कॉकरोच आंदोलन को रोकने-कुचलने या समझने के पुराने तौर-तरीक़े काम न आएंगे!

खबर शेयर कीजिए

Article Desk, 🌐 tajnews.in | Sunday, 26 July, 2026, 10:25:14 AM IST.

Taj News Logo
Taj News
Article Desk
मु
मुकुल सरल
कवि, वरिष्ठ पत्रकार व समाचार संपादक
देश के सुप्रसिद्ध कवि, प्रखर पत्रकार, संस्कृतिकर्मी और वेब पोर्टल ‘न्यूजक्लिक हिंदी’ के समाचार संपादक मुकुल सरल जन-आंदोलनों, छात्र-युवा अधिकारों, सांस्कृतिक चेतना और समकालीन राजनीति पर अपनी बेबाक, चश्मदीद तथा जमीनी विश्लेषणात्मक टिप्पणियों के लिए जाने जाते हैं।

कॉकरोच आंदोलन को रोकने-कुचलने या समझने के पुराने तौर-तरीक़े काम न आएंगे!

— मुकुल सरल

बहुत से लोग मुझसे लगातार पूछते हैं कि आप युवाओं के इस अभूतपूर्व ‘कॉकरोच आंदोलन’ को किस नजरिए से देखते और समझते हैं। तो एक प्रत्यक्षदर्शी चश्मदीद गवाह के तौर पर मैं यह टिप्पणी लिख रहा हूँ—यह मेरी कोई अंतिम या पत्थर की लकीर जैसी राय नहीं है, क्योंकि किसी भी उफनते आंदोलन के बीच में खड़े होकर अंतिम निष्कर्ष पर पहुँचना मैं पत्रकारिता और विश्लेषण की दृष्टि से ठीक नहीं समझता।

पहले दिन से लेकर अब तक मैंने जो कुछ धरातल पर देखा और समझा है, वह यह है कि ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के नाम से उभरा युवाओं का यह नया आंदोलन कोई पारंपरिक किस्म का आंदोलन नहीं है। इसके पीछे न तो पहले से गठित कोई सुसंगठित राजनीतिक पार्टी है, न कोई पुराना संगठन, न ही इसकी कोई रूढ़िवादी ठोस वैचारिकी है, और न ही इसके पास कोई ऐसा अनुशासित कैडर है जो किसी एक शीर्ष नेता के हर विधिक निर्देश का आंख मूंदकर पालन करे। यही वजह है कि इसे किसी एक नेता के निर्देश पर नियंत्रित करके, किसी एक चेहरे को ‘मैनेज’ करके या पुलिस की लाठी-गोली वाले परंपरागत दमनकारी तरीकों से कुचला नहीं जा सकता। और न ही पुराने राजनीतिक औजारों से इसका परंपरागत विश्लेषण किया जा सकता है।

हालांकि यह सोचना भी पूरी तरह गलत होगा कि बिना किसी राजनीतिक चेतना या शुरुआती संगठन के यह आंदोलन अचानक शून्य से खड़ा हो गया। लेकिन आज की तारीख में यह सिर्फ सीजेपी (CJP) का आंदोलन नहीं रह गया है, बल्कि यह देश के समूचे युवाओं का अपना स्वतःस्फूर्त आंदोलन बन चुका है। अब तो यह ऐतिहासिक जंतर-मंतर की सीमाओं को लांघकर पूरे देश के कोने-कोने में फैल चुका है।

शिक्षा और भविष्य के सवाल पर यह बिल्कुल नए दौर का आंदोलन है—जिसे हम ‘जेन-ज़ी’ (Gen-Z) यानी जेनरेशन जेड का आंदोलन कहते हैं। इस आंदोलन पर किसी एक विशिष्ट राजनीतिक दल या विचारधारा का कोई लेबल या बोझ नहीं है। इसमें हर रंग-ढंग, पृष्ठभूमि और सोच के युवा शामिल हैं—लड़के भी और बड़ी संख्या में लड़कियाँ भी। इनमें से कुछ युवा भले ही राजनीतिक विचारधाराओं से लैस हों या पुराने छात्र संघर्षों के साथी रहे हों, लेकिन बहुत से ऐसे हैं जो जीवन में पहली बार किसी सड़क आंदोलन में उतरे हैं और जो किसी भी पारंपरिक वैचारिक खेमेबंदी से बहुत दूर हैं। कई युवा तो कल तक खुद को पूरी तरह अराजनीतिक कहते थे। परंतु मुद्दे की समझ आज सबको बहुत स्पष्ट है। सबको अपने स्वर्णिम भविष्य और रोजगार की चिंता है। ये बच्चे नीट (NEET) पर्चा लीक और ध्वस्त होती शिक्षा प्रणाली में सुधार के लिए साफ शब्दों में सरकार से विधिक जवाबदेही और इसके लिए जिम्मेदार केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। इससे कम पर किसी भी स्तर पर कोई समझौता उन्हें मंजूर नहीं।

