Opinion Desk, Taj News | Saturday, June 13, 2026, 07:53:10 PM IST


डॉ भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा
“स्वतंत्रता लक्ष्य नहीं अपितु विकसित और समानतामूलक समाज व राष्ट्रनिर्माण की ओर अग्रसर एक सतत मार्ग”
— डॉ प्रमोद कुमार
मानव सभ्यता के इतिहास में स्वतंत्रता को सदैव एक महान उपलब्धि और सर्वोच्च मानवीय आकांक्षा के रूप में देखा गया है। परन्तु यदि स्वतंत्रता को केवल एक अंतिम लक्ष्य मान लिया जाए, तो यह उसके व्यापक अर्थ और उद्देश्य को सीमित कर देता है। वास्तव में स्वतंत्रता अपने आप में कोई अंतिम मंज़िल नहीं है, बल्कि वह एक ऐसा मार्ग है जिस पर चलकर समाज और राष्ट्र विकास, समानता, न्याय, गरिमा तथा मानवीय उत्कर्ष के उच्चतर लक्ष्यों को प्राप्त करते हैं। किसी राष्ट्र की राजनीतिक स्वतंत्रता तभी सार्थक होती है जब वह सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता में रूपांतरित होकर प्रत्येक नागरिक के जीवन को बेहतर बनाने का माध्यम बने।
भारत ने 1947 में औपनिवेशिक शासन से मुक्ति प्राप्त की। यह ऐतिहासिक उपलब्धि केवल सत्ता परिवर्तन की घटना नहीं थी, बल्कि एक ऐसे नए युग का आरम्भ थी जिसमें लोकतंत्र, समान अवसर, सामाजिक न्याय और विकास के आदर्शों को साकार करना था। स्वतंत्रता के लगभग आठ दशक बाद आज यह प्रश्न अत्यंत प्रासंगिक है कि क्या स्वतंत्रता को केवल प्राप्त कर लेना पर्याप्त है, अथवा उसे निरंतर विकसित और समानतामूलक समाज के निर्माण की दिशा में प्रयुक्त करना भी आवश्यक है? वर्तमान भारतीय परिप्रेक्ष्य में यह प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि आज देश आर्थिक प्रगति, तकनीकी नवाचार और वैश्विक प्रतिष्ठा के नए आयाम स्थापित कर रहा है, वहीं दूसरी ओर सामाजिक असमानता, बेरोजगारी, शिक्षा की विषमता, पर्यावरणीय संकट और सामाजिक विभाजन जैसी चुनौती भी विद्यमान हैं।
स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं है। यदि कोई व्यक्ति राजनीतिक रूप से स्वतंत्र है लेकिन गरीबी, अशिक्षा, भेदभाव या सामाजिक बहिष्कार से ग्रस्त है, तो उसकी स्वतंत्रता अधूरी है। इसी प्रकार यदि कोई राष्ट्र राजनीतिक रूप से स्वतंत्र है लेकिन उसके नागरिक समान अवसरों से वंचित हैं, तो उस राष्ट्र की स्वतंत्रता भी पूर्ण नहीं कही जा सकती। इसलिए स्वतंत्रता को एक सतत प्रक्रिया के रूप में समझना आवश्यक है, जो निरंतर विकास और समानता की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।
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वर्तमान समय में विकास की अवधारणा भी व्यापक हो चुकी है। कभी विकास को केवल आर्थिक वृद्धि और औद्योगिक उत्पादन की दृष्टि से देखा जाता था, किन्तु आज विकास का अर्थ मानव विकास, सामाजिक समावेशन, पर्यावरणीय संतुलन और जीवन की गुणवत्ता में सुधार से जोड़ा जाता है। किसी देश की सकल घरेलू उत्पाद (GDP) वृद्धि दर महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन यदि उसके नागरिकों के बीच आय, शिक्षा और स्वास्थ्य की गहरी असमानताएं बनी रहें, तो विकास अधूरा माना जाएगा। इसलिए स्वतंत्रता का उद्देश्य केवल आर्थिक समृद्धि नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था का निर्माण होना चाहिए जिसमें विकास का लाभ समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुँचे।
ताज न्यूज़ की रपट के अनुसार, भारतीय संविधान ने इसी दृष्टिकोण को अपनाया है। संविधान की प्रस्तावना में न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को राष्ट्र जीवन के आधारभूत आदर्शों के रूप में स्थापित किया गया। यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि संविधान निर्माताओं ने स्वतंत्रता को समानता और न्याय से अलग नहीं देखा। उनका मानना था कि स्वतंत्रता तभी टिकाऊ और सार्थक होगी जब समाज में समान अवसर और सामाजिक न्याय की व्यवस्था होगी। यदि कुछ लोगों के पास अत्यधिक संसाधन और अवसर हों तथा बड़ी आबादी वंचित रहे, तो स्वतंत्रता का लाभ सीमित वर्ग तक सिमट जाएगा।
