Article Desk, 🌐 tajnews.in | Sunday, 16 August, 2026, 07:45:00 PM IST.


दहेज प्रथा: पारिवारिक त्रासदी और सामाजिक कलंक
डॉ प्रमोद कुमार
प्रमुख अंश (Highlights):
- विवाह का बाजारीकरण: आधुनिकता व शिक्षा के प्रसार के बावजूद दहेज ने विवाह जैसी पवित्र संस्था को आर्थिक सौदेबाजी और सामाजिक प्रदर्शन का माध्यम बना दिया है।
- पारिवारिक व मानवीय त्रासदी: कन्या के जन्म से लेकर विवाह के बाद तक चलने वाली प्रताड़ना, कर्ज का बोझ और घरेलू हिंसा सामाजिक संवेदनहीनता का कड़वा सच है।
- युवाओं की निर्णायक भूमिका: कानून के साथ-साथ जब तक युवक ‘दहेज न लेने’ और युवतियां ‘दहेज लोभियों को ठुकराने’ का संकल्प नहीं लेंगी, तब तक वास्तविक बदलाव संभव नहीं।
- सशक्तीकरण ही समाधान: बेटी को विवाह में महंगे उपहार देने के बजाय उसकी उच्च शिक्षा, आत्मनिर्भरता, स्वावलंबन और सम्मान में निवेश करना ही असली सुरक्षा है।
भारतवर्ष विभिन्न प्रकार की सामाजिक मान्यताओं को मानने वाला एक विशाल महाद्वीप के रूप में विद्यमान है। भारतीय समाज ने समय के साथ अनेक परिवर्तन देखे हैं। विज्ञान और तकनीक ने जीवन को सुविधाजनक बनाया है, शिक्षा ने चेतना का विस्तार किया है, लोकतांत्रिक मूल्यों ने समानता और स्वतंत्रता की अवधारणा को मजबूत किया है और महिलाओं ने जीवन के लगभग प्रत्येक क्षेत्र में अपनी क्षमता का प्रमाण प्रस्तुत किया है। इसके बावजूद कुछ सामाजिक कुरीतियाँ ऐसी हैं, जो आधुनिकता के चमकते आवरण के पीछे आज भी मजबूती से जीवित हैं। दहेज प्रथा ऐसी ही एक कुप्रथा है। यह केवल विवाह के समय धन, वस्तु या संपत्ति के लेन-देन की समस्या नहीं है, बल्कि यह उस मानसिकता का प्रतिबिंब है जिसमें बेटी को मनुष्य के रूप में नहीं, बल्कि आर्थिक दायित्व के रूप में देखा जाता है। दहेज ने विवाह जैसी पवित्र सामाजिक संस्था को कई बार बाजार में बदल दिया है, जहाँ वर की शिक्षा, नौकरी, पद, प्रतिष्ठा और आर्थिक स्थिति के आधार पर उसकी कीमत निर्धारित की जाती है और वधू-पक्ष से उस कीमत की वसूली की जाती है। यही कारण है कि दहेज प्रथा को केवल सामाजिक बुराई कहना पर्याप्त नहीं है; यह स्त्री की गरिमा, पारिवारिक सम्मान, आर्थिक न्याय और मानवीय संवेदनशीलता के विरुद्ध खड़ी एक गंभीर सामाजिक त्रासदी है। विधिक सच को अब और दबाया नहीं जा सकता और इस सामाजिक कुरीति के खिलाफ सामूहिक चेतना जगाना अनिवार्य है। सच से आंखें चुराना अब पूरी तरह बंद होना चाहिए।
दहेज की समस्या का सबसे दुखद पक्ष यह है कि यह समाज के लगभग सभी वर्गों और विभिन्न आर्थिक स्तरों में किसी न किसी रूप में दिखाई देती है। अक्सर यह मान लिया जाता है कि दहेज केवल अशिक्षित या पिछड़े परिवारों की समस्या है, जबकि वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल है। उच्च शिक्षित परिवारों में भी विवाह के अवसर पर कार, मकान, नकद राशि, आभूषण, महंगे उपकरण, व्यवसाय में निवेश अथवा अन्य सुविधाओं की अपेक्षा की जाती है। अंतर केवल इतना होता है कि शिक्षित और संपन्न वर्ग कई बार इसे ‘दहेज’ न कहकर ‘उपहार’, ‘बेटी को दिया गया सामान’, ‘सामाजिक प्रतिष्ठा’ या ‘विवाह की परंपरा’ जैसे आकर्षक शब्दों के पीछे छिपा देता है। शब्द बदल जाने से मानसिकता नहीं बदलती। यदि किसी वस्तु या धन की मांग विवाह की अनिवार्य शर्त के रूप में की जा रही है, तो उसे किसी भी नाम से पुकारा जाए, उसका मूल चरित्र दहेज का ही है।
