यह सबसे बुरा समय था, यह सबसे अच्छा समय भी था!

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Article Desk, 🌐 tajnews.in | Sunday, 2 August, 2026, 06:10:00 PM IST.

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Srijan Bhattacharya
सृजन भट्टाचार्य
मूल आलेख: सृजन भट्टाचार्य (महासचिव, स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया – SFI) | हिंदी अनुवाद: संजय पराते (उपाध्यक्ष, छत्तीसगढ़ किसान सभा)। यह आलेख भारत की ‘जेन-ज़ी’ (Gen-Z) पीढ़ी के ऐतिहासिक छात्र आंदोलन, नीट पेपर लीक के खिलाफ प्रतिरोध, जंतर-मंतर पर पुलिसिया दमन और तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे तक फैले राष्ट्रीय जन-उभार का सीधा जमीनी व राजनीतिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

यह सबसे बुरा समय था, यह सबसे अच्छा समय भी था!

भारत ने अपनी आंखों के सामने इतिहास बनते देखा। बारह सालों के लंबे शासन में पहली बार, नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार को देश की जागरूक जनता के अभूतपूर्व जन-दबाव के सामने इस हद तक संवैधानिक रूप से झुकना पड़ा कि उनके एक सबसे करीबी सहयोगी को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। नीट (NEET) परीक्षा का राष्ट्रव्यापी पेपर लीक, सीबीएसई (CBSE) ओएसएम मूल्यांकन में गंभीर धांधली और देश की युवा आबादी पर सीजेआई की विवादित व अपमानजनक टिप्पणियों के बाद, मौजूदा केंद्र सरकार के प्रति ‘जेन-ज़ी’ (नई पीढ़ी) के भीतर बरसों से सुलग रहे गुस्से और निराशा का एक महा-सामाजिक विस्फोट हुआ। इस जन-आक्रोश ने हाल के दौर में भारत के सबसे विशाल, अनुशासित और अनूठे छात्र-युवा आंदोलन को जन्म दिया, जिसने आखिरकार तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को अपने पद से इस्तीफा देने के लिए पूरी तरह मजबूर कर दिया।

जैसा कि आज की नई पीढ़ी, यानी जेन-ज़ी कहती है, यह मामला केवल एक परीक्षा का नहीं बल्कि बहुत बड़ा और देश के भविष्य से जुड़ा बेहद गंभीर मुद्दा था। विधिक सच को अब और दबाया नहीं जा सकता।

हम सभी अच्छी तरह जानते हैं कि इसके बाद घटनाक्रमों ने क्या ऐतिहासिक रुख अख्तियार किया। नीट पेपर लीक कोई मामूली या छोटा-मोटा प्रशासनिक घोटाला नहीं था। इस संगठित अपराध से देश भर के 22 लाख से ज़्यादा मेधावी परीक्षार्थी सीधे तौर पर प्रभावित हुए और निराशा के भंवर में फंसकर 20 से ज़्यादा मासूम छात्रों की दुर्भाग्यपूर्ण मौतें (आत्महत्याएं) हो गईं। जिस दिन पेपर लीक का मामला जगज़ाहिर हुआ, यानी 12 मई 2026 को, स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) देश का पहला ऐसा जिम्मेदार छात्र संगठन था, जो केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के तुरंत इस्तीफ़े और पीड़ित छात्रों को न्याय दिलाने की मांग को लेकर निर्भीकता से सड़कों पर उतरा। आधिकारिक साक्ष्यों के अनुसार, पिछले 10 सालों के दौरान देश भर में यह 151वां बड़ा पेपर लीक था। केंद्रीय परीक्षाओं के इस विकराल संकट के मामले में, एसएफआई की मांगें सिर्फ़ एक मंत्री के इस्तीफ़े तक ही सीमित नहीं थीं; हमने राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) को पूरी तरह भंग करने और आख़िरकार विवादास्पद नई शिक्षा नीति (NEP) 2020 को पूरी तरह वापस लेने की पुरजोर मांग की, क्योंकि शिक्षा के व्यवसायीकरण और कुप्रबंधन की सारी जड़ें वहीं गहराई तक फैली हुई हैं।

