Agra Desk, tajnews.in | Thursday, April 16, 2026, 02:45:30 PM IST

आगरा: हाल ही में आगरा के शाहदरा फ्लाईओवर से गिरकर दो होनहार युवकों की हुई बेहद दर्दनाक मौत ने पूरे शहर को बुरी तरह से झकझोर कर रख दिया है। इस भयानक हादसे के बाद अब फ्लाईओवर की सुरक्षा और उसके निर्माण मानकों को लेकर एक बहुत बड़ी और तकनीकी बहस छिड़ गई है। इसी कड़ी में, जिला सड़क सुरक्षा समिति के पूर्व सदस्य और शहर के वरिष्ठ अस्थिरोग शल्य चिकित्सक (Orthopedic Surgeon) डॉ. संजय चतुर्वेदी ने फ्लाईओवरों की रेलिंग की ऊंचाई और सुरक्षा मानकों पर एक बहुत ही विस्तृत और तथ्यात्मक अध्ययन पेश किया है। डॉ. चतुर्वेदी ने स्पष्ट रूप से यह बताया है कि भारतीय सड़क कांग्रेस (IRC) के जो वर्तमान मानक हैं, वे जमीनी हकीकत और दोपहिया वाहनों की सुरक्षा के लिहाज से पूरी तरह से अपर्याप्त और जानलेवा साबित हो रहे हैं। उन्होंने जिला सड़क सुरक्षा समिति से इस बेहद गंभीर विषय को अपनी आगामी बैठक में शामिल करने और राष्ट्रीय स्तर पर मानकों में बड़े बदलाव (Amendment) की सिफारिश करने का विनम्र अनुरोध किया है। उनका यह तकनीकी अध्ययन इस बात की ओर सीधा इशारा करता है कि अगर समय रहते रेलिंग की ऊंचाई नहीं बढ़ाई गई, तो ये फ्लाईओवर आगे भी मासूम लोगों के लिए ‘मौत का कुआं’ साबित होते रहेंगे।
भारतीय शहरों की यातायात वास्तविकता और दोपहिया वाहनों का खतरा
किसी भी समस्या का समाधान खोजने से पहले उसकी जमीनी हकीकत को समझना बहुत जरूरी होता है। डॉ. संजय चतुर्वेदी ने अपने अध्ययन में बिल्कुल इसी व्यावहारिक पहलू पर सबसे ज्यादा जोर दिया है। उन्होंने बताया कि आगरा जैसे अधिकांश छोटे और मध्यम दर्जे के भारतीय शहरों में यातायात का स्वरूप पश्चिमी देशों से बिल्कुल अलग है। हमारे यहां सड़कों और फ्लाईओवरों पर चलने वाले कुल वाहनों में से लगभग 70% से अधिक संख्या केवल दोपहिया वाहनों (Two-Wheelers) की होती है। यही वह वर्ग है जो सड़क हादसों में सबसे ज्यादा असुरक्षित और संवेदनशील है।
डॉ. चतुर्वेदी ने दोपहिया चालकों की स्वाभाविक ड्राइविंग प्रवृत्ति (Driving Tendency) का बहुत बारीकी से विश्लेषण किया है। दरअसल, फ्लाईओवरों पर भारी और बड़े वाहन हमेशा मध्य लेन (Middle Lane) पर कब्जा जमाए रहते हैं। ऐसे में, दोपहिया चालक भारी ट्रैफिक से बचने और तेजी से निकलने की होड़ में हमेशा फ्लाईओवर के बिल्कुल किनारे वाली लेन (Edge Lane) का इस्तेमाल करना पसंद करते हैं। इसके अलावा, जब फ्लाईओवर पर कोई घुमाव या मोड़ (Curve) आता है, तो भौतिक विज्ञान के ‘केन्द्रापसारक बल’ (Centrifugal Force) के कारण तेज रफ्तार दोपहिया वाहन स्वाभाविक रूप से बाहरी रेलिंग की तरफ तेजी से खिंचते हैं। ऐसी स्थिति में सड़क पर मौजूद जरा सी भी बालू, फिसलन, कोई छोटा गड्ढा या अचानक लगाया गया ब्रेक वाहन का संतुलन बिगाड़ देता है। दुर्घटना के उस चंद सेकंड के खौफनाक क्षण में, वह किनारे बनी रेलिंग ही सवार और मौत के बीच का एकमात्र और आखिरी अवरोध (Barrier) होती है।