यह आज का युवा किसी भी दमनकारी तंत्र से नहीं डरता; यह पूरी तरह बेखौफ है। यह भी कहा जा सकता है कि इनमें से बहुतों को सत्ता की कुटिल चालाकियों, प्रशासनिक क्रूरता और बाद में होने वाले कानूनी-राजनीतिक परिणामों का कोई पिछला अनुभव नहीं है। इस आंदोलन में गरीब-दलित तबके के अलावा एक बहुत बड़ी तादाद मिडिल और अपर-मिडिल क्लास के उन हिंदू परिवारों के बच्चों की है, जिन्हें अब तक यही लगता था कि ‘मोदी सरकार तो उनकी अपनी सरकार है’। यह युवा भारी लाठीचार्ज और आंसू गैस के दमन के बाद भी जंतर-मंतर पर डटा हुआ है। यह दिन में सड़कों पर पुलिस की लाठियाँ खाता है और शाम को डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर रील व मीम बनाकर सत्ताधीशों को फिर से सीधी चुनौती दे देता है। बीजेपी का पारंपरिक आईटी सेल भी आज इस बात को लेकर भौचक है कि डिजिटल स्पेस में इस नई पीढ़ी का सामना कैसे किया जाए।

यह युवा दिल्ली की सड़कों पर पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) के सामने सीना तानकर खड़ा हो जाता है और कहता है—”मारो, और मारो सर!” यह मुंबई में पुलिस की वैन के आगे निर्भीक होकर खड़ा हो जाता है और उसे रोक देता है। यह पटना की सड़कों पर पुलिस वालों से मुस्कुराकर पूछता है—”भाई साहब, टियर गैस की कोई व्यवस्था नहीं किए हैं? वाटर कैनन तो है…” और वाटर कैनन की तेज बौछारों के बीच सड़कों पर नाचने लगता है। यह सीधे पुलिस की आँखों में आँखें डालकर चुनौती देता है और कहता है—”आपने अपनी वर्दी से नेम प्लेट भले हटा दी हो, लेकिन सरकार एक दिन आपका नाम ही मिटा देगी, जैसे उसने ऑपरेशन सिंदूर में शहीद हुए जवानों के नाम छुपा दिए और कह दिया कि कोई नहीं मारा गया!” ये लड़के-लड़कियाँ पुलिसकर्मियों से पूछते हैं—”क्या आपके घर में बच्चे नहीं हैं? क्या आप उनके साथ भी ऐसी ही बेरहमी से पेश आते? क्या उन्हें अच्छी शिक्षा और सुरक्षित भविष्य नहीं चाहिए?”

20 जुलाई के संसद मार्च के बाद के हालात देखकर स्पष्ट लग रहा है कि इस आंदोलन की शुरुआत भले ही अभिजीत दीपके ने की हो, लेकिन अब इसे किसी ठोस परिणाम तक पहुँचाए बिना खत्म कराना खुद उनके बस की बात भी नहीं रह गई है। आज भले ही दीपके, सौरव दास, आशुतोष रांका या फिर खुद सोनम वांगचुक भी कह दें कि—”चलो सरकारी आश्वासन मिल गया, समझौता हो गया, आंदोलन खत्म, अब सब अपने घर लौट जाओ”—तब भी यह उफनता आंदोलन खत्म नहीं होगा। और अगर सामयिक रूप से खत्म करा भी दिया गया, तो फिर किसी न किसी रूप में यहाँ नहीं तो देश के किसी अन्य कोने में पुनः उठ खड़ा होगा।

तो फिर यह आंदोलन कहाँ और कैसे खत्म होगा? इसके अब मुख्य रूप से दो ही रास्ते बचे हैं: या तो केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान अपने पद से इस्तीफा दें, या फिर सत्ता की प्रशासनिक मशीनरी व संघ-भाजपा के लोग इसे योजनाबद्ध तरीके से अराजक बनाकर बदनाम करें और फिर पुलिस प्रदर्शनकारियों पर सीधे गोलियाँ चलाए, जिसके बाद एक बड़े खूनी संघर्ष के अंत में यह आंदोलन थमे।

