डिग्रियों का मोहभंग और युवा भारत की अनकही त्रासदी
आज का भारतीय युवा एक अत्यंत अजीबोगरीब ऐतिहासिक, सामाजिक और आर्थिक मोड़ पर खड़ा है। एक तरफ बड़े-बड़े नीतिगत मंचों और सरकारी दावों से ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ (Demographic Dividend) का ढिंढोरा पीटा जा रहा है, तो दूसरी तरफ जमीनी स्तर पर डिग्रियों की लगातार घटती उपयोगिता, शिक्षा के व्यवसायीकरण और सिकुड़ते सम्मानजनक रोजगार का कड़वा सच मुँह बाए खड़ा है। लगभग दो दशक पहले तक जिन उच्च पेशेवर डिग्रियों को सामाजिक सुरक्षा, स्थिरता और समृद्ध भविष्य की पक्की गारंटी माना जाता था, आज वे केवल भारी-भरकम फीस की रसीदों और अधूरे छूटे सपनों का बेजान दस्तावेज बनकर रह गई हैं। 1990 के दशक में आर्थिक उदारीकरण के बाद जिस पिछली पीढ़ी ने असीम अवसरों का स्वर्णिम दौर देखा, वह आज की ‘जनरेशन ज़ी’ (Gen-Z) के बुनियादी अस्तित्वगत संघर्षों, मानसिक अवसाद और आर्थिक दबावों को समझने में पूरी तरह विफल साबित हो रही है। विधिक सच यह है कि डिग्रियों का यह मोहभंग अब एक राष्ट्रव्यापी त्रासदी का रूप ले चुका है।
ठहराव की ओर बढ़ता आईटी सेक्टर
भारतीय मध्यवर्ग के सामाजिक और आर्थिक उत्थान का सबसे बड़ा संवाहक पिछले तीन दशकों से देश का आईटी (IT) उद्योग रहा है। आज से लगभग 15-20 वर्ष पूर्व, देश के किसी भी सामान्य या टियर-2 इंजीनियरिंग कॉलेजों से बी.टेक करने वाले नौजवानों को सबसे ज्यादा रोजगार देने वाली देश की दिग्गज आईटी कंपनी ‘टीसीएस’ (TCS) में एक फ्रेशर का शुरुआती पैकेज लगभग 3.25 लाख रुपये सालाना हुआ करता था। विडंबना और घोर आर्थिक संकट यह है कि दो दशकों की भारी मुद्रास्फीति (Inflation) के बावजूद, आज 2026 में भी नए इंजीनियरिंग ग्रेजुएट्स का शुरुआती पैकेज 3.5 से 4 लाख रुपये के आसपास ही अटका हुआ है।
प्रामाणिक आंकड़ों पर नजर डालें तो 2003 से 2013 के बीच टीसीएस में कर्मचारियों की संख्या 30,000 से बढ़कर 3 लाख तक पहुँची थी—यानी महज दस वर्षों में लगभग 10 गुना रिकॉर्ड वृद्धि। अगले दशक (2013-2023) में यह संख्या बढ़कर 6 लाख के पार पहुँची। लेकिन अब बड़े पैमाने पर भर्तियों का वह स्वर्णिम दौर पूरी तरह थम चुका है। ऑटोमेशन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के इस नए तकनीकी दौर में अब टेक कंपनियों में नौकरियों की संख्या बढ़ने के बजाय कुल वर्कफोर्स में भारी गिरावट दर्ज की जा रही है। ऐसे में लाखों बी.टेक छात्र डिग्रियां हाथ में लिए बेबस खड़े हैं।
पेशेवर शिक्षा का संकट: मेडिकल, एमबीए और लॉ
शिक्षा और रोजगार का यह विकराल संकट केवल इंजीनियरिंग तक ही सीमित नहीं है; हमारी उच्च पेशेवर शिक्षा के लगभग हर पारंपरिक क्षेत्र में आपूर्ति और मांग का संतुलन पूरी तरह बिगड़ चुका है:
मेडिकल (MBBS): लाखों-करोड़ों रुपये की डोनेशन फीस और वर्षों की कठिन शारीरिक-मानसिक तपस्या के बाद एमबीबीएस करने वाले युवा डॉक्टरों को शुरुआती दौर में गैर-सरकारी या छोटे निजी अस्पतालों में मात्र 30,000 से 40,000 रुपये की मामूली सैलरी पर काम करने को मजबूर होना पड़ रहा है।
एमबीए (MBA): टियर-2 और टियर-3 संस्थानों से भारी-भरकम एजुकेशन लोन लेकर निकलने वाले अधिकांश एमबीए ग्रेजुएट्स को केवल कमिशन-बेस्ड घटिया सेल्स या बेहद कम वेतन वाली कॉरपोरेट नौकरियों से ही मजबूरन संतोष करना पड़ रहा है।
लॉ (Law): देश भर में कुकुरमुत्ते की तरह खुले महंगे और ‘फैंसी’ लॉ संस्थानों से निकलने वाले छात्रों का बड़ा वर्ग कैंपस प्लेसमेंट के संकट से बुरी तरह जूझ रहा है। जिन्हें शुरुआती अवसर मिलते भी हैं, उनका मासिक वेतन प्रायः 20,000 से 25,000 रुपये के बीच सिमट कर रह जाता है।
