सियासत के कीचड़ में बेटियाँ क्यों?: राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के नाम पर परिवारों, खासकर बेटियों को निशाना बनाना लोकतंत्र नहीं, सामाजिक पतन का संकेत है

खबर शेयर कीजिए

Article Desk, Taj News | Tuesday, June 23, 2026, 04:32:15 PM IST

Taj News Logo
Taj News
Article Desk
Brij Khandelwal
बृज खंडेलवाल
वरिष्ठ पत्रकार
एवं पर्यावरणविद्
आगरा के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ पत्रकार और प्रतिष्ठित पर्यावरणविद् बृज खंडेलवाल ने वर्ष 1972 में ‘भारतीय जनसंचार संस्थान’ (IIMC, नई दिल्ली) से पत्रकारिता की शुरुआत की। वे ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’, ‘इंडिया टुडे’, ‘इंडिया एब्रॉड’, and अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी ‘IANS’ सहित देश-विदेश के कई शीर्ष मीडिया संस्थानों से जुड़े रहे हैं। ‘ब्रज मंडल हेरिटेज कंवर्जेशन सोसाइटी’ के संस्थापक खंडेलवाल ने यमुना और ताजमहल संरक्षण पर दो ऐतिहासिक पुस्तकें लिखी हैं तथा बीबीसी (BBC), सीएनएन (CNN) और नेशनल ज्योग्राफिक के अंतरराष्ट्रीय वृत्तचित्रों में ब्रज की पर्यावरणीय आवाज़ को मुखर किया है। वे डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा और केंद्रीय हिंदी संस्थान में पत्रकारिता के अध्यापन से भी जुड़े रहे हैं।
HIGHLIGHTS
  1. मर्यादाहीन होती राजनीति: चुनावी रैलियों से लेकर सोशल मीडिया के डिजिटल अखाड़े तक वैचारिक मतभेदों के स्थान पर नेताओं के निर्दोष परिवारों और बेटियों पर होने वाले घिनौने हमलों की गंभीर समीक्षा।
  2. ट्रोल संस्कृति का खौफनाक चेहरा: मनगढ़ंत अफवाहों, फोटोशॉप की गई तस्वीरों और फर्जी वीडियो के जरिए चंद लाइक्स व सनसनी बटोरने के लिए बेटियों के मानसिक और सामाजिक उत्पीड़न की पड़ताल।
  3. साझा तहजीब का संदेश: उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कथन “बेटी तो बेटी होती है” को रेखांकित कर बेटियों के सम्मान को दल, धर्म और जातिगत राजनीति से ऊपर रखने की पुरज़ोर पैरवी।
  4. मूल मुद्दों से भटकाव: सियासत जब दुष्प्रचार और चरित्र-हनन के कीचड़ में सिमट जाती है, तब बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई और किसानों की वास्तविक बुनियादी समस्याएं पूरी तरह से पृष्ठभूमि में चली जाती हैं।

सियासत का कीचड़: “बेटी तो बेटी होती है”

राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के नाम पर परिवारों, खासकर बेटियों को निशाना बनाना लोकतंत्र नहीं, सामाजिक पतन का संकेत है

— बृज खंडेलवाल

सूरज ढल चुका था, लेकिन लखनऊ की एक पुरानी हवेली में रोशनी अभी भी जल रही थी। अखबारों के बिखरे पन्नों और टीवी चैनलों के शोर के बीच 22 वर्षीय प्रिया अपनी किताबों में डूबी थी। तभी फोन की घंटी बजी। दोस्त का संदेश था, “प्रिया, तुम ठीक हो? सोशल मीडिया पर क्या चल रहा है?” स्क्रीन खुलते ही उसकी दुनिया बदल गई। कहीं चोरी की अफवाह, कहीं गुमशुदगी की मनगढ़ंत कहानी, कहीं फोटोशॉप की गई तस्वीरें। एक ट्रोल ने लिखा, “नेता की बेटी का असली चेहरा सामने आ गया।” देखते ही देखते लाइक्स, कमेंट्स और शेयरों की बाढ़ आ गई। कुछ लोग इसे मजाक समझ रहे थे, कुछ लोग इसे राजनीतिक हथियार बना रहे थे। घर में सन्नाटा था। माँ की आँखों में आँसू थे। पिता की खामोशी में गुस्सा और बेबसी।

