संपादकीय डेस्क, tajnews.in | मंगलवार, 15 सितंबर 2026, 11:51:48 PM IST

संपादक की कलम
एक को दिनों में जमानत, दूसरा छह साल से जेल—क्या न्याय सबके लिए बराबर है?
(संपादकीय)
प्रमुख अंश (Highlights):
- जमानत की गति पर सवाल: स्वतंत्र भारद्वाज को कुछ ही दिनों में अंतरिम राहत बनाम उमर खालिद के छह साल पूरे होने के बाद भी निर्णायक सुनवाई का अभाव।
- प्रक्रिया और व्यक्तिगत स्वतंत्रता: यूएपीए जैसे कठोर कानूनों के बीच अनुच्छेद 21 के तहत समयबद्ध विचारण (Speedy Trial) और मानवीय गरिमा की रक्षा की अनिवार्यता।
- दोषसिद्धि से पहले लंबी कैद: बिना ट्रायल पूरे हुए वर्षों तक जेल में रखना न्याय का विकल्प नहीं हो सकता; कानूनी प्रक्रिया खुद सजा में नहीं बदलनी चाहिए।
- व्यवस्था की निष्पक्षता की कसौटी: न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि राजनीतिक प्रभाव, विचारधारा और सामाजिक हैसियत से परे समान रूप से दिखना भी चाहिए।

Thakur Pawan Singh
भारत की न्याय व्यवस्था का सबसे बड़ा सिद्धांत यही है कि कानून की नजर में हर व्यक्ति बराबर है। लेकिन जब दो अलग-अलग मामलों की तस्वीरें हमारे सामने आती हैं तो मन में एक असहज सवाल जरूर उठता है—क्या न्याय पाने की गति भी सबके लिए बराबर है?
एक तरफ दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने कथित मारपीट के मामले में गिरफ्तार स्वतंत्र भारद्वाज को तीन सप्ताह की अंतरिम जमानत दे दी। दूसरी तरफ उमर खालिद 13 सितंबर 2020 को गिरफ्तारी के छह वर्ष पूरे कर चुके हैं और 2020 के दिल्ली दंगों से जुड़े कथित बड़ी साजिश के मामले में अब तक उनका मुकदमा उस निर्णायक चरण तक नहीं पहुंचा है जहां आरोपों की अदालत में पूरी तरह सुनवाई हो सके।
एक मामला कुछ दिनों में जमानत तक पहुंच जाता है और दूसरा छह साल की कैद के बाद भी मुकदमे की प्रतीक्षा करता रहता है।
यहीं से सवाल उठता है—हमारी न्याय व्यवस्था में जमानत और मुकदमे की गति का पैमाना क्या है?
आरोप कितना गंभीर है, यह महत्वपूर्ण है—लेकिन प्रक्रिया उससे भी महत्वपूर्ण है
स्वतंत्र भारद्वाज के मामले में घटना से संबंधित वीडियो और उनके अपने सार्वजनिक बयानों ने मामले को व्यापक चर्चा में ला दिया था। पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया और अदालत ने हिरासत के बाद तीन सप्ताह की अंतरिम जमानत दे दी।
यह अदालत का अधिकार है और जमानत का फैसला न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा है। किसी आरोपी को जमानत मिलना उसे निर्दोष घोषित करना नहीं होता।
लेकिन यही सिद्धांत उमर खालिद पर भी लागू होना चाहिए।
उन पर 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों की कथित बड़ी साजिश में शामिल होने के गंभीर आरोप हैं। सरकार और जांच एजेंसियों का पक्ष अपनी जगह है और खालिद इन आरोपों से इनकार करते रहे हैं। आरोप कितने गंभीर हैं, इसका फैसला अदालत को करना है।
लेकिन अदालत का फैसला आने से पहले किसी आरोपी को अनिश्चितकाल तक जेल में रखना क्या न्याय का विकल्प हो सकता है?
