Uttar Pradesh Desk, tajnews.in | Friday, April 10, 2026, 05:40:30 PM IST

उरई: विकास और निर्माण के नाम पर चल रही सरकारी और गैर-सरकारी परियोजनाओं में लापरवाही किस कदर इंसानी जानों पर भारी पड़ सकती है, इसका एक जीता-जागता और खौफनाक उदाहरण शुक्रवार को उत्तर प्रदेश के उरई में देखने को मिला। जालौन जिले के कुठौंद थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले शंकरपुर इलाके में, जहां यमुना नदी का पुल औरैया जिले की सीमा को जोड़ता है, वहां एक विशालकाय और निर्माणाधीन प्रवेश द्वार अचानक ताश के पत्तों की तरह भरभराकर नीचे आ गिरा। इस दिल दहला देने वाले हादसे के वक्त वहां कई मजदूर काम कर रहे थे। भारी-भरकम कंक्रीट, लोहे के गर्डर और शटरिंग के इस मलबे के नीचे पांच गरीब मजदूर बुरी तरह से दब गए। अचानक हुए इस हादसे से मौके पर चीख-पुकार और भयंकर अफरातफरी मच गई। स्थानीय लोगों और पुलिस की कड़ी मशक्कत के बाद सभी पांच मजदूरों को मलबे से बाहर निकालकर अस्पताल पहुंचाया गया है, जिनमें से दो की हालत बेहद नाजुक बनी हुई है। इस घटना ने एक बार फिर निर्माण कार्यों में इस्तेमाल हो रही घटिया सामग्री और इंजीनियरिंग की घोर अनदेखी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
यमुना पुल के पास खौफनाक मंजर: जब मौत बनकर गिरा कंक्रीट का ढांचा
जालौन जिले का उरई क्षेत्र और औरैया जिले को जोड़ने वाला यह यमुना पुल यातायात और व्यापारिक दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी सीमा को एक भव्य स्वरूप देने के लिए शंकरपुर के पास एक विशाल प्रवेश द्वार (Entry Gate) का निर्माण कार्य पिछले कई दिनों से जोरों पर चल रहा था। शुक्रवार की दोपहर जब सूरज सिर पर था और मजदूर अपनी रोजमर्रा की दिहाड़ी कमाने के लिए पसीना बहा रहे थे, तभी यह दर्दनाक हादसा हो गया। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, निर्माण कार्य अपने अंतिम चरणों की तरफ था और ढांचे की ढलाई या ऊपरी हिस्से को सेट करने का काम चल रहा था।
अचानक ढांचे से चरमराने की तेज आवाजें आने लगीं। इससे पहले कि ऊपर और नीचे काम कर रहे मजदूर कुछ समझ पाते या अपनी जान बचाकर वहां से भाग पाते, पूरा का पूरा सपोर्ट सिस्टम जवाब दे गया। एक कानफाड़ू आवाज के साथ वह विशालकाय निर्माणाधीन गेट भरभराकर जमीन पर आ गिरा। कंक्रीट, लोहे के सरिये और लकड़ी की बल्लियों का एक बड़ा पहाड़ सड़क पर बिखर गया और वहां काम कर रहे पांच मजदूर सीधे इस भारी-भरकम मलबे के नीचे दब गए। इस भयानक आवाज को सुनकर आसपास से गुजर रहे राहगीर और स्थानीय ग्रामीण मौके की तरफ दौड़ पड़े। वहां का नजारा देखकर हर किसी की रूह कांप गई, क्योंकि मलबे के नीचे से मजदूरों के कराहने और मदद की गुहार लगाने की आवाजें आ रही थीं।
चीख-पुकार और रेस्क्यू ऑपरेशन: ग्रामीणों ने हाथों से हटाया मलबा
मलबे के नीचे जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे उन गरीब मजदूरों को बचाने के लिए स्थानीय लोगों ने पुलिस या प्रशासन के पहुंचने का इंतजार नहीं किया। ग्रामीणों और वहां से गुजर रहे वाहन चालकों ने तुरंत अपनी गाड़ियों से उतरकर अपने खाली हाथों और पास पड़े औजारों से मलबा हटाना शुरू कर दिया। किसी ने पुलिस कंट्रोल रूम को सूचना दी, तो किसी ने पास के अस्पताल में एंबुलेंस के लिए फोन घुमाया। कुछ ही देर में कुठौंद थाने की पुलिस फोर्स भी सायरन बजाती हुई घटनास्थल पर पहुंच गई और रेस्क्यू ऑपरेशन में तेजी ला दी गई।