हमेशा की तरह, बिक चुके मुख्यधारा के गोदी मीडिया ने शुरुआत में नीट अभ्यर्थियों की भयानक परेशानी और उनके जीवन-मरण के सवाल को कोई राष्ट्रीय मुद्दा नहीं माना तथा ज़्यादा से ज़्यादा समय तक देश की जनता को इस बड़े घोटाले से अनजान व भ्रमित बनाए रखने की भरपूर कोशिश की। लेकिन देश के मुख्य न्यायाधीश द्वारा जब यह संवेदनहीन टिप्पणी आई कि देश के युवा ‘कॉकरोच’ और ‘परजीवी’ की तरह बेकार हैं, तो देश के युवाओं का सुलगता गुस्सा जल्द ही डिजिटल मीडिया की दुनिया में प्रचंड रूप से उभरने लगा। देखते ही देखते केवल कुछ ही दिनों में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के सोशल मीडिया अकाउंट्स पर लाखों-करोड़ों युवा फ़ॉलोअर्स जुड़ते चले गए, जो एक शांत पड़े जन-ज्वालामुखी के अचानक जागने का स्पष्ट शुरुआती संकेत था। मौजूदा निजाम के प्रति देश की जेन-ज़ी पीढ़ी का यह भारी असंतोष खुलकर सामने आने लगा था; और 6 जून तक, सीजेपी ने देश की राजधानी नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर विशाल सार्वजनिक विरोध-प्रदर्शन आयोजित करने के लिए अभूतपूर्व जन-समर्थन जुटा लिया।

एसएफआई की रणनीतिक भूमिका और जन-आंदोलन का विस्तार

एसएफआई इस देशव्यापी आंदोलन में पहले दिन से ही बहुत सक्रियता से शामिल रही है। एक ऐसे वामपंथी-प्रगतिशील छात्र संगठन के रूप में, जो पहले से ही देश के तमाम राज्यों में शिक्षा के इन्हीं बुनियादी सवालों पर व्यापक जनमत तैयार कर रहा था, एसएफआई की राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने तय किया कि अपनी स्वतंत्र सांगठनिक पहलों को जारी रखने के साथ-साथ ‘कॉकरोच आंदोलन’ की विशाल जन-सभाओं में अग्रिम पंक्ति में शामिल होना और वहां एकत्र होने वाले लाखों युवाओं तक अपना स्पष्ट राजनीतिक व वैचारिक संदेश पहुँचाना बेहद ज़रूरी है। सीजेपी के गैर-राजनीतिक नेतृत्व के शुरुआती तौर-तरीकों को लेकर तमाम तरह की आशंकाओं के बावजूद, हमने इस ऐतिहासिक आंदोलन का अटूट हिस्सा बनने का साहसिक फ़ैसला किया। हम बहुत अच्छी तरह जानते थे कि हमारी प्राथमिक भूमिका आंदोलन के प्रवक्ताओं द्वारा उठाए जा रहे उन सभी बुनियादी मुद्दों का पूरी ताकत से समर्थन करना है, जो केंद्र सरकार की पारदर्शी व निष्पक्ष परीक्षाएँ आयोजित कराने की विफलता से जुड़े हैं। इसके साथ ही, इस विशाल जन-आंदोलन के ज़रिए देश के समूचे शिक्षा क्षेत्र में और भी व्यापक ढाँचागत सुधारों की स्वतंत्र रूप से माँग करना है, ताकि हमारी प्राथमिक व उच्च शिक्षा को ज़्यादा समतापूर्ण, वैज्ञानिक और लोकतांत्रिक बनाया जा सके।

