1977 की ऐतिहासिक अखबारी कतरनों से सामने आया ताज संरक्षण आंदोलन का शुरुआती अध्याय, मथुरा रिफाइनरी के विरोध में बृज खंडेलवाल सहित पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने किया था उपवास

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Agra Desk, 🌐 tajnews.in | Saturday, 01 August, 2026, 11:25:58 PM IST.

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tajnews.in | आगरा: ताजमहल को औद्योगिक प्रदूषण से बचाने के संघर्ष का इतिहास केवल न्यायालयों तक सीमित नहीं है। ताज न्यूज़ की रपट के अनुसार, हमारे पास सुरक्षित मई 1977 की तीन ऐतिहासिक अखबारी कतरनें इस बात का दस्तावेज़ी प्रमाण प्रस्तुत करती हैं कि मथुरा ऑयल रिफाइनरी से ताजमहल को संभावित खतरे के विरोध में पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने जनस्तर पर आंदोलन शुरू किया था। यह आंदोलन वरिष्ठ अधिवक्ता एम.सी. मेहता द्वारा बाद में शुरू की गई न्यायिक लड़ाई से पहले का महत्वपूर्ण अध्याय माना जा सकता है।

HIGHLIGHTS
  1. ऐतिहासिक दस्तावेज: मई 1977 की 3 अखबारी कतरनों से सामने आई ताज संरक्षण आंदोलन की ऐतिहासिक शुरुआत।
  2. 1977 का आंदोलन: बृज खंडेलवाल व पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने मथुरा रिफाइनरी के विरोध में दिल्ली में रखा था उपवास।
  3. अंतरराष्ट्रीय अखबारों की सुर्खियां: The Times of India, The Statesman और Hindustan Times ने प्रमुखता से प्रकाशित की थी खबर।
  4. न्यायिक लड़ाई से पहले की नींव: वरिष्ठ अधिवक्ता एम.सी. मेहता की कानूनी जंग से पूर्व का है यह जनआंदोलन।
1977 ताज संरक्षण आंदोलन और मथुरा रिफाइनरी विरोध प्रदर्शन का प्रतीकात्मक चित्रण
1977 की ऐतिहासिक अखबारी कतरनें - मथुरा रिफाइनरी के विरोध में बृज खंडेलवाल व पर्यावरण कार्यकर्ताओं का उपवास

उपलब्ध अखबारी अभिलेखों के अनुसार, ‘सोसाइटी फॉर डिफेन्स ऑफ एनवायरनमेंट’ से जुड़े पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने बृज खंडेलवाल सहित नई दिल्ली में एक दिवसीय उपवास रखकर प्रस्तावित मथुरा ऑयल रिफाइनरी का विरोध किया था। आंदोलनकारियों का कहना था कि रिफाइनरी से निकलने वाली सल्फर डाइऑक्साइड तथा अन्य प्रदूषक गैसें विश्व धरोहर ताजमहल के सफेद संगमरमर को दीर्घकालीन क्षति पहुंचा सकती हैं।

आंदोलनकारियों की प्रमुख मांग थी कि रिफाइनरी को ताज क्षेत्र से पर्याप्त दूरी पर स्थापित किया जाए तथा औद्योगिक विकास के साथ देश की सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए। उनका तर्क था कि यदि ताजमहल को नुकसान पहुंचा तो उसकी भरपाई कभी संभव नहीं होगी।

उपलब्ध दस्तावेज़ों के अनुसार, उस समय देश के प्रमुख अंग्रेजी समाचार पत्रों ने इस आंदोलन को प्रमुखता से प्रकाशित किया था। 22 मई 1977 को The Times of India ने “Refinery threat to Taj: 2 go on day’s fast”, जबकि 23 मई 1977 को The Statesman ने “Environmentalists Go On Fast” तथा Hindustan Times ने “Ecologists fast to save Taj” शीर्षकों के साथ इस विरोध आंदोलन का विस्तृत समाचार प्रकाशित किया।

बृज खंडेलवाल ने साझा की 1977 के आंदोलन की यादें

ताज न्यूज़ से विशेष बातचीत में पर्यावरण कार्यकर्ता बृज खंडेलवाल ने बताया कि वर्ष 1977 का यह उपवास केवल प्रतीकात्मक विरोध नहीं था, बल्कि ताजमहल को संभावित औद्योगिक प्रदूषण से बचाने के उद्देश्य से चलाया गया एक गंभीर जनआंदोलन था। उन्होंने उस समय के संघर्ष, सीमित संसाधनों और आंदोलन के दौरान आई कठिनाइयों को याद करते हुए कहा कि उस दौर में पर्यावरण संरक्षण को लेकर जनजागरूकता आज की तुलना में काफी कम थी, फिर भी कार्यकर्ताओं ने ताजमहल की सुरक्षा के प्रश्न को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने का प्रयास किया।

उन्होंने कहा कि मई 1977 की ये अखबारी कतरनें केवल पुराने समाचार नहीं हैं, बल्कि ताजमहल संरक्षण आंदोलन के शुरुआती चरण का ऐतिहासिक दस्तावेज हैं। उनके अनुसार, बाद के वर्षों में वरिष्ठ अधिवक्ता एम.सी. मेहता ने इस मुद्दे को न्यायपालिका के समक्ष प्रभावी ढंग से उठाया और उनकी कानूनी लड़ाई ने ताज संरक्षण को नई दिशा दी। उन्होंने कहा कि इतिहास को समग्रता में देखा जाना चाहिए, ताकि शुरुआती जनआंदोलनों और बाद की न्यायिक पहल—दोनों को उनका उचित स्थान मिल सके।

उपलब्ध दस्तावेज़ों और प्रत्यक्षदर्शी के अनुभवों से यह स्पष्ट होता है कि ताजमहल संरक्षण का इतिहास कई चरणों में विकसित हुआ। इसमें प्रारंभिक जनआंदोलन, पर्यावरण कार्यकर्ताओं के प्रयास और बाद की न्यायिक लड़ाई—सभी की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इतिहास के इस क्रम को संपूर्णता में समझना और संरक्षित रखना आवश्यक है, ताकि आने वाली पीढ़ियों को ताज संरक्षण आंदोलन की वास्तविक पृष्ठभूमि से परिचित कराया जा सके।

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Thakur Pawan Singh Editor in Chief Taj News

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