बारह साल बाद भी अधूरी तस्वीर! क्या यही है ‘नया भारत’ का सपना, या सिर्फ़ नारों का शोर?

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Article Desk, 🌐 tajnews.in | Friday, 31 July, 2026, 02:50:12 PM IST.

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Brij Khandelwal
बृज खंडेलवाल
वरिष्ठ पत्रकार व विश्लेषक
आगरा के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ पत्रकार और प्रतिष्ठित पर्यावरणविद् बृज खंडेलवाल ने वर्ष 1972 में ‘भारतीय जनसंचार संस्थान’ (IIMC, नई दिल्ली) से पत्रकारिता की शुरुआत की। वे ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’, ‘INDIA TODAY’, ‘इंडिया एब्रॉड’, और अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी ‘IANS’ सहित देश-विदेश के कई शीर्ष मीडिया संस्थानों से जुड़े रहे हैं। ‘ब्रज मंडल हेरिटेज कंवर्जेशन सोसाइटी’ के संस्थापक खंडेलवाल ने यमुना और ताजमहल संरक्षण पर दो ऐतिहासिक पुस्तकें लिखी हैं।

बारह साल बाद भी अधूरी तस्वीर! क्या यही है ‘नया भारत’ का सपना, या सिर्फ़ नारों का शोर?

— बृज खंडेलवाल

क्या केवल दूर तक फैली चमचमाती कंक्रीट की सड़कें, शहरों में खड़ी विशाल ऊँची इमारतें और मोबाइल में सिमटे डिजिटल ऐप्स ही किसी संप्रभु राष्ट्र की वास्तविक तरक्की का अंतिम पैमाना हो सकते हैं? यदि देश के आम चुनाव केवल अकूत धनबल और बाहुबल के दम पर ही लड़े जाते रहें, अदालतों के कमरों में न्याय का इंतज़ार वर्षों तक मुकदमों के अंबार के नीचे अटका रहे, हमारे प्राथमिक व माध्यमिक सरकारी विद्यालय निरंतर कमज़ोर होते चले जाएँ, जन-जन का पुलिस व्यवस्था से भरोसा लगातार घटता जाए और गंभीर बीमारियों का इलाज आम मध्यमवर्गीय परिवार की पूरी जेब खाली कर दे, तो क्या सचमुच हम उस विधिक और भव्य “नए भारत” की मंज़िल पर पहुँच गए हैं जिसका ढोल चारों तरफ पीटा जाता है?

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए (NDA) सरकार को देश की केंद्रीय सत्ता में आए अब पूरे बारह साल हो चुके हैं। इस लंबे कालखंड के दौरान बड़े-बड़े विधिक वादे किए गए और प्रशासनिक स्तर पर कई उल्लेखनीय उपलब्धियाँ भी हासिल हुईं। देश भर में फोर-लेन व सिक्स-लेन राजमार्गों के निर्माण, क्रांतिकारी डिजिटल सार्वजनिक सेवाओं के विस्तार, विशाल आधारभूत संरचनात्मक ढाँचे के विकास और प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) जैसी पारदर्शी कल्याणकारी योजनाओं के सफल क्रियान्वयन में निस्संदेह प्रगति दर्ज की गई है। परंतु जब हम किसी भी लोकतांत्रिक देश की रीढ़ माने जाने वाले उसके बुनियादी संवैधानिक व प्रशासनिक संस्थानों की आंतरिक स्थिति पर बारीक नज़र डालते हैं, तो यह तस्वीर उतनी रोशन और आदर्श नहीं दिखती। स्वतंत्रता के बाद से चले आ रहे कई पुराने प्रशासनिक मसले आज भी जस के तस बने हुए हैं, बल्कि समय के साथ और अधिक पेचीदा व विकराल हो गए हैं। इन गहरे संस्थागत संकटों का सीधा असर भारत के करोड़ों आम नागरिकों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर पड़ता है।