जब सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक और प्रतिष्ठित सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक इस छात्र आंदोलन से सीधे जुड़े और नीट पेपर लीक व शिक्षा माफिया के मामले में केंद्र सरकार से सीधी विधिक जवाबदेही की मांग करते हुए उन्होंने अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की, तो दिल्ली का जंतर-मंतर इस राष्ट्रव्यापी आंदोलन का मुख्य धुरी बन गया। आइसा (AISA) के जांबाज कार्यकर्ता भी तुरंत इस अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल में शामिल हो गए। एसएफआई ने सीजेपी कोर टीम के साथ मिलकर यह नीतिगत ढांचा तय किया कि जब सीजेपी औपचारिक भूख हड़ताल शुरू करेगी, तब एसएफआई के शीर्ष नेतृत्वकर्ता भी उनके साथ अनशन पर बैठेंगे; और फिलहाल, वे मिलकर देश भर के ज़्यादा से ज़्यादा छात्रों को इस मैदानी संघर्ष से जोड़ने का काम करेंगे। इस दौरान सीपीआई (एम) और अन्य तमाम वामपंथी-प्रगतिशील पार्टियों ने हर संभव तरीके से आंदोलन को अपना नैतिक व सांगठनिक समर्थन दिया। जंतर-मंतर पर अनवरत चल रहे धरने में गैर-भाजपा सामाजिक व राजनीतिक संगठनों के वरिष्ठ नेताओं के साथ-साथ देश के प्रमुख धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवी, लेखक और संस्कृतिकर्मी भी लगातार मौजूद रहे।

जल्द ही जंतर-मंतर एक ऐसा मिसाली लोकतांत्रिक जगह बन गया, जहाँ भारत के अलग-अलग राज्यों और कोनों से आए लोग — बिना किसी जाति, पंथ, भाषा या धर्म के भेदभाव के — एक साथ जुटने, रहने और विचार-विमर्श करने लगे। देश भर से उमड़ी युवाओं की भीड़ वहाँ दिन-रात एक-दूसरे से सामाजिक-राजनैतिक संवाद करती थी, और देखते ही देखते यह जगह नफ़रत, विद्वेष और ‘दूसरों को अलग-थलग करने’ की उस विभाजनकारी राजनीति के ख़िलाफ़ एक बुलंद आवाज़ बन गई, जिसे आरएसएस-भाजपा गठबंधन लगातार बढ़ावा देता रहा है। यह इस छात्र आंदोलन का सबसे खूबसूरत और अहम पहलू था, क्योंकि इसने पूरे देश को दिखाया कि कैसे सभी नागरिकों के साझा अधिकारों से जुड़ा कोई बुनियादी मुद्दा देशवासियों को एक सूत्र में पिरो सकता है, भले ही ‘गोदी मीडिया’ और भाजपा की बदनाम आईटी सेल (IT Cell) लगातार नफरती प्रोपेगैंडा फैलाते रहे हों। जंतर-मंतर पर चल रहा यह विरोध-प्रदर्शन एक प्रतिरोधोत्सव जैसा महसूस होता था, जहाँ हर तबके और दूर-दराज के क्षेत्रों के हज़ारों छात्र-छात्राएं रोज़ाना एकत्र होते थे। एसएफआई के विशेष स्टॉल, ‘क्रांति कॉर्नर’, ने पूरे आंदोलन के दौरान जंतर-मंतर की वैचारिक रौनक और ऊर्जा को बनाए रखने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई।

