संसद की गरिमा और शिक्षाविदों का सम्मान: राजनीतिक असहमति की भी एक मर्यादा होनी चाहिए
लोकतंत्र की सबसे बड़ी वास्तविक शक्ति विचारों की जीवंत विविधता और सिद्धांतों पर असहमति व्यक्त करने की स्वतंत्रता है। संसद देश का सर्वोच्च लोकतांत्रिक और संवैधानिक मंच है, जहाँ जनहितैषी नीतियों, नए कानूनों और सरकार के प्रशासनिक निर्णयों पर तीखी बहस होना पूरी तरह से स्वाभाविक और अपेक्षित है। किंतु जब संसद के भीतर यह विमर्श नीतिगत तर्कों से हटकर व्यक्तिगत टिप्पणियों, व्यंग्यात्मक कटाक्षों या किसी व्यक्ति की आत्म-गरिमा को ठेस पहुँचाने वाली भाषा में बदल जाता है, तब यह केवल किसी एक व्यक्ति विशेष का नहीं, बल्कि उस गरिमामय पद, संवैधानिक संस्था और समूचे देश के शैक्षणिक परिवेश का भी गंभीर अपमान बन जाता है। विधिक सच को अब और दबाया नहीं जा सकता और संसदीय संवाद में उच्च स्तर की अपेक्षा हमेशा बनी रहेगी।
हाल ही में देश की सर्वोच्च पंचायत यानी लोकसभा में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) मद्रास के निदेशक प्रो. वी. कामाकोटी के संदर्भ में की गई व्यक्तिगत टिप्पणी और उसके तुरंत बाद देश के 215 वर्तमान एवं पूर्व कुलपतियों, शोध निदेशकों तथा वरिष्ठ शिक्षाविदों द्वारा जारी सामूहिक खुला पत्र इसी गहरी राष्ट्रव्यापी चिंता को प्रखरता से सामने लाता है। इस ऐतिहासिक प्रतिवाद पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में एसोसिएशन ऑफ इंडियन यूनिवर्सिटीज (AIU) के अध्यक्ष एवं छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर के कुलपति प्रो. विनय कुमार पाठक, एआईयू की महासचिव डॉ. पंकज मित्तल, अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE) के अध्यक्ष प्रो. टी. जी. सीताराम, राष्ट्रीय शैक्षिक प्रौद्योगिकी मंच (NETF) के अध्यक्ष एवं एआईसीटीई के पूर्व अध्यक्ष प्रो. अनिल सहस्रबुद्धे, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) की कुलपति प्रो. शांतिश्री धुलीपुडी पंडित, और दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) के कुलपति प्रो. योगेश सिंह सहित देश के अनेक प्रतिष्ठित वर्तमान एवं पूर्व कुलपति तथा वरिष्ठ शिक्षाविद शामिल हैं। इन सभी विचारकों ने सार्वजनिक व संसदीय जीवन में भाषा की गरिमा बनाए रखने और देश के वैज्ञानिकों व शिक्षाविदों के सम्मान की रक्षा करने का सामूहिक व कड़ा आग्रह किया है।
यह गंभीर प्रश्न केवल किसी एक व्यक्ति विशेष का नहीं है। भारत के विभिन्न विश्वविद्यालयों, केंद्रीय अनुसंधान संस्थानों और शीर्ष तकनीकी संस्थानों में रात-दिन सेवारत हजारों शिक्षकों, वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं का आत्म-सम्मान वास्तव में देश की अक्षय बौद्धिक पूंजी का सम्मान है। यदि देश की संसद जैसे सर्वोच्च विधिक मंच से उनके अकादमिक जीवन के लिए अपमानजनक या तंज़ भरे शब्दों का प्रयोग होगा, तो इसका अत्यंत नकारात्मक और घातक संदेश समाज के निचले स्तर तक पहुँचेगा। ऐसी गैर-संसदीय टिप्पणियों के कई गंभीर और दूरगामी दुष्परिणाम हो सकते हैं:
पहला, इससे देश की नई पीढ़ी और छात्रों के मन में अपने गुरुओं, शिक्षकों और वैज्ञानिकों के प्रति श्रद्धा व सम्मान की भावना तेज़ी से कमजोर पड़ सकती है।
दूसरा, हमारे शीर्ष शैक्षणिक संस्थानों की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा बुरी तरह प्रभावित होती है और उनके प्रशासनिक नेतृत्व पर अनावश्यक राजनीतिक विवाद हावी हो जाते हैं।
