भारत को आर्थिक संकट की ओर धकेल रही हैं मोदी सरकार की नीतियां: जयप्रकाश नारायण का प्रखर आलेख

खबर शेयर कीजिए

Article Desk, Taj News | Tuesday, May 19, 2026, 01:10:00 PM IST

Taj News Logo
Taj News
Article Desk
जयप्रकाश नारायण
अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश इकाई
अखिल भारतीय किसान महासभा
अखिल भारतीय किसान महासभा की उत्तर प्रदेश इकाई के अध्यक्ष जयप्रकाश नारायण ने भारतीय अर्थव्यवस्था, विदेश नीति और मजदूर वर्ग की दयनीय स्थिति पर एक बेहद प्रखर आलेख लिखा है। यह आलेख खुलासा करता है कि कैसे केंद्र सरकार की अदूरदर्शी नीतियों, कूटनीतिक विफलताओं और कॉर्पोरेट प्रेम ने देश को एक गहरे और बहुआयामी आर्थिक संकट के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है।
HIGHLIGHTS
  1. कमर्शियल गैस के दामों में 30% की वृद्धि केवल महंगाई नहीं, बल्कि सरकार की कूटनीतिक और आर्थिक विफलताओं का परिणाम है।
  2. विदेश नीति पर सवाल: अमेरिका और इज़राइल के प्रति आत्मसमर्पण ने भारत के ऊर्जा और कृषि क्षेत्र (फर्टिलाइजर) को गहरे संकट में डाल दिया है।
  3. भारत तेजी से ‘मैन्युफैक्चरिंग’ से ‘उपभोक्ता’ अर्थव्यवस्था में बदल रहा है; गिग वर्कर्स और ठेका मजदूरों की संख्या में भारी इज़ाफ़ा हुआ है।
  4. ताज न्यूज़ का संपादकीय: जब नीतियां केवल ‘इलेक्शन मैनेजमेंट’ और कॉर्पोरेट मुनाफे के इर्द-गिर्द बुनी जाती हैं, तो देश की बुनियाद खोखली हो जाती है।

भारत को आर्थिक संकट की ओर धकेल रही हैं मोदी सरकार की नीतियां

— जयप्रकाश नारायण

ताज न्यूज़ की रपट के अनुसार, कमर्शियल गैस के दाम 30% बढ़ा दिए गए हैं। पिछले डेढ़ महीने में 1600 रुपये में मिलने वाला कमर्शियल गैस सिलेंडर अब 3070 रुपये में मिल रहा है। यह सिर्फ मूल्य वृद्धि का सवाल नहीं है, बल्कि संघ मार्का हिंदुत्व विदेश नीति के दिवालियापन का संकेत है, जो नफरत, हिंसा, साम्राज्यवाद के समक्ष समर्पण और सत्ता के दुरुपयोग द्वारा चुनाव जीत लेने के समग्र प्रोजेक्ट का स्वाभाविक परिणाम है।

यह सब वित्तीय पूंजी के जटिल साम्राज्य के साथ अंत:क्रिया में संघी नीति के दिवालिएपन के साथ घनिष्ठ रूप से जुड़ा है। विश्व शक्ति संतुलन के बदलते दौर में यह स्पष्ट हो चुका है कि ‘नागपुर विद्यालय’ से निकले नेता, कार्यकर्ता, विचारक, अर्थशास्त्री न आधुनिक दुनिया की समझ रखते हैं और न वैश्विक राजनीति के किसी भी जटिल सवाल को समझने एवं अंतर्विरोधों को हल करने की सामान्य योग्यता। वे भारत की विविधता में मौजूद अंतर्विरोध को जटिल बनाकर सत्ता का खेल तो खेल सकते हैं और इसे लोकतांत्रिक भारत को कमजोर करने की परियोजना की तरफ धकेल सकते हैं, लेकिन देश के बुनियादी सवालों को हल करने की योग्यता उनमें नहीं है। सुलगते आदिवासी इलाके, जलता मणिपुर और तबाह होते उद्योग, कृषि को कॉरपोरेट हवाले करने के लिए, नागरिकता के सवाल को नासूर में बदलकर, धार्मिक विभिन्नता को अपराध के स्तर पर उन्नत कर कॉरपोरेट कृपा से सत्ता की कुर्सी पर तो बैठे रह सकते हैं, लेकिन विकसित होती राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों के जटिल मोड़ पर 147 करोड़ भारतीयों के वास्तविक जीवन के मुद्दों से जूझने, टकराने और उसे हल करने की ईमानदार नियति इनके पास नहीं है। यही कारण है कि खाड़ी के संकट ने इनके नीतिगत दीवालिएपन को देश और दुनिया के सामने खोल करके रख दिया है।

