वो बेटा नहीं, कलंक है! वृद्धाश्रम में पिता की मौत के बाद बेटों ने नहीं ली लाश, अनाथों की तरह संस्था ने किया अंतिम संस्कार

Uttar Pradesh Desk, tajnews.in | Thursday, April 16, 2026, 01:25:30 PM IST

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कासगंज/एटा: कलयुग में खून के रिश्तों की संवेदनहीनता और मानवीय पतन की एक ऐसी रुला देने वाली तस्वीर सामने आई है, जो किसी भी पत्थरदिल इंसान की आंखों में आंसू ला दे। उत्तर प्रदेश के कासगंज-एटा क्षेत्र में एक बेहद ही शर्मनाक और दिल दहला देने वाली घटना घटी है। जिस पिता ने अपनी पूरी उम्र और खून-पसीना एक करके अपने बच्चों को पाल-पोसकर बड़ा किया, उन्हीं बेटों ने बुढ़ापे में माता-पिता को घर से निकालकर वृद्धाश्रम (Old Age Home) में धकेल दिया। लेकिन क्रूरता की हद तो तब पार हो गई, जब वृद्धाश्रम में उस अभागे पिता की बीमारी और उम्र के तकाजे के चलते मौत हो गई। सूचना मिलने के बावजूद उन कलयुगी बेटों ने अपने सगे पिता की लाश तक लेने से साफ इनकार कर दिया। जहां एक तरफ खून के इस सफेद होते रंग ने पूरे समाज को शर्मसार कर दिया, वहीं दूसरी तरफ कुछ समाजसेवियों ने आगे आकर मृत इंसानियत को फिर से जिंदा करने का काम किया। अपनों द्वारा ठुकराए जाने के बाद एक स्थानीय सामाजिक सेवा समिति ने आगे बढ़कर उस अभागे पिता का पूरे हिंदू रीति-रिवाज के साथ अंतिम संस्कार किया। यह घटना समाज के लिए एक बहुत बड़ा तमाचा और एक गहरी चेतावनी है।

HIGHLIGHTS
  1. कासगंज-एटा की शर्मनाक घटना: वृद्धाश्रम में रहने को मजबूर हुए 70 वर्षीय बुजुर्ग की मौत के बाद बेटों ने दिखाई घोर संवेदनहीनता।
  2. कलयुगी बेटों ने ठुकराई पिता की लाश: वार्डन द्वारा फोन पर सूचना देने के बावजूद दोनों बेटों ने पिता का शव लेने से साफ तौर पर इनकार कर दिया।
  3. समाजसेवियों ने पेश की मिसाल: अपनों के मुंह मोड़ने के बाद ‘संस्कार मानव सेवा समिति’ ने आगे बढ़कर किया बुजुर्ग का अंतिम संस्कार।
  4. रिश्तों के पतन पर खड़े हुए सवाल: इस रुला देने वाली घटना ने पारिवारिक मूल्यों के गिरते स्तर और समाज की बदलती मानसिकता पर गंभीर चिंताएं पैदा कर दी हैं।

बुढ़ापे का वह दर्दनाक सफर और वृद्धाश्रम की चारदीवारी

इंसान अपने बच्चों के लिए अपनी सारी खुशियां और जीवन भर की कमाई कुर्बान कर देता है, इस उम्मीद में कि बुढ़ापे में यही बच्चे उसकी लाठी बनेंगे। लेकिन, कासगंज के मोहल्ला भूतेश्वर कॉलोनी (बिलराम गेट) निवासी 70 वर्षीय चंद्रप्रकाश सक्सेना के नसीब में बेटों का यह सुख नहीं था। पारिवारिक कलह, बेटों की घोर उपेक्षा और तिरस्कार के चलते चंद्रप्रकाश और उनकी पत्नी धनदेवी को अपने ही घर में बेगानों की तरह जीवन बिताना पड़ रहा था। जब स्थिति बिल्कुल बर्दाश्त के बाहर हो गई और बेटों ने उन्हें पूरी तरह से बेसहारा छोड़ दिया, तो इस लाचार और बेबस दंपती को दर-ब-दर की ठोकरें खानी पड़ीं।

मजबूर होकर चंद्रप्रकाश अपनी जीवनसंगिनी धनदेवी के साथ 30 मार्च 2026 को एटा स्थित एक वृद्धाश्रम में आकर रहने लगे। वृद्धाश्रम की चारदीवारी में वे अपने बेटों की बेरुखी का घूंट रोज पी रहे थे। उम्र के इस आखिरी पड़ाव में अपनों के तिरस्कार का यह गहरा सदमा चंद्रप्रकाश बर्दाश्त नहीं कर पाए। उनका स्वास्थ्य लगातार गिरता चला गया। अंततः, मंगलवार की रात को इस अभागे पिता ने वृद्धाश्रम के एक कमरे में अपनी अंतिम सांस ली और इस बेरहम दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया। उनके निधन से उनकी पत्नी धनदेवी पूरी तरह से टूट गईं और अकेली पड़ गईं।

पत्थरदिल बेटे: ‘हमें नहीं लेना पिता का शव, तुम ही कुछ कर लो’

