2022 की जीती 111 सीटों को छोड़ने को तैयार नहीं अखिलेश यादव, मौजूदा विधायकों पर फिर दांव; कांग्रेस मांग रही 105 से 115 सीटें, रायबरेली-अमेठी पर भी फंसा पेंच
लखनऊ डेस्क, 🌐 tajnews.in | मंगलवार, 15 सितंबर 2026, 11:46:15 AM IST

यूपी चुनाव 2027: सपा-कांग्रेस में सीट शेयरिंग पर पेच, 111 सीटों पर सपा का दावा; कांग्रेस चाहती है बड़ी हिस्सेदारी
tajnews.in | लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन को लेकर सहमति बनाए रखने की कोशिश जारी है, लेकिन सीटों के बंटवारे का फार्मूला दोनों दलों के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। सपा अपनी संगठनात्मक ताकत और 2022 में जीती विधानसभा सीटों को आधार बनाकर हिस्सेदारी चाहती है, जबकि कांग्रेस 2024 के लोकसभा चुनाव में गठबंधन के प्रदर्शन को आधार बनाकर ज्यादा सीटों की मांग कर रही है। दोनों दलों के बीच मामला केवल सीटों की संख्या तक सीमित नहीं है। असली पेच यह है कि कौन सी सीट किस पार्टी के हिस्से में जाएगी और वहां किस उम्मीदवार को उतारा जाएगा। यही वजह है कि बातचीत के बावजूद अभी अंतिम सीट शेयरिंग फार्मूला सामने नहीं आया है।
111 जीती हुई सीटों पर सपा का दावा
रिपोर्ट के अनुसार, सपा 2022 में जीती हुई 111 विधानसभा सीटों पर खुद चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है। पार्टी के अधिकांश मौजूदा विधायकों को दोबारा चुनाव मैदान में उतारने की दिशा में भी संकेत दिए जाने की बात सामने आई है। सपा का तर्क है कि जिन सीटों पर उसके विधायक पहले से मजबूत स्थिति में हैं, वहां सीट छोड़ने का जोखिम नहीं लिया जाना चाहिए। पार्टी इन सीटों पर अपने संगठन, मौजूदा विधायक और स्थानीय सामाजिक समीकरण को महत्वपूर्ण मान रही है। दूसरी ओर, भाजपा के कब्जे वाली सीटों में से बड़ी संख्या कांग्रेस के हिस्से में दिए जाने की संभावित रणनीति पर भी चर्चा है। हालांकि यह अभी अंतिम समझौता नहीं है।
कांग्रेस की ज्यादा सीटों की मांग
कांग्रेस इस बार उत्तर प्रदेश में छोटे सहयोगी की भूमिका से आगे बढ़कर अधिक प्रभावी हिस्सेदारी चाहती है। पार्टी की ओर से समानता और सम्मान के आधार पर सीट बंटवारे की बात पहले भी कही जाती रही है। हाल की रिपोर्टों में कांग्रेस की ओर से 105 से 115 सीटों तक की मांग और सपा की ओर से करीब 86 सीटों के प्रस्ताव की चर्चा है। इससे साफ है कि दोनों दलों के बीच सीटों की संख्या को लेकर अभी काफी अंतर है। वहीं, मूल रिपोर्ट में कांग्रेस के लिए 75 से 80 सीटों तक की संभावित हिस्सेदारी का भी उल्लेख किया गया है। इसलिए अंतिम फार्मूला तय होने तक अलग-अलग प्रस्तावों को लेकर राजनीतिक अटकलें जारी रह सकती हैं।
रायबरेली और अमेठी भी अहम
सीटों की संख्या के अलावा रायबरेली और अमेठी की विधानसभा सीटें भी सपा-कांग्रेस बातचीत का महत्वपूर्ण मुद्दा बनी हुई हैं। कांग्रेस इन क्षेत्रों को अपने पारंपरिक राजनीतिक प्रभाव और 2024 के लोकसभा चुनाव के प्रदर्शन के आधार पर महत्वपूर्ण मानती है। वहीं सपा भी इन सीटों पर अपने संगठन और स्थानीय राजनीतिक समीकरण को ध्यान में रखकर फैसला करना चाहती है। ऐसे में इन दोनों लोकसभा क्षेत्रों की विधानसभा सीटों पर सहमति बनाना सीट शेयरिंग की बातचीत में अहम साबित हो सकता है।
2024 का फार्मूला 2027 में कितना काम करेगा?