जनवरी से ही यह सूचना मिलने लगी थी कि ईरान पर किसी भी समय हमला हो सकता है। ओमान की मध्यस्थता में चल रही वार्ता में ईरानी लचीलेपन के बाद भी अमेरिकी हठधर्मिता से भविष्य के संकेत मिलने लगे थे। यह स्पष्ट हो गया था कि अमेरिकी नीयत किसी भी तरह की वार्ता को मंजिल तक पहुंचाने की नहीं है। भू-राजनीति के जानकारों में इस बात पर एक राय थी कि शीघ्र ही ईरान पर हमला होने वाला है। इसलिए आंतरिक राजनीति की जरूरत, नफरती दृष्टि और अदूरदर्शी समझ के कारण अचानक भारतीय प्रधानमंत्री ने इजरायली यात्रा पर जाने का समय सोच-समझ कर चुना होगा। आश्चर्य तो यह है कि यात्रा की घोषणा इज़रायल से की गई। पीएम मोदी के इज़रायल पहुंचने के बाद जो कुछ दिखावा, तमाशा, प्रोपेगेंडा हुआ, वह सब अपनी जगह है। हीनग्रंथि से पीड़ित खोखले विचार वाले क्षुद्र व्यक्ति के लिए यह सब उपलब्धि हो सकती है, लेकिन पूंजी के मालिकों के क्रूर यथार्थवादी दुनिया में इस तमाशे का कोई महत्व नहीं होता। पूंजी के हृदयहीन संचालकों के लिए यह सिर्फ खेल की स्क्रिप्ट ही हो सकती है। इस अहम मोड़ पर मोदी ने इसराइल को ‘फादर ऑफ द नेशन’ कह कर अपने बौद्धिक दिवालिएपन की जो तस्वीर छोड़ी, वह भारत के लिए आत्मघाती था।

यह भी पढ़ें

महज 80 वर्ष की उम्र वाले साम्राज्यवादी और उपनिवेशवादी परियोजना से जन्मे कृत्रिम देश और लाखों मुस्लिम धर्मावलंबी फिलिस्तीनियों के नरसंहार को नजरअंदाज कर प्रफुल्लित हो मोदी ने जो कुछ कहा, आज देश उसकी कीमत चुका रहा है। किस दृष्टि समझ और सोच के कारण संघी राष्ट्रवाद इजरायल को ‘फादर ऑफ नेशन’ मानता है, यह उनके निष्कृष्टतम चिंतन और साम्राज्यवादी प्रेम का बदतरीन नमूना है। खैर, मोदी के आने के 36 घंटे के बाद ईरान पर अमेरिकी और इजरायली हमला हुआ। यह सब दुनिया के सामने है। हमले के 60 से ज्यादा दिन हो चुके हैं। मोदी सरकार की साम्राज्यवादपरस्त समर्पणकारी विदेश नीति के दुष्परिणाम भारत के घरेलू बाजार और नागरिकों के जीवन पर एक हफ्ते के अंदर ही पड़ने लगा है। सबसे पहले हमने सूरत के सेरेमिक इंडस्ट्री को बंद होते देखा।

