ज्योतिष, विज्ञान है या कला? सत्ता के सौदागरों का सबसे बड़ा “कॉस्मिक झांसा” और लोकतंत्र पर प्रहार

खबर शेयर कीजिए

Article Desk, Taj News | Wednesday, May 20, 2026, 09:15:00 AM IST

Taj News Logo
Taj News
Article Desk
Brij Khandelwal Writer
बृज खंडेलवाल
वरिष्ठ पत्रकार
एवं राजनीतिक विश्लेषक
वरिष्ठ पत्रकार बृज खंडेलवाल ने राजनीति, मीडिया और समाज में ज्योतिष के बढ़ते दखल पर एक बेहद प्रखर आलेख लिखा है। यह विश्लेषण स्पष्ट करता है कि कैसे वैज्ञानिक सोच को दरकिनार कर, सत्ता और मीडिया मिलकर जनता के डर का व्यापार कर रहे हैं और ‘कॉस्मिक झांसे’ के जरिए लोकतंत्र की जड़ों को खोखला कर रहे हैं।
HIGHLIGHTS
  1. तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसफ विजय द्वारा निजी ज्योतिषी को ओएसडी (OSD) बनाने के बाद उठे विवाद पर गंभीर विमर्श।
  2. चुनाव आते ही टीवी स्टूडियो का “कॉस्मिक कंट्रोल रूम” में तब्दील होना और डर बेचकर टीआरपी (TRP) बटोरने का खेल।
  3. वैज्ञानिक परीक्षणों में ज्योतिष का बार-बार असफल होना; यह विज्ञान से अधिक मनोवैज्ञानिक “बार्नम इफेक्ट” पर आधारित है।
  4. ताज न्यूज़ का संपादकीय विश्लेषण: भारतीय संविधान वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देता है, लेकिन राजनेता अंधविश्वास के सहारे सत्ता चला रहे हैं।

ज्योतिष, विज्ञान है या कला?
सत्ता के सौदागरों का सबसे बड़ा “कॉस्मिक झांसा”

— बृज खंडेलवाल

तमिलनाडु के नए मुख्यमंत्री सी. जोसफ विजय ने हाल ही में अपने निजी ज्योतिषी को मुख्यमंत्री कार्यालय में ओएसडी नियुक्त कर दिया। इसलिए, यह खबर जंगल की आग की तरह चारों तरफ फैली। दरअसल, कहा गया कि इसी ज्योतिषी ने वर्षों पहले “भविष्यवाणी” की थी कि विजय एक दिन सत्ता की कुर्सी तक पहुंचेंगे। हालांकि, कुछ ही घंटों में राजनीतिक गलियारों में भारी हलचल मच गई। सहयोगी दलों ने तुरंत कड़े सवाल उठाए। इसके बाद, तर्कवाद, वैज्ञानिक सोच और संविधान की दुहाई दी जाने लगी। आखिरकार, सरकार को अपने कदम पीछे खींचने पड़े।

लेकिन, असली सवाल अब भी हवा में गूंज रहा है। क्या लोकतंत्र वास्तव में ग्रहों की चाल से चलेगा? इसके अलावा, क्या करोड़ों लोगों की किस्मत शनि, राहु और मंगल तय करेंगे? या फिर, यह डर, असुरक्षा और सत्ता का वही पुराना कारोबार है, जिसे हर दौर में नया रंग-रोगन लगाकर बेच दिया जाता है?

वास्तव में, भारत में सत्ता और ज्योतिष का रिश्ता बिल्कुल नया नहीं है। सदियों से राजा-महाराजा युद्ध से पहले राज ज्योतिषियों से सलाह लेते रहे। आजकल ज्यादातर लोग कुंडलियों को मिलाकर शादियां करते हैं। फिर भी, बिगड़ते रिश्तों की संख्या लगातार बढ़ रही है। व्यापारी लंबी यात्राओं से पहले हमेशा कुंडली दिखाते थे। इसके साथ ही, सुबह की चाय के साथ राशिफल पढ़ना लगभग एक सामाजिक आदत बन चुका है। मानो आसमान से हर दिन कोई गुप्त फरमान उतरता हो।

यह भी पढ़ें

लेकिन, चुनाव आते ही यह कारोबार अचानक रॉकेट की रफ्तार पकड़ लेता है। इसलिए, टीवी स्टूडियो किसी “कॉस्मिक कंट्रोल रूम” में बदल जाते हैं। हर चैनल पर कोई “सितारों का विशेषज्ञ” अवश्य मौजूद रहता है। कोई शनि देखकर सीधे सरकार गिरा देता है। कोई राहु के सहारे चुनाव जिता देता है। कोई बुध की चाल से गठबंधन की उम्र आसानी से बता देता है। फलस्वरूप, लोकतंत्र कम, ग्रहों का रियलिटी शो ज्यादा दिखने लगता है。

राजनीतिक दल भी इस तमाशे में कभी पीछे नहीं रहते। उम्मीदवार “शुभ मुहूर्त” देखकर ही अपना नामांकन भरते हैं। रैलियों की तारीखें ग्रहों की चाल से तय होती हैं। पार्टी दफ्तरों में रत्न बेचने वाले, अंकशास्त्री और भविष्यवक्ता ऐसे घूमते हैं, जैसे लोकतंत्र नहीं, बल्कि कोई तांत्रिक मेला लगा हो।

