“विकसित भारत: विकसित राष्ट्र के लिए राजनेताओं में धार्मिक टेम्परामेंट के बजाय, वैज्ञानिक टेम्परामेंट की आवश्यकता” : डॉ प्रमोद कुमार

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आर्टिकल डेस्क, 🌐 tajnews.in | रविवार, 13 सितंबर 2026, 09:55:00 AM IST

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“विकसित भारत: विकसित राष्ट्र के लिए राजनेताओं में धार्मिक टेम्परामेंट के बजाय, वैज्ञानिक टेम्परामेंट की आवश्यकता”

डॉ प्रमोद कुमार | डिप्टी नोडल अधिकारी, MyGov, डॉ भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय आगरा

प्रमुख अंश (Highlights):

  • आस्था बनाम सार्वजनिक नीति: धार्मिक आस्था व्यक्तिगत जीवन का अधिकार हो सकती है, लेकिन सार्वजनिक नीतियों, स्वास्थ्य, शिक्षा और अर्थव्यवस्था का आधार केवल तर्क और वैज्ञानिक प्रमाण होना चाहिए।
  • निर्णयों में वैज्ञानिक मनोवृत्ति: वैज्ञानिक दृष्टिकोण का सार पूर्वाग्रह त्यागकर नए तथ्यों के आधार पर धारणा बदलने और नीतियों के वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन में निहित है।
  • प्रश्न पूछने की लोकतांत्रिक स्वतंत्रता: विकसित समाज की पहचान प्रश्न पूछने के अधिकार में है; इसे किसी विरोध के बजाय स्वस्थ लोकतांत्रिक और बौद्धिक प्रक्रिया का स्वाभाविक अंग मानना होगा।
  • डेटा और विशेषज्ञता का सम्मान: जटिल राष्ट्रीय चुनौतियों जैसे एआई, पर्यावरण और स्वास्थ्य संकट के समाधान के लिए भावनात्मक भाषणों के बजाय डेटा-आधारित पारदर्शी शासन की अनिवार्यता।
Dr Pramod Kumar

डॉ प्रमोद कुमार

डिप्टी नोडल अधिकारी, MyGov | डॉ भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय आगरा
सार्वजनिक नीति, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, शैक्षिक सुधार, नागरिक चेतना और समाजशास्त्रीय विमर्श पर निरंतर गंभीर स्तंभकार।

भारतवर्ष एक विविधता भरा राष्ट्र है। इसमें विभिन्न प्रकार के धार्मिक लोग एक साथ निवास करते है। इसलिए भारतीय संविधान में यह निहित है कि यह एक धार्मिक सदभाव वाला राष्ट्र है इसलिए भारत की विशेषता यही है कि विविधता के एकता। भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का लक्ष्य केवल आर्थिक विकास की ऊँची दर, बड़े-बड़े बुनियादी ढाँचे, आधुनिक तकनीक, अधिक उत्पादन या वैश्विक स्तर पर बढ़ती राजनीतिक प्रतिष्ठा से पूरा नहीं हो सकता। विकसित राष्ट्र का वास्तविक अर्थ ऐसी व्यवस्था से है जिसमें नागरिकों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, विश्वसनीय स्वास्थ्य सेवाएँ, रोजगार के अवसर, न्यायपूर्ण प्रशासन, सुरक्षित वातावरण, वैज्ञानिक एवं तकनीकी प्रगति, सामाजिक समानता और सम्मानजनक जीवन उपलब्ध हो। इसके लिए संसाधनों के साथ-साथ निर्णय लेने की ऐसी संस्कृति भी आवश्यक है जो प्रमाण, तर्क, वैज्ञानिक परीक्षण, वस्तुनिष्ठ विश्लेषण और दीर्घकालीन परिणामों पर आधारित हो। इसी संदर्भ में राजनीति और सार्वजनिक नेतृत्व में ‘साइंटिफिक टेम्परामेंट’ अर्थात वैज्ञानिक मनोवृत्ति का प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है।

