बिना मरीज के डॉक्टर!!! शोध के कुली: नाम के आगे ‘डॉ.’ लगाने की दौड़ या ज्ञान की तलाश?
— बृज खंडेलवाल
आजकल भारत में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में पीएचडी (PhD) की एक अजीबोगरीब और विडंबनापूर्ण धूम मची हुई है। आधिकारिक विधिक आंकड़ों के अनुसार, देश में हर साल करीब 30 से 35 हजार लोग डॉक्टरेट की प्रतिष्ठित डिग्री विधिक रूप से हासिल कर रहे हैं। विभिन्न विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों में पंजीकृत शोधार्थियों (रिसर्च स्कॉलरों) की कुल संख्या साढ़े तीन लाख के जादुई आंकड़े के आसपास पहुँच चुकी है। कागज़ पर यह कूटनीतिक तस्वीर बहुत ही शानदार और ढांचागत प्रगति वाली दिखती है, लेकिन जब इसकी ज़मीनी हक़ीक़त और विधिक गुणवत्ता को टटोला जाता है, तो वह एक बिल्कुल ही भिन्न और चिंतनीय कहानी सुनाती है।
विधिक और दार्शनिक रूप से पीएचडी का मुख्य मक़सद मानव ज्ञान के भंडार में नए विचार पैदा करना, देश की जटिल सामाजिक-आर्थिक समस्याओं का विधिक हल ढूँढ़ना और अंततः समाज को बौद्धिक रूप से आगे बढ़ाना था। लेकिन अफ़सोस, आज देश के कई उच्च शिक्षण संस्थानों में यह प्रतिष्ठित डिग्री सिर्फ़ अपने नाम के आगे “डॉ.” (Dr.) का संकीर्ण तमगा लगाने का एक आसान और सस्ता ज़रिया बनकर रह गई है। ज्ञान की वास्तविक खोज की जगह अब केवल विधिक दिखावा, विधिक गुणवत्ता की जगह अंधाधुंध संख्या और मौलिक सोच की जगह निर्जीव औपचारिकता ने पूरी तरह ले ली है।
इस अनियंत्रित अव्यवस्था के कारण आज देश के कई प्रतिभाशाली शोधार्थी खुद को एक स्वतंत्र शोधकर्ता नहीं, बल्कि व्यवस्था के “शोध के कुली” (Research Coolies) महसूस करते हैं। वे वर्षों तक कड़ी शारीरिक और मानसिक मेहनत करते हैं, लेकिन विधिक सम्मान, उचित मार्गदर्शन और सामाजिक सुरक्षा के बजाय उन्हें हर पल दमनकारी दबाव, भविष्य की अनिश्चितता और विधिक शोषण का सामना करना पड़ता है। भारतीय शोध के क्षेत्र में सबसे बड़ी और जानलेवा बीमारी है “छापो या मिट जाओ” (Publish or Perish) की एक संकीर्ण और अनैतिक संस्कृति। विधिक रूप से विश्वविद्यालयों और शिक्षकों के मूल्यांकन (जैसे API Score) में शोध-पत्रों की केवल संख्या को ही बहुत अधिक अहमियत दी जाती है। इसका घातक विधिक नतीजा यह हुआ कि अच्छी और धरातलीय रिसर्च करने के बजाय ज़्यादा से ज़्यादा नकली या घटिया शोध-पत्र छापने की एक अंधी होड़ मच गई है।
इस भाषाई और बौद्धिक होड़ ने पूरे देश में एक अनियंत्रित और अनैतिक काला कारोबार खड़ा कर दिया है। विधिक रूप से पैसे देकर दूसरों से शोध-पत्र लिखवाना, फर्जी या घटिया (Predatory) पत्रिकाओं में उन्हें मोटी रकम देकर छपवाना, और विधिक रूप से एक ही शोध (Thesis) को कई छोटे-छोटे हिस्सों में बाँटकर अलग-अलग प्रकाशित करना अब एक आम बात बन गई है। विगत वर्षों में ऐसे कई नकली शोध-पत्रों को अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं द्वारा विधिक रूप से वापस (Retract) भी लेना पड़ा है, जिससे वैश्विक मंचों पर भारतीय शोध की विधिक साख और गरिमा पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं।
