National Desk, tajnews.in | Thursday, May 21, 2026, 01:28:00 AM IST

पश्चिम बंगाल की सियासत और हाल ही में हुए सत्ता परिवर्तन के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर से इस समय की एक बहुत ही बड़ी और चौंकाने वाली संगठनात्मक खबर सामने आ रही है। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद भड़की भीषण राजनीतिक हिंसा (Post-Poll Violence) के खिलाफ पार्टी द्वारा आयोजित किए गए एक महत्वपूर्ण आधिकारिक विरोध प्रदर्शन से तृणमूल कांग्रेस के आधे से अधिक विधायकों (50 प्रतिशत से ज्यादा विधायकों) ने पूरी तरह से दूरी बना ली है। पार्टी आलाकमान द्वारा जारी कड़े निर्देशों के बावजूद आधे से अधिक जनप्रतिनिधियों का इस बड़े आंदोलन में शामिल न होना तृणमूल कांग्रेस के भीतर एक बहुत बड़े अंदरूनी मतभेद और सांगठनिक बिखराव की ओर साफ इशारा कर रहा है। कोलकाता के राजनीतिक गलियारों में इस ऐतिहासिक अनुपस्थिति को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया है, क्योंकि हाल ही में राज्य की सत्ता गंवाने के बाद पार्टी खुद को दोबारा स्थापित करने के लिए संघर्ष कर रही है। ऐसे नाजुक मोड़ पर विधायकों की यह बड़ी बेруखी टीएमसी नेतृत्व के लिए एक बहुत बड़ी कूटनीतिक और रणनीतिक चुनौती बन गई है।
कोलकाता में टीएमसी के धरने में खाली रहीं कुर्सियां, नेतृत्व पर खड़े हुए गंभीर सवाल
पश्चिम बंगाल की राजनीति में पिछले कुछ हफ्तों से चल रही उठापटक बुधवार तड़के एक नए और बेहद संवेदनशील मोड़ पर पहुंच गई है। विधानसभा चुनाव के नतीजे आने और राज्य में नई सरकार के गठन के बाद से ही तृणमूल कांग्रेस लगातार चुनाव के बाद हुई हिंसा को मुद्दा बनाकर सड़कों पर उतरने का प्रयास कर रही है। इसी कड़ी में कोलकाता के केंद्र में एक बहुत बड़े राज्य स्तरीय विरोध प्रदर्शन और धरने का आयोजन किया गया था। इस धरने का मुख्य उद्देश्य नई सरकार की प्रशासनिक व्यवस्था को घेरना और जनता के बीच अपनी खोई हुई सहानुभूति वापस पाना था।
नतीजतन, जैसे ही कार्यक्रम की शुरुआत हुई, मंच और वीआईपी दीर्घा में बैठी नेताओं की संख्या ने पार्टी रणनीतिकारों के होश उड़ा दिए। आधिकारिक तौर पर चुने गए विधायकों में से 50 प्रतिशत से अधिक जनप्रतिनिधि इस महत्वपूर्ण विरोध प्रदर्शन का हिस्सा बनने बिल्कुल नहीं पहुंचे। कोलकाता कलेक्ट्रेट और विधानसभा सचिवालय के सूत्रों के अनुसार, अनुपस्थित रहने वाले विधायकों में कई ऐसे कद्दावर चेहरे और पूर्व मंत्री शामिल हैं जो पिछले कई सालों से पार्टी का मुख्य स्तंभ रहे हैं। कार्यक्रम के दौरान कुर्सियों का खाली रहना और बड़े नेताओं की यह बेруखी पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी के लिए एक बहुत बड़ा झटका मानी जा रही है, जो इस समय विपक्ष के रूप में संगठन को मजबूत करने की कोशिशों में जुटी हुई हैं।
आंतरिक कलह और भविष्य की राजनीतिक असुरक्षा बनी विधायकों की दूरी की मुख्य वजह
इस ऐतिहासिक अनुपस्थिति के पीछे के कारणों का विश्लेषण करते हुए राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि टीएमसी के भीतर अंदरूनी असंतोष अब ज्वालामुखी की तरह फटने के कगार पर पहुंच गया है। राज्य में शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में नई सरकार बनने के बाद से क्षेत्रीय विधायकों के भीतर अपनी राजनीतिक सुरक्षा को लेकर भारी डर और संशय का माहौल देखा जा रहा है। कई विधायकों का अंदरूनी तौर पर मानना है कि चुनाव के बाद की हिंसा पर बार-बार आक्रामक राजनीति करने से उनके अपने क्षेत्रों का विकास कार्य पूरी तरह ठप हो सकता है और जनता के बीच भी इसका गलत संदेश जा रहा है।