तीसरा, देश के अत्यंत प्रतिभाशाली शिक्षाविद, वैज्ञानिक और शोधकर्ता सार्वजनिक जीवन में या नीति-निर्माण में अपनी निष्पक्ष राय रखने से बचने लगते हैं, क्योंकि उन्हें यह आशंका सताने लगती है कि उनके मौलिक विचारों पर स्वस्थ विमर्श करने के बजाय उनका व्यक्तिगत उपहास उड़ाया जाएगा।
चौथा, इससे समूचे समाज में तर्कपूर्ण और तथ्यपरक बहस की स्वस्थ संस्कृति समाप्त होने लगती है और लोकतांत्रिक संवाद की जगह तीखे कटाक्ष, भद्दे व्यंग्य और व्यक्तिगत हमले लेने लगते हैं। अंततः इसका सीधा प्रतिकूल असर हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं में आम जनता के विश्वास पर भी पड़ता है।
किसी भी परिपक्व लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी शिक्षाविद, वैज्ञानिक, न्यायविद, स्वतंत्र पत्रकार, उद्योगपति या सर्वोच्च सार्वजनिक पद पर आसीन व्यक्ति के विचारों से पूरी तरह असहमति होना विधिक रूप से स्वीकार्य और लोकतांत्रिक है। उनके द्वारा लिए गए निर्णयों, बनाई गई नीतियों और दिए गए सार्वजनिक वक्तव्यों की तथ्यात्मक एवं तार्किक आलोचना करना देश के हर नागरिक और जनप्रतिनिधि का मौलिक अधिकार है। लेकिन आलोचना का स्वर हमेशा ऐसा होना चाहिए जो संबंधित व्यक्ति की मानवीय व पेशेवर गरिमा को ज़रा भी ठेस न पहुँचाए। जब राजनीतिक बहस तथ्यों से भटककर व्यक्तिगत छींटाकशी तक पहुँच जाती है, तो उसका सबसे बड़ा नुकसान हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं की साख और विश्वसनीयता को होता है।
हमारे राजनीतिक नेताओं की बोली और भाषा का समूचे समाज पर गहरा व्यापक प्रभाव पड़ता है। देश की जनता, विशेषकर युवा पीढ़ी, अपने निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के आचरण और भाषणों से ही संवाद की शैली सीखती है। यदि संसद के भीतर मर्यादित, संजीदा और तथ्यपरक भाषा का प्रयोग किया जाएगा, तो देश के आम समाज में भी स्वस्थ व अनुशासित बहस की संस्कृति विकसित होगी। इसके विपरीत यदि संसद में ही व्यक्तिगत कटाक्ष, तुच्छ तंज़ और अपमानजनक शब्द सामान्य हो जाएँगे, तो सार्वजनिक जीवन में शालीनता, मर्यादा और पारस्परिक सम्मान का स्तर लगातार गिरता ही चला जाएगा।
आज समय की मांग है कि देश के सभी राजनीतिक दल और उनके शीर्ष नेता विचारों और नीतियों पर तीखा विमर्श करें, व्यक्तियों पर व्यक्तिगत प्रहार नहीं। वे सरकारी नीतियों का पुरज़ोर विरोध करें, लेकिन हमारी स्वायत्त संस्थाओं और उनके प्रमुखों की गरिमा का सम्मान हर हाल में बनाए रखें। भारतीय लोकतंत्र की वास्तविक मजबूती केवल हर पाँच साल में चुनाव कराने से तय नहीं होती, बल्कि संवाद की गुणवत्ता, भाषा की मर्यादा और परस्पर सम्मान के भाव से तय होती है। हमारी संसद केवल कानून बनाने का एक बेजान मंच नहीं है, बल्कि वह भारत की लोकतांत्रिक संस्कृति का सर्वोच्च आदर्श भी है। इसलिए वहाँ बोले गए प्रत्येक शब्द और तंज़ की नैतिक जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी होती है। राजनीतिक मतभेद हमारे लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति हैं, लेकिन व्यक्तिगत सम्मान की रक्षा करना लोकतंत्र की अनिवार्य मर्यादा है। यदि हम इस संतुलन को ईमानदारी से बनाए रखेंगे, तभी भारत की गौरवशाली लोकतांत्रिक परंपरा और उसकी महान शैक्षणिक संस्थाओं की प्रतिष्ठा एक साथ सुरक्षित रह सकेगी। सच से आंखें चुराना अब पूरी तरह बंद होना चाहिए।