रेलवे स्टेशनों पर प्रवासी मजदूरों की भीड़ दिखाई दी। जैसे ही सरकार ने चार श्रम कोड को 1 अप्रैल 2026 से लागू किया, मजदूरों का धैर्य जवाब दे गया। पूरी गृहस्थी कंधे पर उठाए दिल्ली के इर्द-गिर्द से लेकर गुजरात, पंजाब तक प्रवासी मजदूर रेलवे स्टेशन पर धक्के खाने लगे। अनेक ख़बरनवीस इसे कोरोना काल जैसे हालात का नाम देने लगे। प्रवासी मजदूरों का एक ही कथन था कि हम खाना पकाने की गैस खरीद पाने की स्थिति में नहीं है। हमारा पॉकेट जवाब दे रहा है। सरकार ने इसे विपक्ष के मत्थे मढ़ दिया और आरोप लगाते हुए कहा कि वह देश में पैनिक क्रिएट कर‌ रहा है। आत्मनिर्भर भारत का राग अलापने वाले रोने, गाने, नाचने लगे। महिलाओं के अधिकार की आड़ में भी वे अपना असली चेहरा छुपा नहीं सके। हमेशा की तरफ बिका हुआ मीडिया विपक्ष को कटघरे में खड़ा कर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो गया।

लेकिन पूंजी के मालिकान जानते हैं कि पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली और सभ्यता में सब कुछ ‘आना-पाई-कौड़ी’ से तय होता है। यही कारण है कि पांच राज्यों के चुनाव प्रचार के दौरान ढोल, नगाड़े, डमरू, त्रिशूल, फुटबॉल की गेंद उछालने के बाद मोदी अंत में कमर्शियल गैस सिलेंडर का दाम 30% बढ़ाकर आर्थिक संकट से उबरना चाहते हैं। लेकिन यह संकट तो बहुआयामी है। पिछले 12 वर्षों में भारत सरकार ने जितना निवेश राजनीति और खरीद-फरोख्त, दिखावा, प्रचार और धर्म उद्योग में किया है, उसने अंदर से भारत‌ को खोखला बना दिया है। मैन्युफैक्चरिंग उद्योग बैठ‌ गया और भारत उपभोक्ता आधारित अर्थव्यवस्था (कंज्यूमर इकोनॉमी) वाले देश में बदल गया है। यह खोखलापन ही है, जिसके कारण चार हजार किमी दूर चल रहे युद्ध की आग भारत के लिए गहरा संकट पैदा कर रही है। बची-खुची माली स्थिति अमेरिकी दबाव के समक्ष समर्पण के बाद तबाही की शिकार हो गई।

देश की अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति पर संक्षेप में नज़र डालें तो कई चिंताजनक संकेत दिखाई देते हैं। विदेशी पूंजी लगातार देश से बाहर जा रही है। वर्ष 2024-25 में लगभग 1.70 लाख करोड़ रुपये की विदेशी पूंजी निकली, जबकि 2025-26 में अब तक करीब 1.80 लाख करोड़ रुपये का विदेशी निवेश भारत छोड़ चुका है। इसका असर घरेलू उत्पादन और व्यापार संतुलन पर पड़ा है, जिससे व्यापार घाटा बढ़ा है। जो विदेशी निवेश देश में आ भी रहा है, उसका बड़ा हिस्सा उत्पादक क्षेत्रों में नहीं लग रहा। इसके विपरीत कई विदेशी कंपनियां भारत में अपना कारोबार समेट रही हैं। इसका परिणाम यह हुआ है कि भारत धीरे-धीरे उत्पादन आधारित अर्थव्यवस्था के बजाय उपभोक्ता समाज में बदलता जा रहा है और घरेलू उत्पादन लगातार घट रहा है। ऊर्जा संकट का असर भी विभिन्न उद्योगों पर दिखाई दे रहा है। सूरत का सिरेमिक और हीरा उद्योग, पानीपत, सोनीपत, मानेसर और गुरुग्राम का ऑटोमोबाइल सेक्टर, तथा दिल्ली-एनसीआर के छोटे कारोबार इससे प्रभावित हुए हैं।