20 जुलाई: पुलिसिया बर्बरता, जंतर-मंतर का ‘जलियांवाला बाग़’ और अभूतपूर्व प्रतिरोध

युवाओं के इस आंदोलन में एक बड़ा और उग्र मोड़ तब आया, जब सोनम वांगचुक को उनकी भूख हड़ताल के 21वें दिन दिल्ली पुलिस की भारी टुकड़ियों ने जंतर-मंतर धरना स्थल से आधी रात को ज़बरदस्ती उठाकर अज्ञात जगह भेज दिया। इस बर्बर कार्रवाई की खबर फैलते ही पूरे देश में विरोध की भीषण लहरें दौड़ गईं। अब तक मुख्य रूप से छात्रों और युवाओं तक सीमित रहा यह आंदोलन एक विशाल जन-आंदोलन का रूप धारण करने लगा था। देश की प्रबुद्ध सिविल सोसाइटी, शिक्षक संगठनों और आम नागरिकों ने अपनी आवाज़ बुलंद करनी शुरू कर दी और दिल्ली पुलिस के इस पूरी तरह अलोकतांत्रिक व दमनकारी कदम के ख़िलाफ़ ज़बरदस्त जन-आक्रोश शुरू हो गया। याद रहे कि दिल्ली पुलिस किसी राज्य सरकार के नहीं, बल्कि सीधे भारत सरकार के केंद्रीय गृह मंत्रालय के सीधे नियंत्रण में आती है। इसके तुरंत बाद एसएफआई के अखिल भारतीय अध्यक्ष आदर्श एम. साजी और राष्ट्रीय संयुक्त सचिव आइशी घोष, सीजेपी के प्रमुख अभिजीत दीपके के साथ जंतर-मंतर पर ही अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठ गए। जंतर-मंतर पर देश भर से उमड़े लोगों की भारी भीड़ जुटने लगी और आंदोलित प्रदर्शनकारियों ने 20 जुलाई को संसद भवन तक शांतिपूर्ण ‘संसद मार्च’ निकालने का ऐतिहासिक आह्वान कर दिया।

20 जुलाई 2026 का वह ऐतिहासिक दिन इस राष्ट्रव्यापी आंदोलन के लिए एक अत्यंत निर्णायक और परिवर्तनकारी मोड़ साबित हुआ। एक रात पहले से ही हज़ारों की संख्या में युवा और नागरिक नई दिल्ली की सीमाओं और रेलवे स्टेशनों पर जुटने लगे थे। उनकी मांग पूरी तरह साफ और न्यायसंगत थी: देश की तबाह हो चुकी शिक्षा व्यवस्था में हुई घोर गड़बड़ियों के लिए केंद्र सरकार अपनी विधिक जवाबदेही तय करे और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान तुरंत अपने पद से इस्तीफ़ा दें। केंद्र सरकार के पास आंदोलित प्रदर्शनकारियों के प्रतिनिधियों से लोकतांत्रिक बातचीत करके इस गंभीर मुद्दे का समाधान निकालने का पूरा अवसर मौजूद था, लेकिन इसके विपरीत उसने अपनी पुरानी अहंकारी शैली में बेतहाशा पुलिसिया हिंसा और दमन का रास्ता चुना। 20 जुलाई को जंतर-मंतर के पूरे इलाके को आधुनिक ‘जलियांवाला बाग़’ में तब्दील कर दिया गया; प्रदर्शन स्थल के चारों ओर कई फीट ऊंचे लोहे के कंटीले बैरिकेड्स खड़े कर दिए गए। निहत्थे मासूम छात्रों से निपटने के लिए नई दिल्ली की सड़कों पर दिल्ली पुलिस, आरएएफ (RAF) और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों की भारी टुकड़ियाँ तैनात की गईं, यहाँ तक कि पड़ोसी राज्यों से भी विशेष पुलिस बल मंगा लिए गए। ऐसा खौफनाक मंज़र था जैसे केंद्र सरकार ने अपने ही देश के नौजवानों के ख़िलाफ़ अघोषित गृह-युद्ध छेड़ दिया हो। एक तरफ़ देश का भावी भविष्य यानी निहत्थी आंदोलित जनता थी, तो दूसरी तरफ़ पूरे राज्य का दमनकारी प्रशासनिक तंत्र, जो अपने ही नागरिकों पर बर्बर कार्रवाई करने के लिए मुस्तैद खड़ा था।