भारत एक बहुधार्मिक, बहुभाषी, बहुसांस्कृतिक और विविधताओं से भरा हुआ देश है। यहाँ धर्म केवल व्यक्तिगत आस्था का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसलिए विकसित भारत की चर्चा करते समय धार्मिक आस्था को वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विरोध में खड़ा करना उचित नहीं होगा। किसी व्यक्ति का धार्मिक होना अपने आप में उसके वैज्ञानिक होने में बाधक नहीं है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब धार्मिक विश्वासों को सार्वजनिक नीति, वैज्ञानिक तथ्यों, चिकित्सा, शिक्षा, पर्यावरण, अर्थव्यवस्था अथवा प्रशासनिक निर्णयों का एकमात्र आधार बना दिया जाए। व्यक्तिगत आस्था का सम्मान लोकतांत्रिक समाज की आवश्यकता है, लेकिन सार्वजनिक निर्णयों की कसौटी व्यापक जनहित, संविधान, प्रमाण और तर्क होना चाहिए।

‘धार्मिक टेम्परामेंट’ और ‘साइंटिफिक टेम्परामेंट’ को यहाँ किसी व्यक्ति की धार्मिक पहचान के रूप में नहीं समझना चाहिए। धार्मिक टेम्परामेंट से आशय ऐसी मानसिक प्रवृत्ति से लिया जा सकता है जिसमें किसी विषय को मुख्यतः आस्था, परंपरा, धार्मिक विश्वास या भावनात्मक स्वीकार्यता के आधार पर देखा जाता है, जबकि वैज्ञानिक टेम्परामेंट ऐसी प्रवृत्ति है जिसमें किसी दावे को प्रमाण, तर्क, परीक्षण, प्रश्न, निरीक्षण और परिणामों के आधार पर स्वीकार या अस्वीकार किया जाता है। वैज्ञानिक मनोवृत्ति का मूल वाक्य यह नहीं है कि ‘मैं सब कुछ जानता हूँ’, बल्कि यह है कि ‘जो तथ्य सामने आएँगे, उनके आधार पर मैं अपनी धारणा बदलने के लिए तैयार हूँ।’ यही लोकतांत्रिक शासन के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण गुण है।

विकसित राष्ट्रों की सफलता के पीछे केवल वैज्ञानिक आविष्कार नहीं, बल्कि वैज्ञानिक सोच पर आधारित संस्थागत व्यवस्था भी होती है। विज्ञान प्रयोगशाला में पैदा होता है, लेकिन वैज्ञानिक दृष्टिकोण समाज और शासन की कार्यप्रणाली को भी प्रभावित करता है। जब सरकार किसी योजना का निर्माण करती है तो उसे यह जानना आवश्यक होता है कि समस्या क्या है, उसका वास्तविक आकार कितना है, उसके कारण क्या हैं, उपलब्ध संसाधन कितने हैं, प्रस्तावित योजना से क्या परिणाम आएँगे और परिणामों को मापने का तरीका क्या होगा। यही वैज्ञानिक दृष्टिकोण है। केवल घोषणा कर देना नीति नहीं है; समस्या की पहचान, प्रमाण-संग्रह, समाधान का परीक्षण, क्रियान्वयन और परिणाम का मूल्यांकन—ये सभी नीति निर्माण के आवश्यक चरण हैं।

भारत जैसे विशाल देश में राजनेताओं की भूमिका इसलिए विशेष महत्व रखती है क्योंकि उनके निर्णय करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं। एक वैज्ञानिक की प्रयोगशाला में गलत निष्कर्ष का प्रभाव सीमित हो सकता है, लेकिन सरकार की गलत नीति का प्रभाव लाखों या करोड़ों नागरिकों पर पड़ सकता है। इसलिए सार्वजनिक नेतृत्व में निर्णयों के लिए अधिक प्रमाण, अधिक विशेषज्ञता और अधिक जवाबदेही की आवश्यकता है। शिक्षा नीति हो, कृषि नीति, स्वास्थ्य व्यवस्था, जल प्रबंधन, ऊर्जा नीति, शहरी विकास, परिवहन, रोजगार, जलवायु परिवर्तन या डिजिटल तकनीक—हर क्षेत्र में भावनात्मक दावों की अपेक्षा तथ्यात्मक विश्लेषण अधिक उपयोगी होता है।