जहाँ तक इसके सूक्ष्म विश्लेषण की बात है, तो इस आंदोलन का पुराने परंपरागत ढर्रे पर विश्लेषण इसलिए विफल हो रहा है, क्योंकि देश के तमाम विद्वान और विश्लेषक आज न तो चुनावों को ठीक से पढ़ पा रहे हैं और न ही जन-आंदोलनों को। ऐसा इसलिए है क्योंकि दोनों के तौर-तरीके और स्वरूप पूरी तरह बदल चुके हैं, जबकि हम पुराने और घिसे-पिटे बौद्धिक औजार लेकर बैठे हैं।

चुनावी विश्लेषण आज इसलिए फेल हो रहे हैं, क्योंकि निष्पक्ष चुनाव की पारंपरिक प्रक्रिया ही बदल दी गई है। एसआईआर (SIR) प्रक्रिया और नई वोटर लिस्टों के बाद चुनाव, चुनाव बचा ही नहीं है। एक के बाद एक चुनाव खुलेआम लूटे जा रहे हैं; अब तो सिर्फ विधायक या सांसद ही नहीं, बल्कि पूरी-की-पूरी पार्टियां लूटी जा रही हैं और सत्ताधारी दल के पेट में समा रही हैं। इसलिए जमीनी जनमत या हवा का रुख देखकर चुनावी नतीजों का अनुमान लगाना बेहद मुश्किल साबित हो रहा है।

इसी तरह चाहे कोई बड़ा जन-आंदोलन हो या कोई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय युद्ध, किसी के बारे में पुराने दावों से कुछ नहीं कहा जा सकता। दुनिया के बड़े-बड़े विचारकों, अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों, सैन्य विश्लेषकों और यहाँ तक कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू को न केवल यह अटूट घमंड था, बल्कि बाकायदा सार्वजनिक घोषणा की गई थी कि ईरान को तीन घंटे या तीन दिन में खत्म कर दिया जाएगा। लेकिन ईरान आज पांच महीने बीत जाने के बाद भी उनके सामने सीना तानकर खड़ा है—अपनी पूरी शीर्ष लीडरशिप के खत्म हो जाने के बावजूद। और ट्रंप साहब को समझ नहीं आ रहा कि इस दलदल से कैसे बाहर निकलें। ज्ञात हो कि अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर पहला बड़ा और बर्बर हमला 28 फरवरी 2026 को किया था।

ठीक ऐसे ही अनुमान और दावे रूस-यूक्रेन युद्ध के समय किए गए थे कि यह युद्ध एक सप्ताह भी नहीं चलेगा। लेकिन आज इस युद्ध को करीब साढ़े चार साल हो चुके हैं (फरवरी 2022 से जारी)। नाटो की मदद से यूक्रेन आज भी डटा हुआ है। भारत में भी मोदी सरकार को शायद यही भ्रम था कि यह ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ सिर्फ एक डिजिटल परिघटना (Digital Phenomenon) है, जमीन पर इसका कोई जनाधार नहीं है, और ये युवा दो-चार दिन जंतर-मंतर पर बैठकर अपने आप घर चले जाएंगे।

‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के नाम से यह आंदोलन पहली बार 6 जून 2026 को जंतर-मंतर पर शुरू हुआ था और फिर 20 जून 2026 से लगातार अनिश्चितकालीन रूप से जारी है। अब इसे एक महीने से अधिक समय हो चुका है। जबकि पहले ही दिन से सीजेपी और इसके संस्थापक अभिजीत दीपके तमाम तरह के संदेहों और सवालों से घिरे रहे। 20 जुलाई के संसद मार्च के बाद भी ये सवाल कम होने के बजाय और बढ़ गए हैं। स्वयं आंदोलनकारी युवाओं ने सवाल उठाया कि पूरे मार्च के दौरान दीपके कहाँ थे? वे एक साउंड वाले ट्रक में ही क्यों बैठे रहे? उन्होंने अन्य छात्रों की तरह पुलिस की लाठियाँ क्यों नहीं झेलीं? ऐन संसद कूच के नाजुक समय में प्रमुख प्रवक्ता सौरव दास और आशुतोष रांका स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा से मिलने क्यों चले गए? अगर सरकार से बातचीत होनी थी, तो वह 19 जुलाई की रात तक होनी चाहिए थी; जब हजारों युवा संसद की ओर बढ़ रहे थे, उस समय बंद कमरे की बातचीत का कोई औचित्य नहीं था।

