नव-उदारवादी व्याख्या : अदालत ने मज़दूरों के अधिकारों को नकारा : एन. उमेश (अनुवाद : संजय पराते)

खबर शेयर कीजिए

आर्टिकल डेस्क, 🌐 tajnews.in | शनिवार, 5 सितंबर 2026, 09:15:00 AM IST

Taj News Logo
Taj News
Article Desk

नव-उदारवादी व्याख्या : अदालत ने मज़दूरों के अधिकारों को नकारा

(आलेख : एन. उमेश | अनुवाद : संजय पराते)

प्रमुख अंश (Highlights):

  • 1978 की ऐतिहासिक नजीर से दूरी: सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ द्वारा 5:4 के बहुमत से दिया गया फैसला; औद्योगिक संबंध संहिता (आईआर कोड) को जस्टिस वी.आर. कृष्णा अय्यर के त्रि-स्तरीय परीक्षण के बंधन से किया गया मुक्त।
  • मजदूरों की कानूनी सुरक्षा पर आघात: ‘उद्योग’ की संकीर्ण परिभाषा और अपवादों के विस्तार से धर्मार्थ ट्रस्टों, सरकारी विभागों और समाज कल्याण संस्थाओं में कार्यरत लाखों कामगार मनमानी छंटनी व निष्कासन से सुरक्षा के अधिकार से वंचित।
  • जस्टिस बी.वी. नागरत्ना की सशक्त असहमति: निजीकरण और नव-उदारवादी दौर में मजदूरों को त्रि-स्तरीय परीक्षण जैसी मजबूत सुरक्षा की अपरिहार्यता रेखांकित, बहुमत के फैसले को कामगारों के अधिकारों में ऐतिहासिक कटौती करार दिया।
  • पूंजी और श्रम के संतुलन का संघर्ष: 90% उद्योगों को बिना पूर्व अनुमति छंटनी और तालाबंदी की छूट मिलने के बीच केवल संगठित मजदूर संघर्ष द्वारा ही नव-उदारवादी नीतियों को पीछे धकेलने का आह्वान।
Sanjay Parate

मूल आलेख : एन. उमेश | अनुवाद : संजय पराते

एन. उमेश (ट्रेड यूनियन नेता) | संजय पराते (उपाध्यक्ष, छत्तीसगढ़ किसान सभा | संपर्क: 94242-31650)
श्रम कानूनों, औद्योगिक विवाद अधिनियम, न्यायपालिका की नव-उदारवादी व्याख्याओं और मजदूर अधिकारों पर गंभीर व तथ्यपरक स्तंभकार।

बैंगलोर वॉटर सप्लाई एंड सीवेज बोर्ड (बीडब्ल्यूएसएसबी) में काम करने वाले ए. राजप्पा और अन्य कर्मचारियों पर 1972 में अनुशासन से जुड़े मामले में जुर्माना लगाया गया था। औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (आईडी एक्ट) की धारा 33(सी)(2) के तहत, कर्मचारी को नियोक्ता द्वारा मनमाने ढंग से जुर्माना लगाने और कटौती करने के खिलाफ न्याय पाने का अधिकार मिला हुआ था। इसलिए, उनके द्वारा उठाए गए विवाद में श्रम न्यायालय ने बीडब्ल्यूएसएसबी को एक ‘उद्योग’ माना और बीडब्ल्यूएसएसबी की इस दलील को खारिज कर दिया कि वह औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत ‘कर्मचारी’ नहीं है, क्योंकि यह पानी उपलब्ध कराने की सेवा गतिविधि में शामिल है, न कि किसी औद्योगिक गतिविधि में। हाई कोर्ट ने श्रम न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा और अपील के बाद सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की पीठ ने 5:2 के बहुमत से 1978 में एक मिसाल कायम की, जिसे इसके लेखक जस्टिस वी.आर. कृष्णा अय्यर के फैसले के तौर पर जाना जाता है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले में बीडब्ल्यूएसएसबी को एक उद्योग माना गया और किसी गतिविधि को ‘उद्योग’ तय करने के लिए तीन-स्तरीय जांच का सिद्धांत निरूपित किया गया और यह तय करने के लिए कि कौन सी संप्रभु गतिविधियां ऐसी हैं, जिन्हें उद्योग नहीं माना जा सकता, ‘प्रमुख प्रकृति परीक्षण’ का सिद्धांत निरूपित किया गया।