उदाहरण के लिए यदि किसी क्षेत्र में किसानों की आय कम है तो समस्या का समाधान केवल राजनीतिक भाषणों या भावनात्मक नारों से नहीं हो सकता। यह देखना होगा कि कृषि लागत कितनी है, सिंचाई की स्थिति क्या है, बाजार की संरचना कैसी है, फसल विविधीकरण की संभावनाएँ क्या हैं, भंडारण और परिवहन की सुविधाएँ कितनी हैं, मौसम परिवर्तन का क्या प्रभाव पड़ रहा है और किसानों की वास्तविक आय किन कारणों से प्रभावित हो रही है। इसी प्रकार बेरोजगारी की समस्या का समाधान केवल सरकारी नौकरियों की संख्या बढ़ाने से नहीं होगा। कौशल, उद्योग, शिक्षा की गुणवत्ता, उद्यमिता, तकनीकी परिवर्तन, क्षेत्रीय असमानता और श्रम बाजार के आँकड़ों का विश्लेषण आवश्यक होगा। यही वैज्ञानिक टेम्परामेंट का व्यवहारिक उपयोग है।

स्वास्थ्य के क्षेत्र में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का महत्व और भी स्पष्ट है। महामारी, संक्रामक रोग, टीकाकरण, पोषण, मानसिक स्वास्थ्य, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य या सार्वजनिक स्वास्थ्य के किसी भी प्रश्न पर नीति प्रमाण-आधारित चिकित्सा और वैज्ञानिक अनुसंधान से निर्देशित होनी चाहिए। किसी उपचार या स्वास्थ्य दावे को केवल इसलिए स्वीकार नहीं किया जा सकता कि वह लोकप्रिय है, प्राचीन है या किसी प्रभावशाली व्यक्ति द्वारा प्रस्तुत किया गया है। किसी चिकित्सा पद्धति या उपचार की उपयोगिता का मूल्यांकन उसके वैज्ञानिक प्रमाण, सुरक्षा, प्रभावशीलता और उचित परीक्षण के आधार पर होना चाहिए। इसका अर्थ परंपरागत ज्ञान को नकारना नहीं है; बल्कि यह है कि उपयोगी दावों की वैज्ञानिक जाँच की जाए और जो प्रभावी सिद्ध हों उन्हें प्रमाण के आधार पर स्वीकार किया जाए।

शिक्षा के क्षेत्र में भी यही सिद्धांत लागू होता है। विकसित भारत के लिए केवल डिग्रीधारी युवाओं की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो विद्यार्थियों में प्रश्न पूछने, विश्लेषण करने, प्रमाण खोजने, तर्क करने, असहमति व्यक्त करने और नई परिस्थितियों में सीखने की क्षमता विकसित करे। यदि विद्यार्थी केवल किसी बात को इसलिए सही मानना सीखते हैं क्योंकि वह किसी प्राधिकरण, परंपरा या लोकप्रिय व्यक्ति ने कही है, तो उनमें स्वतंत्र चिंतन का विकास सीमित रह सकता है। दूसरी ओर यदि वे यह सीखते हैं कि हर दावे को प्रमाण और तर्क की कसौटी पर परखा जा सकता है, तो वे अधिक जिम्मेदार नागरिक और बेहतर पेशेवर बन सकते हैं।

वैज्ञानिक टेम्परामेंट का सबसे महत्वपूर्ण गुण प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता है। प्रश्न करना अविश्वास नहीं है; प्रश्न करना ज्ञान की शुरुआत है। लोकतंत्र में भी प्रश्न आवश्यक हैं। विपक्ष सरकार से प्रश्न करता है, पत्रकार सत्ता से प्रश्न करते हैं, नागरिक प्रशासन से प्रश्न करते हैं और वैज्ञानिक अपने ही निष्कर्षों पर प्रश्न करते हैं। जिस समाज में प्रश्न पूछना कमजोरी समझा जाने लगे, वहाँ बौद्धिक विकास बाधित हो सकता है। विकसित भारत को ऐसे राजनीतिक वातावरण की आवश्यकता है जहाँ प्रश्नों को राष्ट्र-विरोध, धर्म-विरोध या व्यक्ति-विरोध के रूप में देखने के बजाय लोकतांत्रिक और बौद्धिक प्रक्रिया का स्वाभाविक हिस्सा माना जाए।

