आर्टिकल डेस्क, 🌐 tajnews.in | शुक्रवार, 11 सितंबर 2026, 06:15:00 PM IST

*9/11 की बरसी पर लंदन से उठता सवाल: आतंकवाद कब खत्म होगा?*
बृज खंडेलवाल | 11 सितंबर 2026
प्रमुख अंश (Highlights):
- 9/11 की बरसी और वैश्विक सुरक्षा: अबू धाबी से हीथ्रो तक कड़े सुरक्षा घेरे के बीच वरिष्ठ पत्रकार बृज खंडेलवाल का निजी यात्रा वृतांत और आतंकवाद पर वैश्विक आत्ममंथन।
- बदलता ब्रिटेन और भारतीय साख: हीथ्रो एयरपोर्ट पर गूंजती हिंदी, बहुसांस्कृतिक समाज और बिना किसी पूछताछ के मात्र दो मिनट में भारतीय पासपोर्ट का त्वरित इमिग्रेशन क्लीयरेंस।
- लंदन की सड़कों से संसद तक विमर्श: टैक्सी ड्राइवर एलेन से लेकर स्थानीय नागरिकों तक आतंकवाद के विरुद्ध एकजुटता की मांग और ब्रिटिश संसद में असिस्टेड डाइंग बिल पर तीखी बहस।
- आतंकवाद के खिलाफ साझा लड़ाई: केवल हथियारों से नहीं बल्कि वित्तीय स्रोतों को बंद करने, खुफिया सूचनाएं साझा करने और वैचारिक कट्टरता से मिलकर लड़ने का वैश्विक संदेश।

बृज खंडेलवाल
आज 9/11 की बरसी है। अमेरिका में शोक और स्मृति के कार्यक्रम चल रहे हैं। ब्रिटेन में भी कई आयोजन हुए। दुनिया उस भयावह दिन को अब भी नहीं भूली है, जब कुछ विमानों ने केवल इमारतों को नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के आत्मविश्वास को हिला दिया था। आतंकवाद खत्म करने के लिए आखिर दुनिया को और कितने 9/11 चाहिए?
संयोग देखिए, आज मैं खुद आतंकवाद के साये वाली इस दुनिया में सफर कर रहा था। अबू धाबी से हीथ्रो पहुंचते हुए कई कड़े सुरक्षा जांचों से गुजरना पड़ा। जांच कभी-कभी परेशान करती है, लेकिन जब सामने 9/11 जैसी त्रासदी हो तो मन कहता है—थोड़ी असुविधा सही, सुरक्षा पहले। गंभीरता के बीच एक हास्यास्पद वाकया भी हुआ। पत्नी पद्मिनी सुरक्षा व्यवस्था और समय की कमी से थोड़ी घबराई हुई थीं। उन्होंने अपना मोबाइल बैग में रखकर भूल गईं। बोर्डिंग गेट पर दोबारा जांच के दौरान मोबाइल मांगा गया। घबराहट में उन्हें लगा कि फोन सिक्योरिटी काउंटर पर रह गया है, इसलिए वे वापस लौट गईं। इधर बैग की तलाशी में फोन मिल गया, लेकिन तब तक एयरपोर्ट की भूलभुलैया में श्रीमती जी गुम हो चुकी थीं। फ्लाइट का समय हो चला था, दबाव बढ़ रहा था। एक अंग्रेज सीनियर अधिकारी को किसी की बीबी खोने की चिंता सता गई। उन्होंने तुरंत कई फोन किए। अंत में सभी को राहत मिली जब पद्मिनी दौड़ती-हांफती लौटीं। इस सबके बीच सबसे सुखद एहसास यह रहा कि आज भारत का झंडा बुलंद है। हिंदुस्तानियों को सम्मान और अदब से देखा जाता है। इमिग्रेशन चेक दो मिनट में पूरा हो गया, कोई सवाल-जवाब नहीं। झुंड के झुंड भारतीय यात्री दिखाई दिए।
लंदन की सड़कों पर आतंकवाद विरोधी सुर
लंदन पहुंचकर आतंकवाद पर बातचीत का सिलसिला जारी रहा। हमारे टैक्सी ड्राइवर एलेन ने सीधी बात कही—“आतंकवाद को खत्म करना है तो दुनिया के सभी देशों को एकजुट होना पड़ेगा।” सच कहें तो बात में दम है। आतंकवादियों का पासपोर्ट अलग हो सकता है, भाषा अलग हो सकती है, लेकिन उनका निशाना अक्सर एक ही होता है—निर्दोष इंसान और लोकतांत्रिक समाज।
होटल में मार्गरेट से भी इस मुद्दे पर बात हुई। उनका कहना था कि आतंकवाद के खिलाफ सरकारों को कठोर कदम उठाने होंगे। आज लंदन में कई लोगों से चर्चा हुई। आतंकवाद को लेकर गुस्सा साफ दिखाई दिया। अधिकांश लोग चाहते हैं कि आतंकवादियों के खिलाफ कोई नरमी न बरती जाए। भारतीय मूल के कारोबारी अर्जुन का गुस्सा कुछ ज्यादा ही था। उनका आरोप था कि भारत में विपक्षी दल आतंकवादियों के प्रति जरूरत से ज्यादा नरम रवैया अपनाते हैं।
