रूस का Su-57 कितना ताकतवर? भारत को क्यों दे रहा पांचवीं पीढ़ी के फाइटर का ऑफर, क्या मिलेगा टेक्नोलॉजी ट्रांसफर का फायदा

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मोदी-पुतिन वार्ता और ब्रिक्स सम्मेलन के बीच Su-57E की पेशकश चर्चा में; संयुक्त उत्पादन, AESA रडार व स्टील्थ तकनीक के ट्रांसफर का दावा, चीन के J-20 और भारत के AMCA प्रोजेक्ट के बीच क्या होगा फैसला?

अंतरराष्ट्रीय डेस्क, 🌐 tajnews.in | शनिवार, 12 सितंबर 2026, 08:14:15 AM IST

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tajnews.in | नई दिल्ली। रूस का पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ फाइटर Su-57 एक बार फिर भारत-रूस रक्षा सहयोग के केंद्र में है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की 11 सितंबर को हुई मुलाकात से पहले क्रेमलिन ने Su-57 की भारत को बिक्री और उससे जुड़ी तकनीकी साझेदारी को बातचीत के एजेंडे में शामिल होने का संकेत दिया था। भारत में चल रहे BRICS शिखर सम्मेलन के बीच यह पेशकश दोनों देशों के व्यापक रणनीतिक संबंधों के लिहाज से भी महत्वपूर्ण हो गई है। रूस की पेशकश केवल तैयार लड़ाकू विमान बेचने तक सीमित नहीं है। मॉस्को Su-57E के उत्पादन, तकनीकी सहयोग और भविष्य में विमान के विकास में भारत की भागीदारी की संभावना भी सामने रख रहा है। जून 2026 में राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भारत के साथ Su-57 के संयुक्त उत्पादन और विकास में सहयोग की इच्छा जताई थी।

HIGHLIGHTS
  • रूस ने भारत को दिया 5वीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर Su-57E के संयुक्त उत्पादन और तकनीक का ऑफर।
  • सुपर-मैन्युवरेबिलिटी, AESA रडार और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर से लैस Su-57 यूक्रेन युद्ध में भी आजमाया गया।
  • चीन के J-20 के मुकाबले भारतीय वायुसेना के पास फिलहाल 5वीं पीढ़ी के फाइटर जेट का अभाव।
  • स्वदेशी AMCA प्रोजेक्ट के विकास के बीच क्या भारत चुनेगा रूसी Su-57 का त्वरित विकल्प?

क्या है Su-57?

Su-57 रूस का पांचवीं पीढ़ी का बहुउद्देश्यीय लड़ाकू विमान है। इसे सुखोई डिजाइन ब्यूरो ने विकसित किया है और इसका निर्माण यूनाइटेड एयरक्राफ्ट कॉरपोरेशन से जुड़ा है। इसे केवल दुश्मन के लड़ाकू विमानों से मुकाबले के लिए नहीं बनाया गया है। Su-57 को हवा, जमीन और समुद्र के लक्ष्यों के खिलाफ विभिन्न मिशनों के लिए डिजाइन किया गया है। यह दिन-रात, खराब मौसम और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध जैसी परिस्थितियों में भी अभियान चलाने के लिए तैयार किया गया है।

इसके प्रोटोटाइप ने 29 जनवरी 2010 को पहली उड़ान भरी थी। इसके बाद विमान की उड़ान क्षमता, एवियोनिक्स, हथियार प्रणालियों और स्टील्थ क्षमता का लंबे समय तक परीक्षण किया गया। रूस ने 2018 में शुरुआती विमानों की आपूर्ति के लिए रक्षा मंत्रालय के साथ अनुबंध किया और पहला सीरियल-प्रोडक्शन विमान 2020 में रूसी रक्षा मंत्रालय को सौंपा गया।

कितना बड़ा और कितना ताकतवर है?