आज भारत विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। डिजिटल क्रांति, अंतरिक्ष अनुसंधान, आधारभूत संरचना, स्टार्टअप संस्कृति और वैश्विक निवेश जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय उपलब्धियां प्राप्त हुई हैं। लेकिन विकास की इस यात्रा के साथ-साथ यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक है कि आर्थिक प्रगति सामाजिक समावेशन के साथ आगे बढ़े। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच बढ़ती विषमता, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक असमान पहुँच, स्वास्थ्य सुविधाओं का असंतुलित वितरण तथा रोजगार की चुनौतियां यह संकेत देती हैं कि स्वतंत्रता की यात्रा अभी जारी है। समानतामूलक समाज का निर्माण स्वतंत्रता की सबसे बड़ी कसौटी है। समानता का अर्थ यह नहीं कि सभी लोग हर दृष्टि से एक समान हो जाएँ, बल्कि इसका अर्थ यह है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षमता के विकास के लिए समान अवसर प्राप्त हों। जाति, धर्म, भाषा, लिंग, क्षेत्र या आर्थिक स्थिति के आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव समानता के सिद्धांत के विपरीत है। आधुनिक लोकतांत्रिक समाज की सफलता इसी पर निर्भर करती है कि वह विविधताओं को सम्मान देते हुए अवसरों की समानता सुनिश्चित कर सके।
रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय समाज की ऐतिहासिक संरचना में अनेक प्रकार की सामाजिक असमानताएं रही हैं। इन असमानताओं को दूर करने के लिए शिक्षा, संवैधानिक अधिकारों, सामाजिक सुधार आंदोलनों और लोकतांत्रिक संस्थाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। फिर भी यह स्वीकार करना होगा कि समानता की दिशा में अभी भी लंबी यात्रा शेष है। सामाजिक सम्मान, आर्थिक अवसर और राजनीतिक भागीदारी के क्षेत्र में मौजूद असंतुलन इस बात की ओर संकेत करते हैं कि स्वतंत्रता का लक्ष्य अभी पूर्ण नहीं हुआ है। स्वतंत्रता और विकास के बीच गहरा संबंध है। स्वतंत्रता नागरिकों को अपनी प्रतिभा, रचनात्मकता और उद्यमशीलता को विकसित करने का अवसर देती है। जब व्यक्ति स्वतंत्र होता है, तभी वह नवाचार कर सकता है, नए विचार प्रस्तुत कर सकता है और समाज की प्रगति में योगदान दे सकता है। इसलिए लोकतांत्रिक स्वतंत्रता किसी भी राष्ट्र के विकास की आधारशिला होती है। लेकिन इसके साथ उत्तरदायित्व भी जुड़ा होता है। स्वतंत्रता का अर्थ अनुशासनहीनता नहीं, बल्कि ऐसी जिम्मेदार नागरिकता है जो अपने अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों का भी सम्मान करे।
वर्तमान वैश्विक परिप्रेक्ष्य में स्वतंत्रता की अवधारणा नई चुनौतियों का सामना कर रही है। डिजिटल युग ने अभिव्यक्ति के नए अवसर प्रदान किए हैं, लेकिन इसके साथ गलत सूचना, घृणा-प्रचार और सामाजिक ध्रुवीकरण की समस्याएं भी बढ़ी हैं। ऐसे समय में स्वतंत्रता और उत्तरदायित्व के बीच संतुलन बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। यदि स्वतंत्रता का उपयोग सामाजिक विभाजन को बढ़ाने के लिए किया जाए, तो वह राष्ट्रनिर्माण की प्रक्रिया को कमजोर कर सकती है। इसके विपरीत यदि स्वतंत्रता का उपयोग संवाद, सहयोग और नवाचार के लिए किया जाए, तो वह विकास का शक्तिशाली साधन बन सकती है।
पर्यावरणीय संकट भी स्वतंत्रता और विकास की बहस को नया आयाम प्रदान करता है। विकास की अंधी दौड़ यदि प्राकृतिक संसाधनों के अति-दोहन का कारण बनती है, तो भविष्य की पीढ़ियों की स्वतंत्रता और जीवन की गुणवत्ता खतरे में पड़ सकती है। इसलिए आज सतत विकास की अवधारणा अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई है। विकसित राष्ट्र वही माना जाएगा जो आर्थिक प्रगति और पर्यावरणीय संतुलन के बीच सामंजस्य स्थापित कर सके। जल, जंगल, भूमि और जैव विविधता का संरक्षण केवल पर्यावरणीय आवश्यकता नहीं, बल्कि भविष्य की स्वतंत्रता और समृद्धि