लेकिन युवाओं के प्रचंड आवेग के सामने सरकारी बैरिकेड्स ताश के पत्तों की तरह टूट गए। पुलिसिया बलप्रयोग की तमाम कोशिशों के बावजूद, हज़ारों आक्रोशित छात्र-छात्राएं संसद की ओर जाने वाली मुख्य सड़कों पर पहुँच गए। किसी भी प्रदर्शनकारी का मकसद संसद भवन पर कब्ज़ा करना या हिंसा करना बिल्कुल नहीं था। वे बस इतना चाहते थे कि देश के जनप्रतिनिधि और सरकार उनकी जायज शिकायतों पर ध्यान दें। स्थिति बिगड़ती देख प्रधानमंत्री संसद भवन के पिछले दरवाजे से निकल गए। इसके कुछ ही देर बाद पुलिस ने बेकसूर छात्रों पर अंधाधुंध हिंसक लाठीचार्ज शुरू कर दिया। शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की आवाज़ को दबाने के लिए आँसू गैस के सैकड़ों गोले, काँटेदार लाठियां, इलेक्ट्रिक शॉक और घातक पैलेट गन का खुलेआम इस्तेमाल किया गया। घंटों तक देश की राजधानी का दिल कहा जाने वाला इलाका पुलिस बल की अकल्पनीय और बर्बर क्रूरता का प्रत्यक्ष गवाह बना। बेगुनाह छात्र-छात्राओं के साथ सड़क पर दौड़ा-दौड़ाकर मारपीट व गंभीर बदसलूकी की गई और उन्हें जबरन बसों में भरकर दूर-दराज के थानों में हिरासत में ले जाया गया। पुलिस बल की आड़ में छिपे हुए संघ के उपद्रवियों ने भी भीड़ पर हिंसक हमले किए। पूरी दुनिया ने बेहद हैरानी और थू-थू के साथ देखा कि लोकतांत्रिक कहलाने वाली कोई चुनी हुई सरकार अपने ही देश के होनहार युवाओं के साथ कितनी बेदर्दी से पेश आ सकती है। इस बर्बर दमन में हज़ारों युवा प्रभावित हुए और सैकड़ों छात्र गंभीर रूप से घायल हो गए। अकेले एसएफआई के 40 से ज़्यादा प्रमुख कार्यकर्ताओं को लहूलुहान अवस्था में प्राथमिक इलाज के लिए पास के अस्पतालों में भर्ती कराना पड़ा।

लेकिन ठीक यहीं पर भारत की आम जनता और युवाओं ने अपनी असीम व फौलादी इच्छाशक्ति का परिचय दिया। हर उस मोड़ पर, जब दंभी सरकार को लगा कि वह लाठी और गोलियों के जोर-जबरदस्ती से इस आंदोलन को हमेशा के लिए खत्म कर देगी, प्रदर्शनकारी युवा और भी दुगुने जोश और नैतिक बल के साथ वापस सड़कों पर आए। 20 जुलाई की शाम होते-होते, तितर-बितर हुई भीड़ फिर से अभूतपूर्व रूप से एकजुट हुई और ध्वस्त हो चुके जंतर-मंतर पर दोबारा जमा हो गई। तब तक दिल्ली पुलिस ने वहाँ प्रदर्शनकारियों के सभी तंबू, मंच और सामान पूरी तरह तहस-नहस कर दिए थे। लेकिन उसी पुलिसिया मलबे के बीच से आंदोलन का एक नया ऐतिहासिक पुनर्जन्म हुआ। खुद को ‘कॉकरोच’ कहने वाले इन आंदोलित युवाओं ने एक स्वर में बुलंद ऐलान किया कि वे इस जगह से अब एक इंच भी पीछे नहीं हटेंगे; या तो शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दें, या फिर यह जन-विद्रोह देश के कोने-कोने में फैल जाएगा। यहाँ अब कोई बीच का समझौता मुमकिन नहीं था। मासूम नागरिकों और सहपाठियों पर हुई पुलिसिया बर्बरता के ख़िलाफ़ पूरा भारत गुस्से से उबल रहा था। शरीर पर लगी गंभीर चोटों, बहते खून और पट्टियों के बावजूद, छात्रों ने तिरंगे झंडे और देशभक्ति के नारों को फिर से बुलंद किया और 20 जुलाई की देर रात तक अपने प्रतिरोध का रुख इस अलोकतांत्रिक मोदी सरकार की नींव की ओर मोड़ दिया।