राजनीति में वैज्ञानिक टेम्परामेंट का अर्थ यह भी है कि राजनेता अपनी गलती स्वीकार करने की क्षमता रखें। राजनीति में यह कठिन होता है क्योंकि सार्वजनिक जीवन में नेता अपने निर्णयों को सही सिद्ध करने के लिए राजनीतिक दबाव महसूस कर सकते हैं। लेकिन विज्ञान का मूल चरित्र यह सिखाता है कि यदि नया प्रमाण पुराने निष्कर्ष को गलत सिद्ध करता है तो निष्कर्ष बदलना कमजोरी नहीं, बल्कि ज्ञान की प्रगति है। इसी प्रकार सरकार की कोई योजना अपेक्षित परिणाम न दे तो उसका मूल्यांकन होना चाहिए। आवश्यकता पड़ने पर नीति में सुधार, संशोधन या परिवर्तन किया जाना चाहिए। किसी योजना को केवल इसलिए जारी रखना कि वह राजनीतिक रूप से पहले घोषित की जा चुकी है, वैज्ञानिक दृष्टिकोण नहीं है।

भारत में धार्मिक परंपराओं और वैज्ञानिक सोच के बीच संबंध को भी संतुलित रूप से समझना आवश्यक है। भारतीय सभ्यता में ज्ञान, तर्क, दर्शन, गणित, चिकित्सा, खगोल और भाषा-विज्ञान की समृद्ध परंपराएँ रही हैं। परंपरा का सम्मान किया जा सकता है, लेकिन परंपरा और वैज्ञानिक प्रमाण को एक ही श्रेणी में रखना उचित नहीं होगा। किसी प्राचीन ग्रंथ में कोई बात लिखी होने से वह स्वतः आधुनिक वैज्ञानिक तथ्य नहीं बन जाती। उसी प्रकार आधुनिक विज्ञान द्वारा किसी पुराने विश्वास पर प्रश्न उठाए जाने का अर्थ यह नहीं कि उस परंपरा का सांस्कृतिक महत्व समाप्त हो जाता है। संस्कृति और विज्ञान की अपनी-अपनी कसौटियाँ हैं। विकसित समाज दोनों के बीच स्वस्थ संवाद स्थापित करता है।

यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर समझना आवश्यक है—विज्ञान ‘क्या है’ और ‘कैसे काम करता है’ जैसे प्रश्नों का उत्तर प्रमाण और परीक्षण से खोजता है, जबकि धर्म और दर्शन अक्सर जीवन के अर्थ, नैतिकता, आध्यात्मिकता और अस्तित्व संबंधी प्रश्नों से जुड़े होते हैं। इसलिए हर धार्मिक प्रश्न का वैज्ञानिक उत्तर अपेक्षित करना भी उचित नहीं है और हर वैज्ञानिक प्रश्न का समाधान धार्मिक विश्वास से करना भी उचित नहीं है। सार्वजनिक नीति के उन क्षेत्रों में जहाँ वस्तुनिष्ठ तथ्य उपलब्ध हैं, वहाँ तथ्य और वैज्ञानिक प्रमाण को प्राथमिकता देना अधिक व्यावहारिक है।