दहेज प्रथा की जड़ें केवल विवाह की व्यवस्था में नहीं, बल्कि उस पितृसत्तात्मक सोच में हैं जिसमें पुत्र को परिवार की संपत्ति का उत्तराधिकारी और पुत्री को दूसरे घर की सदस्य माना जाता है। जब बेटी को बचपन से यह बताया जाता है कि वह ‘पराया धन’ है और उसके विवाह में परिवार को बड़ी आर्थिक जिम्मेदारी निभानी होगी, तभी दहेज की मानसिकता का बीजारोपण हो जाता है। दूसरी ओर पुत्र को परिवार का सहारा, वंश का वाहक और आर्थिक सुरक्षा का साधन मानने से उसकी ‘बाजार कीमत’ निर्धारित करने की प्रवृत्ति जन्म लेती है। फलतः विवाह दो व्यक्तियों के बीच समान साझेदारी का संबंध न रहकर कई बार आर्थिक सौदे में बदल जाता है। विडंबना यह है कि जिस बेटी को माता-पिता प्रेम, संस्कार और शिक्षा देकर बड़ा करते हैं, उसी बेटी के विवाह के समय उनकी आर्थिक क्षमता को सामाजिक प्रतिष्ठा की कसौटी पर परखा जाता है। बारात में कितनी गाड़ियाँ आईं, कितना सोना दिया गया, विवाह स्थल कितना भव्य था, वर को क्या दिया गया और लड़की के परिवार ने कितनी ‘इज्जत रखी’—इन प्रश्नों ने विवाह को सामाजिक प्रदर्शन का माध्यम बना दिया है। समाज की यह प्रतिस्पर्धी मानसिकता दहेज की मांग को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा देती है। कई परिवार अपनी आर्थिक क्षमता से अधिक खर्च केवल इसलिए करते हैं कि समाज में उनकी प्रतिष्ठा बनी रहे। परिणामस्वरूप वे वर्षों तक कर्ज के बोझ तले दबे रहते हैं।
दहेज का सबसे क्रूर रूप तब सामने आता है जब विवाह के बाद अपेक्षाएँ पूरी न होने पर महिला को मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना दी जाती है। ताने, अपमान, मारपीट, आर्थिक नियंत्रण, मायके से पैसे लाने का दबाव, सामाजिक अलगाव और लगातार मानसिक उत्पीड़न उसके जीवन को यातना में बदल देते हैं। कभी-कभी यह हिंसा इतनी बढ़ जाती है कि महिला को आत्महत्या करने के लिए मजबूर होना पड़ता है अथवा उसकी हत्या तक कर दी जाती है। ऐसी घटनाओं को केवल ‘पारिवारिक विवाद’ कहकर टाल देना सामाजिक संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है। जहाँ किसी महिला को दहेज की मांग पूरी न होने के कारण प्रताड़ित किया जाता है, वहाँ वास्तव में पूरा समाज अपराधी मानसिकता के सामने खड़ा दिखाई देता है।दहेज की त्रासदी का एक पक्ष वह भी है जो विवाह से बहुत पहले शुरू हो जाता है। अनेक परिवार बेटी के जन्म को आर्थिक चिंता के साथ जोड़ते हैं। बेटी के जन्म पर खुशी के बजाय भविष्य के विवाह और दहेज की चिंता करने वाली मानसिकता कन्या के प्रति भेदभाव को जन्म देती है। यही मानसिकता कभी-कभी कन्या भ्रूण हत्या जैसी गंभीर सामाजिक समस्या को भी अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा देती है। जब बेटी को परिवार की ‘जिम्मेदारी’ और बेटा ‘निवेश’ समझा जाएगा, तब लैंगिक समानता का वास्तविक सपना कैसे पूरा हो सकता है? इसलिए दहेज विरोधी संघर्ष को केवल विवाह के समय होने वाले लेन-देन तक सीमित करना समस्या की जड़ को नजरअंदाज करना है।
दहेज के कारण परिवारों पर पड़ने वाला आर्थिक दबाव भी गंभीर है। निम्न और मध्यम आय वर्ग के अनेक परिवार अपनी जीवनभर की बचत विवाह में खर्च कर देते हैं। कई बार माता-पिता कर्ज लेते हैं, जमीन बेचते हैं, संपत्ति गिरवी रखते हैं या वर्षों तक ऋण चुकाते रहते हैं। यह स्थिति विशेष रूप से उन परिवारों के लिए विनाशकारी है जिनकी आर्थिक स्थिति पहले से कमजोर है। विडंबना यह है कि जिस विवाह को दो परिवारों के बीच सुख और सहयोग का संबंध बनना चाहिए, वही विवाह एक परिवार को आर्थिक रूप से कमजोर और दूसरे को अनुचित लाभ का अधिकार देने वाली व्यवस्था में बदल जाता है। लेकिन दहेज की समस्या के लिए केवल वर-पक्ष को दोषी ठहराकर हम अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकते। समाज का एक हिस्सा ऐसा भी है जो दिखावे, प्रतिस्पर्धा और सामाजिक प्रतिष्ठा की भावना से दहेज देने को तैयार रहता है। कई माता-पिता स्वयं कहते हैं कि ‘हम अपनी बेटी को खाली हाथ नहीं भेजेंगे।’ बेटी को प्रेम और सुरक्षा देने में कोई समस्या नहीं है, लेकिन जब उपहार सामाजिक दबाव, प्रतिष्ठा या वर-पक्ष की अपेक्षा पूरी करने का माध्यम बन जाए, तब वह परंपरा नहीं, बल्कि कुप्रथा का हिस्सा बन जाता है। इसलिए दहेज के खिलाफ लड़ाई में देने और लेने दोनों पक्षों की मानसिकता को बदलना आवश्यक है।
यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण है कि शिक्षित समाज में दहेज क्यों समाप्त नहीं हो रहा? इसका उत्तर शिक्षा की प्रकृति में छिपा है। केवल डिग्री प्राप्त कर लेना शिक्षा नहीं है। वास्तविक शिक्षा मनुष्य के विचारों, व्यवहार और मूल्यों में परिवर्तन लाती है। यदि कोई व्यक्ति उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी विवाह में लाखों रुपये, महंगी कार या संपत्ति की मांग करता है, तो उसकी डिग्री उसके ज्ञान का प्रमाण हो सकती है, उसके संस्कार का नहीं। समाज को यह समझना होगा कि शिक्षा का मूल्य केवल रोजगार प्राप्त करने में नहीं, बल्कि न्याय, समानता, संवेदना और नैतिक जिम्मेदारी को जीवन में उतारने में है। दहेज प्रथा को समाप्त करने के लिए कानून की आवश्यकता निश्चित रूप से है और भारत में दहेज निषेध से संबंधित कानूनी प्रावधान मौजूद हैं। घरेलू हिंसा और दहेज संबंधी उत्पीड़न के मामलों में भी कानूनी संरक्षण उपलब्ध है। लेकिन कानून तभी प्रभावी हो सकता है जब समाज उसे गंभीरता से स्वीकार करे। कानून अपराध होने के बाद कार्रवाई कर सकता है; वह हर परिवार की मानसिकता को स्वयं नहीं बदल सकता। इसलिए कानूनी व्यवस्था के साथ सामाजिक चेतना, नैतिक शिक्षा, महिला सशक्तीकरण और सामुदायिक सहभागिता आवश्यक है। दहेज के विरुद्ध संघर्ष अदालतों से अधिक परिवारों के भीतर और सामाजिक सोच के स्तर पर लड़ा जाना चाहिए।
इस संदर्भ में युवाओं की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। विवाह योग्य युवा यदि स्वयं यह निर्णय लें कि वे दहेज नहीं लेंगे और न ही अपने परिवार को लेने देंगे, तो दहेज की व्यवस्था को सबसे बड़ा झटका लग सकता है। किसी युवक की वास्तविक योग्यता उसकी नौकरी, वेतन या पद से नहीं, बल्कि उसके चरित्र और जीवनसाथी के प्रति सम्मान से निर्धारित होनी चाहिए। जिस युवक को अपने विवाह के लिए दहेज की आवश्यकता है, वह वास्तव में अपनी योग्यता का मूल्य स्वयं कम कर रहा है। इसी प्रकार युवतियों को भी यह अधिकार और आत्मविश्वास विकसित करना होगा कि वे दहेज मांगने वाले परिवार से विवाह करने से इंकार कर सकें। विवाह जीवन का लक्ष्य नहीं, जीवन की साझेदारी है; इसलिए विवाह के नाम पर आत्मसम्मान का समझौता नहीं किया जाना चाहिए। माता-पिता को भी अपनी सोच बदलनी होगी। बेटी की शादी में अत्यधिक धन खर्च करने के बजाय उसकी शिक्षा, कौशल, आत्मनिर्भरता और निर्णय क्षमता में निवेश करना कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। बेटी को महंगे सामान देने की अपेक्षा उसे आर्थिक रूप से सक्षम बनाना उसके भविष्य की वास्तविक सुरक्षा है। यदि बेटी शिक्षित, आत्मनिर्भर और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक है, तो वह किसी भी प्रकार के शोषण के विरुद्ध अधिक मजबूती से खड़ी हो सकती है। समाज को यह समझना होगा कि बेटी को दहेज नहीं, समान अवसर चाहिए।