राष्ट्रव्यापी जन-उभार और ऐतिहासिक जीत

सत्ताधारी भाजपा की राजनीतिक परेशानी तब और अधिक विकराल हो गई, जब देश के अलग-अलग राज्यों में युवाओं और छात्र संगठनों ने ज़बरदस्त विरोध-प्रदर्शन शुरू कर दिए। विशेष रूप से कोलकाता, पटना, लखनऊ और मुंबई जैसे बड़े महानगरों में ‘कॉकरोच आंदोलन’ के समर्थन में लाखों की भारी भीड़ सड़कों पर उतर आई। दक्षिण में केरल से लेकर उत्तर-पूर्व में असम तक और उत्तर में हिमाचल से लेकर दक्षिण में तेलंगाना तक, देश के पूरे 23 राज्यों में एसएफआई के झंडे तले पुलिस की इस बर्बरता के खिलाफ़ विशाल चक्का जाम व विरोध-प्रदर्शन हुए। राज्यों में भी पुलिसिया लाठीचार्ज जारी रहा, लेकिन हमारी ‘जेन-ज़ी’ पीढ़ी के प्रदर्शनकारियों का बुलंद हौसला कभी कम होता नहीं दिखा। विरोध दर्ज कराने के उनके अनूठे, आधुनिक, सृजनात्मक और व्यंग्यात्मक तरीकों से यह पूरी तरह साफ़ हो चुका था कि सरकारी दमन के डर पर व्यवस्था परिवर्तन का साहस और पक्का इरादा पूरी तरह हावी हो चुका था। मोदी सरकार के खिलाफ़ उफनता यह प्रचंड जन-आक्रोश — जो सीधे केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के बिना शर्त इस्तीफ़े की मांग में तब्दील हो चुका था — देश के हर हिस्से और हर गाँव-शहर में साफ़ तौर पर देखा जा सकता था।

सीजेपी के प्रतिनिधिमंडल के साथ कई दौर की आपातकालीन बैठकों के बाद, आखिरकार घबराई हुई केंद्र सरकार उनकी अधिकांश मुख्य माँगें मानने को तैयार हो गई। दो सबसे प्रमुख माँगें थीं — नीट धांधली के पीड़ितों और मृत छात्रों के परिवारों को भारी आर्थिक मुआवज़ा देना और जंतर-मंतर सहित देश भर में प्रदर्शनकारियों पर दर्ज किए गए सभी झूठे पुलिस मुकदमों को बिना शर्त वापस लेना। इन दोनों बिंदुओं पर सहमति बनने के बावजूद, सत्ता पक्ष आखिरी समय तक धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग पर टालमटोल करने की हताश कोशिश करता रहा। परंतु तब तक, यह लड़ाई सिर्फ़ सीजेपी की कोर टीम के हाथ में ही सीमित नहीं रह गई थी। देश की जागरूक आम जनता और सड़कों पर डटे लाखों युवाओं ने साफ़ कर दिया था कि वे शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े से कम किसी भी समझौते को कतई ज़ाहूर नहीं करेंगे। साथ ही 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर हुई बर्बरता के लिए प्रधानमंत्री से सार्वजनिक रूप से माफ़ी की माँग भी उठने लगी थी। यह स्पष्ट भांपते हुए कि यह छात्र आंदोलन अब नियंत्रण से बाहर होकर पूरे भारत में एक बड़े राजनीतिक विद्रोह का रूप ले चुका है और अब किसी भी तरह के प्रोपेगैंडा या पुलिसिया दमन से इन बेखौफ युवाओं को हराना असंभव होगा, आखिरकार 25 जुलाई 2026 की दोपहर को केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को अपना इस्तीफा सौंपने पर मजबूर होना पड़ा।