राजनीति हमेशा ऐसी नहीं थी। मतभेद होते थे, तीखी बहसें भी होती थीं, लेकिन परिवारों को निशाना बनाने की परंपरा नहीं थी। विरोधियों पर वैचारिक हमले होते थे, निजी जीवन पर नहीं। आज बहस का मंच कीचड़ उछालने का अखाड़ा बनता जा रहा है। मुद्दे गायब हैं, मर्यादा लापता है। देश के अलग-अलग हिस्सों से ऐसी घटनाएँ लगातार सामने आ रही हैं। कभी किसी नेता की बेटी को फर्जी वीडियो से बदनाम किया जाता है, कभी किसी की पत्नी या माँ को अभद्र टिप्पणियों का शिकार बनाया जाता है। चुनावी रैलियों से लेकर सोशल मीडिया तक, राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता अब निजी हमलों में बदलती जा रही हैं।

सोशल मीडिया का मकड़जाल और चारित्रिक हनन

तमिलनाडु, महाराष्ट्र, बिहार, राजस्थान या उत्तर प्रदेश, कोई प्रदेश इससे अछूता नहीं है। सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और खतरनाक बना दिया है। एक झूठी पोस्ट मिनटों में लाखों लोगों तक पहुँच जाती है। किसी को सनसनी चाहिए, किसी को लाइक्स चाहिए, तो किसी को अपने विरोधी को नीचा दिखाने का अवसर। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हाल में कहा, “बेटी तो बेटी होती है।” यह केवल एक राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि हमारी साझा संस्कृति और तहजीब की याद दिलाने वाला संदेश है। बेटियों का सम्मान किसी दल, धर्म, जाति या विचारधारा का विषय नहीं हो सकता।

ताज न्यूज़ की रपट के अनुसार, इस मामले में पुलिस ने त्वरित कार्रवाई की। विभिन्न राजनीतिक दलों ने भी एक स्वर में इसकी निंदा की। यह स्वागतयोग्य है, लेकिन समस्या केवल एक घटना तक सीमित नहीं है। जब तक राजनीतिक दल अपने समर्थकों को संयम और जवाबदेही का पाठ नहीं पढ़ाएँगे, तब तक ऐसी घटनाएँ रुकने वाली नहीं हैं। जरा उस लड़की की कल्पना कीजिए, जिसका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं। वह स्कूल जाती है, सपने देखती है, दोस्तों के साथ हँसती है। अचानक पिता की राजनीतिक पहचान उसकी अपनी पहचान पर भारी पड़ जाती है। उसकी तस्वीरें वायरल होने लगती हैं। संदर्भ बदल दिए जाते हैं। स्कूल में सवाल उठते हैं, मोहल्ले में कानाफूसी शुरू हो जाती है। परिवार की नींद उड़ जाती है।

यह भी पढ़ें

लोकतांत्रिक सुचिता और सामूहिक चेतना का ह्रास

रिपोर्ट के अनुसार, लोकतंत्र में असहमति जरूरी है। सरकार की आलोचना होनी चाहिए, विपक्ष से सवाल पूछे जाने चाहिए। लेकिन जब बहस परिवारों तक पहुँच जाती है, तब असली मुद्दे दम तोड़ देते हैं। बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, महँगाई और किसानों की समस्याएँ पीछे छूट जाती हैं। चर्चा अफवाहों और अपमान तक सिमट जाती है। हमें ठहरकर सोचना होगा। हर सनसनीखेज पोस्ट को साझा करने से पहले उसकी सच्चाई परखें। राजनीतिक कार्यकर्ता हों, इन्फ्लुएंसर हों या आम नागरिक, सभी को संयम दिखाना होगा। झूठ फैलाने वाला दोषी है, लेकिन बिना जाँच उसे आगे बढ़ाने वाला भी उतना ही जिम्मेदार है।

ताज न्यूज़ की रपट के अनुसार, सत्ता बदलती रहती है। नेता आते-जाते रहते हैं। लेकिन समाज की शालीनता एक बार टूट जाए, तो उसे जोड़ने में पीढ़ियाँ लग जाती हैं। बेटी तो बेटी होती है। यह कोई नारा नहीं, हमारी सामूहिक चेतना का हिस्सा होना चाहिए। क्योंकि जब सियासत बेटियों को निशाना बनाती है, तब हार किसी एक दल की नहीं होती, पूरे समाज की होती है। और इस हार की भरपाई कोई चुनावी जीत नहीं कर सकती।

(लेखक आगरा के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ पत्रकार, चिंतक एवं ब्रज मंडल हेरिटेज कंजर्वेशन सोसाइटी के संस्थापक हैं।)

Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News

खबर शेयर कीजिए

Leave a Comment

Verified by MonsterInsights