1980 के दशक में, उत्तर प्रदेश सरकार के सामाजिक वानिकी विभाग में काम करने वाले एक दिहाड़ी मज़दूर, जय वीर सिंह को नौकरी से निकाल दिया गया था। इसके खिलाफ़ उसने श्रम न्यायालय में अपील किया और तर्क दिया कि उसे नौकरी से निकालना औद्यौगिक विवाद अधिनियम की धारा 25(एफ) के तहत छंटनी के नियमों का उल्लंघन था। उत्तरप्रदेश सरकार का तर्क था कि पर्यावरण संरक्षण के लिए सामाजिक वानिकी का काम एक ‘संप्रभु गतिविधि है, न कि कोई औद्योगिक गतिविधि। श्रम न्यायालय ने इसे औद्योगिक गतिविधि माना और हाई कोर्ट ने भी इस फ़ैसले को सही ठहराया। इसके बाद, उत्तरप्रदेश सरकार की अपील पर सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की पीठ ने 1978 के बीडब्ल्यूएसएसबी मामले की नज़ीर को 2005 में एक बड़ी बेंच के पास भेज दिया। सात सदस्यों वाली पीठ गठित की गई, जिसने इस मामले को 2017 में नौ सदस्यों वाली पीठ के पास भेज दिया, और इस तरह मौजूदा नौ जजों की संवैधानिक पीठ का गठन हुआ। पीठ ने 16 फरवरी 2026 को चार मुद्दे तय किए, ताकि 1978 के फ़ैसले के कानूनन सही-गलत स्थिति, औद्योगिक संबंध संहिता (आईआर कोड) पर इसके लागू होने, और सामाजिक गतिविधियों व संप्रभु गतिविधियों पर इसके असर की जांच की जा सके।

बोझ और बंधन से मुक्ति

सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने 20 अगस्त 2026 को 5:4 के बहुमत से एक फैसला दिया है कि औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 और उससे पहले औद्योगिक विवाद (संशोधन) अधिनियम, 1982 में दी गई ‘उद्योग’ की परिभाषा पर, 1978 में सात जजों की संवैधानिक पीठ द्वारा तय की गई ‘उद्योग’ की परिभाषा का बोझ या बंधन नहीं डाला जा सकता।

औद्योगिक संबंध संहिता के तहत उद्योग को अलग रखना

बहुमत के फैसले ने भी उद्योग की परिभाषा को अलग-थलग कर दिया है — यह परिभाषा न सिर्फ़ औद्योगिक संबंध संहिता (आईआर कोड) में है, बल्कि औद्योगिक विवाद (संशोधन) अधिनियम, 1982 में भी थी (हालांकि, जिसे कभी लागू नहीं किया गया और जो औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के साथ 16 फरवरी 2026 को रद्द हो गया है)। इस फैसले ने कई तरह के कामों में लगे कर्मचारियों को उन अधिकारों से वंचित कर दिया है, जो उन्हें मनमाने ढंग से नौकरी से निकालने, छंटनी, काम से अस्थायी रूप से हटाने और नियोक्ताओं की अन्य कार्रवाईयों के खिलाफ़ कानूनी सुरक्षा देते थे। साथ ही, यह भी तय किया गया है कि 1978 की पुरानी नजीर सिर्फ़ अभी चल रहे विवादों पर लागू होगी, न कि औद्योगिक संबंध संहिता के तहत भविष्य में होने वाले विवादों पर।