की भी शर्त है। राष्ट्रनिर्माण की प्रक्रिया केवल सरकारों के प्रयासों से पूरी नहीं हो सकती। इसमें नागरिक समाज, शैक्षिक संस्थानों, मीडिया, उद्योग जगत और सामान्य नागरिकों की समान भागीदारी आवश्यक है। स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ तभी साकार होगा जब प्रत्येक नागरिक स्वयं को राष्ट्रनिर्माण की प्रक्रिया का सक्रिय भागीदार समझे। मतदान करना, कानून का सम्मान करना, सामाजिक सद्भाव बनाए रखना, पर्यावरण संरक्षण में योगदान देना और शिक्षा तथा ज्ञान के प्रसार में सहयोग करना—ये सभी राष्ट्रनिर्माण के महत्वपूर्ण आयाम हैं।
ताज न्यूज़ की रपट के अनुसार, विकसित भारत की परिकल्पना केवल आर्थिक शक्ति बनने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। एक विकसित राष्ट्र वह है जहाँ नागरिक सुरक्षित, शिक्षित, स्वस्थ और सम्मानजनक जीवन जी सकें; जहाँ महिलाओं को समान अवसर प्राप्त हों; जहाँ युवाओं को रोजगार और नवाचार के अवसर मिलें; जहाँ बुजुर्गों और कमजोर वर्गों को सामाजिक सुरक्षा प्राप्त हो; तथा जहाँ लोकतांत्रिक संस्थाएं मजबूत और उत्तरदायी हों। इस दृष्टि से स्वतंत्रता एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है जो समाज को बेहतर बनाने के लिए प्रेरित करती रहती है। आज भारत “विकसित भारत 2047” की दिशा में अग्रसर है। यह लक्ष्य केवल आर्थिक संकेतकों की वृद्धि से प्राप्त नहीं होगा। इसके लिए सामाजिक न्याय, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं का सार्वभौमिक विस्तार, लैंगिक समानता, वैज्ञानिक सोच, संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता और पर्यावरणीय संतुलन जैसे तत्वों को समान महत्व देना होगा। यदि विकास के लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुँचते, तो स्वतंत्रता का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा।
इतिहास यह सिखाता है कि स्वतंत्रता प्राप्त करना कठिन है, लेकिन उसे सार्थक बनाना उससे भी अधिक कठिन कार्य है। अनेक देशों ने राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त की, किन्तु सामाजिक असमानता, भ्रष्टाचार, हिंसा और संस्थागत कमजोरी के कारण अपेक्षित विकास हासिल नहीं कर सके। इसलिए स्वतंत्रता को केवल उत्सव का विषय नहीं, बल्कि निरंतर आत्ममूल्यांकन और सुधार की प्रक्रिया के रूप में देखना चाहिए। अंततः यह कहा जा सकता है कि स्वतंत्रता किसी राष्ट्र की यात्रा का अंत नहीं, बल्कि उसकी वास्तविक शुरुआत है। यह वह आधार है जिस पर विकास, समानता, न्याय और मानव गरिमा का विशाल भवन निर्मित किया जाता है। स्वतंत्रता तभी सार्थक है जब वह प्रत्येक नागरिक को अपने जीवन को बेहतर बनाने का अवसर प्रदान करे और समाज को अधिक समावेशी, न्यायपूर्ण तथा मानवीय बनाए।
वर्तमान भारतीय परिप्रेक्ष्य में स्वतंत्रता का सबसे बड़ा दायित्व यही है कि वह राष्ट्र को केवल आर्थिक रूप से नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक दृष्टि से भी विकसित बनाए। इसलिए स्वतंत्रता को एक प्राप्त उपलब्धि के रूप में नहीं, बल्कि एक सतत मार्ग के रूप में समझना चाहिए—ऐसा मार्ग जो हमें विकसित, समतामूलक, न्यायपूर्ण और मानवीय समाज की ओर निरंतर अग्रसर करता है। यही स्वतंत्रता का वास्तविक उद्देश्य है और यही किसी भी आधुनिक लोकतांत्रिक राष्ट्र की सबसे बड़ी पहचान व उपलब्धि भी। अतः भारत को एक अखण्ड समृद्ध सशक्त विकसित राष्ट्र के रूप में स्थाई रूप से करना है तो इसके लिए हमें स्वतंत्रता का सही मायने में अर्थ समझना है और इसे अपना समृद्धि का मार्ग के रूप में स्वीकारना है न कि अंतिम लक्ष्य। स्वतंत्रता के मार्ग पर चलकर ही भारत अखण्ड समृद्ध सशक्त विकसित और समतामूलक राष्ट्र के रूप में विश्व के सामने सदैव उदीयमान रहेगा।
— डॉ प्रमोद कुमार
डिप्टी नोडल अधिकारी, MyGov
डॉ भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा

Pawan Singh
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