सपा और कांग्रेस ने 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में भाजपा के खिलाफ मिलकर चुनाव लड़ा था। गठबंधन के प्रदर्शन ने दोनों दलों के बीच राजनीतिक सहयोग को आगे बढ़ाने की जमीन तैयार की। लेकिन विधानसभा चुनाव का गणित लोकसभा से अलग होता है। 403 विधानसभा क्षेत्रों में स्थानीय उम्मीदवार, जातीय समीकरण, बूथ संगठन और क्षेत्रीय मुद्दों की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। यही कारण है कि दोनों पार्टियों के लिए केवल लोकसभा चुनाव के आंकड़े पर्याप्त नहीं होंगे। सीटों का फैसला करते समय विधानसभा क्षेत्रवार राजनीतिक स्थिति और जीत की संभावना भी महत्वपूर्ण होगी।
सपा के सामने PDA समीकरण बचाने की चुनौती
अखिलेश यादव की राजनीति में PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण महत्वपूर्ण रहा है। 2024 के लोकसभा चुनाव में इस सामाजिक गठजोड़ ने सपा को लाभ पहुंचाया। अब 2027 के विधानसभा चुनाव में सपा के सामने इस समीकरण को बूथ और विधानसभा स्तर तक मजबूत बनाए रखने की चुनौती है। पार्टी को स्थानीय स्तर पर सामाजिक संतुलन और संगठन दोनों को साधना होगा।
कांग्रेस की नजर नए वोटरों पर
कांग्रेस भी उत्तर प्रदेश में अपनी राजनीतिक जमीन को विस्तार देने की कोशिश कर रही है। पार्टी का ध्यान युवा मतदाताओं और उन सामाजिक वर्गों पर है, जिन्हें वह अपने साथ जोड़कर विधानसभा स्तर पर प्रभाव बढ़ाना चाहती है। कांग्रेस के लिए केवल ज्यादा सीटें हासिल करना ही पर्याप्त नहीं होगा। उसे ऐसी सीटों और उम्मीदवारों का चयन भी करना होगा, जहां उसका संगठन, प्रत्याशी और स्थानीय जनाधार गठबंधन के वोट को प्रभावी ढंग से चुनावी जीत में बदल सके।
भाजपा भी रख रही नजर
सपा-कांग्रेस के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर चल रही बातचीत पर भाजपा की भी नजर रहेगी। विपक्षी गठबंधन में सीटों को लेकर असहमति या स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं की नाराजगी भाजपा के लिए राजनीतिक अवसर पैदा कर सकती है। दूसरी ओर, भाजपा भी 2027 के चुनाव को लेकर संगठन और सरकार के स्तर पर अपनी तैयारियां तेज कर रही है। ऐसे में सपा-कांग्रेस के बीच सीट शेयरिंग का अंतिम फार्मूला चुनावी मुकाबले की दिशा पर असर डाल सकता है।
असली चुनौती सीट नहीं, मजबूत उम्मीदवार
सपा-कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा सवाल केवल यह नहीं होगा कि किस पार्टी को कितनी सीटें मिलती हैं। उससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह होगा कि किस पार्टी को कौन सी सीट मिलती है और वहां उसका उम्मीदवार कितना मजबूत है। कई विधानसभा क्षेत्रों में दोनों दलों का अपना-अपना संगठन और स्थानीय प्रभाव है। ऐसे में सीट छोड़ने पर स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं में असंतोष, बगावत तथा वोट ट्रांसफर की समस्या पैदा हो सकती है। यही कारण है कि सीट शेयरिंग का फैसला केवल आंकड़ों के आधार पर नहीं, बल्कि विधानसभा क्षेत्रवार राजनीतिक ताकत को ध्यान में रखकर करना दोनों दलों के लिए जरूरी होगा।
फिलहाल तस्वीर क्या है?
सपा-कांग्रेस के बीच 2027 में गठबंधन बनाए रखने की कोशिश जारी है।
• रिपोर्ट के अनुसार सपा 111 जीती हुई विधानसभा सीटों पर खुद चुनाव लड़ना चाहती है।
• कांग्रेस की ओर से 105 से 115 सीटों तक की मांग की चर्चा है।
• सपा की ओर से करीब 86 सीटों के प्रस्ताव की भी रिपोर्ट सामने आई है।
• मूल रिपोर्ट में कांग्रेस के लिए 75 से 80 सीटों तक की संभावित हिस्सेदारी का उल्लेख है।
• रायबरेली और अमेठी की विधानसभा सीटें बातचीत का महत्वपूर्ण मुद्दा बनी हुई हैं।
• अंतिम सीट-वितरण और उम्मीदवारों की सूची अभी सामने नहीं आई है।
अब नजर अंतिम फार्मूले पर
उत्तर प्रदेश में 2027 का विधानसभा चुनाव अभी दूर है, लेकिन सपा और कांग्रेस के बीच सीट शेयरिंग की बातचीत ने चुनावी तैयारियों को पहले ही राजनीतिक चर्चा के केंद्र में ला दिया है। सपा अपने मजबूत गढ़ और मौजूदा विधायकों वाली सीटें सुरक्षित रखना चाहती है, जबकि कांग्रेस अधिक सीटों के जरिए प्रदेश में अपनी राजनीतिक मौजूदगी बढ़ाना चाहती है। अब दोनों दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती ऐसा फार्मूला तैयार करने की है, जिससे सीटों का बंटवारा भी हो और कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल तथा वोट ट्रांसफर भी बना रहे। फिलहाल अंतिम फैसला सामने नहीं आया है। आने वाले महीनों में सीटों और उम्मीदवारों को लेकर होने वाली बातचीत ही तय करेगी कि 2027 में सपा-कांग्रेस गठबंधन किस स्वरूप में चुनाव मैदान में उतरता है।
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Thakur Pawan Singh
Chief Editor, Taj News
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