Su-57 की लंबाई करीब 20.1 मीटर, पंखों का फैलाव 14.1 मीटर और ऊंचाई करीब 4.6 मीटर है। इसका अधिकतम टेकऑफ वजन करीब 35 टन बताया जाता है। विमान में एक पायलट के लिए कॉकपिट और दो इंजन हैं। हालांकि इसकी असली ताकत केवल आकार या इंजन की शक्ति में नहीं है। इसकी डिजाइन में स्टील्थ, सेंसर, एवियोनिक्स, हथियार और उच्च गतिशीलता को एक साथ जोड़ा गया है।

स्टील्थ क्षमता इसे खास क्यों बनाती है?

Su-57 को रडार, इंफ्रारेड और दृश्य पहचान के स्तर पर कम दिखाई देने के लिए डिजाइन किया गया है। इसका मतलब यह नहीं है कि विमान पूरी तरह अदृश्य हो जाता है। स्टील्थ तकनीक का उद्देश्य दुश्मन के सेंसरों के लिए विमान का पता लगाना, उसकी पहचान करना और उस पर प्रभावी निशाना साधना कठिन बनाना है। यही क्षमता पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों को पारंपरिक लड़ाकू विमानों से अलग करती है।

सुपर-मैन्युवरेबिलिटी भी बड़ी ताकत

Su-57 की प्रमुख विशेषताओं में उसकी सुपर-मैन्युवरेबिलिटी शामिल है। यानी विमान तेज गति से अपनी दिशा और उड़ान की स्थिति बदल सकता है। यह क्षमता विशेष रूप से नजदीकी हवाई मुकाबले में उपयोगी हो सकती है। रूस इसे सुपरसोनिक गति वाला विमान भी बताता है। विमान की युद्धक क्षमता का दावा स्टील्थ, आधुनिक एवियोनिक्स, हथियार प्रणालियों और उच्च गतिशीलता के संयोजन पर आधारित है।

यूक्रेन युद्ध में भी इस्तेमाल हो चुका है

Su-57 केवल परीक्षण और प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहा है। ब्रिटेन की रक्षा खुफिया एजेंसी के आकलन के अनुसार, रूस ने कम से कम जून 2022 से यूक्रेन के खिलाफ युद्ध में Su-57 का इस्तेमाल किया है। हालांकि उपलब्ध आकलनों के अनुसार रूस ने इन विमानों को यूक्रेन के अंदरूनी इलाकों के ऊपर जोखिम में डालने से बचाया और लंबी दूरी के हथियारों के इस्तेमाल के लिए रूसी क्षेत्र से मिशन किए। इससे यह भी पता चलता है कि रूस अपने सबसे आधुनिक लड़ाकू विमानों को युद्ध में इस्तेमाल करते हुए उनकी सुरक्षा को लेकर काफी सतर्क है।

2026 में Su-57 में क्या नया?

Su-57 के विकास का अगला चरण भी सामने आ चुका है। दो सीट वाले Su-57D प्रोटोटाइप ने 2026 में उड़ान परीक्षण शुरू किया। इसे केवल प्रशिक्षण विमान के रूप में नहीं देखा जा रहा, बल्कि मानवयुक्त और बिना पायलट वाले विमानों के साथ संयुक्त अभियानों में भूमिका के लिए भी विकसित किया जा रहा है। इसका अर्थ है कि भविष्य के हवाई युद्ध में Su-57 जैसे विमान केवल खुद लड़ने के बजाय ड्रोन और दूसरे प्लेटफॉर्म के साथ मिलकर अभियान संचालित करने में भी भूमिका निभा सकते हैं।

भारत को Su-57 की पेशकश क्यों?

