राहुल सांकृत्यायन से कौन डरता है?(आलेख : मालिनी भट्टाचार्य, अंग्रेजी से अनुवाद : संजय पराते)

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Article Desk, 🌐 tajnews.in | Saturday, 1 August, 2026, 11:20:00 PM IST.

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Malini Bhattacharya
मालिनी भट्टाचार्य
मूल आलेख: मालिनी भट्टाचार्य (सुप्रसिद्ध संस्कृतिकर्मी, नाटककार, सेवानिवृत्त प्राध्यापक, महिला आंदोलन की प्रमुख नेत्री एवं पूर्व सांसद) | हिंदी अनुवाद: संजय पराते (उपाध्यक्ष, छत्तीसगढ़ किसान सभा)। यह आलेख महापंडित राहुल सांकृत्यायन के ऐतिहासिक भौतिकवादी योगदान, सामाजिक मुक्ति के दर्शन और राजनीतिक दमन के खिलाफ बौद्धिक प्रतिरोध का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

राहुल सांकृत्यायन से कौन डरता है?

विगत 20 जुलाई की आधी रात को, कुछ ‘अज्ञात बदमाशों’ ने पश्चिम बंगाल के औद्योगिक शहर रानीगंज के एक मुख्य चौराहे पर लगी महापंडित राहुल सांकृत्यायन की आदमकद मूर्ति को अचानक गायब कर दिया। अगली सुबह वहाँ बिखरी हुई ईंटों और टूटे पत्थरों के अलावा कुछ नहीं बचा था। इस असंवैधानिक कृत्य से हैरान स्थानीय निवासियों ने तुरंत पास के पुलिस स्टेशन में इसकी सूचना दी थी, लेकिन तब से आज तक पुलिस एक भी दोषी की पहचान करने में पूरी तरह नाकाम रही है। आप इसे पश्चिम बंगाल में भाजपा की नई सरकार के दौर में कानून-व्यवस्था की प्रशासनिक स्थिति पर एक तीखी टिप्पणी मान सकते हैं कि स्थानीय प्रशासन ने इस संवेदनशील मामले पर कोई ध्यान नहीं दिया; न तो राज्य के मुख्यमंत्री और न ही किसी स्थानीय सांसद/विधायक ने कोई चिंता जताई, इस बर्बर घटना की निंदा की या नुकसान की भरपाई का कोई सरकारी प्रस्ताव दिया। लेकिन भाजपा के कुछ गुंडों ने आकर स्थानीय सीपीआई(एम) कार्यकर्ताओं को गंभीर परिणाम भुगतने की धमकियां जरूर दीं, क्योंकि उन्होंने कई चिंतित नागरिकों के साथ मिलकर ऐतिहासिक मूर्ति की तोड़-फोड़ की निंदा करने के लिए उसी जगह पर एक विरोध सभा का आयोजन किया था।

ऐसा तानाशाही व्यवहार कोई हैरानी की बात नहीं है, क्योंकि राज्य में नई सरकार की शुरुआत ही महात्मा गांधी और लेनिन की ऐतिहासिक मूर्तियों को नुकसान पहुँचाने तथा बंगाल में 1860 के दशक के ‘नील विद्रोह’ से जुड़ी एक महत्वपूर्ण कलाकृति को तोड़ने से हुई थी। भाजपा के सत्ता में आने से कुछ साल पहले भी, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के कार्यकर्ताओं ने तत्कालीन सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस (TMC) के कार्यकर्ताओं के साथ हिंसक झड़प के दौरान, ईश्वरचंद्र विद्यासागर के नाम पर बने कॉलेज के कैंपस में स्थापित उनकी ही प्रतिमा को बेरहमी से तोड़ दिया था। अब जब वे सत्ता में काबिज हैं, तो वे निश्चित रूप से उन सार्वजनिक प्रतीकों को नष्ट करके उन सभी स्थानों पर कब्ज़ा करने की कोशिश करेंगे, जो किसी दूसरी प्रगतिशील विचारधारा या प्रभाव को दर्शाते हैं। अगला कदम होगा, जैसा कि सभी फ़ासीवादी ताकतों के मामले में होता है, इतिहास की इन खाली जगहों को अपनी पसंद के प्रतीकों से भरना, और स्थानीय स्तर पर इतिहास को फिर से मनमाफिक लिखना, ठीक वैसे ही जैसे वे राष्ट्रीय स्तर पर कर रहे हैं। विधिक सच को अब और दबाया नहीं जा सकता।