देश के सुशासन की दिशा में सबसे बड़ा और सबसे अधूरा रह गया कार्य चुनावी सुधार (Election Reforms) है। पिछले कई दशकों से देश के सर्वोच्च न्यायालय, निष्पक्ष चुनाव विशेषज्ञ और विभिन्न विधि आयोगों की समितियां हमारी राजनीतिक व्यवस्था को पारदर्शी बनाने के लिए कड़े चुनावी सुधारों की सिफारिशें करती रही हैं। परंतु इसके बावजूद भारतीय राजनीति में धनबल और बाहुबल का अनियंत्रित दबदबा रत्ती भर भी कम नहीं हुआ है। आधिकारिक साक्ष्यों के अनुसार, वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में देश भर से निर्वाचित होकर संसद पहुँचे लगभग 46 प्रतिशत जनप्रतिनिधियों पर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज थे। इनमें से लगभग एक-तिहाई सांसदों पर तो हत्या, हत्या के प्रयास, बलात्कार, महिलाओं पर अत्याचार और अपहरण जैसे अत्यंत संगीन आरोप शामिल हैं। आर्थिक रूप से देखें तो औसतन हर निर्वाचित सांसद की घोषित संपत्ति लगभग 38 करोड़ रुपये पाई गई, जबकि इस चुनाव में हुआ कुल राजनीतिक व प्रशासनिक चुनावी खर्च का अनुमान लगभग एक लाख करोड़ रुपये लगाया गया था। चुनावी प्रक्रिया के दौरान देश भर की विभिन्न जांच एजेंसियों ने 8,800 करोड़ रुपये से अधिक की बेनामी नकदी, कीमती वस्तुएं और अन्य अवैध प्रलोभन जब्त किए थे। यह भयावह तस्वीर हमारे महान भारतीय लोकतंत्र की मौलिक साख पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

वर्ष 2017 में लागू की गई विवादित इलेक्टोरल बॉन्ड (Electoral Bond) योजना को सत्ता पक्ष द्वारा राजनीतिक चंदे में पारदर्शिता लाने का बहुत बड़ा माध्यम बताया गया था। परंतु वर्ष 2024 के अपने ऐतिहासिक फैसले में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने इस व्यवस्था को पूरी तरह से असंवैधानिक और नागरिकों के जानने के अधिकार का हनन करार देते हुए रद्द कर दिया। तब तक इस पूरी गुप्त व्यवस्था से लगभग दो अरब डॉलर (16,000 करोड़ रुपये से अधिक) का विशाल चंदा गुजर चुका था, जिसका सबसे बड़ा हिस्सा अकेले सत्तारूढ़ राजनीतिक दल के खातों में जमा हुआ। आज भी हमारे देश में राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के लिए चुनावों की शत-प्रतिशत स्टेट फंडिंग (State Funding) की कोई व्यवस्था नहीं है, चुनावी अभियानों में राजनीतिक दलों द्वारा किए जाने वाले बेलगाम खर्च पर कोई प्रभावी कानूनी सीमा लागू नहीं है और अपने कर्तव्यों में विफल रहने वाले कमजोर जनप्रतिनिधियों को जनता द्वारा वापस बुलाने (Right to Recall) जैसा कोई लोकतांत्रिक अधिकार मौजूद नहीं है। इसके अलावा, ऐन चुनावों के वक्त मतदाता सूचियों (Voter Lists) से लाखों वैध नागरिकों के नाम अचानक गायब हो जाने के गंभीर प्रशासनिक आरोप भी बार-बार सामने आते रहते हैं। कुल मिलाकर मौजूदा चुनावी परिदृश्य में ईमानदारी और निष्ठा से कहीं अधिक किसी भी कीमत पर ‘चुनाव जीतना’ ही एकमात्र प्राथमिकता बन गया है।

देश के स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में भी हमारा समाज दो स्पष्ट हिस्सों में विभाजित होता जा रहा है। एक ओर जहाँ बेहद महँगी फीस वाले सर्वसुविधायुक्त निजी स्कूल हैं, वहीं दूसरी ओर बुनियादी सुविधाओं के अभाव में लगातार बेजान और कमज़ोर होते जा रहे हमारे सरकारी विद्यालय हैं। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार पिछले दस वर्षों के दौरान देश भर में लगभग 90 हजार सरकारी स्कूल पूरी तरह ताला बंद होकर बंद हो गए—यानी औसतन हर दिन लगभग 25 सरकारी प्राथमिक व उच्च प्राथमिक स्कूल खत्म होते चले गए। इसके ठीक विपरीत, निजी शिक्षण संस्थानों का कारोबार दिन-दुगनी रात-चौगुनी रफ़्तार से फलता-फूलता रहा। आज हमारे सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले अधिकांश मासूम बच्चे समाज के अत्यंत शोषित, अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और आर्थिक रूप से बेबस परिवारों से आते हैं। इसका सीधा सादा तात्पर्य यह है कि हमारे देश की जर्जर और दिशाहीन प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था का सबसे कड़वा बोझ आज भी उन्हीं कमजोर कंधों पर पड़ रहा है जिनके पास कोई अन्य विकल्प मौजूद नहीं है।