यह कहानी केवल रूस के एक हथियार बेचने की नहीं है। भारत के लिए इसका सबसे बड़ा संदर्भ पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान की जरूरत है। भारतीय वायुसेना के पास फिलहाल कोई पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान परिचालन सेवा में नहीं है। भारत का अपना AMCA यानी Advanced Medium Combat Aircraft कार्यक्रम चल रहा है, लेकिन उसके सेवा में आने में अभी समय लगेगा। रूस इसी अंतराल को देखते हुए Su-57E को भारत के लिए संभावित विकल्प के रूप में पेश कर रहा है। जून 2026 में रूस ने संयुक्त उत्पादन और तकनीकी सहयोग की पेशकश को सार्वजनिक रूप से सामने रखा था।

भारत और Su-57 का रिश्ता पुराना है

भारत और रूस इससे पहले भी पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान पर साथ काम कर चुके हैं। दोनों देशों ने 2007 में FGFA यानी Fifth Generation Fighter Aircraft कार्यक्रम शुरू किया था। हालांकि भारत 2018 में इस कार्यक्रम से बाहर हो गया। लागत, तकनीक तक पहुंच और विमान की स्टील्थ क्षमता से जुड़े सवालों को इसके पीछे महत्वपूर्ण कारणों में गिना गया। इसके बाद रूस ने Su-57 का विकास अपने स्तर पर आगे बढ़ाया।

2025 में भारत आया Su-57E

Su-57E ने Aero India 2025 में भारत में अपनी पहली बड़ी सार्वजनिक मौजूदगी दर्ज कराई। बेंगलुरु के येलहंका एयरबेस पर रूसी विमान ने स्थिर प्रदर्शन के साथ उड़ान प्रदर्शन में भी हिस्सा लिया। उस प्रदर्शन ने भारतीय रक्षा क्षेत्र में इस विमान को लेकर चर्चा को और तेज किया। Su-57 के साथ अमेरिकी F-35 की मौजूदगी ने भी पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों की प्रतिस्पर्धा को भारत में खास आकर्षण दिया।

रूस भारत को सिर्फ विमान नहीं, तकनीक भी देना चाहता है

यही इस पूरी पेशकश का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। रूस की पेशकश में तैयार Su-57E की बिक्री, भारत में संयुक्त उत्पादन और तकनीकी सहयोग शामिल है। संभावित सहयोग के जिन क्षेत्रों का उल्लेख किया गया है, उनमें इंजन, AESA रडार, ऑप्टिक्स, सॉफ्टवेयर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्टील्थ तकनीक और हथियार प्रणालियां शामिल हैं। हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। क्रेमलिन ने संकेत दिया है कि भारत की दिलचस्पी उत्पादन तकनीक हासिल करने में है, लेकिन संवेदनशील तकनीक साझा करने की शर्तों पर अभी बातचीत जारी है। इसलिए रूस की ओर से व्यापक तकनीकी सहयोग की पेशकश को अंतिम और पूर्ण टेक्नोलॉजी ट्रांसफर समझना सही नहीं होगा। किन संवेदनशील तकनीकों को किस सीमा तक भारत को दिया जाएगा, यह अंतिम समझौते पर निर्भर करेगा।

भारत में उत्पादन हुआ तो क्या बदलेगा?

अगर भारत और रूस Su-57E के स्थानीय उत्पादन पर सहमत होते हैं तो भारत को केवल एक नया लड़ाकू विमान नहीं मिलेगा, बल्कि फाइटर जेट के निर्माण और रखरखाव की औद्योगिक क्षमता विकसित करने का अवसर भी मिल सकता है। पांचवीं पीढ़ी के विमान की ताकत केवल उसके एयरफ्रेम में नहीं होती। रडार, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली, सेंसर, मिशन कंप्यूटर, सॉफ्टवेयर, इंजन और हथियारों का एकीकरण उसकी वास्तविक युद्ध क्षमता तय करता है। रूस की पेशकश में महत्वपूर्ण हिस्सों के स्थानीय उत्पादन और चरणबद्ध तरीके से भारत की भूमिका बढ़ाने की बात इसी वजह से महत्वपूर्ण है।