और यदि बातचीत होनी भी थी, तो वह सबके सामने पारदर्शी तरीके से होती। क्या इसके लिए धरने में लगातार डटे युवाओं या सहयोगी छात्र संगठनों से कोई सलाह-मशविरा किया गया? इस बातचीत का नतीजा क्या निकला? केवल यही कि जब मोर्चे पर नेतृत्व की सबसे ज्यादा जरूरत थी, तब नेतृत्व ही गायब था। बाद में दीपके ने माना भी कि सरकार ने आंदोलनकारियों को अलग-थलग करने के लिए यह कूटनीतिक चाल चली थी। हालांकि हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि दीपके या उनकी युवा टीम को किसी बड़े जन-आंदोलन को चलाने का कोई पुराना अनुभव नहीं है। संभवतः यह उनका पहला बड़ा मैदानी आंदोलन है। और इस मामले में दीपके की सराहना करनी होगी कि उन्होंने पहले ही दिन से बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर की तस्वीर थाम रखी है और सांप्रदायिक हिंदू-मुस्लिम राजनीति का खुलकर मुखर विरोध किया है। यानी सत्ताधारी दल के कोर एजेंडे पर उन्होंने 6 जून के पहले ही प्रदर्शन में सीधा प्रहार कर दिया था, जिसके चलते संघ-भाजपा चाहकर भी अभी तक इस छात्र आंदोलन को सांप्रदायिक रंग नहीं दे पाई है।

एक अन्य प्रमुख प्रवक्ता विजेता दहिया का हाल भी सबने देखा। उन्होंने जिस नाजुक मोड़ पर जैसा गैर-जिम्मेदाराना रवैया दिखाया, उसके बाद सीजेपी ने उन्हें प्रवक्ता पद और सभी जिम्मेदारियों से तुरंत मुक्त कर दिया। इन तीन प्रवक्ताओं के अलावा बाद में चार अन्य नए प्रवक्ता भी जोड़े गए, जिनमें तीन महिला प्रतिनिधि शामिल थीं। क्योंकि शुरुआत से ही यह सवाल उठ रहा था कि सीजेपी के मुख्य नेतृत्व में महिलाओं की भागीदारी क्यों नहीं है? हालांकि इन महिलाओं को प्रवक्ता तो बनाया गया, परंतु उन्हें निर्णय लेने की मुख्य भूमिका नहीं दी गई। जबकि यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि इस पूरे आंदोलन के जमीनी तेवर को लड़कियों ने ही अपनी अटूट निष्ठा से संभाला और संवारा है, जो आज भी अग्रिम मोर्चे पर डटी हुई हैं।

सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की युवा बेरोजगारों और एक्टिविस्टों पर की गई वह बेहद विवादित और शर्मनाक टिप्पणी—कि ऐसे लोग ‘कॉकरोच और परजीवी’ हैं—के व्यंग्य स्वरूप यह पार्टी पहली बार एक्स (X) और इंस्टाग्राम जैसे डिजिटल स्पेस में शुरू हुई थी। जब 6 जून को जंतर-मंतर पर पहले एक दिवसीय धरने की इजाजत मिली, तभी से इस पर तमाम तरह की शंकाएं जताई जा रही थीं। लेकिन तमाम अंतर्विरोधों के बावजूद यदि आज एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन खड़ा हो गया है, तो यह अपने आप में बहुत बड़ी बात है।

दिलचस्प बात यह है कि शुरुआत से ही इस आंदोलन पर संदेह करने वालों में केवल सत्ता पक्ष ही नहीं, बल्कि पूरा विपक्ष भी शामिल था। इस मामले में दोनों एक ही धरातल पर खड़े दिखे। सत्ता पक्ष ने इसे विपक्ष की साजिश बताया, तो विपक्ष ने इसे सत्ता पक्ष का प्रायोजित नाटक करार दिया। बड़े-बड़े बुद्धिजीवी, लेखक और पत्रकार भी असमंजस में रहे। प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट सतीश आचार्य ने इस पर एक बहुत ही सटीक कार्टून बनाया था कि ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ वास्तव में अंधों के हाथी जैसी है, जहाँ कोई उसकी पूंछ पकड़कर विश्लेषण कर रहा है तो कोई उसकी सूंड; पूरा हाथी किसी की समझ में नहीं आ रहा।