यही मूल प्रश्न है।
छह साल कोई छोटा समय नहीं
13 सितंबर 2020 को गिरफ्तार किए गए उमर खालिद छह साल से न्यायिक हिरासत में हैं। इस दौरान उनकी जमानत याचिकाएं अदालतों में गईं, सुनवाई हुई और उन्हें अंतरिम राहत भी सीमित परिस्थितियों में मिली। लेकिन मुख्य मामले में मुकदमे की प्रक्रिया अभी भी आरोप तय करने और उससे जुड़े चरणों से आगे बढ़ने की प्रतीक्षा में है।
छह वर्ष।
यह केवल कैलेंडर की छह तारीखें नहीं हैं।
यह किसी इंसान के जीवन के छह वर्ष हैं।
इस दौरान उम्र बढ़ती है, परिवार बदलता है, माता-पिता बूढ़े होते हैं, रिश्ते बदलते हैं और जीवन के वे वर्ष वापस नहीं आते जिन्हें जेल की दीवारों के भीतर बिताया गया।
अगर अंततः अदालत किसी व्यक्ति को दोषी ठहराती है तो कानून के अनुसार सजा होनी चाहिए। लेकिन अगर वह व्यक्ति निर्दोष साबित होता है तो उसके जीवन के उन छह वर्षों की भरपाई कौन करेगा?
यही कारण है कि speedy trial केवल कानूनी शब्द नहीं, बल्कि नागरिक स्वतंत्रता का मूल प्रश्न है।
जमानत क्या प्रभावशाली लोगों का विशेषाधिकार बन रही है?
यह सवाल भी पूछा जाना चाहिए—हालांकि इसका उत्तर केवल दो मामलों की तुलना से नहीं निकाला जा सकता।
किसी को जल्दी जमानत मिल जाना अपने आप में न्याय व्यवस्था की पक्षपातपूर्ण होने का प्रमाण नहीं है। हर मामले में आरोप, धाराएं, साक्ष्य, हिरासत की आवश्यकता, जांच की स्थिति और कानून अलग हो सकते हैं।
लेकिन जब समाज को बार-बार ऐसी तस्वीरें दिखाई देती हैं जिसमें कुछ आरोपी थोड़े समय में जेल से बाहर आ जाते हैं और कुछ लोग वर्षों तक मुकदमे की प्रतीक्षा में जेल में रहते हैं, तो न्याय व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
न्याय केवल होना नहीं चाहिए, न्याय होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए।
UAPA और लंबे समय की हिरासत की कठिनाई
उमर खालिद का मामला इसलिए और महत्वपूर्ण है क्योंकि उन पर कठोर आतंकवाद-रोधी कानून UAPA के तहत आरोप हैं। ऐसे मामलों में जमानत के कानूनी मानदंड सामान्य आपराधिक मामलों से अलग और अधिक कठोर होते हैं।
यही सरकार और अभियोजन पक्ष का तर्क भी है कि गंभीर आरोपों और उपलब्ध सामग्री को देखते हुए अदालत को सावधानी बरतनी पड़ती है।
यह तर्क अपनी जगह उचित हो सकता है।
लेकिन दूसरी तरफ संविधान का अनुच्छेद 21 भी है, जो जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है। न्यायपालिका स्वयं कई मामलों में यह कह चुकी है कि मुकदमे में असाधारण देरी और लंबे समय तक चलने वाली हिरासत संवैधानिक चिंता पैदा कर सकती है।
तो फिर सवाल यही है—
कठोर कानून का उद्देश्य न्याय में तेजी रोकना नहीं हो सकता।
अगर किसी व्यक्ति के खिलाफ इतना गंभीर मामला है कि उसे छह वर्ष तक जेल में रखना जरूरी समझा जा रहा है, तो फिर मुकदमा भी उसी गंभीरता और तेजी से क्यों नहीं चलना चाहिए?
आरोपी को दोषी मान लेना सबसे बड़ी भूल होगी
यह बात दोनों दिशाओं में लागू होती है।
स्वतंत्र भारद्वाज को जमानत मिली है तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह आरोपों से मुक्त हो गए।
उमर खालिद छह साल से जेल में हैं तो इसका अर्थ यह भी नहीं कि वह दोषी साबित हो चुके हैं।
आरोप और दोषसिद्धि के बीच अदालत की पूरी प्रक्रिया होती है।
यही सभ्य लोकतांत्रिक व्यवस्था और भीड़ की अदालत में अंतर है।
हम किसी आरोपी को पसंद करते हों या नापसंद, उसकी विचारधारा हमारी पसंद की हो या न हो, उसके राजनीतिक विचार हमसे मिलते हों या बिल्कुल अलग हों—न्याय का पैमाना नहीं बदलना चाहिए।
अगर कानून किसी विरोधी विचार वाले व्यक्ति के साथ अलग व्यवहार करने लगे तो कल वही व्यवस्था हमारे अपने पक्ष के व्यक्ति के खिलाफ भी इस्तेमाल हो सकती है।
सवाल किसी व्यक्ति का नहीं, व्यवस्था का है
इस संपादकीय का उद्देश्य स्वतंत्र भारद्वाज को दोषी ठहराना या उमर खालिद को निर्दोष घोषित करना नहीं है।
दोनों मामलों में अंतिम फैसला अदालत को करना है।
सवाल उससे बड़ा है।
क्या भारत की न्याय व्यवस्था ऐसी हो सकती है जिसमें किसी व्यक्ति के मामले की जांच और सुनवाई समयबद्ध तरीके से हो?