राजनेताओं के वैज्ञानिक टेम्परामेंट का एक और महत्वपूर्ण पक्ष विशेषज्ञों के प्रति सम्मान है। आधुनिक शासन अत्यंत जटिल हो चुका है। जलवायु विज्ञान, परमाणु ऊर्जा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जैव-प्रौद्योगिकी, साइबर सुरक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य, अर्थशास्त्र, शहरी नियोजन और जल संसाधन जैसे विषयों पर केवल राजनीतिक अनुभव पर्याप्त नहीं हो सकता। राजनेता जनप्रतिनिधि हैं, लेकिन हर क्षेत्र के विशेषज्ञ होना आवश्यक नहीं है। इसलिए उन्हें वैज्ञानिकों, अर्थशास्त्रियों, चिकित्सकों, इंजीनियरों, शिक्षाविदों, समाजशास्त्रियों और अन्य विशेषज्ञों की सलाह को सुनने और समझने की संस्थागत क्षमता विकसित करनी चाहिए।

हालाँकि विशेषज्ञों पर भी आँख बंद करके विश्वास करना वैज्ञानिक दृष्टिकोण नहीं है। वैज्ञानिक टेम्परामेंट विशेषज्ञ की बात को भी प्रमाण, पद्धति और परिणामों की कसौटी पर परखने की अनुमति देता है। इसलिए आदर्श व्यवस्था ऐसी होगी जिसमें राजनीति और विशेषज्ञता एक-दूसरे की विरोधी न होकर पूरक हों। राजनेता जनहित, लोकतांत्रिक प्राथमिकताओं और सामाजिक वास्तविकताओं को सामने रखें तथा विशेषज्ञ उपलब्ध प्रमाणों और संभावित परिणामों का वैज्ञानिक विश्लेषण करें। अंतिम निर्णय संवैधानिक और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के भीतर लिया जाए।

विकसित भारत के लिए डेटा-आधारित शासन भी आवश्यक है। आज डिजिटल तकनीक के कारण सरकार के पास पहले की तुलना में कहीं अधिक आँकड़े उपलब्ध हैं। लेकिन डेटा की मात्रा से अधिक महत्वपूर्ण उसकी गुणवत्ता, विश्वसनीयता और सही व्याख्या है। राजनेताओं और नीति-निर्माताओं को आँकड़ों के चयनात्मक उपयोग से बचना होगा। यदि किसी योजना की सफलता के लिए केवल अनुकूल आँकड़े प्रस्तुत किए जाएँ और प्रतिकूल आँकड़ों को छिपा दिया जाए, तो यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण नहीं होगा। पारदर्शी शासन में सफलता और विफलता दोनों के प्रमाण सामने आने चाहिए।

इसी संदर्भ में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उदाहरण भी महत्वपूर्ण है। भारत यदि AI के क्षेत्र में विश्व शक्ति बनना चाहता है तो केवल तकनीक अपनाना पर्याप्त नहीं होगा। AI के उपयोग में डेटा की गुणवत्ता, गोपनीयता, साइबर सुरक्षा, पारदर्शिता, जवाबदेही, रोजगार पर प्रभाव और मानवीय नियंत्रण जैसे प्रश्नों पर वैज्ञानिक तथा नैतिक दृष्टिकोण आवश्यक होगा। राजनीतिक नेतृत्व को न तो AI से अवास्तविक चमत्कार की अपेक्षा करनी चाहिए और न ही भय के कारण उससे दूरी बनानी चाहिए। वास्तविक क्षमता और जोखिम का प्रमाण-आधारित मूल्यांकन करके नीति बनाना अधिक उपयोगी होगा।

पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन भी ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ धार्मिक या राजनीतिक भावनाओं की तुलना में वैज्ञानिक प्रमाणों का महत्व अत्यधिक है। जल संकट, वायु प्रदूषण, भूजल का गिरता स्तर, तापमान वृद्धि, जैव विविधता का नुकसान और ऊर्जा संक्रमण जैसी समस्याएँ भावनात्मक भाषणों से हल नहीं होंगी। इनके लिए वैज्ञानिक आँकड़े, स्थानीय परिस्थितियों का अध्ययन, तकनीकी समाधान, नागरिक भागीदारी और दीर्घकालीन योजना आवश्यक है। यदि विकास का मॉडल पर्यावरणीय लागत को नजरअंदाज करेगा तो अल्पकालीन आर्थिक लाभ भविष्य में बड़ी सामाजिक और आर्थिक क्षति का कारण बन सकता है।