लेफ्ट, राइट और सेंटर राजनीतिक दलों के अलावा लेखक-बुद्धिजीवी भी अपने-अपने पुराने खाँचों में बैठकर इसका मूल्यांकन करते रहे। हर कोई इसमें दूसरे की चाल या साजिश तलाश रहा था। एक वर्ग तो इसे पूरी तरह अविश्वास के साथ खारिज कर रहा था। परंतु आज विपक्ष धीरे-धीरे इस युवा आंदोलन से जुड़ने को मजबूर हुआ है, हालांकि वह अब भी खुद को इससे थोड़ा अलग दिखाकर इसका श्रेय केवल अपने पाले में समेटना चाहता है।

सत्ता पक्ष (संघ-भाजपा व गोदी मीडिया) के लिए तो यह आंदोलन पहले दिन से ही कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और वामपंथियों की साजिश था। इसे ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’, ‘अर्बन नक्सल’ और राष्ट्रविरोधी करार देने की कोशिशें हुईं और हमेशा की तरह इसमें पाकिस्तान व चीन का हाथ साबित करने के मनगढ़ंत दावे किए गए। दूसरी ओर, कांग्रेस समर्थित विचारकों ने भी शुरुआती दौर में सीजेपी को बीजेपी की ही ‘बी-टीम’ या ‘अन्ना आंदोलन पार्ट-2’ समझा, जिसे अंततः संघ का प्रोजेक्ट माना गया था जिसने 2014 में मनमोहन सरकार का तख्तापलट किया था।

अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी इस पूरे आंदोलन को अपने राजनीतिक लाभ के लिए भुनाना चाहती रही। अब भी, जब 20 जुलाई के बर्बर पुलिस दमन के विरोध में 21 जुलाई को राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री आवास (7, लोक कल्याण मार्ग) के बाहर एक ऐतिहासिक विरोध प्रदर्शन किया, तो आम आदमी पार्टी इसे पचा नहीं पाई। आप सांसद संजय सिंह, जो उदारवादी हलकों में जाने जाते हैं, उन्होंने भी पार्टी लाइन पर चलते हुए बयान दे दिया कि “मोदी ने ही राहुल को अपने आवास पर धरने पर बिठवाया है।” आतिशी और सौरभ भारद्वाज ने भी इसी लाइन को आगे बढ़ाया। यानी राजनीतिक दल अभी भी अपने संकीर्ण हितों से ऊपर नहीं उठ पाए हैं।

बहरहाल, वामपंथी दलों के छात्र संगठन (आइसा, एसएफआई, एआईएसएफ आदि) पहले दिन से ही इस आंदोलन के साथ मजबूती से खड़े रहे, क्योंकि उनका स्पष्ट मानना था कि वे शिक्षा के अधिकार और रोजगार के मुद्दे पर वर्षों से संघर्ष कर रहे हैं, इसलिए पेपर लीक के खिलाफ शुरू हुए इस बड़े आंदोलन को वे यूँ ही नहीं छोड़ सकते। भाकपा (माले) के महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य 6 जून को ही जंतर-मंतर पहुँचकर अपना पूर्ण समर्थन दे चुके थे। 20 जून के बाद सीपीएम महासचिव एम.ए. बेबी, वृंदा करात, और सीपीआई महासचिव डी. राजा जैसे शीर्ष वामपंथी नेता भी आंदोलन के मंच पर पहुँचे। इन दलों के कई सांसद लगातार जंतर-मंतर पर डटे रहे।

28 जून को जब प्रसिद्ध शिक्षाविद और पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक ने जंतर-मंतर पर अपनी अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की, तो उनके साथ आइसा (AISA) की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा समेत छह छात्र नेताओं ने भी आमरण अनशन प्रारंभ कर दिया। बीच में तीन अनशनकारियों की तबीयत अत्यधिक बिगड़ने पर उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन नेहा, आमीन और मनीष की भूख हड़ताल 20 जुलाई के संसद मार्च तक अनवरत जारी रही। 20 जुलाई को चिकित्सा डॉक्टरों की सलाह पर उनका अनशन समाप्त कराया गया, लेकिन जज्बा देखिए कि नेहा अस्पताल से डिस्चार्ज होते ही 22 जुलाई को पुनः जंतर-मंतर पहुँचकर आंदोलन में अग्रिम मोर्चे पर डट गईं। इनके अलावा केवाईएस, दिशा, पछास जैसे अनेक छात्र संगठनों के युवाओं ने भी 15 से 18 दिनों तक कठोर अनशन किया।