रानीगंज की मूर्ति का ऐतिहासिक संदर्भ

बहरहाल, रानीगंज क्रॉसिंग पर लगी राहुल सांकृत्यायन की इस मूर्ति का अपना एक खास और समृद्ध इतिहास है। कभी-कभी यह जायज शिकायत की जाती है — और शायद यह शिकायत पूरी तरह सही भी है — कि राहुल सांकृत्यायन जैसे असाधारण विद्वान, शीर्ष बुद्धिजीवी और भारत की आज़ादी की लड़ाई के महान सेनानी को इतिहास के पन्नों में उतनी जगह नहीं मिली, जितनी उन्हें मिलनी चाहिए थी। बहरहाल, 1993 में उनकी जन्मशती के वर्ष के अवसर पर पश्चिम बंगाल में उनके जीवन और ऐतिहासिक कार्यों का स्मरण करने और उनके महान योगदान का सही मूल्यांकन करने के लिए कई भव्य कार्यक्रम आयोजित किए गए थे। कोयला खदानों के क्षेत्र और विशाल औद्योगिक आबादी वाले रानीगंज में, कई मज़दूर नेताओं ने प्रगतिशील लेखकों, संस्कृतिकर्मियों, कलाकारों और शिक्षकों के साथ मिलकर उनकी जन्मशती मनाने के लिए साल भर चलने वाला व्यापक कार्यक्रम आयोजित किया था। इसका मुख्य मकसद राहुल की बहुआयामी भूमिका को सिर्फ़ एक असाधारण विद्वान, दार्शनिक और महान भाषाविद् के तौर पर ही नहीं, बल्कि एक प्रखर जन-नेता और आम लोगों के बीच घूमने-फिरने वाले एक ऐसे घुमक्कड़ के रूप में भी सामने लाना था, जिन्होंने भारतीय समाज में शोषितों के दमन की गहराई को समझने और सामाजिक मुक्ति का क्रांतिकारी रास्ता खोजने की निरंतर कोशिश की। इन्हीं खोजों की वजह से वे बौद्ध दर्शन के भौतिकवादी पहलुओं और करुणा के सिद्धांत से गहराई से जुड़े, और फिर ऐतिहासिक भौतिकवाद तथा मार्क्सवादी सिद्धांत पर मौलिक शोध किया, जिसे उन्होंने भारतीय सामाजिक परिस्थितियों में लागू करने का अनूठा प्रयास किया।

रानीगंज की आयोजन टीम ने राहुल के जीवन और उनके महान कार्यों से जुड़ी इन्हीं बुनियादी बातों पर प्रकाश डालने की कोशिश की। उनकी सांगठनिक गतिविधियों में मज़दूरों के मोहल्लों और किसानों के समूहों के साथ बैठकें और विचार-विमर्श के सत्र आयोजित करने की योजना शामिल थी। इस तरह, इन कार्यक्रमों का मुख्य मकसद राहुल के जीवन और उनके विचारों की अहमियत को मेहनतकश आवाम के बीच लोकप्रिय बनाना था। शताब्दी वर्ष के आखिर में, 1994 में जब योजना के मुताबिक रानीगंज चौराहे पर उनकी विशाल प्रतिमा स्थापित की गई, तो किसान आंदोलन के वरिष्ठ नेता और उस समय वाम मोर्चा सरकार में मंत्री रहे बिनॉयकृष्ण चौधरी ने इसका विधिवत अनावरण किया था; इस ऐतिहासिक मौके पर राहुल सांकृत्यायन का परिवार और कई गणमान्य साहित्यकार, लेखक और बुद्धिजीवी मौजूद थे। लेकिन उनके साथ-साथ आम मेहनतकश मज़दूरों की भी भारी भीड़ वहाँ जमा हुई थी, क्योंकि यह कार्यक्रम उनके लिए बेहद महत्वपूर्ण था। तब से, हर साल 9 अप्रैल को राहुल का जन्मदिन उसी जगह पर ‘पश्चिमबंग गणतांत्रिक लेखक शिल्पी संघ’ द्वारा बड़े सम्मान के साथ मनाया जाता रहा है।