असल में, चुनाव डर और बेचैनी का मौसम होते हैं। नेता सत्ता के लिए हर समय बेताब रहते हैं। टीवी चैनलों को सिर्फ टीआरपी चाहिए। जनता महंगाई, बेरोजगारी और तनाव से परेशान रहती है। ऐसे माहौल में लोग तर्क नहीं, बल्कि तसल्ली खोजने लगते हैं।

मीडिया की भूमिका भी कम दिलचस्प नहीं है। कई चैनल सेलिब्रिटी ज्योतिषियों को वैज्ञानिकों जैसी गंभीरता से पेश करते हैं। कोई आर्थिक तबाही की भविष्यवाणी करता है। कोई राजनीतिक भूचाल की कड़ी चेतावनी देता है। कोई “देश पर संकट” का भारी ऐलान कर देता है। अगर कुछ नहीं होता, तो कोई जवाबदेही नहीं होती। अगले हफ्ते वही चेहरा नई चमक के साथ फिर स्क्रीन पर लौट आता है。

सबसे खतरनाक वे “कयामत वाले बाबा” हैं, जो डर बेचते हैं। वे ग्रहों के बहाने युद्ध, महामारी, बर्बादी और राष्ट्रीय संकट की बातें फैलाते हैं। क्योंकि, डर हमेशा बिकता है। ठंडी समझदारी बिल्कुल नहीं बिकती।

भारत की आध्यात्मिक परंपरा बेहद समृद्ध रही है। यहां दर्शन, चिंतन और आत्ममंथन की एक लंबी विरासत है। लेकिन, टीवी पर परोसी जा रही अंधभक्ति और सनसनीखेज भविष्यवाणियों पर आंख मूंदकर भरोसा करना समाज की तार्किक सोच को कमजोर कर रहा है। दरअसल, लोकतंत्र को जागरूक नागरिक चाहिए, डरे हुए राशिफल भक्त नहीं।

सच यह है कि ज्योतिष हर बड़े वैज्ञानिक परीक्षण में हमेशा कमजोर साबित हुआ है। दावा किया जाता है कि ग्रह-नक्षत्र इंसान के स्वभाव, रिश्तों और भविष्य को पूरी तरह प्रभावित करते हैं। मगर, आज तक कोई वैज्ञानिक यह नहीं समझा पाया कि करोड़ों किलोमीटर दूर मौजूद मंगल या शनि किसी की नौकरी, शादी या चुनावी किस्मत कैसे तय कर सकते हैं। भौतिक विज्ञान के अनुसार ग्रहों का गुरुत्वाकर्षण असर तो होता है, लेकिन वह इतना सूक्ष्म है कि जन्म के समय पास खड़े अस्पताल के उपकरणों का प्रभाव कई बार उससे अधिक हो सकता है। फिर भी लोग विश्वास क्यों करते हैं?

क्योंकि, ज्योतिष का धंधा विज्ञान से ज्यादा मनोविज्ञान पर चलता है। इंसान स्वभाव से ही पैटर्न खोजता है। हम अव्यवस्था में अर्थ तलाशते हैं। मुश्किल वक्त में उम्मीद और सहारा चाहते हैं। ज्योतिष वही देता है, रहस्यमयी शब्दों और चमकीली भाषा में। राशिफल अक्सर इतने धुंधले होते हैं कि वे हर किसी पर फिट बैठ जाएं। “आज कोई चुनौती आ सकती है।” “पुराना संबंध फिर सामने आ सकता है।” “धन के मामलों में सावधानी रखें।” ऐसी बातें लगभग हर इंसान पर लागू हो सकती हैं। मनोविज्ञान में इसे “बार्नम इफेक्ट” कहा जाता है, जहां सामान्य बातें भी हमें अपनी निजी सच्चाई लगने लगती हैं।

1985 में वैज्ञानिक पत्रिका Nature में प्रकाशित एक चर्चित प्रयोग और बाद के कई अध्ययनों ने दिखाया कि पेशेवर ज्योतिषियों की भविष्यवाणियां अनुमान से बेहतर नहीं थीं। अलग-अलग ज्योतिषी एक ही कुंडली की बिल्कुल अलग व्याख्या करते मिले। कई चर्चित ज्योतिषियों की भविष्यवाणियां बार-बार गलत साबित हुईं। सही निकले कुछ तुक्कों को खूब प्रचार मिलता है, लेकिन असफल भविष्यवाणियां जल्दी भुला दी जाती हैं।

