BRICS Summit 2026: सात साल बाद भारत पहुंचे शी जिनपिंग, सीमा विवाद के बीच व्यापार और निवेश पर नई डील की तैयारी; 112 अरब डॉलर के घाटे के बीच भारत की भी कड़ी शर्तें
नई दिल्ली डेस्क, 🌐 tajnews.in | शनिवार, 12 सितंबर 2026, 08:48:15 AM IST

tajnews.in | नई दिल्ली। भारत और चीन के रिश्तों में लंबे तनाव के बाद अब एक नई तस्वीर उभरती दिखाई दे रही है। चीन के सरकारी बयानों और आधिकारिक मीडिया के सुर में भारत के साथ व्यापार, निवेश और आर्थिक सहयोग को लेकर पहले की तुलना में ज्यादा सकारात्मक रुख नजर आ रहा है। बीजिंग ने भारत से चीनी कंपनियों के लिए निष्पक्ष, पारदर्शी और गैर-भेदभावपूर्ण कारोबारी माहौल की मांग की है। इसी बीच चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग सात साल बाद भारत पहुंच रहे हैं। वह 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में हो रहे 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में हिस्सा ले रहे हैं। भारत और चीन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग के बीच द्विपक्षीय बैठक की भी तैयारी की है। चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि दोनों देशों को रणनीतिक और दीर्घकालिक नजरिये से संबंधों को देखना, संवाद बढ़ाना और मतभेदों को उचित तरीके से संभालना चाहिए। यह मुलाकात इसलिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि 2020 के गलवान संघर्ष के बाद दोनों देशों के रिश्ते लंबे समय तक तनावपूर्ण रहे। अब सवाल यह है कि क्या सीमा पर तनाव कम करने की प्रक्रिया को व्यापार और निवेश के नए दौर से जोड़ा जा सकता है।
चीन ने अचानक कारोबार की बात क्यों शुरू की?
शी जिनपिंग के भारत दौरे से ठीक पहले चीन ने भारत के साथ आर्थिक रिश्तों को लेकर स्पष्ट संदेश दिया है। चीनी विदेश मंत्रालय ने भारत-चीन आर्थिक और व्यापारिक सहयोग को परस्पर लाभकारी और दोनों पक्षों के लिए फायदेमंद बताया है। बीजिंग ने भारत से चीन की कंपनियों के लिए निष्पक्ष, न्यायसंगत, पारदर्शी और गैर-भेदभावपूर्ण कारोबारी माहौल उपलब्ध कराने की अपील भी की है। यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि चीन की कंपनियों के लिए भारत एक विशाल और तेजी से बढ़ता बाजार है। दूसरी तरफ भारत भी इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, रसायन और औद्योगिक उपकरणों जैसी कई श्रेणियों में चीन से बड़े पैमाने पर आयात करता है। यानी दोनों देशों के बीच आर्थिक निर्भरता कम करने की कोशिशों के बावजूद कारोबार को पूरी तरह अलग करना आसान नहीं है।
112 अरब डॉलर का व्यापार घाटा भारत की सबसे बड़ी चिंता
भारत और चीन के बीच कारोबार का आकार बड़ा है, लेकिन संतुलन भारत के पक्ष में नहीं है। भारत के वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने चीन को 19.47 अरब डॉलर का निर्यात किया, जबकि चीन से 131.63 अरब डॉलर का आयात किया। इस तरह भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा करीब 112.16 अरब डॉलर रहा। दोनों देशों का कुल माल व्यापार करीब 151.10 अरब डॉलर रहा। यही आंकड़े बताते हैं कि मोदी-शी बातचीत में सिर्फ चीनी कंपनियों को भारत में कारोबार की सुविधा देने का सवाल नहीं होगा। भारत की बड़ी मांग होगी कि भारतीय उत्पादों के लिए चीन का बाजार भी अधिक खोला जाए, भारतीय कंपनियों को बराबर अवसर मिले और व्यापार घाटे को कम करने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएं।
मोदी-शी की बैठक में क्या हो सकता है?
चीन के विदेश मंत्रालय ने 11 सितंबर को पुष्टि की कि दोनों देशों के नेता द्विपक्षीय बैठक की व्यवस्था कर रहे हैं। बीजिंग ने संकेत दिया है कि बातचीत में संबंधों को रणनीतिक और दीर्घकालिक नजरिये से आगे बढ़ाने पर जोर रहेगा। रिपोर्टों के मुताबिक दोनों देशों के बीच रणनीतिक आर्थिक संवाद शुरू करने की दिशा में भी चर्चा चल रही है। इसमें व्यापार घाटा, बाजार तक पहुंच, चीनी निवेश, वीजा और कारोबारी बाधाओं जैसे मुद्दे शामिल हो सकते हैं। भारत के लिए बातचीत का मूल सवाल यही रहेगा कि चीन के साथ आर्थिक संबंध बढ़ें, लेकिन उनका फायदा एकतरफा न हो।
चीन को भारत से क्या चाहिए?
