क्या ब्रिटेन टूटने की राह पर है?
लंदन से बृज खंडेलवाल | 14 सितंबर 2026
प्रमुख अंश (Highlights):
- ब्रिटेन की एकता पर अभूतपूर्व दबाव: स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड के नेताओं की अहम बैठक के बीच यूनाइटेड किंगडम के भविष्य और नक्शे पर छिड़ी गंभीर बहस।
- स्कॉटलैंड में आजादी की सुगबुगाहट: 2014 के जनमत संग्रह के बाद ब्रेक्जिट और आर्थिक नीतियों के कारण स्वायत्तता व अलगाव की मांग ने फिर पकड़ा जोर।
- उत्तरी आयरलैंड और गुड फ्राइडे समझौता: बदलती जनसांख्यिकी और व्यापारिक पेचीदगियों के बीच संयुक्त आयरलैंड की चर्चा को मिला अंतरराष्ट्रीय रंग।
- सहमति और जनविश्वास की चुनौती: साझा संस्थाओं और रक्षा ढांचे से परे किसी भी बहुराष्ट्रीय संघ को जोड़े रखने के लिए जनता के भरोसे की अनिवार्यता।

बृज खंडेलवाल
वरिष्ठ पत्रकार, पर्यावरणविद् व अंतरराष्ट्रीय मामलों के विश्लेषक
अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीति, सामाजिक सरोकारों, वैश्विक कूटनीति और नागरिक व्यवस्थाओं पर दशकों से निरंतर पैनी नजर।
ऐसा लगता तो नहीं है! लेकिन आम जनता व्यवस्था से संतुष्ट नहीं है। अतीत का ग्रेट ब्रिटेन समस्याओं से जूझ रहा है। कॉफी हाउस में बातचीत के दौरान ये मुद्दा उठा। क्या ब्रिटेन का नक्शा आने वाले वर्षों में बदल सकता है? यह सवाल अब राजनीतिक गलियारों से निकलकर गंभीर राष्ट्रीय बहस बन गया है। स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड के नेता ऐसे समय मिलने जा रहे हैं, जब ब्रिटेन की एकता पर दबाव साफ दिखाई दे रहा है।
स्कॉटलैंड में आजादी की मांग कोई नई बात नहीं है। 2014 के जनमत संग्रह में जनता ने ब्रिटेन के साथ रहने का फैसला किया था। लेकिन सवाल पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। कभी अर्थव्यवस्था, कभी लंदन की नीतियां और कभी राजनीतिक असंतोष इस मांग को फिर हवा दे देते हैं।
पत्रकार जेम्स ने बताया , “ब्रिटेन में नई लेबर सरकार के सामने यह बड़ी परीक्षा है। प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम को तय करना होगा कि स्कॉटलैंड की मांगों को कितनी छूट दी जाए। एक कदम इधर बढ़ा तो अलगाववादियों को उम्मीद मिलेगी, और ज्यादा सख्ती हुई तो असंतोष और बढ़ सकता है। यानी आगे कुआं, पीछे खाई।”
ब्रेक्जिट ने भी इस बहस को आसान नहीं छोड़ा है। व्यापार, मुद्रा, सरकारी खर्च और यूरोप से संबंध जैसे सवाल पहले से ज्यादा पेचीदा हो गए हैं। अगर स्कॉटलैंड कभी फिर जनमत संग्रह की ओर बढ़ता है, तो 2014 के मुकाबले इस बार बहस कहीं ज्यादा कठिन होगी।
वेल्स की स्वायत्तता और उत्तरी आयरलैंड का पेच
वेल्स की स्थिति अलग है। वहां स्कॉटलैंड जैसी तेज आजादी की लहर नहीं है। फिर भी राष्ट्रीय पहचान और ज्यादा स्वायत्तता की मांग मौजूद है। अगर स्कॉटलैंड ब्रिटेन से अलग होने की दिशा में बढ़ता है, तो वेल्स में भी नई आवाजें उठ सकती हैं।
सबसे संवेदनशील मामला उत्तरी आयरलैंड का है। गुड फ्राइडे समझौते के तहत, परिस्थितियां अनुकूल होने पर आयरलैंड के एकीकरण के लिए जनमत संग्रह कराया जा सकता है। बदलती जनसंख्या, पहचान की राजनीति और आयरिश सागर में व्यापार की व्यवस्था ने इस मुद्दे को लगातार जिंदा रखा हुआ है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का संयुक्त आयरलैंड के समर्थन में बयान इस बहस को अंतरराष्ट्रीय रंग दे दिया है। हालांकि ब्रिटेन और आयरलैंड की सरकारें इसे मुख्य रूप से वहां के लोगों का फैसला मानती हैं। बाहर से आने वाली राजनीतिक टिप्पणियां आग में घी का काम भी कर सकती हैं।
लंदन की परीक्षा और संघ का भविष्य
तीनों देशों के नेताओं की बैठक इसलिए महत्वपूर्ण है। यह केवल बातचीत नहीं, बल्कि बदलते ब्रिटेन की तस्वीर है। लंदन के सामने दो रास्ते हैं, और ज्यादा अधिकार देकर संघ को मजबूत करना या अलगाववादी मांगों का कड़ा मुकाबला करना।
ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था, रक्षा व्यवस्था और साझा संस्थाएं आज भी इन हिस्सों को मजबूती से जोड़ती हैं। लेकिन कोई भी संघ केवल कानून और संस्थाओं से नहीं चलता। आखिरकार जनता का भरोसा और साथ रहने की इच्छा ही उसकी असली नींव होती है।
इतिहास का सबक साफ है। बहुराष्ट्रीय देश समय के साथ बदलते हैं, लेकिन सहमति टूट जाए तो मजबूत दीवारें भी दरकने लगती हैं। लंदन की मौजूदा बहस इसलिए केवल राजनीति की कहानी नहीं, बल्कि ब्रिटेन के भविष्य की घंटी है।
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