इसके अतिरिक्त, हमारे देश में स्कूली शिक्षा के कई अलग-अलग प्रशासनिक और भाषाई ढाँचे समानांतर रूप से चल रहे हैं; जिनमें सीबीएसई (CBSE), आईसीएसई (CISCE), विभिन्न राज्यों के स्टेट बोर्ड, अंतर्राष्ट्रीय पाठ्यक्रम (IB), मदरसा बोर्ड और ग्राम पंचायत स्कूल शामिल हैं। परंतु इन सभी के बीच देश के हर नागरिक बच्चे के लिए एक समान गुणवत्ता मानक (Uniform Quality Standards) की भारी कमी है। त्रिभाषा सूत्र और भाषा नीति को लेकर अलग-अलग राज्यों में विवाद लगातार जारी हैं। विभिन्न स्वतंत्र और गैर-सरकारी शैक्षणिक सर्वेक्षण (जैसे ASER रिपोर्ट) यह कड़वा सच उजागर करते हैं कि सरकारी व ग्रामीण स्कूलों के अधिकांश बच्चे अपनी कक्षा के अनुरूप बुनियादी पाठ पढ़ने और प्राथमिक गणित के सवाल हल करने में भी पूरी तरह असमर्थ हैं। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) ने देश में बड़े क्रांतिकारी बदलावों का वादा किया था, परंतु धरातल पर अमीर और गरीब के बच्चों को मिलने वाली शिक्षा के बीच की चौड़ी खाई पहले से कहीं अधिक खतरनाक रूप ले चुकी है।

जमीनी स्तर पर प्रशासनिक भ्रष्टाचार भी समाप्त नहीं हुआ है, बल्कि उसने केवल अपना पुराना अंदाज़ बदल लिया है। आम नागरिकों के रोजमर्रा के सरकारी दफ्तरों में होने वाले छोटे-बड़े कामों, प्रमाण पत्रों, जमीनी नामांतरण और लाइसेंसों के लिए रिश्वतखोरी की शिकायतें आज भी बहुत आम हैं। नीतिगत स्तर पर अक्सर यह गंभीर आरोप लगाए जाते हैं कि बड़ी-बड़ी कॉरपोरेट कंपनियाँ और व्यावसायिक घराने राजनीतिक दलों को भारी इलेक्टोरल फंड व गुप्त चंदा प्रदान करते हैं और उसके बदले बाद में विशाल सरकारी ठेके, रियायतें और नीतियाँ अपने पक्ष में हासिल कर लेते हैं। देश के कुछ प्रमुख उद्योगों, विशेषकर प्राकृतिक संसाधन खनन, रियल एस्टेट और दवा निर्माण क्षेत्रों में, सरकारी नियामक संस्थाओं (Regulatory Bodies) की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर भी बार-बार गंभीर सवाल उठते रहे हैं।

देश के राजनीतिक गलियारों में “वाशिंग मशीन” (Political Washing Machine) जैसा तीखा शब्द भी पिछले कुछ वर्षों के दौरान ज़ोर-शोर से चर्चा में रहा। विपक्षी दलों के जिन प्रमुख नेताओं पर जांच एजेंसियों द्वारा भ्रष्टाचार के बेहद संगीन और आपराधिक मामले दर्ज किए गए थे, वे जैसे ही सत्ताधारी दल में शामिल हुए या उन्होंने पाला बदला, वैसे ही वे उन सभी कानूनी दबावों और जांचों से पूरी तरह राहत पाते हुए दिखाई दिए। इसके अलावा, शीर्ष स्तर के संस्थागत व राजनीतिक भ्रष्टाचार पर कड़ी निगरानी रखने और पारदर्शी जांच के लिए जनता के भारी संघर्ष के बाद बना वैधानिक ‘लोकपाल’ (Lokpal) का पद भी इतने वर्षों बाद अपने अपेक्षित प्रभाव और स्वायत्तता को साबित करने में पूरी तरह से विफल रहा है।