2011-12 से 2024 के बीच लोगों की वास्तविक आय में लगभग 1.1 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। यह संकेत देता है कि कोरोना महामारी के बाद देश में गरीबी और आर्थिक असमानता बढ़ी है। सरकार की नीतियों, जैसे — नोटबंदी, जीएसटी और लंबे लॉकडाउन, ने बड़े पैमाने पर आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित किया। वहीं, निजीकरण को आर्थिक विकास का मुख्य आधार बनाए जाने से स्थायी वेतनभोगी कर्मचारियों की संख्या घटती गई और ठेका मजदूरों की संख्या बढ़ती गई। इससे ठेकेदारी आधारित एक बिचौलिया अर्थव्यवस्था विकसित हुई, जिसने व्यापक मजदूर वर्ग को आर्थिक रूप से और कमजोर किया।

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में देश में गिग वर्कर्स की संख्या में लगभग 55 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। वर्ष 2021-22 में गिग वर्कर्स की संख्या करीब 77 लाख थी, जो 2026 तक बढ़कर लगभग डेढ़ करोड़ हो चुकी है। यदि यही वृद्धि दर जारी रही, तो 2027 तक इनके दो करोड़ तक पहुंचने की संभावना जताई जा रही है। इन गिग वर्कर्स में बड़ी संख्या उच्च शिक्षित युवाओं की है, जो प्रत्यक्ष उत्पादन से जुड़े कार्यों में नहीं हैं। इससे स्पष्ट होता है कि मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र के कमजोर होने के कारण बड़ी संख्या में युवा मजबूरीवश इस तरह के अस्थायी और असुरक्षित रोजगार की ओर बढ़ रहे हैं। भारत में जो विदेशी निवेश आ रहा है, उसका बड़ा हिस्सा विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) क्षेत्र में न जाकर अन्य क्षेत्रों में लगाया जा रहा है।

रोजगार के सीमित अवसरों का असर युवाओं की मानसिक स्थिति पर भी दिखाई दे रहा है। 18 से 34 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 60 प्रतिशत युवा मानसिक तनाव का सामना कर रहे हैं। दिल्ली-एनसीआर और हरियाणा में मजदूरी बढ़ाने की मांग को लेकर चले आंदोलनों ने इस गंभीर स्थिति को उजागर किया है। महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और भोजन पर बढ़ते खर्च को देखते हुए साफ कहा जा सकता है कि वास्तविक मजदूरी में गिरावट आई है, जिसका सीधा असर लोगों की जीवन स्थितियों पर पड़ रहा है।

उदारीकरण के बाद भी लगभग दस वर्ष पहले तक फैक्ट्रियों और औपचारिक क्षेत्र (फॉर्मल सेक्टर) में सामान्यतः करीब 20 प्रतिशत कर्मचारी ठेका मजदूर होते थे। अब यह संख्या बढ़कर लगभग 41 प्रतिशत तक पहुंच गई है। यानी जिन उद्योगों में पहले लगभग 80 प्रतिशत स्थायी कर्मचारी हुआ करते थे, वहां अब उनकी हिस्सेदारी घटकर करीब 60 प्रतिशत रह गई है। स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर आउटसोर्सिंग के नाम पर संविदा और मानदेय आधारित नियुक्तियां की जा रही हैं। डॉक्टर, प्रोफेसर और इंजीनियर जैसे पेशेवर भी अब स्थायी रोजगार के बजाय फिक्स्ड सैलरी और निश्चित अवधि के अनुबंधों पर नियुक्त किए जा रहे हैं। इससे साफ संकेत मिलता है कि मध्यवर्ग की आर्थिक ताकत कमजोर हो रही है और उसका दायरा लगातार सिमटता जा रहा है।

