संपादकीय डेस्क, 🌐 tajnews.in | रविवार, 13 सितंबर 2026, 12:35:00 PM IST

संपादक की कलम
BRICS में भारत की आवाज़: चीन से संवाद जरूरी, लेकिन भरोसा सोच-समझकर
(संपादकीय)
प्रमुख अंश (Highlights):
- ग्लोबल साउथ की मजबूत आवाज: ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नियम-निर्माता के तौर पर भारत की वैश्विक भागीदारी और बहुपक्षीय सुधारों पर दिया बल।
- चीन से संवाद बनाम भरोसे की सीमा: गलवान संघर्ष, अनसुलझा सीमा विवाद और चीन-पाकिस्तान रणनीतिक गठजोड़ के बीच कूटनीतिक संवाद तो जरूरी है, लेकिन आंख मूंदकर भरोसा नहीं।
- 112 अरब डॉलर का भारी व्यापार घाटा: 151 अरब डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार में भारत की आर्थिक संप्रभुता के लिए जरूरी है कि चीनी कलपुर्जों, रसायनों और मशीनरी पर एकतरफा निर्भरता घटे।
- रणनीतिक स्वायत्तता की कसौटी: न चीन पर निर्भरता और न अमेरिका पर जरूरत से ज्यादा भरोसा; किसी खेमे में बंधने के बजाय भारत केंद्रित विदेश नीति ही समय की मांग।

Thakur Pawan Singh
नई दिल्ली में BRICS शिखर सम्मेलन के खुले सत्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब वैश्विक व्यवस्था को अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण और न्यायसंगत बनाने की बात कही तो यह केवल एक अंतरराष्ट्रीय मंच पर दिया गया भाषण नहीं था। यह उस भारत की आकांक्षा का भी प्रदर्शन था जो अब विश्व व्यवस्था में केवल नियमों का पालन करने वाला देश नहीं, बल्कि नियमों के निर्माण में अपनी भूमिका चाहता है। भारत की अध्यक्षता में हुए इस सम्मेलन की घोषणा में भी वैश्विक शासन व्यवस्था में सुधार, Global South की अधिक भागीदारी और बहुपक्षीय संस्थाओं को अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण बनाने पर जोर दिया गया है। (PM India)
लेकिन किसी भी बड़े अंतरराष्ट्रीय भाषण की असली परीक्षा उसके शब्दों से नहीं, उसके बाद की कूटनीति और उसके परिणामों से होती है।
और यहीं से भारत के सामने एक कठिन सवाल खड़ा होता है—क्या चीन के साथ संबंध सुधारने की पहल का स्वागत करते हुए भारत उस पर सहज विश्वास कर सकता है?
इसका उत्तर शायद नहीं है।
इसका अर्थ यह भी नहीं कि भारत को चीन से दूरी बनाए रखनी चाहिए। इसके विपरीत, दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं और पड़ोसी देशों के बीच संवाद, व्यापार और तनाव कम करना भारत के हित में है। प्रधानमंत्री मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात में दोनों देशों के संबंधों को आगे बढ़ाने, सीमा पर शांति बनाए रखने और आर्थिक संबंधों को संतुलित करने पर जोर दिया गया है। (China Mission to the UN in Geneva)
समस्या संवाद में नहीं, समस्या भरोसे की सीमा में है।
भारत यह भूल नहीं सकता कि 2020 के गलवान संघर्ष ने दोनों देशों के रिश्तों को किस गहराई से प्रभावित किया था। आज संबंधों में सुधार की कोशिश हो रही है, लेकिन सीमा विवाद पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। दूसरी ओर चीन और पाकिस्तान की रणनीतिक साझेदारी भी कोई नई या मामूली बात नहीं है। पाकिस्तान के साथ चीन का रक्षा और रणनीतिक सहयोग भारत की सुरक्षा गणना का स्थायी हिस्सा है। (The Indian Express)
ऐसे में भारत के लिए चीन से यह कहना बिल्कुल उचित है कि हम प्रतिद्वंद्वी नहीं, साझेदार बनना चाहते हैं। लेकिन साथ ही यह कहना भी उतना ही जरूरी है कि साझेदारी बराबरी, पारदर्शिता और परस्पर विश्वास पर ही टिक सकती है।
आर्थिक रिश्तों की दूसरी बड़ी पहेली
भारत-चीन संबंधों में सबसे बड़ा विरोधाभास अर्थव्यवस्था में दिखाई देता है।
दोनों देशों के बीच व्यापार तेजी से बढ़ा है, लेकिन यह व्यापार भारत के पक्ष में संतुलित नहीं है। वित्त वर्ष 2025-26 में दोनों देशों का द्विपक्षीय व्यापार लगभग 151 अरब डॉलर तक पहुंचा, लेकिन भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा करीब 112 अरब डॉलर रहा। यानी चीन से भारत जितना खरीदता है, उसके मुकाबले भारत चीन को बहुत कम बेच पाता है। (The Economic Times)
यह स्थिति केवल आंकड़ों की समस्या नहीं है। यह भारत की रणनीतिक स्वायत्तता का सवाल भी है।
हम चीन से संबंध सुधारना चाहते हैं, लेकिन हमें यह भी देखना होगा कि भारतीय उद्योग की कितनी महत्वपूर्ण कड़ियां चीनी मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक्स, रसायनों और औद्योगिक उपकरणों पर निर्भर हैं। भारत आत्मनिर्भरता की बात करता है और ठीक भी करता है, लेकिन आत्मनिर्भरता का अर्थ दुनिया से कट जाना नहीं हो सकता। इसका अर्थ होना चाहिए—किसी एक देश पर ऐसी निर्भरता न हो जो संकट के समय भारत की आर्थिक क्षमता को प्रभावित कर सके।
और फिर है अमेरिका का प्रश्न
भारत की दूसरी बड़ी वास्तविकता अमेरिका है।
अमेरिका भारत का एक महत्वपूर्ण निर्यात बाजार है। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने अमेरिका को 87.31 अरब डॉलर का निर्यात किया। (DD News)
इसलिए भारत के सामने केवल चीन का सवाल नहीं है। सवाल यह भी है कि क्या भारत अपनी आर्थिक वृद्धि और निर्यात के लिए किसी एक बड़े बाजार पर अत्यधिक निर्भर रह सकता है?