यह बहस भारत में नई नहीं है। लेकिन एक बात साफ होनी चाहिए—आतंकवाद पर राजनीति से ऊपर उठना होगा। आतंकवादी चाहे किसी भी विचारधारा, संगठन या धर्म का नाम लें, कानून की नजर में उनका पहला परिचय आतंकवादी ही होना चाहिए। हां, कठोर कार्रवाई का अर्थ कानून को ताक पर रखना भी नहीं हो सकता। लोकतंत्र की असली ताकत यही है कि वह आतंकवाद से लड़ते हुए भी कानून और न्याय की सीमा नहीं भूलता।
बदलता ब्रिटेन और हीथ्रो की वैश्विक तस्वीर
लंदन ने आज एक दूसरा चेहरा भी दिखाया। हीथ्रो एयरपोर्ट पर हर तरफ हिंदी सुनाई दी। पोर्टर, ड्राइवर, अधिकारी और दूसरे कर्मचारी—एशियाई मूल के लोग बड़ी संख्या में दिखाई दिए। कुछ चेहरे भारतीय लगे, कुछ दूसरे एशियाई देशों के। अफ्रीकी मूल के लोग भी बड़ी संख्या में काम करते नजर आए। हीथ्रो देखकर लगा जैसे दुनिया ने लंदन में अपना छोटा-सा शिविर लगा रखा हो। ब्रिटेन बदल चुका है। अब यहां केवल अंग्रेज नहीं रहते। भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफ्रीका और दुनिया के अनेक हिस्सों से आए लोग इस देश की अर्थव्यवस्था और रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा हैं।
लोकतंत्र, संसद और जीवन-मृत्यु का द्वंद्व
दिलचस्प बात यह भी रही कि बाहर मौसम गरम था और अंदर राजनीतिक बहस। संसद में असिस्टेड डाइंग बिल को लेकर चर्चा चल रही थी। सरकार इसे पास कराने में सफल नहीं रही, जबकि आम लोगों में इसके समर्थन की आवाज सुनाई दे रही है। समर्थकों का कहना है कि गंभीर और असहनीय पीड़ा झेल रहे लोगों को जीवन के अंतिम दौर में अपनी इच्छा के अनुसार फैसला लेने का अधिकार मिलना चाहिए। विरोध करने वालों की अपनी चिंताएं हैं। लोकतंत्र में ऐसी बहसें जरूरी हैं, क्योंकि जीवन और मृत्यु जैसे सवालों के आसान जवाब नहीं होते।
एक ही दिन में दो बिल्कुल अलग सवाल सामने थे। एक तरफ आतंकवाद है, जो इंसान की जिंदगी छीनता है। दूसरी तरफ असिस्टेड डाइंग की बहस है, जिसमें सवाल है कि असहनीय पीड़ा में जी रहे इंसान को अपनी जिंदगी के अंतिम पड़ाव पर कितना अधिकार मिलना चाहिए। यही लोकतंत्र की खूबसूरती है। लंदन की सड़कों पर टैक्सियां दौड़ रही हैं, संसद में बहस हो रही है, एयरपोर्ट पर सुरक्षा जांच चल रही है और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से आए लोग अपनी-अपनी जिंदगी जी रहे हैं।
एकजुटता ही आतंकवाद का अंतिम जवाब
लेकिन 9/11 हमें चेताता है। आतंकवाद से लड़ाई केवल बंदूकों और बमों से नहीं जीती जा सकती। देशों को खुफिया सूचनाएं साझा करनी होंगी, आतंक के वित्तीय स्रोत बंद करने होंगे और उन विचारों से भी लड़ना होगा जो युवाओं के दिमाग में नफरत का बारूद भरते हैं। एलेन की बात फिर याद आती है—सभी देशों को एकजुट होना पड़ेगा। शायद यही 9/11 का सबसे बड़ा सबक है। आतंकवादी दुनिया को बांटना चाहते हैं। हमारा जवाब होना चाहिए—दुनिया और ज्यादा एकजुट हो। क्योंकि आतंकवाद की कोई सीमा नहीं होती। इसलिए उसके खिलाफ इंसानियत की भी कोई सीमा नहीं होनी चाहिए।
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Thakur Pawan Singh
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