त्रि-स्तरीय जांच

1978 के फैसले में यह तय करने के लिए त्रि-स्तरीय परीक्षण निर्धारित किए गए कि कोई भी संस्थान औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 2 (जे) के तहत एक उद्योग है या नहीं। त्रि-स्तरीय परीक्षण के अनुसार, पहला : यदि कोई संस्थान एक प्रणालीगत गतिविधि करता है, दूसरा : संगठित नियोक्ता और कर्मचारी संबंध मौजूद है, और तीसरा : भले ही यह लाभ के उद्देश्य से नहीं है, लेकिन अगर मानवीय जरूरतों या इच्छाओं को पूरा करने के लिए वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन और वितरण करता है, तो इसे एक उद्योग के रूप में माना जाना चाहिए। इसलिए रक्षा, कानून और व्यवस्था, विधि, न्यायपालिका जैसी संप्रभु गतिविधियों को छोड़कर बाकी सभी चीजें उद्योग के दायरे और परिभाषा में आती हैं। इस नजीर के द्वारा उद्योग की परिभाषा के तहत कई गतिविधियों के व्यापक कवरेज की अनुमति दी गई, जिसमें कानून के सुरक्षात्मक आवरण के साथ श्रमिकों को न्याय पाने का अधिकार दिया गया।

प्रमुख प्रकृति परीक्षण

व्याख्या के दौरान, यह तय करने के लिए कि संप्रभु गतिविधि किसे कहा जाएगा, ‘प्रमुख प्रकृति परीक्षण’ निर्धारित किया गया। जब संप्रभु गतिविधि को करने वाले विभागों में कई तरह की गतिविधियाँ शामिल हों, तो यह नियम बनाया गया कि यदि ऐसी इकाईयाँ हैं, जो ऐसी गतिविधियाँ करती हैं, जिन्हें मुख्य रूप से अलग किया जा सकता है, तो वे ‘उद्योग’ के दायरे में आती हैं, क्योंकि उस गतिविधि की प्रमुख प्रकृति संप्रभु गतिविधि नहीं होती है।

कामगारों के अधिकार तय करने वाले परीक्षण

त्रि-स्तरीय जांच और प्रमुख प्रकृति परीक्षण ने उद्योग के दायरे और कवरेज को परिभाषित किया। साथ ही, औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत अधिकारों और सुरक्षा का लाभ उन मजदूरों तक भी पहुँचाया, जो धर्मार्थ ट्रस्ट, धार्मिक और परोपकारी संस्थाओं, सरकारी विभागों, रक्षा अनुसंधान और विकास संस्थानों, घरेलू सेवाओं आदि में काम करते हैं।

औद्योगिक संबंध संहिता ने मजदूरों के अधिकार छिने

औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 की धारा 2(पी) के अनुसार, ‘कोई भी संस्थान जहाँ व्यवस्थित गतिविधि होती है, नियोक्ता और कर्मचारी के बीच संगठित संबंध होता है, और मानवीय ज़रूरतों या इच्छाओं को पूरा करने के लिए सामान और सेवाओं का उत्पादन और वितरण किया जाता है’, उसे ‘उद्योग’ माना जाएगा। ऐसे में सवाल उठता है कि इसमें क्या समस्या है, क्योंकि यह 1978 के फैसले के अनुरूप है। लेकिन समस्या इसके ‘प्रोविज़ो’ (शर्त) के साथ है, जो कुछ गतिविधियों को इससे बाहर रखता है : जैसे कि पूरी तरह या मुख्य रूप से धर्मार्थ, सामाजिक या परोपकारी सेवा में लगे संस्थानों की गतिविधियाँ ; सरकार की संप्रभु गतिविधियों, जैसे रक्षा अनुसंधान, परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष आदि से जुड़ी गतिविधियाँ ; घरेलू सेवाएँ ; और केंद्र सरकार द्वारा बाहर रखी गई कोई अन्य गतिविधि। यह परिभाषा सरकार को ऐसी अतिरिक्त गतिविधियों को भी अधिसूचित करने का अधिकार देती है, जिन्हें औद्योगिक संबंध संहिता के तहत ‘उद्योग’ की परिभाषा में शामिल नहीं किया जाएगा। इसने मजदूरों के अधिकारों को कम करने के लिए इन अपवादों (बाहर रखी गई गतिविधियों) का दायरा और बढ़ा दिया है।