क्या गंभीर आरोपों वाले मामलों में भी अदालतें यह सुनिश्चित कर सकती हैं कि मुकदमा वर्षों तक लंबित न रहे?
क्या जांच एजेंसियां आरोपों को साबित करने के लिए जरूरी साक्ष्य अदालत के सामने समय पर प्रस्तुत कर सकती हैं?
और सबसे महत्वपूर्ण—
क्या जमानत का अधिकार व्यक्ति की पहचान, राजनीतिक प्रभाव, विचारधारा या सामाजिक हैसियत से स्वतंत्र होकर समान रूप से लागू हो सकता है?
इन सवालों से बचना न्याय व्यवस्था में जनता के विश्वास को मजबूत नहीं करेगा।
न्याय में देरी, अपने आप में एक सजा है
किसी व्यक्ति को छह वर्ष तक जेल में रखना और फिर कहना कि मुकदमा अभी शुरू होना बाकी है—यह स्थिति किसी भी लोकतंत्र के लिए सहज नहीं हो सकती।
दूसरी तरफ किसी आरोपी को कुछ दिनों के भीतर अंतरिम राहत मिलना भी अपने आप में गलत नहीं है। अदालत ने यदि कानून के अनुसार उचित समझा है तो उसे उस अधिकार का इस्तेमाल करना ही चाहिए।
समस्या तब पैदा होती है जब समाज को यह महसूस होने लगे कि किसी के लिए कानून की गति तेज है और किसी दूसरे के लिए वही कानून बेहद धीमा।
न्याय की विश्वसनीयता केवल फैसले से नहीं बनती।
वह इस बात से बनती है कि आरोपी को समय पर सुनवाई मिले, अभियोजन को अपना पक्ष रखने का अवसर मिले, पीड़ित को न्याय मिले और अंततः दोषी को सजा तथा निर्दोष को सम्मानपूर्वक मुक्ति मिले।
अंत में
स्वतंत्र भारद्वाज को मिली तीन सप्ताह की अंतरिम जमानत अदालत का फैसला है। उसका सम्मान होना चाहिए।
उमर खालिद के छह वर्ष की हिरासत का प्रश्न भी अदालतों के सामने है। उस पर भी न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान होना चाहिए।
लेकिन एक लोकतंत्र में नागरिक यह सवाल पूछने का अधिकार जरूर रखता है—
एक आरोपी को दिनों में अंतरिम जमानत मिल सकती है तो दूसरे आरोपी को छह वर्ष में मुकदमे की निर्णायक सुनवाई क्यों नहीं मिल सकती?
क्या गंभीर आरोपों का अर्थ यह है कि मुकदमा जितना लंबा चले, हिरासत भी उतनी ही लंबी होती जाए?
या फिर हमारी न्याय व्यवस्था को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जेल मुकदमे का विकल्प न बने और मुकदमा जेल से पहले न्याय तक पहुंचे?
किसी अपराधी को बचाना न्याय नहीं है।
लेकिन किसी आरोपी को बिना दोषसिद्धि के वर्षों तक जेल में रखना भी न्याय की अंतिम मंजिल नहीं हो सकती।
कानून की ताकत इस बात में नहीं कि वह किसी को लंबे समय तक जेल में रख सकता है।
कानून की असली ताकत इस बात में है कि वह समय पर यह तय कर सके कि दोषी कौन है और निर्दोष कौन।
यही भारत के संविधान की आत्मा है।
और यही हमारी न्याय व्यवस्था की सबसे बड़ी परीक्षा भी।
ठाकुर पवन सिंह
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