सुबह चाय के साथ राशिफल पढ़ लेना कोई बड़ा गुनाह नहीं है। समस्या तब शुरू होती है जब लोग जिंदगी के बड़े फैसले तर्क और जानकारी की जगह ग्रहों के भरोसे लेने लगते हैं। कोई व्यापारी निवेश टाल देता है क्योंकि “बुध वक्री” है। कोई परिवार अच्छा रिश्ता ठुकरा देता है क्योंकि कुंडली नहीं मिली। कोई मरीज अपना इलाज छोड़ देता है क्योंकि “शनि भारी” है। कोई नेता जनता की जरूरत नहीं, बल्कि ज्योतिषी की सलाह सुनने लगता है। रात का आसमान बेहद खूबसूरत है। तारों को देखकर हैरत होती है। ग्रह कल्पना को लंबी उड़ान देते हैं। लेकिन, खूबसूरती सबूत नहीं होती। रहस्य हमेशा सच नहीं होता।

ताज न्यूज़ का विशेष संपादकीय विश्लेषण: संवैधानिक मूल्यों की हत्या और ‘भय का व्यापार’

बृज खंडेलवाल जी का यह आलेख आधुनिक भारतीय समाज के उस सबसे बड़े विरोधाभास (Contradiction) को उजागर करता है, जहाँ हम तकनीक में तो 21वीं सदी में जी रहे हैं, लेकिन हमारी सोच आज भी अंधविश्वास की बेड़ियों में जकड़ी हुई है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री द्वारा एक ज्योतिषी को ओएसडी (OSD) बनाना कोई मामूली घटना नहीं है। यह सीधे तौर पर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51A(h) का खुला उल्लंघन है। यह अनुच्छेद स्पष्ट रूप से कहता है कि प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह वैज्ञानिक दृष्टिकोण (Scientific Temper), मानववाद और ज्ञानार्जन की भावना का विकास करे। जब सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग ही संवैधानिक कर्तव्यों को दरकिनार कर ‘ग्रहों की चाल’ से नीतियां तय करने लगें, तो वह समाज कभी एक विकसित राष्ट्र का निर्माण नहीं कर सकता। नीतियां डेटा, रिसर्च और जन-कल्याण पर आधारित होनी चाहिए, न कि राहु और केतु की दशा पर।

मीडिया का पतन और ‘छद्म विज्ञान’ (Pseudoscience) का महिमामंडन:
आजकल मुख्यधारा के न्यूज़ चैनल पत्रकारिता के मंच कम और ‘तांत्रिक अखाड़े’ अधिक नज़र आते हैं। जब देश को बेरोजगारी, महंगाई और जलवायु परिवर्तन जैसे गंभीर मुद्दों पर बहस की आवश्यकता होती है, तब एंकर किसी ज्योतिषी को बिठाकर यह बता रहे होते हैं कि फलां नेता को किस रंग का कुर्ता पहनना चाहिए। यह केवल टीआरपी (TRP) का खेल नहीं है; यह जानबूझकर जनता का ध्यान असली मुद्दों से भटकाने की एक गहरी साज़िश है। जब एक आम नागरिक देखता है कि बड़े-बड़े टीवी चैनल ज्योतिष को ‘विज्ञान’ बताकर परोस रहे हैं, तो उसका मनोवैज्ञानिक पतन (Psychological Decline) शुरू हो जाता है। वह अपने जीवन की विफलताओं का कारण व्यवस्था या सरकार में खोजने के बजाय अपनी ‘कुंडली के दोषों’ में खोजने लगता है। यह व्यवस्था के लिए बहुत सुविधाजनक है, क्योंकि डरी हुई और अंधविश्वासी जनता कभी अपने अधिकारों के लिए सवाल नहीं पूछती।

बार्नम इफेक्ट (Barnum Effect) और मानसिक शोषण:
लेखक ने ‘बार्नम इफेक्ट’ का जो संदर्भ दिया है, वह ज्योतिष के पूरे छद्म व्यापार की पोल खोल देता है। मनुष्य का मस्तिष्क स्वाभाविक रूप से अनिश्चितता से डरता है। ज्योतिषी इसी मनोवैज्ञानिक कमजोरी का फायदा उठाते हैं। वे ऐसी गोलमोल बातें कहते हैं जो किसी भी व्यक्ति के जीवन की स्थिति से मेल खा सकती हैं। जब एक बीमार व्यक्ति डॉक्टर की वैज्ञानिक सलाह को छोड़कर ‘शनि के उपाय’ में उलझ जाता है, तो यह केवल अंधविश्वास नहीं, बल्कि सामाजिक त्रासदी बन जाता है। ‘ताज न्यूज़’ का यह स्पष्ट मानना है कि आस्था और विज्ञान के बीच एक स्पष्ट रेखा खींचनी होगी। ग्रहों की गति खगोल विज्ञान (Astronomy) का विषय है, मानव जीवन की नियति का नहीं। लोकतंत्र को जागरूक और प्रश्न पूछने वाले नागरिकों की आवश्यकता है, ‘कॉस्मिक झांसों’ में फंसे हुए मूक दर्शकों की नहीं। जब तक समाज तार्किकता को नहीं अपनाएगा, सत्ता के सौदागर ऐसे ही डर का व्यापार करते रहेंगे।

Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News

खबर शेयर कीजिए

4 thoughts on “ज्योतिष, विज्ञान है या कला? सत्ता के सौदागरों का सबसे बड़ा “कॉस्मिक झांसा” और लोकतंत्र पर प्रहार”

Leave a Comment