हमारी न्यायपालिका की वर्तमान कार्यप्रणाली भी अत्यधिक चिंताजनक और निराशाजनक बनी हुई है। देश भर की छोटी-बड़ी विभिन्न अदालतों में इस समय 5.6 करोड़ से अधिक लंबित मुकदमों का विशाल अंबार जमा है। इनमें से लगभग पांच करोड़ से अधिक मामले अकेले हमारी निचली और जिला अदालतों में न्याय का इंतज़ार कर रहे हैं। देश के कई उच्च न्यायालयों (High Courts) में भी दस-दस और पंद्रह-पंद्रह वर्षों से सामान्य नागरिकों के आपराधिक व दीवानी मुकदमे बिना किसी अंतिम फैसले के अटके पड़े हैं। इसके ऊपर से, सभी स्तरों की अदालतों में न्यायाधीशों के हजारों स्वीकृत पद वर्षों से खाली पड़े हैं। एक साधारण और गरीब भारतीय नागरिक अपने बुनियादी न्याय के इंतज़ार में पूरी तरह बूढ़ा हो जाता है या दुनिया से चला जाता है, जबकि देश के रसूखदार और प्रभावशाली लोग भारी-भरकम फीस वाले वकीलों के दम पर इस लंबी और पेचीदा कानूनी प्रक्रिया का पूरा लाभ उठाकर आसानी से बच निकलते हैं।

हमारी पुलिस व्यवस्था आज भी आज़ादी के इतने दशकों बाद ब्रिटिश हुकूमत के दौर के पुराने 1861 के पुलिस कानून (Police Act 1861) की दमनकारी सोच और औपनिवेशिक ढाँचे पर टिकी हुई है। अधिकांश राज्यों के पुलिस महकमों में निचले स्तर के सिपाहियों से लेकर जांच अधिकारियों तक के बड़ी संख्या में पद खाली पड़े हैं। पुलिस प्रशासन में सत्तारूढ़ नेताओं का सीधा राजनीतिक दखल, थानों और पुलिस कस्टडी में होने वाली बर्बर हिंसा तथा पक्षपातपूर्ण एकतरफा कार्यवाहियों की गंभीर शिकायतें लगातार मानवाधिकार आयोगों तक पहुँचती रहती हैं। वर्ष 2006 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक प्रकाश सिंह मामले में पुलिस सुधारों (Police Reforms) के लिए सात कड़े और स्पष्ट विधिक निर्देश दिए थे, परंतु देश के अधिकांश राज्यों और केंद्र सरकारों ने उन ऐतिहासिक निर्देशों को केवल फाइलों में दबाकर आज तक पूरी तरह अधूरा छोड़ रखा है।

हमारी सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था (Public Healthcare System) में भी बुनियादी ढाँचे और संवेदनशीलता की भारी कमियाँ लगातार बनी हुई हैं। देश में जीवनरक्षक दवाओं और चिकित्सा उपकरणों की वास्तविक दरों में कोई कठोर पारदर्शिता मौजूद नहीं है। बड़े-बड़े निजी अस्पताल अक्सर आम मरीजों से दवाओं, डायग्नोस्टिक टेस्टों, आईसीयू बेड और डॉक्टरों के परामर्श शुल्क के नाम पर वास्तविक लागत से कई-कई गुना अधिक मनमाना बिल वसूलते हैं। सरकार की महत्वाकांक्षी ‘आयुष्मान भारत योजना’ के भीतर भी निजी अस्पतालों द्वारा भारी संगठित फर्जीवाड़े और फर्जी दावों की खबरों के कारण सरकार को हजारों धोखाधड़ी करने वाले अस्पतालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करनी पड़ी। इसके अतिरिक्त, घटिया और मिलावटी भारतीय दवाओं के सेवन से देश-विदेश में मासूम बच्चों की दुखद मौतों जैसी अंतरराष्ट्रीय घटनाओं ने हमारी संपूर्ण दवा नियामक व्यवस्था की साख पर गंभीर राष्ट्रीय सवाल खड़े किए हैं। देश के दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों के सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों, विशेषज्ञ चिकित्साकर्मियों, एम्बुलेंस और बुनियादी आईसीयू संसाधनों की भारी कमी आज भी जस की तस बनी हुई है।

