बीस लाख सपने, सवा लाख सीटें: भारत को और मेडिकल कॉलेज चाहिए या नई परीक्षा व्यवस्था ?

खबर शेयर कीजिए

Article Desk, Taj News | Tuesday, June 23, 2026, 11:21:40 AM IST

Taj News Logo
Taj News
Article Desk
Brij Khandelwal
बृज खंडेलवाल
वरिष्ठ पत्रकार
एवं पर्यावरणविद्
आगरा के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ पत्रकार और प्रतिष्ठित पर्यावरणविद् बृज खंडेलवाल ने वर्ष 1972 में ‘भारतीय जनसंचार संस्थान’ (IIMC, नई दिल्ली) से पत्रकारिता की शुरुआत की। वे ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’, ‘इंडिया टुडे’, ‘इंडिया एब्रॉड’, और अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी ‘IANS’ सहित देश-विदेश के कई शीर्ष मीडिया संस्थानों से जुड़े रहे हैं। ‘ब्रज मंडल हेरिटेज कंवर्जेशन सोसाइटी’ के संस्थापक खंडेलवाल ने यमुना और ताजमहल संरक्षण पर दो ऐतिहासिक पुस्तकें लिखी हैं तथा बीबीसी (BBC), सीएनएन (CNN) और नेशनल ज्योग्राफिक के अंतरराष्ट्रीय वृत्तचित्रों में ब्रज की पर्यावरणीय आवाज़ को मुखर किया है। वे डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा और केंद्रीय हिंदी संस्थान में पत्रकारिता के अध्यापन से भी जुड़े रहे हैं।
HIGHLIGHTS
  1. आँकड़ों का भीषण असंतुलन: नीट-यूजी परीक्षा में २० लाख से अधिक परीक्षार्थियों के मुकाबले देश भर के ८२३ मेडिकल कॉलेजों में मात्र १,२९,६०२ सीटों की विवशता पर गहन मंथन।
  2. कोचिंग उद्योग का मकड़जाल: प्रवेश परीक्षा के चलते देश में पनपे अरबों रुपये के रटंत व्यावसायिक तंत्र, ग्रामीण-गरीब छात्रों के साथ होने वाले विधिक व सामाजिक भेदभाव का तटस्थ विश्लेषण।
  3. आर्थिक विषमता का दंश: कुल सीटों में से केवल ६३ हजार सीटें सरकारी संस्थानों में उपलब्ध होने तथा निजी कॉलेजों में करोड़ों की फीस के कारण मध्यमवर्गीय सपनों के टूटने की पड़ताल।
  4. नीतिगत सुधारों की पैरवी: साल में दो बार परीक्षा के आयोजन, हर ज़िले के अस्पताल को सुसज्जित मेडिकल कॉलेज में बदलने और जनसांख्यिकी के आधार पर ढांचागत विस्तार की पुरज़ोर वकालत।

बीस लाख सपने, सवा लाख सीटें: भारत को और मेडिकल कॉलेज चाहिए या नई परीक्षा व्यवस्था ?

— बृज खंडेलवाल

हर साल भारत के लाखों घरों में एक ही सपना पलता है। बेटा या बेटी डॉक्टर बने। हर साल यह सपना एक कठिन परीक्षा से गुजरता है। और हर साल उम्मीदों का पहाड़ आंकड़ों की दीवार से टकरा जाता है। इस वर्ष नीट-यूजी परीक्षा में 20 लाख से अधिक विद्यार्थियों ने भाग लिया। दूसरी ओर, देश में एमबीबीएस की कुल सीटें लगभग 1.29 लाख हैं। देशभर के 823 मेडिकल कॉलेजों में 1,29,602 सीटें उपलब्ध हैं। यानी एक सीट के लिए औसतन 16 से अधिक अभ्यर्थियों के बीच मुकाबला है। सरकारी मेडिकल कॉलेजों की सीटों के लिए यह प्रतिस्पर्धा और भी भयावह है। 140 करोड़ की आबादी वाले देश का स्वास्थ्य भविष्य इतनी सीमित सीटों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।

यह सच है कि पिछले कुछ वर्षों में भारत ने मेडिकल शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। कुछ साल पहले जहां एमबीबीएस सीटों की संख्या करीब 1.09 लाख थी, वह बढ़कर लगभग 1.30 लाख तक पहुंच गई है। नए मेडिकल कॉलेज खुले हैं और कई संस्थानों में सीटें बढ़ाई गई हैं। लेकिन मांग की रफ्तार आपूर्ति से कहीं तेज है। डॉक्टर बनने का सपना अब केवल महानगरों या संपन्न परिवारों तक सीमित नहीं रहा। छोटे शहरों, कस्बों और गांवों के छात्र दिन-रात मेहनत कर रहे हैं। कई युवा कोचिंग संस्थानों में वर्षों बिताते हैं। परिवार अपनी जमा-पूंजी खर्च कर देते हैं। फिर भी सरकारी सीटें इतनी कम हैं कि मेहनत और प्रतिभा के बावजूद हजारों योग्य छात्र पीछे छूट जाते हैं।

