स्वास्थ्य महानिदेशालय की 82 करोड़ की खरीद योजना पर सांसद सीमा द्विवेदी के पत्र के बाद शासन ने बिठाई जांच; सप्लायरों से सांठगांठ के आरोप, पुरानी मशीनों, नीलामी और एएमसी के रिकॉर्ड की भी होगी गहन पड़ताल
उत्तर प्रदेश डेस्क, 🌐 tajnews.in | शनिवार, 12 सितंबर 2026, 10:05:15 AM IST

tajnews.in | लखनऊ। उत्तर प्रदेश के सरकारी अस्पतालों के लिए प्रस्तावित करीब 82 करोड़ रुपये की मेडिकल उपकरण खरीद अब जांच के घेरे में आ गई है। खरीद प्रक्रिया को आगे बढ़ाने से पहले पूरे मामले की पड़ताल कराने के निर्देश दिए गए हैं। जांच में प्रस्तावित खरीद की जरूरत और प्रक्रिया के साथ-साथ स्वास्थ्य महानिदेशालय के अधिकारियों और उपकरण आपूर्तिकर्ताओं के बीच संभावित सांठगांठ के आरोपों की भी जांच होगी।
मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जांच का दायरा सिर्फ नई खरीद तक सीमित नहीं रखा गया है। पहले खरीदे गए चिकित्सा उपकरणों का इस्तेमाल, उनकी मौजूदा स्थिति, खराब उपकरणों की मरम्मत, उन्हें निष्प्रयोज्य घोषित करने और नीलामी से मिली रकम तक का हिसाब जांच के दायरे में आएगा।
मुख्यमंत्री कार्यालय के निर्देश के बाद चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के अपर मुख्य सचिव डॉ. अमित कुमार घोष को मामले की जांच कर रिपोर्ट उपलब्ध कराने को कहा गया है।
20 अगस्त को भेजा गया था 82 करोड़ की खरीद का प्रस्ताव
वित्तीय वर्ष 2026-27 में प्रदेश के उच्चीकृत सरकारी अस्पतालों के लिए चिकित्सा उपकरण खरीदने की प्रक्रिया शुरू की गई थी। इसी क्रम में स्वास्थ्य महानिदेशालय की ओर से 20 अगस्त 2026 को शासन को करीब 82 करोड़ रुपये की खरीद का प्रस्ताव भेजा गया।
इसी प्रस्ताव पर राज्यसभा सदस्य सीमा द्विवेदी ने सवाल उठाते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र भेजा। उन्होंने खरीद प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगाने और पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की।
सीमा द्विवेदी ने आरोप लगाया कि उपकरणों की खरीद प्रक्रिया में महानिदेशालय के स्तर पर अधिकारियों और सप्लायरों के बीच संभावित सांठगांठ की आशंका है। ये आरोप हैं और इनकी पुष्टि जांच पूरी होने के बाद ही हो सकेगी।
सिर्फ 82 करोड़ की नई खरीद नहीं, पुराने उपकरणों का भी होगा हिसाब
इस मामले का सबसे अहम पहलू जांच का व्यापक दायरा है। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि अब 82 करोड़ रुपये के उपकरण क्यों खरीदे जा रहे हैं, बल्कि यह भी है कि पहले सरकारी धन से खरीदे गए उपकरणों का कितना और किस तरह इस्तेमाल हुआ।
जांच में यह देखा जा सकता है कि—
- पहले खरीदे गए कितने उपकरण अभी चालू हालत में हैं?
- कितने उपकरण खराब या निष्प्रयोज्य पड़े हैं?
- किसी उपकरण को खराब या निष्प्रयोज्य घोषित करने का निर्णय किस अधिकारी ने लिया?
- खराब मशीनों की मरम्मत क्यों नहीं कराई गई?
- उपकरणों की AMC/CMC यानी रखरखाव व्यवस्था क्या थी?
- यदि उपकरण नीलाम किए गए तो नीलामी कब और किस प्रक्रिया के तहत हुई?
- नीलामी से मिली रकम सरकारी खाते में जमा हुई या नहीं?
