Agra Desk, 🌐 [tajnews.in] | Saturday, 18 July, 2026, 07:30:00 PM IST.

tajnews.in | आगरा: ताजनगरी के ऐतिहासिक सरोजनी नायडू (एस.एन.) मेडिकल कॉलेज के प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग के चिकित्सकों ने एक बार फिर अपनी उच्च स्तरीय चिकित्सा विशेषज्ञता, अदम्य साहस और आधुनिक शल्य कौशल का लोहा मनवाया है। विभाग की विशेषज्ञ सर्जिकल टीम ने एक 27 वर्षीय अत्यंत उच्च जोखिम (हाई-रिस्क) वाली गर्भवती महिला का सफलतापूर्वक बेहद जटिल ऑपरेशन संपन्न किया है। डॉक्टरों ने न केवल एक स्वस्थ और किलकारियां भरते शिशु को सुरक्षित रूप से जन्म दिलाया, बल्कि महिला के गर्भाशय में मौत का जाल बुनकर बैठे 7×8 सेंटीमीटर के एक बेहद विशालकाय फाइब्रॉइड (रसोली) को भी शरीर से बाहर निकाल दिया। इस जटिल शल्यक्रिया की सफलता के बाद वर्तमान में माँ और बच्चा दोनों पूरी तरह सुरक्षित व स्वस्थ हैं, जिसे चिकित्सा जगत में एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।
गर्भाशय के निचले हिस्से में फाइब्रॉइड होने से जान का खतरा, हिस्टरेक्टॉमी की थी पूरी आशंका
प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग के क्लिनिकल विन्यास से प्राप्त विस्तृत केस विवरण के अनुसार, 27 वर्षीय यह महिला 37 सप्ताह की पूर्ण गर्भवती थी। मरीज का चिकित्सीय इतिहास पहले से ही काफी पेचीदा और गंभीर था। उसका पहला प्रसव भी गंभीर परिस्थितियों में सीज़ेरियन (एलएससीएस) विन्यास के तहत हुआ था और वह वर्तमान में गंभीर हाइपोथायरॉयडिज़्म नामक थायराइड विकार से भी बुरी तरह ग्रसित थी। चिकित्सा टीम के समक्ष सबसे बड़ी विधिक और सर्जिकल चुनौती यह थी कि यह विशाल फाइब्रॉइड गर्भाशय के सबसे संवेदनशील और संकरे निचले भाग (लोअर यूटेराइन सेगमेंट) में पूरी तरह विकसित हो चुका था। इस स्थिति में चीरा लगाते ही गर्भाशय की धमनियों से अत्यधिक और अनियंत्रित रक्तस्राव (ब्लीडिंग) होने की 100% आशंका थी, जो कि मरीज के लिए तत्काल कार्डियक अरेस्ट या मौत का कारण बन सकती थी।
ऐसी नाजुक परिस्थितियों में सामान्यतः डॉक्टरों के पास महिला की जान बचाने के लिए उसके पूरे गर्भाशय को ही काटकर शरीर से अलग करने (हिस्टरेक्टॉमी) के अतिरिक्त कोई विधिक विकल्प नहीं बचता है, जिससे महिला भविष्य में कभी दोबारा माँ बनने का सुख प्राप्त नहीं कर पाती। लेकिन एस.एन. मेडिकल कॉलेज के स्त्री रोग विशेषज्ञों ने आपात्कालीन स्थिति में भी अपना धैर्य नहीं खोया। डॉक्टरों ने आधुनिक शल्य तकनीकों, उन्नत संवहनी अवरोध (वैस्कुलर ओक्लूजन) और सटीक टांके लगाने की पद्धति का उपयोग कर रक्तस्राव को चमत्कारिक रूप से नियंत्रित कर लिया। डॉक्टरों ने न केवल रक्त की एक-एक बूंद की विधिक रक्षा की, बल्कि महिला के गर्भाशय के मूल विन्यास को भी पूरी तरह सुरक्षित और अक्षुण्ण बचा लिया।
प्राचार्य प्रो. प्रशांत गुप्ता ने सराहा, विभागाध्यक्ष प्रो. शिखा सिंह की टीम ने पेश की मिसाल
इस गौरवमयी और ऐतिहासिक सफलता पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए एस.एन. मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य प्रो. प्रशांत गुप्ता ने कहा, “यह अत्यंत जटिल शल्यक्रिया हमारी क्लीनिकल टीम के उत्कृष्ट अंतर्विभागीय समन्वय और आधुनिक चिकित्सा कौशल का एक जीता-जागता प्रमाण है। सीज़ेरियन प्रसव के साथ ही इतने भारी फाइब्रॉइड को एक साथ निकालना चिकित्सा विज्ञान के दृष्टिकोण से बेहद जोखिम भरा विन्यास माना जाता है। लेकिन हमारे चिकित्सकों ने विशेष शल्य तकनीकों का उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए माँ और बच्चे दोनों को नया जीवन दिया है। एस.एन. मेडिकल कॉलेज ताजनगरी और समूचे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के निर्धन व गंभीर से गंभीर मरीजों को न्यूनतम खर्च में विश्वस्तरीय, सुरक्षित और आधुनिक उपचार प्रदान करने के लिए विधिक रूप से पूरी तरह प्रतिबद्ध है।”
इस ऐतिहासिक सफल ऑपरेशन को प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग की विभागाध्यक्ष प्रो. शिखा सिंह के कुशल और कड़े दिशानिर्देशों के तहत अंजाम दिया गया। ऑपरेशन थियेटर के भीतर मोर्चा संभालने वाली मुख्य सर्जिकल टीम में डॉक्टर उर्वशी, डॉ. दिव्या यादव, डॉ. सुमन गुप्ता, सीनियर रेज़िडेंट डॉ. नीलांक्षा तथा जूनियर रेज़िडेंट डॉ. प्रतिमा शामिल रहीं, जिन्होंने कड़े तनाव के बीच कई घंटों तक सूझबूझ से सर्जरी की। वहीं, सर्जरी के दौरान मरीज को बेहोश रखने और उसके वाइटल्स को स्थिर बनाए रखने वाली एनेस्थीसिया टीम का कुशल नेतृत्व डॉ. अमृता ने मुस्तैदी से किया। विशेषज्ञों की इस संयुक्त और सटीक प्री-ऑपरेटिव प्लानिंग के कारण ही ऑपरेशन शत-प्रतिशत सफल रहा। सफल उपचार के पश्चात अब माँ और नवजात शिशु दोनों को पूर्णतः स्वस्थ घोषित कर अस्पताल से ससम्मान और सुरक्षित रूप से डिस्चार्ज कर घर भेज दिया गया है, जिससे पीड़ित परिवार में अपार खुशियाँ हैं।
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Thakur Pawan Singh
Chief Editor, Taj News
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