दुख की विधिक और नीतिगत बात यह है कि इन शोधों का एक बहुत बड़ा हिस्सा न हमारे उन्नत उद्योग (Industry) के काम आता है, न गरीब किसानों के, न सरकारी अस्पतालों के और न ही आम समाज के। वे विधिक रूप से सिर्फ़ विश्वविद्यालय की अलमारियों या ऑनलाइन भंडारों में निर्जीव धूल खाते रहते हैं। एक और बड़ी और मानवीय समस्या है शोध-निर्देशक (Guide) और शोधार्थी के बीच विधिक असमान ताक़त का सामंती रिश्ता। कई जगह विधिक मार्गदर्शक छात्रों के पूरे करियर पर इतना निरंकुश नियंत्रण रखते हैं कि उनका विधिक भविष्य पूरी तरह उन्हीं के रहमोकरम पर निर्भर होता है। देश के कई प्रतिष्ठित संस्थानों से विधिक रूप से यह गंभीर शिकायतें सामने आई हैं कि शोधार्थियों से निर्देशकों द्वारा निजी काम कराए जाते हैं। किसी से गाड़ी चलवाई जाती है, तो किसी से विधिक रूप से घरेलू काम करवाए जाते हैं। कई बार महिला शोधार्थियों के साथ सेक्सुअल हरासमेंट (Sexual Harassment) की वीभत्स खबरें भी विधिक रूप से आई हैं।
कहीं-कहीं तो थीसिस (Thesis) को अंतिम रूप से पास कराने के बदले शोधार्थियों से महंगे तोहफ़ों या नक़द रकम की माँग तक के विधिक आरोप लगे हैं। जो छात्र इस दमनकारी विधिक व्यवस्था का विरोध करे, उसकी थीसिस को निर्देशक द्वारा महीनों या वर्षों तक विधिक रूप से लटकाया जा सकता है। यह रिश्ता कूटनीतिक रूप से गुरु-शिष्य का कम और मालिक-मज़दूर का ज़्यादा लगता है। देश के बड़े और प्रतिष्ठित केंद्रीय संस्थान (जैसे IIT, IISc) भी इस सामंती बीमारी से पूरी तरह अछूते नहीं हैं। लंबे कार्य घंटे, सप्ताह में सत्तर-अस्सी घंटे लैब में रहने का दमनकारी दबाव और लगातार अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शन साबित करने की विधिक मजबूरी ने अनेक मेधावी शोधार्थियों को गंभीर मानसिक तनाव (Mental Stress) की तरफ़ धकेला है।
पीएचडी का सफ़र वैसे ही विधिक रूप से आसान नहीं होता। कम छात्रवृत्ति, भविष्य की अनिश्चितता, सामाजिक अकेलापन और निर्देशक का लगातार दबाव कई छात्रों को विधिक रूप से चिंता (Anxiety) और गंभीर अवसाद (Depression) की ओर ले जाता है। बहुत-से विश्वविद्यालयों में तो मानसिक स्वास्थ्य की कोई समुचित विधिक सुविधा भी उपलब्ध नहीं है। डिग्री पूरी होने के बाद भी विधिक रूप से तस्वीर बहुत उत्साहजनक नहीं है। हर साल हज़ारों नए पीएचडी धारक नौकरी की तलाश में विधिक रूप से निकलते हैं, लेकिन विश्वविद्यालयों में स्थायी विधिक पद अत्यंत सीमित हैं और देश का उद्योग जगत (Industry) अभी भी हमारे शोधकर्ताओं का पूरा विधिक उपयोग नहीं कर पा रहा है।