बीजिंग की प्राथमिकताओं में भारत में चीनी कंपनियों के लिए अधिक स्थिर और अनुमानित कारोबारी वातावरण प्रमुख है। चीन चाहता है कि उसकी कंपनियों को भारत में निवेश और संचालन के दौरान नियामकीय स्पष्टता मिले। दूसरी तरफ भारत सुरक्षा कारणों से चीनी निवेश और तकनीक को लेकर सावधानी बरतता रहा है। यही अविश्वास दोनों देशों के आर्थिक रिश्तों की सबसे बड़ी अड़चन है। हाल के वर्षों में भारत ने कुछ क्षेत्रों में चीनी निवेश को लेकर नियमों में सीमित ढील दी है और कुछ कारोबारी साझेदारियों को मंजूरी भी मिली है। लेकिन संवेदनशील क्षेत्रों में सुरक्षा जांच अभी भी जारी है। दोनों देशों के बीच वीजा, तकनीकी उपकरण, निवेश और नियामकीय मंजूरी जैसे मुद्दे अब भी कारोबार को प्रभावित कर रहे हैं।
भारत के लिए सिर्फ चीनी निवेश काफी नहीं
भारत की स्थिति भी स्पष्ट है। नई दिल्ली को चीन से निवेश और तकनीक की जरूरत हो सकती है, लेकिन वह ऐसा रिश्ता नहीं चाहती जिसमें भारतीय बाजार लगातार चीनी उत्पादों के लिए बड़ा बाजार बनता रहे और भारतीय उत्पादों को चीन में समान अवसर न मिले। इसीलिए भारत की प्राथमिकताओं में तीन बातें अहम रहेंगी। पहली, चीन में भारतीय उत्पादों के लिए बाजार पहुंच बढ़े। दूसरी, व्यापार घाटा कम करने के लिए ठोस कदम उठें। तीसरी, निवेश और तकनीकी सहयोग में राष्ट्रीय सुरक्षा की चिंताओं का समाधान हो। यानी भारत के लिए आर्थिक सहयोग का मतलब सिर्फ चीन से ज्यादा निवेश लाना नहीं, बल्कि अधिक संतुलित आर्थिक संबंध बनाना है।
सीमा पर भी रिश्ते धीरे-धीरे सुधर रहे हैं
आर्थिक रिश्तों में नरमी के संकेतों के साथ सीमा पर भी संवाद की प्रक्रिया आगे बढ़ी है। अगस्त 2026 में भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल और चीन के विदेश मंत्री व विशेष प्रतिनिधि वांग यी के बीच सीमा मुद्दे पर 25वें दौर की बातचीत हुई। दोनों पक्षों ने सीमा क्षेत्रों में शांति और स्थिरता बनाए रखने तथा सीमा विवाद के समाधान की दिशा में बातचीत आगे बढ़ाने पर सहमति जताई। दोनों देशों ने पूर्वी और मध्य सेक्टर में दो अतिरिक्त सैन्य हॉटलाइन और वरिष्ठ सैन्य कमांडरों की बैठक के लिए दो नए संपर्क बिंदु बनाने पर भी सहमति जताई। सीमापार नदियों से जुड़े मुद्दों पर सितंबर में विशेषज्ञ स्तर की बैठक आयोजित करने पर भी सहमति बनी है। तीन निर्धारित सीमा व्यापार बिंदुओं को दोबारा खोलने और सीमा व्यापार तथा तीर्थयात्रा से जुड़े सहयोग को बढ़ाने की बात भी सामने आई है। इससे साफ है कि दोनों देश टकराव के बजाय नियंत्रित संवाद और व्यावहारिक सहयोग की दिशा में आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं।
लेकिन 2020 का अविश्वास अभी खत्म नहीं हुआ
रिश्तों में नरमी को पूर्ण सामान्य स्थिति मानना जल्दबाजी होगी। 2020 के गलवान संघर्ष के बाद भारत ने चीनी निवेश, ऐप्स और कारोबारी गतिविधियों पर कई तरह के प्रतिबंध और सुरक्षा जांच लागू किए थे। अब दोनों देशों के बीच संपर्क और कारोबार में सुधार के संकेत जरूर हैं, लेकिन सीमा पर सैन्य तैनाती और रणनीतिक अविश्वास पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। यही कारण है कि विशेषज्ञ भारत-चीन संबंधों में मौजूदा बदलाव को कूटनीतिक सीमित नरमी के रूप में देखते हैं, न कि पूर्ण रणनीतिक समझौते के रूप में।
ब्रिक्स के मंच पर क्यों महत्वपूर्ण है मोदी-शी मुलाकात?