मजदूर आंदोलन का वर्तमान उभार वस्तुतः उदारीकरण के बाद बनी वैश्विक अर्थव्यवस्था की एक कड़ी के संकटग्रस्त होने के साथ शुरू हुआ है। मोदी सरकार के आने के बाद जिस तरह से मित्र पूंजीवाद और कॉरपोरेट घरानों के पक्ष में नीतियां बनाई गईं, उससे लगा कि भारत 18वीं सदी के बर्बर पूंजीवाद के दौर की ओर वापस लौट रहा है। आर्थिक नीतियों ने मजदूर वर्ग के जीवन को ही विखंडित नहीं किया, बल्कि उनके संगठित प्रतिरोध को भी कमजोर बना दिया। ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमले के बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए फारस की खाड़ी से तेल, गैस और क्रूड ऑयल की सप्लाई रोक दी, तो दुनिया हिलने लगी। साम्राज्यवादी अर्थव्यवस्था का संकट गहराने और उसकी श्रृंखला की एक कड़ी के कमजोर होते ही पूरा वैश्विक आर्थिक ढांचा लड़खड़ाने लगा, जिसका तीव्र असर भारत में महसूस किया गया। भारतीय उपमहाद्वीप में इसका सबसे गहरा प्रभाव भारत पर पड़ा। इसके कारण की तलाश मोदी सरकार की अमेरिकी-इजरायलीपरस्ती में की जानी चाहिए। पुराने मित्र ईरान का साथ छोड़कर युद्ध के 48 घंटे पहले जिस तरह से मोदी ने इजरायल के समक्ष आत्मसमर्पण किया, उसने पलटवार कर दिया है।

आज भारत को अमेरिका, वेनेजुएला जैसे देशों से डेढ़ गुना ज्यादा कीमत पर पेट्रोलियम पदार्थों का आयात करना पड़ रहा है। कारण यह है कि ईरान की नजर में भारत की विश्वसनीयता खत्म हो चुकी है। एविएशन उद्योग संकट में है और कई हवाई कंपनियां अपना कारोबार समेटने लगी हैं। भारत सरकार को एलपीजी और पेट्रोलियम पदार्थों की सप्लाई की राशनिंग करनी पड़ सकती है। आने वाले समय में कृषि सीजन शुरू होगा। किसानों को खाद की किल्लत से जूझना पड़ेगा, जिससे निश्चित रूप से कृषि उत्पादकता प्रभावित होगी। भारत का 40 प्रतिशत पेट्रोलियम उत्पाद और रसोई गैस फारस की खाड़ी के देशों से आती रही है। इसी से फर्टिलाइजर तैयार होते थे, घरों के चूल्हे जलते थे और अन्य जरूरी वस्तुएं बनती थीं। लेकिन मोदी सरकार की अमेरिका और इजरायलपरस्ती वाली आत्मघाती नीतियों ने देश को एक नए संकट के दरवाजे पर ला खड़ा किया है।

मजदूरों पर चल रहे फासिस्ट दमन के खिलाफ जिस तरह छात्र, गांधीवादी, सामाजिक कार्यकर्ता, वकील, मानवाधिकार के क्षेत्र में काम करने वाले लोग, ट्रेड यूनियनें और 300 से ज्यादा वाम-जनवादी लेखक, पत्रकार तथा अकादमिक एकजुट हुए हैं, वह लोकतंत्र, न्याय तथा रोजी-रोटी और सम्मानजनक जीवन की लड़ाई को नई शक्ति प्रदान करेगा। भारत में चल रहा यह महान संक्रमण काल स्वतंत्रता आंदोलन के 1930-40 के दशक की तरह एक नए भविष्य का संकेत देता दिखाई दे रहा है। शायद इसी को इतिहास का दोहराव कहते हैं।

ताज न्यूज़ का विशेष संपादकीय विश्लेषण: कूटनीतिक चूक और ‘ठेकाकरण’ के दोहरे पाश में फंसा भारत