- पुराने उपकरणों की खरीद, स्थापना और उपयोग से संबंधित रिकॉर्ड क्या कहता है?
यानी जांच का मूल सवाल यह होगा कि सरकार ने जिन मशीनों पर पहले पैसा खर्च किया, उनका वास्तविक लाभ मरीजों को कितना मिला।
खरीद समिति भी जांच के दायरे में
शिकायत में उपकरण खरीद के लिए महानिदेशालय स्तर पर गठित समिति की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं। समिति में शामिल अधिकारियों के नाम, पदनाम, शैक्षिक योग्यता और तकनीकी विशेषज्ञता की जांच की मांग की गई है।
चिकित्सा उपकरणों की खरीद सामान्य सामान की खरीद से अलग होती है। मशीन की तकनीकी क्षमता, अस्पताल की वास्तविक जरूरत, मरीजों की संख्या, उपलब्ध स्टाफ, इंस्टॉलेशन, प्रशिक्षण, वारंटी और बाद की सर्विस—इन सभी पहलुओं को खरीद से पहले देखना जरूरी होता है। ऐसे में जांच में यह सवाल महत्वपूर्ण होगा कि 82 करोड़ रुपये के उपकरणों की सूची किस आधार पर तैयार की गई और उनकी जरूरत का आकलन किस स्तर पर किया गया।
सप्लायरों से सांठगांठ के आरोप कितने गंभीर?
शिकायत में स्वास्थ्य महानिदेशालय के अधिकारियों और उपकरण आपूर्तिकर्ताओं के बीच संभावित सांठगांठ का आरोप लगाया गया है। अगर जांच में ऐसा कोई तथ्य सामने आता है तो यह सिर्फ एक खरीद प्रक्रिया की अनियमितता नहीं होगी, बल्कि सरकारी अस्पतालों के लिए होने वाली खरीद व्यवस्था की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़ा करेगा।
हालांकि, अभी किसी अधिकारी या सप्लायर को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। जांच पूरी होने और ठोस साक्ष्य सामने आने के बाद ही जिम्मेदारी तय की जा सकती है।
एक लिपिक की भूमिका पर भी उठे सवाल
शिकायत में महानिदेशालय में पूर्व में तैनात एक लिपिक को हटाए जाने के मामले को भी जांच में शामिल करने की मांग की गई है। आरोप है कि उपकरण खरीद से जुड़े मामलों में उक्त कर्मचारी की भूमिका को लेकर पहले भी शिकायतें सामने आती रही थीं और अधिकारियों तथा ठेकेदारों/आपूर्तिकर्ताओं के बीच करोड़ों रुपये के प्रस्तावों एवं खरीद से जुड़े मामलों में उसकी भूमिका पर सवाल उठे थे।
अब जांच में यह देखा जाना महत्वपूर्ण होगा कि संबंधित कर्मचारी को हटाने के पीछे वास्तविक कारण क्या था, उसके खिलाफ क्या शिकायतें थीं और उन शिकायतों पर विभाग ने क्या कार्रवाई की। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि फिलहाल नहीं हुई है।
अस्पतालों में मशीन खरीदने से ज्यादा जरूरी है उनका चलना
सरकारी अस्पतालों में महंगी मशीनें खरीद लेना अपने आप में स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार की गारंटी नहीं है। किसी मशीन से मरीज को वास्तविक लाभ तभी मिलेगा जब— मशीन खरीदी जाए, समय पर स्थापित हो, प्रशिक्षित स्टाफ उपलब्ध हो, मशीन लगातार चले, जरूरी स्पेयर पार्ट्स मिलें, समय पर सर्विस हो और खराब होने पर जल्द मरम्मत हो।
यही वजह है कि नई खरीद के साथ पुराने उपकरणों की स्थिति की जांच बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। अगर किसी अस्पताल में पहले से मौजूद मशीनें लंबे समय से खराब पड़ी हैं और उनके लिए मरम्मत या रखरखाव की व्यवस्था प्रभावी नहीं है, तो नई मशीनों की खरीद से पहले उस समस्या का समाधान करना भी जरूरी होगा।
सवाल यह भी—82 करोड़ के उपकरण किन अस्पतालों में जाएंगे?