शी जिनपिंग का भारत दौरा सिर्फ द्विपक्षीय रिश्तों तक सीमित नहीं है। वह 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने आए हैं। ब्रिक्स अब 11 सदस्य देशों का समूह है और वैश्विक अर्थव्यवस्था तथा ग्लोबल साउथ की राजनीति में उसका महत्व बढ़ा है। इस सम्मेलन में वैश्विक शासन, बहुपक्षवाद, व्यापार, वित्तीय व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय संघर्षों जैसे मुद्दे भी चर्चा में हैं। भारत के लिए ब्रिक्स ऐसा मंच है जहां वह एक तरफ चीन और रूस जैसी शक्तियों के साथ संवाद बनाए रख सकता है, तो दूसरी तरफ अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ अपने संबंधों को भी संतुलित रख सकता है।
अमेरिका फैक्टर भी है महत्वपूर्ण
भारत और चीन के रिश्तों में आर्थिक समीकरण को केवल द्विपक्षीय नजरिये से देखना पर्याप्त नहीं होगा। दोनों देशों के अमेरिका के साथ अपने-अपने तनाव हैं। चीन लंबे समय से अमेरिका के साथ व्यापार और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा में उलझा है, जबकि भारत के भी व्यापार, टैरिफ और रणनीतिक मुद्दों पर अमेरिका के साथ कई मतभेद हैं। ऐसे में भारत और चीन के बीच सीमित आर्थिक सहयोग दोनों देशों को कुछ रणनीतिक गुंजाइश भी दे सकता है। हालांकि भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखना चाहता है और चीन के साथ संबंधों में सुरक्षा चिंताओं को नजरअंदाज करने के पक्ष में नहीं है।
चीन के सरकारी मीडिया का बदला सुर कितना बड़ा संकेत?
चीन की ओर से आर्थिक सहयोग पर जोर देना निश्चित रूप से महत्वपूर्ण संकेत है। लेकिन इसे चीन की पूरी रणनीति में बदलाव का प्रमाण मानना अभी जल्दबाजी होगी। बीजिंग के लिए भारत एक बड़ा उपभोक्ता बाजार है। भारत के लिए चीन एक बड़ा आयात स्रोत और महत्वपूर्ण औद्योगिक सप्लाई चेन पार्टनर है। इसलिए दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंधों को पूरी तरह अलग करना दोनों के लिए महंगा साबित हो सकता है। यही वजह है कि फिलहाल दोनों देशों का रास्ता शायद प्रतिस्पर्धा के साथ सीमित सहयोग का है।
असली परीक्षा मोदी-शी मुलाकात के बाद
शी जिनपिंग की सात साल बाद भारत यात्रा और मोदी-शी की संभावित द्विपक्षीय बैठक ने भारत-चीन रिश्तों को फिर से वैश्विक सुर्खियों में ला दिया है। लेकिन इस बैठक की असली सफलता किसी गर्मजोशी भरे बयान से नहीं, बल्कि उसके बाद उठाए जाने वाले ठोस कदमों से तय होगी। क्या चीन भारतीय उत्पादों के लिए अपना बाजार ज्यादा खोलेगा? क्या 112 अरब डॉलर से अधिक के व्यापार घाटे को कम करने की दिशा में कोई ठोस व्यवस्था बनेगी? क्या चीनी कंपनियों के निवेश को लेकर भारत में नियम स्पष्ट होंगे? क्या भारतीय कंपनियों को चीन में बराबर कारोबारी अवसर मिलेंगे? और सबसे अहम—क्या सीमा पर शांति और आर्थिक सहयोग एक-दूसरे को मजबूत करेंगे?
फिलहाल बीजिंग का संदेश साफ दिखाई दे रहा है: वह भारत के साथ रिश्तों में आर्थिक मोर्चे को फिर से सक्रिय करना चाहता है। लेकिन नई दिल्ली के लिए आगे बढ़ने की शर्त भी उतनी ही स्पष्ट है—कारोबार बढ़े, मगर संतुलित तरीके से; निवेश आए, मगर राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता किए बिना; और सीमा पर शांति हो, तभी रिश्तों में स्थायी भरोसा बन सकेगा। भारत-चीन संबंधों में यह बदलाव किसी बड़े समझौते की मंजिल नहीं, बल्कि एक नई परीक्षा की शुरुआत है।
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Pawan Kumar Singh
Chief Editor, Taj News
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