चीन और पाकिस्तान के संदर्भ में भारत के सामने चुनौती

Su-57 की पेशकश का सबसे बड़ा रणनीतिक संदर्भ चीन की पांचवीं पीढ़ी की क्षमता है। चीन के पास J-20 परिचालन सेवा में है। पाकिस्तान की भविष्य की स्टील्थ फाइटर क्षमता को लेकर भी भारत में लगातार चर्चा होती रही है। ऐसे माहौल में भारत के पास फिलहाल कोई परिचालन पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान नहीं होना एक महत्वपूर्ण अंतर है। भारत के पास Su-30MKI और Rafale जैसे आधुनिक लड़ाकू विमान हैं, लेकिन इन्हें पांचवीं पीढ़ी के विमान की श्रेणी में नहीं रखा जाता। दूसरी तरफ AMCA भारत का स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी का प्रमुख कार्यक्रम है, जो अभी विकास के चरण में है।

दुनिया में Su-57 के सामने कौन?

पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों की दौड़ में रूस के Su-57 के साथ अमेरिका के F-22 Raptor और F-35 Lightning II तथा चीन का J-20 प्रमुख नाम हैं। F-22 को मुख्य रूप से हवाई श्रेष्ठता के लिए विकसित किया गया है, जबकि F-35 को बहुउद्देश्यीय स्टील्थ मिशनों, सेंसर फ्यूजन और नेटवर्क-केंद्रित युद्ध के लिए विकसित किया गया है। चीन का J-20 भी परिचालन सेवा में है। इसलिए भारत अगर Su-57E को चुनता है तो यह केवल एक विमान खरीदने का फैसला नहीं होगा। इसका असर आने वाले वर्षों की हवाई युद्ध क्षमता, तकनीकी आत्मनिर्भरता और रक्षा औद्योगिक नीति पर पड़ेगा।

BRICS के बीच Su-57 का मुद्दा इतना महत्वपूर्ण क्यों?

मोदी-पुतिन की हालिया बैठक का एजेंडा केवल Su-57 तक सीमित नहीं था। दोनों नेताओं के बीच रक्षा के साथ ऊर्जा, व्यापार और व्यापक रणनीतिक सहयोग पर भी चर्चा हुई। भारत और रूस ने द्विपक्षीय व्यापार को 2030 तक 100 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य भी दोहराया है। रूस के लिए भारत के साथ रक्षा संबंध इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि दोनों देशों का सहयोग Su-30MKI और BrahMos जैसे कार्यक्रमों तक फैला हुआ है। भारत के लिए रूस के साथ संबंध पश्चिमी देशों के साथ साझेदारी के समानांतर अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने का एक महत्वपूर्ण आधार हैं।

सबसे बड़ा सवाल: भारत खरीदेगा या AMCA का इंतजार करेगा?

यही इस पूरी कहानी का निर्णायक बिंदु है। Su-57E भारत को अपेक्षाकृत जल्दी पांचवीं पीढ़ी की क्षमता देने का विकल्प पेश करता है, जबकि AMCA भारत का स्वदेशी दीर्घकालिक समाधान है। लेकिन Su-57 को लेकर भारत पहले भी तकनीक, लागत और स्टील्थ क्षमता पर सवाल उठा चुका है। इसलिए अंतिम फैसला केवल इस बात पर निर्भर नहीं करेगा कि Su-57 कितना ताकतवर है। असली सवाल यह होगा कि रूस भारत को कितनी तकनीक देता है, भारत में कितना उत्पादन संभव होता है, कीमत और रखरखाव की शर्तें क्या रहती हैं और यह सौदा भारत के AMCA कार्यक्रम को मजबूत करता है या उससे संसाधनों का ध्यान भटकाता है।

यानी Su-57E भारत के लिए सिर्फ एक लड़ाकू विमान की पेशकश नहीं है। यह इस सवाल का भी परीक्षण है कि भारत अपनी अगली पीढ़ी की हवाई ताकत कितनी जल्दी हासिल करना चाहता है और उसमें विदेशी तकनीक तथा स्वदेशी विकास के बीच संतुलन क्या होगा।

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Pawan Kumar Singh Editor in Chief Taj News

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