चंद्रप्रकाश के निधन के बाद वृद्धाश्रम में शोक का माहौल छा गया। वृद्धाश्रम प्रशासन को उम्मीद थी कि मौत की खबर सुनकर बेटों का दिल पसीज जाएगा और वे कम से कम अपने पिता के अंतिम दर्शन और मुखाग्नि देने जरूर आएंगे। वृद्धाश्रम की वार्डन योग्यता ने तुरंत मानवीय जिम्मेदारी निभाते हुए चंद्रप्रकाश के बड़े बेटे विजय कुमार (निवासी कांशीराम कॉलोनी) और उसके दूसरे भाई को फोन पर इस दुखद घटना की सूचना दी। उन्होंने उम्मीद की थी कि बेटे तुरंत अपने पिता के पार्थिव शरीर को लेने के लिए रवाना होंगे।

लेकिन, फोन पर दूसरी तरफ से जो जवाब मिला, उसने वार्डन और वहां मौजूद सभी लोगों की रूह कंपा दी। उन कलयुगी बेटों ने अपने सगे पिता का शव लेने से दो टूक शब्दों में इनकार कर दिया। उन्होंने साफ कह दिया कि उनका अब अपने पिता से कोई वास्ता नहीं है और वे अंतिम संस्कार के लिए नहीं आएंगे। बेटों की इस घोर संवेदनहीनता और पत्थरदिली ने वहां मौजूद हर एक व्यक्ति की आंखों में आंसू ला दिए। एक बेबस मां (धनदेवी) अपनी आंखों के सामने अपने पति की लाश और बेटों की इस भयंकर क्रूरता को देखकर बदहवास हो गई।

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जब अपनों ने मोड़ा मुंह, तब ‘संस्कार मानव सेवा समिति’ बनी सहारा

बेटों के इस अमानवीय फैसले के बाद वृद्धाश्रम प्रशासन के सामने एक बड़ा संकट खड़ा हो गया। शव को लावारिस नहीं छोड़ा जा सकता था। ऐसे कठिन और भावुक क्षण में वृद्धाश्रम की वार्डन योग्यता ने एटा की जानी-मानी ‘संस्कार मानव सेवा समिति’ (Sanskar Manav Sewa Samiti) को इस पूरी घटना की विस्तार से सूचना दी। समाज में इंसानियत को जिंदा रखने का बीड़ा उठाने वाली इस समिति के सदस्य बिना एक पल गंवाए तुरंत वृद्धाश्रम पहुंच गए।

उन्होंने बेसहारा और बिलखती हुई बुजुर्ग पत्नी धनदेवी को ढांढस बंधाया और उनसे अंतिम संस्कार की विधिवत सहमति ली। जब खून के रिश्तों ने मुंह मोड़ लिया, तब इन समाजसेवियों ने एक बेटे का पूरा फर्ज निभाया। समिति के सदस्य चंद्रप्रकाश के पार्थिव शरीर को बहुत ही ससम्मान अपने कंधों पर उठाकर माल गोदाम रोड स्थित मोक्षधाम ले गए। वहां पूरे हिंदू रीति-रिवाज, वेद मंत्रों और पूर्ण सम्मान के साथ उस अभागे पिता का अंतिम संस्कार संपन्न कराया गया। इस दृश्य को देखकर श्मशान घाट पर मौजूद हर एक व्यक्ति की आंखें छलक उठीं। संस्था का यह निस्वार्थ कार्य समाज में एक बहुत बड़ी उम्मीद की किरण बनकर उभरा है।

पारिवारिक रिश्तों का पतन और समाज के लिए एक गंभीर चेतावनी

कासगंज-एटा की यह रुला देने वाली घटना केवल एक परिवार की कहानी नहीं है, बल्कि यह आज के हमारे पूरे आधुनिक समाज के माथे पर एक बहुत बड़ा कलंक है। यह घटना सोचने पर मजबूर करती है कि हम भौतिकवादी अंधी दौड़ में अपने नैतिक और पारिवारिक मूल्यों को कितनी बुरी तरह से कुचलते जा रहे हैं। आज के समय में जब युवा पीढ़ी पाश्चात्य संस्कृति और एकल परिवार (Nuclear Family) की अवधारणा में अंधी होती जा रही है, तब माता-पिता को उनके ही घर में एक बोझ समझा जाने लगा है। देश भर में तेजी से खुलते और भरते हुए वृद्धाश्रम इस कड़वी सच्चाई का सबसे बड़ा और जीता-जागता प्रमाण हैं।

हालांकि, हमारे देश में ‘माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम’ (Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act) जैसा बेहद कड़ा कानून मौजूद है, जो बच्चों को अपने माता-पिता की देखभाल करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य करता है। लेकिन, जब इंसान का जमीर ही मर जाए और दिलों से ममता ही सूख जाए, तो कोई भी कानून रिश्तों में आई इस भयंकर दरार को नहीं भर सकता। जो बेटे आज अपने पिता की लाश को लेने से कतरा रहे हैं, उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि वक्त का पहिया गोल होता है और कर्मों का हिसाब यहीं देना पड़ता है। संस्कार मानव सेवा समिति का यह कार्य हमें याद दिलाता है कि भले ही खून के रिश्ते धोखा दे दें, लेकिन इंसानियत आज भी इस धरती पर पूरी तरह से जिंदा है।

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Thakur Pawan Singh Editor in Chief Taj News

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