फिर भी वैज्ञानिक टेम्परामेंट का अर्थ यह नहीं कि राजनीति केवल मशीनों और आँकड़ों से चल सकती है। मनुष्य केवल आर्थिक इकाई नहीं है। समाज में भावनाएँ, संस्कृति, नैतिकता, इतिहास, पहचान और सामुदायिक संबंध भी महत्वपूर्ण हैं। इसलिए वैज्ञानिक शासन को मानवीय संवेदनशीलता से जोड़ना आवश्यक है। वैज्ञानिक प्रमाण यह बता सकते हैं कि कोई नीति कितनी प्रभावी है, लेकिन नीति का अंतिम उद्देश्य मानव कल्याण होना चाहिए। इसलिए विकसित भारत के लिए वैज्ञानिकता और मानवीयता का संयोजन आवश्यक है।

राजनीतिक नेतृत्व में वैज्ञानिक टेम्परामेंट विकसित करने के लिए कुछ व्यावहारिक कदम उठाए जा सकते हैं। संसद और विधानसभाओं में विशेषज्ञों के साथ नियमित नीति-संवाद को मजबूत किया जा सकता है। महत्वपूर्ण विधेयकों के लिए प्रमाण-आधारित प्रभाव मूल्यांकन को प्रोत्साहित किया जा सकता है। सांसदों और विधायकों के लिए विज्ञान, अर्थव्यवस्था, तकनीक, पर्यावरण और डेटा-साक्षरता से संबंधित प्रशिक्षण आयोजित किए जा सकते हैं। सरकारी योजनाओं का स्वतंत्र मूल्यांकन कराया जा सकता है। विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों को नीति निर्माण से अधिक प्रभावी ढंग से जोड़ा जा सकता है। वैज्ञानिक संस्थाओं की स्वायत्तता और अनुसंधान संस्कृति को मजबूत किया जा सकता है। मीडिया और शिक्षा व्यवस्था में वैज्ञानिक साक्षरता बढ़ाई जा सकती है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वैज्ञानिक टेम्परामेंट केवल राजनेताओं से अपेक्षित नहीं होना चाहिए। समाज में भी वैज्ञानिक सोच का विस्तार आवश्यक है। यदि मतदाता केवल धार्मिक पहचान, जाति, भावनात्मक मुद्दों या तात्कालिक लाभ के आधार पर राजनीतिक निर्णय करेंगे तो राजनीतिक दलों पर भी दीर्घकालीन नीतिगत प्रदर्शन का दबाव कम हो सकता है। लोकतंत्र में राजनीतिक नेतृत्व और नागरिक समाज एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। इसलिए विकसित भारत के लिए वैज्ञानिक नागरिकता भी उतनी ही आवश्यक है जितना वैज्ञानिक राजनीतिक नेतृत्व।

राजनीति में धर्म का प्रश्न अत्यंत संवेदनशील है। भारत में धर्म को सार्वजनिक जीवन से पूरी तरह अलग कर देना न तो सरल है और न ही आवश्यक रूप से व्यवहारिक। धार्मिक आस्था करोड़ों लोगों के जीवन का हिस्सा है। वास्तविक चुनौती धर्म को समाप्त करना नहीं, बल्कि शासन के निर्णयों को संवैधानिकता, समानता, सार्वजनिक हित और प्रमाण-आधारित तर्क से संचालित करना है। कोई राजनेता व्यक्तिगत रूप से धार्मिक हो सकता है और साथ ही वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाला भी। समस्या धार्मिक होना नहीं, बल्कि किसी सार्वजनिक नीति को केवल धार्मिक विश्वास के कारण सही मान लेना है, जबकि उपलब्ध प्रमाण उसके विपरीत हों।