जनरेशनल गैप और अपेक्षाओं का बोझ
आज का भारतीय युवा शायद पिछली कई पीढ़ियों की तुलना में सबसे ज्यादा मानसिक तनाव, अनिश्चितता और दिशाहीनता का सामना कर रहा है। उसके माता-पिता उस दौर की उपज हैं जब “बी.टेक, एमबीए या मेडिकल कर लिया, तो लाइफ पूरी तरह सेट है” का सीधा और सरल सामाजिक समीकरण काम करता था। आज स्थिति यह है कि इन अत्यधिक महंगी डिग्रियों के बावजूद या तो बाजार में सम्मानजनक नौकरियां मौजूद ही नहीं हैं, या फिर वेतन इतना कम है कि दिल्ली, मुंबई या बेंगलुरु जैसे बड़े महानगरों में एक ठीक-ठाक कमरे का किराया और राशन चुकाना भी मुहाल हो जाता है। इसके बावजूद, परिजनों और समाज की उम्मीदों का बोझ रत्ती भर भी कम नहीं हुआ है। किसी भी स्वाभिमानी युवा के लिए सबसे दुखद और मर्मस्पर्शी क्षण वह होता है जब वह अपनी इस थोपी गई आर्थिक विफलता के कारण खुद को अपने ही माता-पिता की नजरों में गिरता हुआ महसूस करता है।
‘स्किल डेवलपमेंट’ और गिग इकोनॉमी का कड़वा सच
नीतिगत और प्रशासनिक स्तर पर अक्सर युवाओं को यह घिसा-पिटा परामर्श दे दिया जाता है—”डिग्री का मोह छोड़ो, स्किल सीखो।” लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या गुणवत्तापूर्ण, आधुनिक और व्यावहारिक स्किल ट्रेनिंग के लिए देश में कोई सुलभ, सस्ता और पारदर्शी सरकारी ढांचा तैयार है? कागजों पर चल रहे कौशल विकास केंद्र फर्जीवाड़े का शिकार हैं।
दूसरी ओर, ‘गिग इकोनॉमी’ (Gig Economy) या फ्रीलांसिंग को जितना सुगम और आकर्षक बताकर प्रचारित किया जाता है, जमीनी हकीकत उससे बिल्कुल भयावह और अलग है। यदि कोई शिक्षित युवा डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए डिलीवरी, होम-सर्विस या फ्रीलांसिंग करता है, तो वह केवल एक हुनरमंद कारीगर नहीं होता, बल्कि वह एक साथ मार्केटिंग, कस्टमर सर्विस, ऐप रेटिंग और सोशल मीडिया मैनेजमेंट खुद संभाल रहा होता है। दिन-रात की इस अनिश्चित और कमरतोड़ भागदौड़ के बाद महीने में बमुश्किल 20,000 से 25,000 रुपये की आय हो पाती है, जिसमें न तो कोई विधिक सामाजिक सुरक्षा (Social Security) है, न स्वास्थ्य बीमा और न ही भविष्य की कोई पेंशन व्यवस्था।
संवादहीनता और उपेक्षा का शिकार युवा
आज के भारतीय युवाओं की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि उनकी इस जायज और गंभीर आर्थिक समस्याओं को पूरी संवेदनशीलता से लेने के बजाय उन्हें लगातार खारिज किया जा रहा है। एक तरफ प्रतियोगी भर्ती परीक्षाओं में सालों-साल होने वाली देरी, संगठित धांधली और पेपर लीक जैसे गंभीर संस्थागत मुद्दे हैं, तो दूसरी तरफ जब वे अपने संवैधानिक अधिकारों या रोजगार के लिए सड़कों पर आवाज उठाते हैं, तो उनकी वास्तविक चिंताओं को राजनीतिक बहसों के शोर और पुलिसिया दमन में निर्दयता से दबा दिया जाता है।
1990 और 2000 के दशक में आर्थिक उदारीकरण के शुरुआती लाभ उठाकर समाज में स्थापित हुई पिछली पीढ़ी, जो आज मुख्यधारा के मीडिया और राजनीतिक विमर्श पर पूरी तरह काबिज है, सोशल मीडिया फॉरवर्ड्स के सतही ज्ञान के आधार पर इस नई पीढ़ी के वास्तविक आर्थिक-मानसिक संघर्ष को समझने में पूरी तरह असमर्थ दिखती है। देश के युवाओं के इस सुलगते दर्द को केवल “मानसिक रूप से कमजोर” या “भ्रमित” कहकर टाल देना भारत के स्वर्णिम भविष्य के साथ एक बहुत बड़ा खिलवाड़ है। यदि समय रहते शिक्षा और रोजगार की इस विकराल बुनियादी खाई को नहीं पाटा गया, तो भारत का यह तथाकथित ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ जल्द ही एक बहुत बड़े सामाजिक विद्रोह और आर्थिक संकट में बदल सकता है। विधिक सच को अब और दबाया नहीं जा सकता। सच से आंखें चुराना अब पूरी तरह बंद होना चाहिए।