्रोम” कहता हूं। यह कोई चिकित्सकीय बीमारी नहीं है। यह हमारी प्रशासनिक संस्कृति का स्थायी रोग है। इसके लक्षण बेहद परिचित हैं—नियमों को विकास विरोधी बताओ, निरीक्षण को आय का स्रोत बना दो, शिकायतों को फाइलों में दबा दो, चेतावनियों को नजरअंदाज करो, हादसा होने दो, फिर जांच समिति बना दो, कुछ छोटे अधिकारियों को निलंबित कर दो, मुआवजे की घोषणा कर दो और अगले हादसे का इंतजार करो।
इस पूरी प्रक्रिया में वे लोग शायद ही कभी पकड़े जाते हैं जिन्होंने अवैध निर्माण को संरक्षण दिया, जिन्होंने एनओसी को व्यापार बना दिया, जिन्होंने जहरीली शराब या असुरक्षित फैक्ट्रियों को राजनीतिक और प्रशासनिक छतरी प्रदान की। व्यवस्था के बड़े खिलाड़ी अक्सर बच निकलते हैं। बलि हमेशा छोटे लोग चढ़ते हैं।
बयान कभी नहीं बदलते
देश बदल गया। तकनीक बदल गई। सरकारें बदल गईं। लेकिन हर त्रासदी के बाद सुनाई देने वाले वाक्य नहीं बदले—”दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा”, “उच्च स्तरीय जांच के आदेश दे दिए गए हैं”, “मृतकों के परिजनों को उचित मुआवजा दिया जाएगा।” इन वाक्यों को सुनते-सुनते देश की कई पीढ़ियां बड़ी हो चुकी हैं।
भोपाल ने दुनिया को सिखाया था कि सुरक्षा पर खर्च किया गया पैसा कभी व्यर्थ नहीं जाता। हमने उससे शायद एक अलग ही सबक सीखा कि समय सबसे बड़ा क्लीनर है। कुछ साल बीत जाएंगे, जनता भूल जाएगी, मीडिया नया विषय ढूंढ लेगा, फाइलों पर धूल जम जाएगी और दोषी फिर किसी नई फाइल पर हस्ताक्षर कर रहे होंगे।
आखिर कब तक?
जब बिना फायर एनओसी के होटल चलते हैं, जब अवैध मंजिलें खड़ी होती हैं, जब पुलों का निरीक्षण केवल कागजों पर होता है, जब फैक्ट्रियां सुरक्षा नियमों को मजाक समझती हैं, तब मौत अचानक नहीं आती। उसे बुलाया जाता है। उसके लिए रास्ता बनाया जाता है। इन मौतों को “दुर्घटना” कहना एक राष्ट्रीय आत्म-छल है। इनके जन्म प्रमाण पत्र पर पहले से ही लालच, भ्रष्टाचार और मिलीभगत के हस्ताक्षर दर्ज होते हैं।
ताज न्यूज़ की रपट के अनुसार, जब तक बड़े संरक्षक बचते रहेंगे और छोटे कर्मचारी बलि के बकरे बनते रहेंगे, तब तक हर आग, हर ढहती इमारत, हर जहरीली बोतल और हर टूटा पुल हमें एक ही बात याद दिलाता रहेगा: मौत नई होती है, लापरवाही पुरानी होती है, शव बदल जाते हैं, व्यवस्था नहीं। और शायद यही इस देश की सबसे बड़ी त्रासदी है कि भोपाल कभी गया ही नहीं।
(लेखक आगरा के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ पत्रकार, चिंतक एवं ब्रज मंडल हेरिटेज कंजर्वेशन सोसाइटी के संस्थापक हैं।)