करीब आधे घंटे की कड़ी और सांस रोक देने वाली मशक्कत के बाद, एक-एक करके सभी पांचों मजदूरों को उस कंक्रीट के जाल से बाहर निकाला गया। सभी मजदूर खून से लथपथ थे और बुरी तरह से घायल अवस्था में थे। उन्हें तुरंत मौके पर पहुंची एंबुलेंस के जरिए नजदीकी सरकारी अस्पताल ले जाया गया। अस्पताल में मौजूद डॉक्टरों की टीम ने तुरंत घायलों का प्राथमिक उपचार शुरू किया। मुख्य चिकित्सा अधिकारी के अनुसार, मलबे से निकाले गए पांच मजदूरों में से तीन को गंभीर चोटें आई हैं, लेकिन वे खतरे से बाहर हैं। हालांकि, अन्य दो मजदूरों की हालत बेहद नाजुक (Critical) बनी हुई है। उनके सिर और सीने पर भारी चोटें आई हैं, जिसके चलते उन्हें बेहतर और विशेष इलाज के लिए हायर सेंटर या मेडिकल कॉलेज रेफर करने की तैयारी की जा रही है।
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निर्माण में भ्रष्टाचार और इंजीनियरिंग की घोर विफलता का जीता-जागता सबूत
किसी भी विशाल ढांचे का इस तरह से गिर जाना कोई प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि एक मानव निर्मित त्रासदी और सिस्टम के भ्रष्टाचार का परिणाम होता है। प्रारंभिक जांच और मौके पर मौजूद तकनीकी विशेषज्ञों की मानें तो इस हादसे के पीछे निर्माण कंपनी और ठेकेदार की एक बहुत बड़ी और आपराधिक लापरवाही सामने आ रही है। बताया जा रहा है कि प्रवेश द्वार के इतने बड़े और भारी स्ट्रक्चर को खड़ा करने के लिए जिस तरह की शटरिंग (Shuttering) और सपोर्ट सिस्टम का इस्तेमाल किया गया था, वह मानक के अनुरूप बिल्कुल नहीं था। ढांचे का डिजाइन और सपोर्ट सिस्टम कंक्रीट के भारी-भरकम बोझ को सहन करने में पूरी तरह से विफल साबित हुआ।
इसके अलावा, निर्माण सामग्री की गुणवत्ता को लेकर भी कई गंभीर सवाल उठ रहे हैं। अक्सर सरकारी या सार्वजनिक परियोजनाओं में ठेकेदार कुछ पैसे बचाने के लालच में सुरक्षा मानकों की धज्जियां उड़ा देते हैं, जिसका सीधा खामियाजा उन गरीब मजदूरों को भुगतना पड़ता है जो चंद रुपयों की दिहाड़ी के लिए अपनी जान दांव पर लगाते हैं। इस प्रवेश द्वार के निर्माण की निगरानी कर रहे जूनियर इंजीनियर और लोक निर्माण विभाग (PWD) के अधिकारियों की भूमिका भी अब सीधे तौर पर संदेह के घेरे में आ गई है। अगर समय रहते इंजीनियरों ने इस कमजोर सपोर्ट सिस्टम पर ध्यान दिया होता, तो शायद आज ये पांच मजदूर जिंदगी और मौत की जंग नहीं लड़ रहे होते।
प्रशासन की सख्त चेतावनी: दोषियों के खिलाफ दर्ज होगी FIR
हादसे की खबर मिलते ही उरई और जालौन जिले के वरिष्ठ प्रशासनिक एवं पुलिस अधिकारी दल-बल के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए। उप-जिलाधिकारी (SDM) और क्षेत्राधिकारी (CO) ने मौके का बारीकी से मुआयना किया और मलबे को पूरी तरह से सड़क से हटाने के निर्देश दिए, ताकि यमुना पुल पर यातायात सुचारू रूप से चल सके। प्रशासन ने स्पष्ट रूप से कहा है कि इस मामले को बेहद गंभीरता से लिया जा रहा है और किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा। पुलिस ने बताया कि निर्माण कार्य का ठेका जिस भी कंपनी या ठेकेदार के पास था, उसके खिलाफ लापरवाही और जानमाल को खतरे में डालने की गंभीर धाराओं के तहत तुरंत प्राथमिकी (FIR) दर्ज की जा रही है।
जिला प्रशासन ने निर्माण स्थल को पूरी तरह से सील कर दिया है और एक तकनीकी कमेटी का गठन किया है जो इस बात की विस्तार से जांच करेगी कि आखिर यह ढांचा क्यों और कैसे गिरा। इस घटना ने पूरे उत्तर प्रदेश में चल रहे अन्य निर्माण कार्यों के लिए भी एक बहुत बड़ी और खौफनाक चेतावनी जारी कर दी है। मजदूरों के परिवारों का रो-रोकर बुरा हाल है। वे अब प्रशासन से न्याय की गुहार लगा रहे हैं और ठेकेदार से उचित मुआवजे की मांग कर रहे हैं। अब देखना यह है कि क्या सिर्फ कुछ छोटे कर्मचारियों पर गाज गिराकर इस मामले को रफा-दफा कर दिया जाएगा, या फिर उन बड़े ठेकेदारों और अधिकारियों को भी सलाखों के पीछे भेजा जाएगा जिनकी कमीशनखोरी ने आज इन गरीब मजदूरों को मौत के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है।

Thakur Pawan Singh
Editor in Chief, Taj News
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