क्यों जानलेवा साबित हो रहे हैं वर्तमान IRC मानक? (बायोमैकेनिकल विश्लेषण)
फ्लाईओवर बनाते समय इंजीनियर ‘भारतीय सड़क कांग्रेस’ (Indian Roads Congress – IRC) द्वारा तय किए गए मानकों का पालन करते हैं। वर्तमान में लागू IRC:SP:90-2010 के खंड 6.4.4 के अनुसार, किसी भी फ्लाईओवर पर लगाई जाने वाली क्रैश बैरियर या रेलिंग की न्यूनतम ऊंचाई 1.1 मीटर (यानी लगभग 3.6 फीट) निर्धारित की गई है। एक वरिष्ठ अस्थिरोग शल्य चिकित्सक होने के नाते डॉ. संजय चतुर्वेदी ने इस 3.6 फीट के मानक को मानव शरीर विज्ञान (Biomechanics) की कसौटी पर परखा है और इसे पूरी तरह से अव्यावहारिक और अपर्याप्त करार दिया है।
डॉ. चतुर्वेदी ने अपने अध्ययन में बहुत ही स्पष्ट और वैज्ञानिक तर्क देते हुए समझाया कि भारत में इस्तेमाल होने वाली एक सामान्य कम्यूटर मोटरसाइकिल की सीट की ऊंचाई सड़क से लगभग 2.5 फीट होती है। जब कोई औसत कद का व्यक्ति उस सीट पर बैठता है, तो उस व्यक्ति के शरीर का ‘गुरुत्व केंद्र’ (Centre of Gravity) सड़क की सतह से लगभग 3.5 फीट की ऊंचाई पर आ जाता है। अब जरा दुर्घटना के उस खौफनाक क्षण की कल्पना कीजिए। जब एक तेज रफ्तार मोटरसाइकिल असंतुलित होकर 3.6 फीट ऊंची रेलिंग से टकराती है, तो मोटरसाइकिल का अगला हिस्सा रेलिंग से टकराकर वहीं रुक जाता है और मोटरसाइकिल एक ‘फुलक्रम’ (Fulcrum) या लीवर की तरह काम करने लगती है।
चूंकि सवार के शरीर का गुरुत्व केंद्र (3.5 फीट) रेलिंग की ऊंचाई (3.6 फीट) के लगभग बराबर या उससे ऊपर होता है, इसलिए टक्कर के भारी ‘मोमेंटम’ (Momentum) के कारण सवार का शरीर रेलिंग से रुकने के बजाय उसके ऊपर से उछलकर सीधे 50-60 फीट नीचे सड़क या खाई में जा गिरता है। डॉ. चतुर्वेदी का सीधा निष्कर्ष यह है कि IRC की यह 3.6 फीट की रेलिंग केवल वाहन को नीचे गिरने से रोक सकती है, लेकिन वह उस पर बैठे हुए इंसान की जान बचाने में पूरी तरह से विफल है। जब 70% ट्रैफिक दोपहिया है, तो मानक भी कारों के बजाय दोपहिया वाहनों की वास्तविकता को ध्यान में रखकर ही बनाए जाने चाहिए।
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जिला सड़क सुरक्षा समिति से डॉ. चतुर्वेदी का 5 सूत्रीय विनम्र अनुरोध
शाहदरा फ्लाईओवर हादसे में जान गंवाने वाले दोनों युवकों के परिवारों की चीखें आज भी आगरा शहर की हवाओं में गूंज रही हैं। एक जिम्मेदार नागरिक और पूर्व समिति सदस्य के नाते डॉ. संजय चतुर्वेदी ने इस समस्या के ठोस और स्थायी समाधान के लिए जिला सड़क सुरक्षा समिति के समक्ष अपना एक बहुत ही महत्वपूर्ण 5 सूत्रीय मांग पत्र (Proposal) प्रस्तुत किया है। उन्होंने समिति से अपनी आगामी आधिकारिक बैठक में इन बिंदुओं पर गंभीरता से चर्चा करने का कड़ा आग्रह किया है। उनके द्वारा प्रस्तुत किए गए मुख्य सुझाव इस प्रकार हैं:
- मानकों की तत्काल समीक्षा: IRC:SP:90-2010 के रेलिंग मानकों की वैज्ञानिक समीक्षा की जाए, जिसमें दोपहिया वाहनों की भारी संख्या, उनकी लेन में चलने की प्रवृत्ति और दुर्घटना के समय बायोमैकेनिकल वास्तविकता को मुख्य आधार बनाया जाए।
- सुरक्षा सर्वेक्षण और बैरियर की ऊंचाई: आगरा शहर के सभी फ्लाईओवरों का एक व्यापक सुरक्षा सर्वेक्षण (Safety Audit) कराया जाए। वर्तमान में मौजूद रेलिंग को हटाकर आवश्यकतानुसार न्यूनतम 5 से 6 फीट ऊंचे ठोस कंक्रीट क्रैश बैरियर (Solid Concrete Crash Barriers) लगाए जाएं।
- घुमावदार मोड़ों पर विशेष सुरक्षा: फ्लाईओवरों के वक्र (Curve) यानी घुमावदार स्थलों पर ‘केन्द्रापसारक बल’ के खतरे को देखते हुए विशेष रूप से अतिरिक्त सुदृढ़ और ऊंचे बैरियर की व्यवस्था अनिवार्य रूप से की जाए।
- NHAI और IRC को आधिकारिक पत्र: स्थानीय प्रशासन द्वारा भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) और भारतीय सड़क कांग्रेस (IRC) को आधिकारिक पत्र प्रेषित कर राष्ट्रीय स्तर पर इन जानलेवा मानकों में संशोधन करने का मजबूत सुझाव भेजा जाए।
- CCTV कैमरों की अनिवार्य स्थापना: हादसों के कारणों का सटीक पता लगाने और ओवरस्पीडिंग पर लगाम कसने के लिए सभी फ्लाईओवरों पर हाई-डेफिनिशन CCTV कैमरों की तत्काल संस्तुति की जाए।
‘एक चिकित्सक की पीड़ा: रोकी जा सकती थीं ये मौतें’
इस पूरे तकनीकी अध्ययन और मांग पत्र के अंत में डॉ. संजय चतुर्वेदी ने जो बात कही है, वह प्रशासन और नीति निर्माताओं की आंखें खोलने के लिए काफी है। उन्होंने बहुत ही भावुक लेकिन दृढ़ स्वर में अपना निवेदन प्रस्तुत करते हुए कहा, “मैं इस हादसे के लिए किसी विशेष विभाग या व्यक्ति पर कोई आरोप नहीं लगा रहा हूँ। लेकिन, एक चिकित्सक (Doctor) के रूप में जो रोज दुर्घटनाओं के शिकार लोगों का इलाज करता है, मेरी सबसे बड़ी पीड़ा यह है कि जो मृत्युएं शाहदरा फ्लाईओवर पर हुईं, वे पूरी तरह से रोकी जा सकती थीं। अगर रेलिंग की ऊंचाई पर्याप्त होती, तो आज वे दोनों होनहार युवक हमारे बीच जीवित होते।”
उन्होंने आगे कहा, “मेरा यह तथ्यात्मक और विनम्र प्रयास केवल इतना है कि जिला सड़क सुरक्षा समिति इस गंभीर विषय पर तुरंत विचार करे और अपनी उचित संस्तुति उच्च अधिकारियों एवं केंद्र सरकार तक पहुंचाए। शाहदरा हादसे में अपने बच्चों को खोने वाले उन दो परिवारों की असहनीय पीड़ा व्यर्थ नहीं जानी चाहिए। उनके आंसुओं से कम से कम भविष्य के लिए एक सुरक्षित रास्ता तो जरूर तैयार होना चाहिए।” निश्चित रूप से, डॉ. चतुर्वेदी की यह वैज्ञानिक और मानवीय पहल आगरा ही नहीं, बल्कि पूरे देश के सड़क सुरक्षा मानकों में एक बहुत बड़ा और जीवन रक्षक बदलाव लाने की क्षमता रखती है। अब गेंद पूरी तरह से जिला प्रशासन और NHAI के पाले में है।
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Thakur Pawan Singh
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