मीडिया और मनोरंजन उद्योग की भूमिका भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। फिल्मों, धारावाहिकों, विज्ञापनों और सोशल मीडिया में विवाह को अत्यधिक खर्च, दिखावे और उपभोग से जोड़ने वाली संस्कृति ने सामाजिक अपेक्षाओं को प्रभावित किया है। विवाह जितना महंगा और भव्य होगा, परिवार उतना ही प्रतिष्ठित माना जाएगा—यह धारणा दहेज मानसिकता को अप्रत्यक्ष रूप से पोषित करती है। मीडिया को विवाह की वास्तविक सुंदरता—समानता, साझेदारी, प्रेम, सम्मान और जिम्मेदारी—को अधिक प्रमुखता देनी चाहिए। सोशल मीडिया पर भी ‘दिखावे की शादी’ की प्रतिस्पर्धा को सामाजिक सफलता का प्रतीक मानने के बजाय सादगी और समानता को सम्मान मिलना चाहिए। धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। विवाह सामाजिक और सांस्कृतिक संस्था है, इसलिए धार्मिक नेताओं, सामाजिक संगठनों, पंचायतों, शैक्षणिक संस्थानों और नागरिक समूहों को सामूहिक रूप से दहेज-विरोधी अभियान चलाने चाहिए। विवाह समारोहों में दहेज न लेने वाले परिवारों को सम्मानित करना, सामूहिक विवाह को प्रोत्साहित करना, सादगीपूर्ण विवाह को सामाजिक प्रतिष्ठा देना और दहेज मांगने वाले परिवारों का सामाजिक बहिष्कार जैसे उपाय प्रभावी हो सकते हैं। हालांकि सामाजिक बहिष्कार का अर्थ किसी व्यक्ति के मूल अधिकारों का हनन नहीं होना चाहिए; उद्देश्य केवल ऐसी मानसिकता को सामाजिक स्वीकृति से वंचित करना होना चाहिए।
शैक्षणिक संस्थानों में भी दहेज विरोधी चेतना को केवल किसी एक दिवस के कार्यक्रम तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। विद्यार्थियों के बीच संवाद, वाद-विवाद, निबंध प्रतियोगिता, नाटक, पोस्टर अभियान, कानूनी जागरूकता कार्यक्रम और लैंगिक समानता पर कार्यशालाएँ आयोजित की जानी चाहिए। युवाओं को यह समझाना आवश्यक है कि सामाजिक परिवर्तन केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। प्रत्येक नागरिक अपने निजी निर्णयों के माध्यम से समाज को बदल सकता है। यदि हजारों युवा दहेज रहित विवाह का संकल्प लेते हैं, तो यह किसी भी सरकारी अभियान से अधिक शक्तिशाली सामाजिक संदेश हो सकता है।दहेज प्रथा के विरुद्ध संघर्ष को महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण से भी जोड़ना होगा। आर्थिक रूप से निर्भर महिला के लिए हिंसक या शोषणकारी वैवाहिक संबंध से बाहर निकलना कठिन हो सकता है। रोजगार, कौशल विकास, संपत्ति और उत्तराधिकार के अधिकार, वित्तीय साक्षरता तथा उद्यमिता के अवसर महिलाओं को अधिक स्वतंत्र बनाते हैं। आर्थिक आत्मनिर्भरता दहेज प्रथा का प्रत्यक्ष समाधान नहीं है, लेकिन यह महिला को शोषण के विरुद्ध मजबूत आधार अवश्य प्रदान करती है।