उद्योगों को अलग करने के लिए कानूनी कोशिशें

बीडब्ल्यूएसएसबी फ़ैसले में 1978 में तय किए गए नियम के असर से उद्योगों को बचाने के लिए 1979 में एक कानूनी कोशिश की गई थी। मोरारजी देसाई सरकार में तत्कालीन श्रम मंत्री रवींद्र वर्मा ने विवादित औद्योगिक संबंध विधेयक पेश किया था, लेकिन संयुक्त ट्रेड यूनियन आंदोलन के कारण इसे वापस लेना पड़ा।

1982 में श्रीमती इंदिरा गांधी की सरकार ने औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 में एक संशोधन किया। इस संशोधन में, जहाँ परिभाषा में तीन घटक शामिल किए गए थे, वहीं सरकार को यह अधिकार भी दिया गया कि वह संलग्न अनुसूची के तहत कुछ खास तरह की गतिविधियों को ‘उद्योग’ के दायरे से बाहर करके उन उद्योगों को औद्योगिक विवाद अधिनियम के दायरे से हटा सकती है। इस तरह, लाखों कर्मचारियों को उद्योग की परिभाषा के दायरे से बाहर कर दिया गया। 1988 में ‘अल्तमेश रेन बनाम भारत संघ’ मामले में, सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि चूँकि उद्योग की परिभाषा से बाहर किए गए लोगों की सेवा से जुड़े विवादों को सुलझाने के लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं थी, इसलिए संशोधित परिभाषा को लागू नहीं किया गया।

मोदी सरकार ने उद्योगों के लिए नए उदारवादी ढांचे के हिसाब से औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 बनाया, इसे 21 नवंबर 2025 से लागू किया और 8 मई 2026 से इसे परिचालित कर दिया। इसने औद्योगिक संबंध (संशोधन) संहिता 2026 के ज़रिए 16 फरवरी 2026 से औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 और औद्योगिक विवाद (संशोधन) अधिनियम 1982 को भी रद्द कर दिया। लेकिन जब तक 1978 के पुराने फ़ैसले को बदला नहीं जाता, तब तक औद्योगिक संबंध संहिता के तहत किसी भी उद्योग की आगे की व्याख्या उसी के आधार पर की जानी थी। इसलिए न्यायाधीशों ने बहुमत से यह तय किया कि भविष्य के किसी भी विवाद की नए सिरे से व्याख्या की जाएगी, जिससे उद्योग की नव-उदारवादी व्याख्या का और इससे मजदूरों के अधिकारों पर हमला करने का रास्ता साफ हो गया है।

छूट का दायरा और बढ़ाना

औद्योगिक संबंध संहिता ने 90 प्रतिशत उद्योगों को सरकार की पूर्व अनुमति के बिना कर्मचारियों की छंटनी करने, उन्हें हटाने और अपने उद्योग बंद करने का अधिकार दे दिया है। इसके साथ ही, उन्हें विधिक प्रमाणीकरण के बिना स्वयं-प्रमाणित स्थाई आदेश रखने की भी छूट दी गई है। ऐसे में, सुप्रीम कोर्ट का फैसला उन सभी संस्थानों को भी इन अधिकारों और सुविधाओं के दायरे से बाहर रखेगा, जो धर्मार्थ या परोपकारी संस्थाओं द्वारा चलाए जाते हैं, या जो रक्षा अनुसंधान, परमाणु ऊर्जा और सरकार द्वारा संप्रभु गतिविधि के तौर पर अधिसूचित की गई गतिविधियों से जुड़े हैं – चाहे उनमें कर्मचारियों की संख्या 300 से ज़्यादा हो या कम।