केदारनाथ पांडे से महापंडित राहुल सांकृत्यायन तक

राहुल सांकृत्यायन का जन्म के समय का मूल नाम केदारनाथ पांडे था और वे बिहार के एक दूर-दराज़ के गाँव पंडहा में एक पारंपरिक ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए थे। लेकिन 20वीं सदी की शुरुआत में भारत में स्वाधीनता संग्राम के फैलने के साथ जो व्यापक सामाजिक बदलाव आए, उसने उन्हें भी गहराई से प्रभावित किया और उनके तेज़ व जिज्ञासु दिमाग को अपने आस-पास की बदलती दुनिया को लगातार जानने, सीखने और समझने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कई सालों तक कई पारंपरिक संस्थानों से जुड़कर गहन ज्ञान हासिल किया; हालाँकि उन्हें कभी भी ‘आधुनिक’ अंग्रेजी शिक्षण संस्थानों से कोई औपचारिक डिग्री नहीं मिली, लेकिन यह बात कभी भी ज्ञान की उनकी ज़बरदस्त प्यास में रुकावट नहीं बनी। यहाँ तक कि जब वे पारंपरिक शिक्षा प्रणालियों से गुज़रे, तब भी उन्होंने अपनी तीखी आलोचनात्मक सोच का इस्तेमाल किया और भारतीय असहमति की महान परंपराओं से परिचित हुए। इस तरह, वे मुख्य रूप से एक आधुनिक व्यक्ति थे, जो उस दौर की हलचल भरी राजनीतिक परिस्थितियों की उपज थे। एक घूमते-फिरते बौद्ध विद्वान के तौर पर उन्होंने अपना नाम ‘राहुल सांकृत्यायन’ रखा और ज्ञान की अटूट खोज में तिब्बत, श्रीलंका और सोवियत रूस की अत्यंत कठिन यात्राओं के दौरान उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफ़ी शोहरत और सम्मान मिला। साथ ही, 1922 में गांधीवादी आंदोलन के एक सक्रिय सेनानी के तौर पर वे पहली बार जेल गए। बाद में 1938 में, वे किसान सभा में शामिल हुए और अखिल भारतीय किसान सभा के अध्यक्ष भी बने। किसान आंदोलनों में अग्रणी भूमिका निभाते हुए वे कई बार औपनिवेशिक जेलों में गए। वे 1939 में शुरू हुई कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (CPI) की मुंगेर इकाई के संस्थापक सदस्यों में से एक थे।

फासीवादी नासमझी और बौद्धिक चेतना का संघर्ष

अब बुनियादी सवाल यह उठता है कि क्या रानीगंज में राहुल जी की प्रतिमा हटाने वाले गुंडों को इन सब ऐतिहासिक बातों की रत्ती भर भी जानकारी थी, या फिर यह वामपंथी और प्रगतिशील समूहों की जन-सभाओं के लिए आमतौर पर इस्तेमाल होने वाली जगह पर की गई तोड़-फोड़ की एक बेमतलब की असंवैधानिक हरकत थी? इसमें कोई शक नहीं कि संघ परिवार के विचारकों ने वामपंथ और वैज्ञानिक भौतिकवादी विचारधारा को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मान लिया है। अगर सत्ता में बैठे लोग और उनके कार्यकर्ता इसे गंभीरता से लेते हैं, तो अब पश्चिम बंगाल में भी वामपंथी व प्रगतिशील ऐतिहासिक हस्तियों को लगातार निशाना बनाया जाएगा।

लेकिन आज हमारे लिए, महापंडित राहुल सांकृत्यायन का नाम बेहद खास और क्रांतिकारी मायने रखता है। उन्होंने जीवन भर जो जुझारू भौतिकवादी दृष्टिकोण अपनाया, उसका आज के दौर में अत्यधिक महत्व है। स्वामी करपात्रीजी जैसे ‘सनातनियों’ ने ऐतिहासिक भौतिकवाद पर जो आक्रामक हमले किए थे, राहुल जी ने अपनी प्रसिद्ध लघु पुस्तिका ‘रामराज्य और मार्क्सवाद’ में उसका करारा वैज्ञानिक खंडन किया था। उनका यह ऐतिहासिक काम आज के माहौल में ख़ास तौर पर महत्वपूर्ण है। धार्मिक आस्था का राजनीतिक इस्तेमाल करके हर तरह के शोषण को ‘माया’ बताना, अमीरों और ताकतवर लोगों के आगे बिना सोचे-समझे झुकने को इंसान की किस्मत साबित करना, ब्राह्मणवादी व्यवस्था को नैतिक बताना और पति की चिता पर मरना औरतों का फ़र्ज़ बताने जैसी कुरीतियों पर राहुल जी की शानदार व्यंग्यात्मक टिप्पणियों को आज के दौर में फिर से पढ़ना होगा, जहाँ शोषित और दबे-कुचले लोगों के दिमाग को गुलाम बनाने के लिए फासीवादी नासमझी फैलाई जा रही है। हाँ, फासीवादी और सांप्रदायिक ताकतों को उस अदम्य, बेखौफ और तर्कशील इंसानी दिमाग से डरने की सख्त ज़रूरत है, जिसका महापंडित राहुल सांकृत्यायन प्रतिनिधित्व करते हैं। सच से आंखें चुराना अब पूरी तरह बंद होना चाहिए।

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Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News

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