अंततः विकसित भारत का निर्माण केवल सड़कों, पुलों, एक्सप्रेसवे, डिजिटल नेटवर्क और औद्योगिक उत्पादन से नहीं होगा। विकसित राष्ट्र की पहचान उसकी निर्णय लेने की गुणवत्ता से भी होती है। जब शासन समस्या को पहचानता है, प्रमाण जुटाता है, विशेषज्ञों से सलाह लेता है, संभावित परिणामों का अनुमान करता है, नीति लागू करता है और फिर परिणामों के आधार पर उसमें सुधार करता है, तब वह वैज्ञानिक शासन की दिशा में आगे बढ़ता है।

इसलिए ‘धार्मिक टेम्परामेंट के बजाय वैज्ञानिक टेम्परामेंट’ को धार्मिक आस्था के निषेध के रूप में नहीं, बल्कि सार्वजनिक निर्णयों में आस्था से ऊपर प्रमाण, भावना से ऊपर तथ्य, पूर्वाग्रह से ऊपर तर्क और घोषणा से ऊपर परिणाम को रखने के सिद्धांत के रूप में समझना अधिक उचित होगा। व्यक्तिगत जीवन में व्यक्ति की आस्था उसका निजी अधिकार है; लेकिन सार्वजनिक पद पर उसका निर्णय करोड़ों नागरिकों को प्रभावित करता है। वहाँ निर्णय की कसौटी व्यक्तिगत विश्वास नहीं, बल्कि संविधान, जनहित, प्रमाण और विवेक होना चाहिए।

भारत की सभ्यता की शक्ति उसकी विविधता और ज्ञान-परंपरा में रही है और आधुनिक भारत की शक्ति उसकी युवा आबादी, लोकतांत्रिक संस्थाओं, वैज्ञानिक क्षमता, तकनीकी प्रतिभा और उद्यमशीलता में है। इन दोनों को जोड़ने के लिए ऐसी राजनीतिक संस्कृति की आवश्यकता है जो परंपरा का सम्मान करे, लेकिन प्रश्न पूछने से न डरे; आस्था का सम्मान करे, लेकिन प्रमाण को न छोड़े; संस्कृति को समझे, लेकिन वैज्ञानिक तथ्य को नकारे नहीं; और राजनीतिक लोकप्रियता के साथ-साथ दीर्घकालीन राष्ट्रीय हित को भी प्राथमिकता दे।

विकसित भारत का सपना तभी स्थायी रूप से साकार होगा जब विकास की राजनीति भावनात्मक mobilization से आगे बढ़कर ज्ञान, अनुसंधान, नवाचार, संस्थागत क्षमता और प्रमाण-आधारित नीति निर्माण पर केंद्रित होगी। राजनेताओं के लिए वैज्ञानिक टेम्परामेंट इसलिए किसी विशेष विचारधारा का विकल्प नहीं, बल्कि आधुनिक शासन की अनिवार्य कार्यपद्धति है। लोकतंत्र में जनता अंतिम शक्ति है और राजनेता उसके प्रतिनिधि। अतः जनता और नेतृत्व दोनों के लिए यह समझना आवश्यक है कि राष्ट्र केवल विश्वासों से नहीं, बल्कि विश्वसनीय संस्थाओं, वैज्ञानिक ज्ञान, विवेकपूर्ण निर्णयों और उनके प्रभावी क्रियान्वयन से विकसित होता है।

यही दृष्टिकोण भारत को केवल आर्थिक रूप से समृद्ध नहीं, बल्कि ज्ञान-आधारित, न्यायपूर्ण, तकनीकी रूप से सक्षम, मानवीय और दीर्घकालीन रूप से टिकाऊ विकसित राष्ट्र बनाने की दिशा में वास्तविक आधार प्रदान कर सकता है। विकसित भारत की यात्रा में धार्मिक आस्था व्यक्तिगत और सांस्कृतिक जीवन में अपना स्थान बनाए रख सकती है, लेकिन शासन की प्रयोगशाला में नीति का परीक्षण अंततः तथ्य, तर्क, प्रमाण, संविधान और जनकल्याण की कसौटी पर ही होना चाहिए।

डॉ प्रमोद कुमार
डिप्टी नोडल अधिकारी, MyGov
डॉ भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय आगरा

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