यह भी आवश्यक है कि हम विवाह को सामाजिक प्रतिष्ठा की प्रतियोगिता बनाने से रोकें। विवाह में खर्च की बढ़ती होड़ ने दहेज के साथ-साथ अनेक अन्य सामाजिक समस्याओं को जन्म दिया है। जब परिवार लाखों रुपये केवल यह दिखाने के लिए खर्च करता है कि उसने समाज में अपनी प्रतिष्ठा बनाए रखी, तब वास्तव में वह उस सामाजिक दबाव को मजबूत कर रहा होता है जो आने वाली पीढ़ियों को भी इसी चक्र में फँसाएगा। सादगीपूर्ण विवाह को पिछड़ेपन का प्रतीक नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी और आर्थिक विवेक का प्रतीक माना जाना चाहिए। दहेज प्रथा का सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि समाज एक ओर देवी के रूप में स्त्री की पूजा करता है और दूसरी ओर उसी स्त्री के विवाह के समय उसकी कीमत तय करता है। एक ओर हम महिला सशक्तीकरण, महिला सम्मान और समानता की बातें करते हैं, दूसरी ओर विवाह के बाजार में लड़की के परिवार से आर्थिक सौदेबाजी करते हैं। यह विरोधाभास समाप्त किए बिना महिला सम्मान की कोई भी बात अधूरी है। स्त्री सम्मान पूजा, भाषण या प्रतीकात्मक कार्यक्रमों से नहीं, बल्कि उसके अधिकारों और निर्णयों के वास्तविक सम्मान से सुनिश्चित होगा।
आज आवश्यकता इस बात की है कि दहेज विरोधी आंदोलन को केवल कानून और सरकारी योजनाओं का विषय न मानकर सामाजिक नैतिकता का प्रश्न बनाया जाए। हर परिवार को स्वयं से पूछना चाहिए कि क्या वह अपनी बेटी की शिक्षा और आत्मनिर्भरता को विवाह में दिए जाने वाले सामान से अधिक महत्वपूर्ण मानता है? हर युवक को स्वयं से पूछना चाहिए कि क्या उसकी योग्यता इतनी कम है कि उसे विवाह के बदले धन और वस्तुओं की आवश्यकता है? हर माता-पिता को विचार करना चाहिए कि क्या वे अपनी बेटी को आर्थिक बोझ समझकर उसका भविष्य तय कर रहे हैं? और हर नागरिक को यह तय करना चाहिए कि क्या वह दहेज को सामाजिक प्रतिष्ठा का हिस्सा मानता रहेगा या इसके विरुद्ध खड़ा होगा। दहेज प्रथा का अंत केवल कानून से नहीं होगा; इसके लिए मानसिक क्रांति आवश्यक है। जब बेटा यह कहेगा कि उसे दहेज नहीं चाहिए, जब माता-पिता बेटे की ‘बोली’ लगाने से इंकार करेंगे, जब बेटी दहेज मांगने वाले परिवार को अस्वीकार करने का साहस करेगी, जब समाज सादगीपूर्ण विवाह को सम्मान देगा, जब शिक्षा चरित्र और समानता की चेतना पैदा करेगी और जब विवाह आर्थिक लेन-देन के बजाय समान साझेदारी का संबंध बनेगा, तभी वास्तविक परिवर्तन संभव होगा।
अंततः दहेज केवल एक सामाजिक कुरीति नहीं, बल्कि हमारे सामूहिक चरित्र की परीक्षा है। यह प्रश्न किसी एक परिवार, एक जाति, एक वर्ग या एक समुदाय का नहीं है; यह पूरे समाज की मानसिकता से जुड़ा प्रश्न है। दहेज के कारण किसी बेटी की आँखों में भय, किसी पिता के कंधे पर कर्ज, किसी माँ के हृदय में चिंता और किसी नवविवाहिता के जीवन में हिंसा दिखाई देती है, तो यह केवल एक परिवार की विफलता नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक चेतना की विफलता है। जिस समाज में बेटी को सम्मानपूर्वक जन्म लेने, शिक्षा प्राप्त करने, अपने जीवनसाथी का चुनाव करने और गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार है, वही समाज वास्तव में सभ्य कहलाने का अधिकारी है। इसलिए दहेज के विरुद्ध संघर्ष किसी एक दिन का अभियान नहीं, बल्कि सामाजिक पुनर्निर्माण का सतत प्रयास होना चाहिए। हमें यह संकल्प लेना होगा कि बेटी विवाह में कोई आर्थिक सौदा नहीं, बल्कि समान अधिकारों वाली मनुष्य है; वर कोई बिकाऊ वस्तु नहीं, बल्कि जिम्मेदार जीवनसाथी है; और विवाह कोई बाजार नहीं, बल्कि दो स्वतंत्र व्यक्तियों की समान साझेदारी है। जिस दिन यह विचार भारतीय समाज की सामान्य चेतना का हिस्सा बन जाएगा, उस दिन दहेज प्रथा का अंत केवल कानून की किताब में नहीं, बल्कि सामाजिक जीवन की वास्तविकता में दिखाई देगा।
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Thakur Pawan Singh
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