चीन पर अंधा भरोसा जोखिमपूर्ण है तो अमेरिका पर अत्यधिक निर्भरता भी जोखिम से मुक्त नहीं है।
यही भारत की असली दुविधा है।
एक तरफ चीन है—विशाल बाजार, बड़ी विनिर्माण क्षमता और भारत के लिए महत्वपूर्ण आपूर्ति शृंखलाएं; दूसरी तरफ सीमा विवाद, पाकिस्तान के साथ उसकी निकटता और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा।
दूसरी तरफ अमेरिका है—भारत का महत्वपूर्ण निर्यात बाजार और रणनीतिक साझेदार; लेकिन वहां की व्यापार नीति और बदलती प्राथमिकताएं भारत को यह याद दिलाती रहती हैं कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में स्थायी दोस्ती से अधिक स्थायी राष्ट्रीय हित होते हैं।
इसलिए भारत को रास्ता बीच का नहीं, अपना चुनना होगा
भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी ताकत यही रही है कि उसने किसी एक खेमे में खुद को पूरी तरह बांधने से परहेज किया है।
BRICS में चीन के साथ बैठना अमेरिका विरोधी होना नहीं है। अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी करना चीन विरोधी होना भी नहीं है। भारत को दोनों देशों के साथ अपने हितों के आधार पर संबंध रखने चाहिए।
लेकिन इसके लिए एक बात बिल्कुल स्पष्ट रहनी चाहिए—
भारत को चीन के साथ संबंध सुधारने चाहिए, चीन पर निर्भर नहीं होना चाहिए।
भारत को अमेरिका के साथ साझेदारी बढ़ानी चाहिए, अमेरिका पर निर्भर नहीं होना चाहिए।
और शायद यही भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की सबसे कठिन परीक्षा है।
BRICS के मंच से भारत ने Global South की आवाज को मजबूत करने की बात कही है। अब भारत को अपनी आर्थिक ताकत, अपनी विनिर्माण क्षमता, अपनी तकनीकी क्षमता और अपने निर्यात बाजारों को इतना व्यापक बनाना होगा कि किसी एक देश के साथ संबंध बिगड़ने का अर्थ भारत के लिए संकट न बन जाए।
कूटनीति में हाथ मिलाना कमजोरी नहीं है।
व्यापार करना कमजोरी नहीं है।
पुराने विवादों को पीछे छोड़कर आगे बढ़ने की कोशिश भी कमजोरी नहीं है।
कमजोरी तब होगी जब भारत अपने राष्ट्रीय हितों की कीमत पर किसी पर भरोसा करेगा।
चीन के साथ संबंधों में गर्माहट का स्वागत होना चाहिए। अमेरिका के साथ साझेदारी भी जारी रहनी चाहिए। लेकिन दोनों के बीच भारत की जगह किसी दूसरे देश द्वारा तय नहीं की जानी चाहिए।
भारत की विदेश नीति का केंद्र चीन नहीं हो सकता।
भारत की विदेश नीति का केंद्र अमेरिका भी नहीं हो सकता।
उसका केंद्र केवल और केवल भारत होना चाहिए।
BRICS के मंच से प्रधानमंत्री मोदी ने दुनिया के सामने भारत की बात रख दी है। अब अगली परीक्षा भाषण की नहीं, उस रणनीतिक संतुलन की है जिसमें भारत दोस्ती के दरवाजे खुले रखे, लेकिन अपनी आंखें बंद न करे।
क्योंकि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में संवाद भरोसे से शुरू हो सकता है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा केवल भरोसे के सहारे नहीं चलती।
— संपादक की कलम
ठाकुर पवन सिंह
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