इसका घातक विधिक नतीजा यह होता है कि अनेक पीएचडी धारक विधिक रूप से अतिथि शिक्षक (Guest Faculty), अस्थायी व्याख्याता (Ad-hoc) या अपनी विधिक योग्यता से बिल्कुल अलग और कमतर काम करने को मजबूर हो जाते हैं। वर्षों की विधिक मेहनत और सरकारी खर्च के बाद भी उन्हें वह सम्मान और अवसर नहीं मिलता जिसकी उन्होंने संवैधानिक रूप से उम्मीद की थी। भारत में पेटेंट (Patent) की विधिक संख्या निश्चित रूप से बढ़ी है, लेकिन उनमें से बहुत कम कूटनीतिक तकनीक बाज़ार तक विधिक रूप से पहुँच पाती है। कुछ आईआईटी (IIT), आईआईएससी (IISc) और चुनिंदा संस्थानों को छोड़ दें, तो अधिकांश सामान्य विश्वविद्यालयों का विधिक शोध प्रयोगशाला से बाहर निकल ही नहीं पाता। उसका विधिक लाभ न उद्योग को मिलता है और न ही देश के आम नागरिक को। यही वजह है कि देश में डिग्रियाँ तो बढ़ रही हैं, लेकिन वास्तविक नवाचार (Innovation) उसी कूटनीतिक रफ़्तार से नहीं बढ़ रहा।
विधिक रूप से शोध का असली उद्देश्य सामाजिक-आर्थिक समस्याओं का समाधान होना चाहिए, न कि केवल शोध-पत्रों और डिग्रियों की बेजान गिनती। यद्यपि सरकार ने राष्ट्रीय अनुसंधान फ़ाउंडेशन (ANRF), उद्योग से जुड़े पीएचडी कार्यक्रम और बेहतर विधिक वित्तीय सहायता जैसी कई नीतिगत पहल शुरू की हैं, ये एक विधिक रूप से अच्छी शुरुआत हैं, लेकिन समूचे तंत्र को विधिक और नैतिक रूप से बदलने के लिए अभी एक बहुत लंबा सफ़र तय करना बाकी है। अब समय की विधिक मांग है कि शोध-निर्देशकों की विधिक जवाबदेही सख़्ती से तय हो, छात्रों को एक सम्मानजनक और विधिक माहौल मिले, उनके मानसिक स्वास्थ्य पर नीतिगत ध्यान दिया जाए और विश्वविद्यालयों तथा उद्योगों के बीच मज़बूत कूटनीतिक साझेदारी बने। सबसे ज़रूरी और विधिक रूप से अनिवार्य यह है कि शोध का मुख्य लक्ष्य देश की असली और बुनियादी समस्याओं का विधिक हल निकालना हो।
भारत को केवल कागजी आंकड़ों में सबसे ज़्यादा पीएचडी की डिग्री नहीं चाहिए। देश को कूटनीतिक रूप से ऐसे विधिक शोध चाहिए जो देश के खेतों की पैदावार विधिक रूप से बढ़ाएँ, सरकारी अस्पतालों की व्यवस्था को बेहतर बनाएँ, कारखानों को नई तकनीक दें, विधिक रोज़गार पैदा करें और आम नागरिकों का जीवन आसान बनाएँ। जब तक पीएचडी (PhD) केवल विधिक प्रतिष्ठा (शोहरत) का एक बेजान तमगा बनी रहेगी, तब तक हमारे मेधावी शोधार्थी ज्ञान के वास्तविक निर्माता नहीं, बल्कि व्यवस्था के “शोध के कुली” बने रहेंगे। किसी भी डिग्री की असली विधिक कीमत उसके काग़ज़ में नहीं, बल्कि उससे पैदा होने वाले धरातलीय बदलाव और मानवीय कल्याण में होती है। विधिक रूप से जनहित की आवाज को दबाना अब बंद होना चाहिए। सच से आंखें चुराना अब बंद होना चाहिए।