अब यह आंदोलन केवल शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे तक सीमित न रहकर सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विधिक जवाबदेही और उनके इस्तीफे की मांग तक पहुँच गया है। पेपर लीक से शुरू हुई यह चिंगारी अब पूरे देश में व्यापक शिक्षा सुधार और सम्मानजनक रोजगार की राष्ट्रीय मांग बन चुकी है। अखिलेश यादव, डिंपल यादव, चंद्रशेखर आजाद, उद्धव ठाकरे और शरद पवार जैसे प्रमुख विपक्षी नेता भी अब इस छात्र आंदोलन के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े दिखाई दे रहे हैं। संसद से लेकर सड़कों तक किसान, मजदूर, महिला और कर्मचारी संगठन भी इस युवा उबाल के समर्थन में उतर आए हैं।

अब बात करते हैं 20 जुलाई की उस खौफनाक रात की। संसद मार्च के दौरान गृह मंत्रालय के अधीन आने वाली दिल्ली पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) ने निहत्थे छात्रों पर जो बर्बर लाठीचार्ज किया, आंसू गैस के गोले दागे, पेलेट गन और कील लगी लाठियों का इस्तेमाल किया, उसने स्वतंत्र भारत में दमनकारी इतिहास का नया रिकॉर्ड बना दिया। कई छात्राओं के साथ पुलिस द्वारा की गई अभद्रता के वीडियो आज सोशल मीडिया पर वायरल हैं। लेकिन इसके बावजूद एक सबसे बड़ी पहेली बनी हुई है: जब 20 जुलाई के दिन पुलिस ने जंतर-मंतर को पूरी तरह खाली कराकर तंबू उखाड़ दिए थे, तो उसी रात दोबारा वहाँ प्रदर्शनकारी कैसे जमा हो गए और धरना फिर से कैसे शुरू हो गया?

क्या हम यह मान लें कि यह सब सरकार की मौन सहमति के बिना संभव हो गया? दिल्ली पुलिस जैसी प्रशिक्षित फ़ोर्स के होते हुए रात में दोबारा तंबू गाड़कर धरना शुरू होने देना एक बहुत बड़ी प्रशासनिक और राजनीतिक पहेली है। इसका एक ही संभावित उत्तर समझ आता है कि इस आंदोलन में बड़ी संख्या उन मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चों की है जो पारंपरिक रूप से बीजेपी के वोटर रहे हैं। तो क्या शुरुआती भीषण दमन के बाद सरकार ने जानबूझकर थोड़ी नरमी दिखाई ताकि उसका अपना कैडर और मिडिल-क्लास वोटर पूरी तरह बगावत पर न उतर आए? या फिर सरकार की रणनीति यह है कि इस आंदोलन को लंबे समय तक खींचकर इसमें असामाजिक तत्वों को घुसाया जाए, किसी बड़ी हिंसा को प्रायोजित कराया जाए और फिर पूरे आंदोलन को ‘अराजक’ घोषित करके इसका पूर्ण दमन कर दिया जाए?

चाहे जो भी कूटनीतिक चालें चली जाएं, लेकिन एक बात पूरी तरह साफ है कि भारत का आज का यह युवा अब पुराने डराने-धमकाने के ढर्रे से दबने वाला नहीं है। वे पुलिसकर्मियों को हाथ में गुलाब के फूल दे रहे हैं, उन्हें पानी और खाना पूछ रहे हैं, लेकिन अपने बुनियादी अधिकारों से पीछे हटने को कतई तैयार नहीं हैं। सत्ताधीशों को यह भली-भांति समझ लेना होगा कि कॉकरोच आंदोलन को रोकने, कुचलने या समझने के पुराने घिसे-पिटे तौर-तरीके अब इस देश में कतई काम नहीं आएंगे। विधिक रूप से जनहित और युवा अधिकारों की आवाज को दबाना अब संभव नहीं रहा। सच से आंखें चुराना अब पूरी तरह बंद होना चाहिए।

यह भी पढ़ें

Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News

खबर शेयर कीजिए

Leave a Comment