अब जांच में यह भी स्पष्ट होना जरूरी है कि प्रस्तावित 82 करोड़ रुपये की खरीद में कौन-कौन से उपकरण शामिल हैं, किन अस्पतालों को कितने उपकरण मिलने हैं और प्रत्येक उपकरण की अनुमानित लागत क्या है।
इसके साथ यह भी देखा जाना होगा कि जिन अस्पतालों के लिए उपकरण प्रस्तावित हैं, वहां उन्हें चलाने के लिए जरूरी डॉक्टर, तकनीकी कर्मचारी, बिजली व्यवस्था, स्थान और रखरखाव की सुविधा उपलब्ध है या नहीं। क्योंकि किसी महंगी मशीन का अस्पताल में पहुंच जाना और उसका मरीजों के इलाज में नियमित इस्तेमाल होना—दो अलग-अलग बातें हैं।
मेडिकल उपकरण खरीद में पारदर्शिता क्यों जरूरी?
मेडिकल उपकरणों की खरीद सीधे मरीजों की स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ी है। इसलिए इसमें सिर्फ कीमत ही नहीं, बल्कि गुणवत्ता, तकनीकी मानक, वास्तविक जरूरत, प्रतिस्पर्धी खरीद प्रक्रिया और खरीद के बाद रखरखाव भी महत्वपूर्ण हैं।
केंद्र स्तर पर भी चिकित्सा उपकरणों की गुणवत्ता और सुरक्षा के लिए नियामकीय व्यवस्था मौजूद है। उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं में जवाबदेही और समयबद्धता पर जोर दिया जा रहा है। ऐसे में इतनी बड़ी खरीद प्रक्रिया की जांच यह तय करने में महत्वपूर्ण हो सकती है कि प्रस्तावित खरीद वास्तविक अस्पताल जरूरतों पर आधारित है या प्रक्रिया में सुधार की जरूरत है।
जांच रिपोर्ट से खुलेगा खरीद प्रक्रिया का राज
अब पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण इंतजार जांच रिपोर्ट का है। जांच में अगर प्रस्तावित उपकरणों की जरूरत, कीमत, तकनीकी विनिर्देश, खरीद समिति की भूमिका, सप्लायर चयन और पुराने उपकरणों के इस्तेमाल में कोई गड़बड़ी सामने आती है तो जिम्मेदारी तय करने का रास्ता खुल सकता है। वहीं अगर जांच में खरीद प्रक्रिया नियमों के अनुरूप पाई जाती है तो 82 करोड़ रुपये की खरीद को आगे बढ़ाने का रास्ता भी साफ हो सकता है।
असली सवाल 82 करोड़ का नहीं, सरकारी पैसे के इस्तेमाल का है
यह मामला सिर्फ 82 करोड़ रुपये की नई मेडिकल उपकरण खरीद का नहीं है। इससे बड़ा सवाल यह है कि सरकारी अस्पतालों के लिए आवंटित धन का इस्तेमाल किस तरह हो रहा है और उसका वास्तविक लाभ मरीजों तक कितना पहुंच रहा है। नई मशीन खरीदना आसान है, लेकिन उसे वर्षों तक चालू रखना बड़ी चुनौती है।
इसलिए इस जांच की असली कसौटी यही होगी कि क्या यह सिर्फ प्रस्तावित 82 करोड़ रुपये की खरीद की औपचारिक जांच बनकर रह जाएगी, या फिर पुरानी खरीद, खराब पड़ी मशीनों, रखरखाव, सप्लायरों, खरीद समितियों और सरकारी धन के इस्तेमाल की पूरी श्रृंखला की जवाबदेही भी तय होगी। फिलहाल 82 करोड़ रुपये की मेडिकल उपकरण खरीद पर अंतिम फैसला जांच रिपोर्ट के बाद ही स्पष्ट होगा।
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Pawan Kumar Singh
Chief Editor, Taj News
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