ताज न्यूज़ की रपट के अनुसार, अनुपस्थित रहने वाले कुछ विधायकों ने नाम न छापने की कड़ी शर्त पर बताया कि पार्टी की वर्तमान आंतरिक नीतियां और निर्णय लेने की प्रक्रिया कुछ ही नेताओं के इर्द-गइर्द सिमट कर रह गई है। जमीनी हकीकत को समझे बिना कड़े और थोपे गए आंदोलनों के कारण स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं को भारी कानूनी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। यही कारण है कि अब विधायकों का एक बहुत बड़ा धड़ा आलाकमान की इन टकराववादी नीतियों से खुद को पूरी तरह दूर रखना चाहता है। यह अंदरूनी मतभेद आने वाले दिनों में तृणमूल कांग्रेस के भीतर एक बहुत बड़ी और वैधानिक टूट का कारण भी बन सकता है, जिसे रोकने के लिए नेतृत्व के पास फिलहाल कोई ठोस योजना बिल्कुल नजर नहीं आ रही है।
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द टाइम्स ऑफ इंडिया की विशेष रिपोर्ट: ममता बनर्जी के नेतृत्व की पकड़ ढीली होने के संकेत
प्रतिष्ठित अंग्रेजी दैनिक समाचार पत्र ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ (Times of India) में प्रकाशित इस विशेष राजनीतिक रिपोर्ट के बाद देश के राजनीतिक विश्लेषकों ने ममता बनर्जी की संगठनात्मक पकड़ पर गंभीर समीक्षाएं शुरू कर दी हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया के कड़े आंकड़ों और विश्लेषण के अनुसार, बुधवार रात करीब एक बजकर अट्ठाईस मिनट पर इस सनसनीखेज आंतरिक विद्रोह की पूरी रूपरेखा सामने आई। रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि बंगाल में तीन दशक से अधिक समय की छात्र राजनीति से उभरीं ममता बनर्जी की अपने विधायकों पर पकड़ अब उतनी मजबूत बिल्कुल नहीं रह गई है, जितनी सत्ता में रहते हुए हुआ करती थी।
इस बीच, राजनीतिक विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि टीएमसी के भीतर एक बहुत बड़ा वैचारिक शून्य पैदा हो चुका है। विपक्ष में बैठने के बाद पार्टी के कई नेता अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता और भविष्य को लेकर बेहद असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, अनुपस्थित रहने वाले अधिकांश विधायक उन क्षेत्रों से आते हैं जहाँ हालिया चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने बहुत कड़ा और शानदार प्रदर्शन किया है। ऐसे में ये विधायक अपने-अपने क्षेत्रों की जनता की नाराजगी का जोखिम किसी भी हाल में उठाने के लिए तैयार नहीं हैं।
भारतीय जनता पार्टी का कड़ा पलटवार, दावे को बताया हताशा और अंत की शुरुआत
तृणमूल कांग्रेस के इस बड़े अंदरूनी बिखराव पर पश्चिम बंगाल और नई दिल्ली के भारतीय जनता पार्टी (BJP) नेतृत्व ने बहुत ही तीखा और कड़ा पलटवार किया है। बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ताओं ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर दावा किया कि यह तृणमूल कांग्रेस के पतन की आधिकारिक शुरुआत है। उन्होंने कहा कि टीएमसी के समझदार और विकासप्रिय विधायक अब अपनी ही पार्टी की दमनकारी और नकारात्मक राजनीति से पूरी तरह से तंग आ चुके हैं। वे राज्य के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री और डबल इंजन सरकार के विकासवादी दृष्टिकोण के साथ मिलकर काम करना चाहते हैं।
बीजेपी नेताओं ने कड़े शब्दों में कहा कि ममता बनर्जी को अब यह कड़वा सच पूरी तरह स्वीकार कर लेना चाहिए कि बंगाल की जनता ने उन्हें सत्ता से बेदखल कर दिया है और अब उनके अपने विधायक भी उनके बयानों और बेबुनियाद आंदोलनों के बहकावे में आने वाले बिल्कुल नहीं हैं। आगरा सहित पूरे उत्तर प्रदेश और देश के राजनीतिक हलकों में भी इस बड़े सांगठनिक बिखराव को लेकर चर्चाओं का बाजार पूरी तरह से गर्म हो गया है। ताज न्यूज़ इस पूरी बड़ी आंतरिक राजनीतिक जंग, टीएमसी के आगामी कड़े फैसलों और बयानों की हर एक बारीक अपडेट पर अपनी पैनी नजर लगातार बनाए हुए है।

Thakur Pawan Singh
Chief Editor, Taj News
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