असहमतिपूर्ण फ़ैसले पर ध्यान देना ज़रूरी है

यहाँ जस्टिस बी.वी. नागरत्ना के असहमतिपूर्ण फ़ैसले और उसके पीछे दिए गए तर्कों पर ध्यान देना ज़रूरी है। वे तर्क देती हैं कि निजीकरण और उदारीकरण की प्रक्रिया के कारण ही मजदूरों को मज़बूत सुरक्षा की ज़रूरत है, जैसा कि 1978 के पुराने फ़ैसले में त्रि-स्तरीय जांच और प्रमुख प्रकृति परीक्षण के ज़रिए तय किया गया था। इसलिए, वे इस नतीजे पर पहुँचती हैं कि त्रि-स्तरीय जांच सही क़ानून है। इसका असर औद्योगिक संबंध संहिता और औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1982 में ‘उद्योग’ की परिभाषा पर पड़ता है ; सरकारी विभागों या उनके निकायों की सामाजिक कल्याण गतिविधियों और योजनाओं को औद्योगिक गतिविधियाँ माना जाना चाहिए, और ‘प्रमुख प्रकृति परीक्षण’ के आधार पर संप्रभु गतिविधियां भी उद्योग के दायरे में आती हैं।

मज़दूरों के अधिकारों में कटौती

लेकिन न्यायधीशों की बहुमत वाली पीठ ने औद्योगिक संबंध संहिता के तहत उद्योग की परिभाषा को 1978 के उस पुराने फ़ैसले (जिसमें इसे व्यापक दायरे में रखा गया था) से अलग कर दिया है और उसे उस दायरे से बाहर कर दिया है। इस तरह, न्यायधीशों ने मज़दूरों के उन अधिकारों में कटौती की है, जो लंबे समय से चले आ रहे थे। इसके साथ ही, उन्होंने संहिता में दी गई छूट या अपवादों को तय करने के लिए न्यायिक व्याख्याओं के अनिश्चित और मुश्किल दौर का रास्ता भी खोल दिया है।

अगर पूंजी और श्रम के रिश्तों से जुड़ी बुर्जुआ कानूनी व्यवस्था को नए सिरे से परिभाषित नहीं किया जाता, तो फिर उस अधि-संरचना यानी बुर्जुआ-ज़मींदार राज्य की न्यायपालिका से और क्या उम्मीद की जा सकती है? यह राज्य पूंजीवादी व्यवस्था से जुड़े संकट से उबरने की बेताबी में अब एक नव-उदारवादी राज्य में बदलता जा रहा है। जैसा कि कार्ल मार्क्स ने कहा था, ‘पूंजीवाद के तहत श्रम कानून कभी भी तटस्थ नहीं होते’। सिर्फ़ मज़दूर वर्ग का संघर्ष ही राज्य को पूंजी और श्रम के बीच संतुलन बनाने के लिए मजबूर करता है। आइए, इसके लिए मज़दूर वर्ग का एक मज़बूत और एकजुट संघर्ष खड़ा करें।

#LabourLawReform2026 #SupremeCourtVerdictLabour #BWSSBCase1978 #JusticeVRKrishnaIyer #IndustrialRelationsCode #JusticeBVNagarathnaDissent #WorkerRightsIndia #SovereignFunctionsVsIndustry #NeoliberalJudiciary #TajNewsOpinion #AgraNews #TajNewsViral #मजदूर_अधिकार #श्रम_कानून_फैसला #एन_उमेश_आलेख #संजय_पराते_अनुवाद

यह भी पढ़ें

Thakur Pawan Singh

Thakur Pawan Singh

Pradhan Sampadak, Taj News

खबर शेयर कीजिए

Leave a Comment