जयप्रकाश नारायण जी का यह आलेख भारतीय अर्थव्यवस्था और विदेश नीति के उस डरावने गठजोड़ का पर्दाफाश करता है, जिस पर मुख्यधारा का मीडिया अक्सर खामोशी ओढ़े रहता है। आज भारत जिस आर्थिक संकट (Economic Crisis) के मुहाने पर खड़ा है, वह रातों-रात पैदा नहीं हुआ है। जब विदेश नीति (Foreign Policy) का संचालन राष्ट्रीय हितों के बजाय ‘इवेंट मैनेजमेंट’ और ‘साम्राज्यवादी ताकतों’ को खुश करने के लिए किया जाने लगता है, तो उसका सीधा असर देश के भीतर रसोई गैस और पेट्रोल के दामों पर पड़ता है। ईरान, जो कभी भारत का भरोसेमंद तेल और प्राकृतिक गैस आपूर्तिकर्ता था, उसे अमेरिकी दबाव में नज़रअंदाज़ करने की कीमत आज भारत का आम नागरिक चुका रहा है। 55 रुपये का क्रूड ऑयल जब 125 रुपये में भारतीय बंदरगाहों पर पहुंचता है, तो इसकी भरपाई ‘कमर्शियल सिलेंडर’ के दामों में 30% की वृद्धि करके की जाती है। यह कूटनीतिक विफलता का आर्थिक दंड है जिसे जनता भुगत रही है।

मैन्युफैक्चरिंग का पतन और ‘गिग इकॉनमी’ का भ्रम:
आलेख में जो दूसरा सबसे बड़ा मुद्दा उठाया गया है, वह है भारत का ‘उत्पादन आधारित अर्थव्यवस्था’ (Manufacturing Economy) से ‘उपभोक्ता समाज’ (Consumer Society) में तब्दील होना। मेक इन इंडिया (Make in India) के तमाम दावों के बीच यह एक कड़वा सच है कि देश में स्थायी नौकरियां खत्म हो रही हैं। जब 41% से अधिक कार्यबल ठेकेदारी (Contractual) व्यवस्था में धकेल दिया जाए, तो युवाओं के पास स्विगी (Swiggy), ज़ोमैटो (Zomato) और ओला (Ola) जैसे प्लेटफॉर्म्स पर ‘गिग वर्कर’ (Gig Worker) बनने के अलावा कोई चारा नहीं बचता। 1.5 करोड़ गिग वर्कर्स की फौज कोई ‘रोजगार क्रांति’ नहीं है, बल्कि यह बेरोजगारी की वह विवशता है जहाँ उच्च शिक्षित युवा भी बिना किसी सामाजिक सुरक्षा (Social Security) और पेंशन के 12-12 घंटे काम करने को मजबूर हैं। यह एक ‘बिचौलिया अर्थव्यवस्था’ है जो केवल पूंजीपतियों की तिजोरियां भर रही है।

संघर्ष की राह और वाम-जनवादी शक्तियों का उभार:
लेखक ने बहुत ही सटीकता से रेखांकित किया है कि जब राज्य की नीतियां कॉरपोरेट फासीवाद (Corporate Fascism) का रूप ले लेती हैं, तो जनता के पास संघर्ष के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। नई शिक्षा नीति के तहत मेडिकल और इंजीनियरिंग की 50% सीटों को खुले बाज़ार में बेचना, अग्निवीर जैसी ठेका-आधारित सेना भर्ती, और श्रम कानूनों (Labour Codes) को कॉरपोरेट्स के पक्ष में मोड़ना—ये सभी कदम आम मध्यवर्गीय और गरीब परिवारों को विकास की मुख्यधारा से बाहर कर रहे हैं। ‘ताज न्यूज़’ का यह स्पष्ट मानना है कि अगर विदेशी पूंजी लगातार देश से पलायन कर रही है और सूरत से लेकर दिल्ली-एनसीआर तक के उद्योग दम तोड़ रहे हैं, तो सरकार को अपने ‘अंध-राष्ट्रवाद’ के चश्मे को उतारकर यथार्थवादी नीतियां अपनानी होंगी। लोकतंत्र की रक्षा अब सड़कों पर लड़ रहे उन मजदूरों, किसानों और छात्रों के हाथों में है, जो इस ‘एकाधिकार पूंजीवाद’ के खिलाफ एक नई इबारत लिख रहे हैं।

Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News

खबर शेयर कीजिए

Leave a Comment