हम सभी ने अपनी आंखों से देखा कि भारत की यह नई युवा पीढ़ी अपनी न्यायपूर्ण बात पर अटूट रूप से अड़ गई और उसने सत्ता के मुंह पर स्पष्ट कह दिया—’अब बहुत हो चुका! तुम्हारी नफरत फैलाने वाली और बांटने वाली पुरानी चालें अब हमें बेवकूफ नहीं बना सकतीं।’ यह स्वतंत्र भारत के इतिहास में सचमुच एक अभूतपूर्व और ऐतिहासिक मोड़ था।

आगे की राह: वैचारिक लड़ाई और संरचनात्मक सुधार

अब इस ऐतिहासिक जीत के बाद सबसे महत्वपूर्ण और मुश्किल सवाल यह खड़ा होता है कि आगे सीजेपी और यह युवा आंदोलन किस दिशा और रास्ते पर चलेगा? क्या देश की आम जनता अपनी इस अंतर्निहित क्रांति-शक्ति को पूरी तरह पहचान पाएगी, या फिर यह विशाल आंदोलन केवल एक मंत्री के इस्तीफ़े तक ही सीमित होकर समाप्त हो जाएगा?

फिलहाल तो पूरी जिम्मेदारी के साथ यही कहा जा सकता है कि यदि कोई और आगे आए या न आए, स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) देश की उन सभी प्रगतिशील, लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष ताकतों को एकजुट करने के लिए रात-दिन अथक प्रयास करेगा, जो भारत की ध्वस्त हो चुकी शिक्षा नीतियों में केवल ऊपरी या दिखावटी बदलावों से संतुष्ट नहीं हैं, बल्कि वास्तविक विधिक व संरचनात्मक सुधारों की कड़ी मांग कर रही हैं। हम सीजेपी टीम की भावी गतिविधियों पर भी पैनी नज़र रखेंगे और निष्पक्ष विश्लेषण करेंगे कि वे किस वैचारिक दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं। ‘कॉकरोच आंदोलन’ ने निसंदेह एक बहुत बड़ा लोकतांत्रिक मंच तैयार किया था, जिसके कुछ अपने मौलिक आधार थे, लेकिन उन सबसे बढ़कर, यह देश की आम जनता और छात्र थे, जिन्होंने अपनी न्यूनतम साझा मांगों के आधार पर इस आंदोलन को स्वतःस्फूर्त रूप से आगे बढ़ाया है। अब भारत की चरमराई सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था को बचाने के लिए आगे बढ़कर निर्णायक पहल करना एसएफआई का प्राथमिक कर्तव्य है। हम अपने इन क्रांतिकारी लक्ष्यों को प्राप्त करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे।

महान दार्शनिक कार्ल मार्क्स ने हीगेल के ‘अधिकार के दर्शन की आलोचना’ में बहुत ही सटीक लिखा था कि—”जब कोई क्रांतिकारी विचार देश की आम जनता द्वारा गहराई से अपना लिया जाता है, तो वह विचार खुद एक विशाल भौतिक शक्ति (Material Force) में तब्दील हो जाता है।” भारत ने मई से जुलाई 2026 के इन ऐतिहासिक महीनों के दौरान एक ऐसा अभूतपूर्व जन-विद्रोह देखा, जिसने खुद को अजेय और अमर समझने वाले सत्ताधीशों को बहुत ही बेदर्दी से उनकी वास्तविक औकात दिखा दी है। भारत की आम जनता और उसकी इस नई ‘जेन-ज़ी’ पीढ़ी की ओर से हुआ यह प्रचंड प्रतिरोध बेहद ज़रूरी था, ख़ासकर इसलिए, क्योंकि इसने देश की नव-फ़ासीवादी ताकतों को भी यह सबक अच्छी तरह सिखा दिया है कि सत्ता के सिंहासन पर बैठे चंद लोगों की तुलना में इस देश की लोकतांत्रिक जनता की सामूहिक शक्ति हमेशा कई गुना बड़ी और सर्वोपरि होती है। सच से आंखें चुराना अब पूरी तरह बंद होना चाहिए।

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Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News

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