इन सभी गंभीर सामाजिक और प्रशासनिक विसंगतियों को अलग-अलग टुकड़ों में विभाजित करके नहीं देखा जा सकता। ये सभी मिलकर उस विशाल और खौफनाक फासले की कहानी बयां करती हैं जो चुनाव के समय किए जाने वाले बड़े-बड़े राजनीतिक वादों और देश के आम आदमी की कठोर ज़मीनी हकीकत के बीच मौजूद है। व्यापक चुनावी सुधार, हर बच्चे के लिए एक समान व गुणवत्तापूर्ण प्राथमिक शिक्षा, पारदर्शी व भ्रष्टाचार-मुक्त ईमानदार प्रशासन, आम आदमी को समय पर मिलने वाला तेज़ व सुलभ न्याय, एक आधुनिक व संवेदनशील पुलिस व्यवस्था और हर बीमार के लिए भरोसेमंद व किफायती स्वास्थ्य सेवाएँ आज भी स्वतंत्र भारत का एक बहुत बड़ा अधूरा एजेंडा बना हुआ है।

हालाँकि यह भी एक स्थापित और सकारात्मक सच है कि पिछले एक दशक के दौरान भारत ने विशाल राष्ट्रीय राजमार्गों के संजाल, डिजिटल भुगतान क्रांति (UPI), रेलवे के आधुनिकीकरण और विभिन्न प्रत्यक्ष कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में ऐतिहासिक सफलता हासिल की है। परंतु दुनिया का कोई भी महान राष्ट्र केवल एक्सप्रेसवे, डिजिटल ऐप्स और आसमान छूती इमारतों के बेजान पत्थरों से कभी महान नहीं बनता। किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र की वास्तविक ताक़त और महानता इस बात से तय होती है कि उसकी सरकारें अपने सबसे अंतिम, गरीब और लाचार नागरिक की रोज़मर्रा की जीवनदायी परेशानियों को कितनी ईमानदारी, संवेदनशीलता और निष्ठा से हल करती हैं।

आज भी देश के भावी विकास के सामने छः बड़े और सुलगते हुए सवाल मजबूती से खड़े हैं: देश के करोड़ों पढ़े-लिखे युवाओं में गहराती बेरोज़गारी की समस्या, खेती की बढ़ती लागत से बेहाल हमारे किसानों की बदहाली, हर मध्यमवर्गीय रसोई का बजट बिगाड़ती बेकाबू महँगाई, हमारी नदियों, हवा और पर्यावरण पर मंडराता भयावह संकट, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में तेज़ी से बढ़ती सामाजिक-आर्थिक असमानता, तथा देश के ताने-बाने में सामाजिक सौहार्द व आपसी भाईचारे को मजबूत करने की चुनौती। देश के करोड़ों नौजवान सम्मानजनक नौकरियों की तलाश में दर-दर भटक रहे हैं। हमारे अन्नदाता किसान अनिश्चित मौसम और फसल के अनिश्चित दामों से जूझ रहे हैं। विषैली हवा और दूषित जल हमारे बच्चों और नागरिकों की सेहत पर सीधा हमला बोल रहे हैं। समाज के भीतर पैदा की जा रही नफरत की दूरियां हमारे महान लोकतंत्र की बुनियादी ताक़त को अंदर ही अंदर कमज़ोर कर रही हैं।

किसी भी चुनी हुई सरकार की नीतियों और उसकी विफलताओं की रचनात्मक आलोचना करना किसी भी स्थिति में देश-विरोध या राष्ट्र-द्रोह नहीं हो सकता। एक जीवंत और परिपक्व लोकतंत्र में निष्पक्ष और रचनात्मक आलोचना ही सुशासन की वास्तविक नींव होती है। किसी भी महान सरकार की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक सफलता केवल अपनी पुरानी कागजी उपलब्धियाँ गिनाने में नहीं होती, बल्कि अपनी व्यावहारिक कमियों और विफलताओं को विनम्रता से स्वीकार करके उन्हें पूरी निष्ठा से दूर करने में निहित होती है। आज हमारे भारत को एक ऐसे समावेशी और सतत विकास की सख्त ज़रूरत है जो देश के हर वर्ग को साथ लेकर चले, पर्यावरण के अनुकूल हो और जिसका वास्तविक लाभ हमारे सबसे अंतिम नागरिक तक पूरी पारदर्शिता के साथ पहुँचे। विधिक सच को अब और दबाया नहीं जा सकता। सच से आंखें चुराना अब पूरी तरह बंद होना चाहिए।

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Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News

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