कोचिंग माफिया और शिक्षा का बाजारीकरण

आलोचकों का मानना है कि राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) ने अनजाने में एक विशाल कोचिंग उद्योग को जन्म दिया है, जो छात्रों की आशंकाओं और सपनों से मुनाफा कमाता है। उनका तर्क है कि यह परीक्षा अब प्रतिभा, संवेदनशीलता और वास्तविक समझ से अधिक महंगी कोचिंग, परीक्षा तकनीकों और रटंत शिक्षा को बढ़ावा देती है। इससे ग्रामीण, गरीब और सरकारी स्कूलों के विद्यार्थियों के लिए अवसर असमान हो जाते हैं। कोचिंग संस्थानों की बढ़ती संख्या, ऊंची फीस और प्रश्नपत्र लीक जैसी घटनाओं ने इस धारणा को मजबूत किया है कि शिक्षा के इर्द-गिर्द एक शक्तिशाली व्यावसायिक तंत्र विकसित हो चुका है। हालांकि, नीट को “माफियाओं की साजिश” कहना एक राय है, स्थापित तथ्य नहीं, क्योंकि इसके समर्थन में संगठित आपराधिक गठजोड़ का कोई ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

ताज न्यूज़ की रपट के अनुसार, जब सफलता केवल योग्यता से नहीं, बल्कि फीस भरने की क्षमता से तय होने लगे, तब व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है। देश की कुल एमबीबीएस सीटों में लगभग 63 हजार सीटें सरकारी संस्थानों में हैं। शेष सीटें निजी और डीम्ड विश्वविद्यालयों में हैं, जहां फीस लाखों रुपये सालाना से लेकर पूरे पाठ्यक्रम के लिए करोड़ों रुपये तक पहुंच जाती है। ऐसे में गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए डॉक्टर बनने का सपना अक्सर अधूरा रह जाता है। यह केवल छात्रों की समस्या नहीं है। यह देश के सार्वजनिक स्वास्थ्य का सवाल है।

यह भी पढ़ें

ढांचागत सुधार और स्वास्थ्य क्रांति की आवश्यकता

आज भी भारत के अनेक ग्रामीण और दूरदराज़ इलाकों में डॉक्टरों की भारी कमी है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र विशेषज्ञों के बिना चल रहे हैं। सरकारी अस्पतालों पर मरीजों का बोझ बढ़ता जा रहा है। डॉक्टर और मरीज के अनुपात में सुधार की जरूरत लगातार महसूस की जा रही है। मेडिकल शिक्षा का विस्तार केवल शैक्षणिक मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आवश्यकता है। समाधान मानकों को कम करना नहीं, अवसरों को बढ़ाना है। साल में दो बार अगर नीट परीक्षा आयोजित हो जाए, तो कोई आफत नहीं आ जाएगी।

रिपोर्ट के अनुसार, हर जिले में एक सुसज्जित मेडिकल कॉलेज और उससे जुड़ा शिक्षण अस्पताल होना चाहिए। जिला अस्पतालों को चरणबद्ध तरीके से मेडिकल कॉलेजों में बदला जाए। शिक्षकों की कमी दूर करने के लिए बेहतर वेतन, पारदर्शी भर्ती और आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं। सड़कें, हवाई अड्डे और औद्योगिक गलियारे जितने महत्वपूर्ण हैं, उतना ही महत्वपूर्ण स्वास्थ्य ढांचा भी है। डॉक्टर किसी देश की सबसे बड़ी पूंजी होते हैं।

ताज न्यूज़ की रपट के अनुसार, उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश और पूर्वोत्तर राज्यों जैसे अधिक आबादी वाले क्षेत्रों में नए मेडिकल कॉलेज खोलने की विशेष जरूरत है। साथ ही, निजी मेडिकल शिक्षा की फीस पर प्रभावी नियंत्रण और पारदर्शिता सुनिश्चित की जानी चाहिए। किसी भी प्रतिभाशाली छात्र का सपना केवल आर्थिक मजबूरी के कारण नहीं टूटना चाहिए। नीट में शामिल होने वाले 20 लाख से अधिक छात्र केवल आंकड़े नहीं हैं। वे देश की ऊर्जा हैं, उसकी आकांक्षाएं हैं और भविष्य की स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ हैं। डॉक्टर बनने का अवसर कुछ लोगों का विशेषाधिकार नहीं, हर योग्य छात्र का अधिकार होना चाहिए।

(लेखक आगरा के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ पत्रकार, चिंतक एवं ब्रज मंडल हेरिटेज कंजर्वेशन सोसाइटी के संस्थापक हैं।)

Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News

खबर शेयर कीजिए

Leave a Comment

Verified by MonsterInsights