तानाशाह का भविष्य: सत्ता के अहंकार और इतिहास के क्रूर यथार्थ पर विष्णु नागर का तीखा प्रहार

खबर शेयर कीजिए

Article Desk, Taj News | Wednesday, May 20, 2026, 03:36:15 AM IST

Taj News Logo
Taj News
Article Desk
Vishnu Nagar Writer
विष्णु नागर
वरिष्ठ साहित्यकार
एवं स्वतंत्र पत्रकार
प्रसिद्ध साहित्यकार और स्वतंत्र पत्रकार विष्णु नागर ने अपने इस प्रखर राजनैतिक व्यंग्य में अधिनायकवादी प्रवृत्तियों, संस्थाओं के पतन और ‘निर्विकल्प’ बनने की चाहत रखने वाले तानाशाहों के मनोविज्ञान का एक मारक चित्रण किया है। यह आलेख समकालीन सत्ता-संरचना के उस क्रूर यथार्थ को सामने लाता है जहाँ इतिहास अंततः हर निरंकुश शासक का हिसाब चुकता करता है।
HIGHLIGHTS
  1. विष्णु नागर का प्रहार: तानाशाह कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, उसका पतन और उसके सहयोगियों का कच्चा चिट्ठा सामने आना अवश्यंभावी है।
  2. ईमानदारी से चुनाव न जीत पाने के डर से ‘चुनाव आयोग’ जैसी स्वायत्त संस्थाओं को महज एक सरकारी विभाग में तब्दील कर देने का कड़वा सच।
  3. तानाशाहों का मनोविज्ञान: अपनी छवि में पैबंद लगाना, विरोधियों को कुचलना और विपरीत जनमत को नकारात्मक तरीकों से अपने पक्ष में मोड़ना।
  4. ताज न्यूज़ का संपादकीय विश्लेषण: युद्ध से हुए भौतिक नुकसान की भरपाई तो मुमकिन है, लेकिन लोकतांत्रिक संस्थाओं को तानाशाह जो घाव देता है, उसे भरने में पीढ़ियां लग जाती हैं।

राजनैतिक व्यंग्य-समागम

तानाशाह का भविष्य : विष्णु नागर

वैसे तो मेरे वे दोस्त बहुत ज्ञानी हैं, मगर उन्हें न जाने क्या सूझी कि उन्होंने मुझसे पूछा कि हमारा तानाशाह जो कुछ कर रहा है, वह सब आज नहीं, कल नहीं, परसों नहीं, बरसों नहीं, मगर कभी तो सामने आएगा? पचास साल बाद तो सामने आएगा?

मैंने कहा, आएगा और जल्दी ही सामने आएगा। इसने ऐसी स्थिति में अपने को डाल दिया है कि इसका पतन अब कोई ताकत अधिक समय तक रोक नहीं सकती। फिर भी सुविधा के लिए मान लें कि दस बरस बाद यह जाएगा। तब सब कुछ सामने आएगा। इसका ही नहीं, इसके साथ के सब लोगों का कच्चा चिट्ठा सामने आएगा। एक-एक चीज़ आज दर्ज की जा रही है। इसे वे भी दर्ज कर रहे हैं, जो आज इसके अपने हैं। उनके मन में डर है कि कल पांसा पलट गया, तो उनका गला भी नापा जा सकता है और कब, कौन-सी चिनगारी आग बन जाएगी, यह कोई नहीं जानता!

ऐसा नहीं कि तानाशाह खुद यह बात नहीं जानता। जानता है, मगर फिलहाल उसकी चिंता सत्ता पर अपनी पकड़ को और मजबूत बनाना है, अपने मजबूत विरोधियों को कुचलना है। उन्हें विभिन्न माध्यमों से इतना बदनाम कर देना है कि वे जनता के सामने जाने से भी डरें और नहीं डरें, तो इसका नतीजा भुगतें।

यह भी पढ़ें

हर तानाशाह यह मानता है कि वह इतना कुशल है कि जीते-जी उसका कुछ नहीं बिगड़ेगा। बाद मरने के उसके बारे में क्या-क्या सामने आता है, क्या-क्या राज खुलते हैं, इसकी उसे चिंता नहीं, क्योंकि वह तो अपनी पारी सफलता से खेल चुका है। उसका सारा खेल, उसकी सारी राजनीति आज के लिए है। उसे आज उसकी छवि बनाना है। वह जानता है कि उसके जीते-जी भी उसकी बनाई छवि टूटती रहती है, उसमें वह पैबंद लगाता रहता है। हमारा तानाशाह जान चुका है कि ईमानदारी से वह चुनाव नहीं जीत सकता, इसलिए चुनाव आयोग को उसने सरकार के एक सरकारी विभाग में बदल दिया है। इस तरह वह मानता है कि वह टिका रहेगा। फिर राज्य की शक्ति उसके पास है, उसका इस्तेमाल कर वह विपरीत जनमत को भी सकारात्मक वोट में बदल सकता है। फिलहाल हमारे तानाशाह का जोर पूरे भारत की राजनीति पर कब्जा करना है और अपने को निर्विकल्प बनाना है。

तानाशाह जानते हैं कि उनका भविष्य क्या है। लोग उन्हें कल किस रूप में याद करेंगे। उन्हें मालूम है कि उनकी पूजा नहीं होगी। उनकी तुलना महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू से नहीं होगी। उन्हें उसी तरह देखा जाएगा, जिस तरह देखा जाना किसी तानाशाह को पसंद नहीं आता। उनकी कोशिश यह होती है कि ऐसी नौबत नहीं आए, जो हिटलर और मुसोलिनी के सामने आई थी। पर कौन जानता है, कौन तय कर सकता है कि कल उसके साथ क्या होगार。

मगर तानाशाह ने जितना नुकसान किया होता है, उसकी भरपाई आसानी से नहीं होती। युद्ध से हुए नुकसान की भरपाई हो सकती है, तानाशाह के किये नुकसान की बहुत मुश्किल होती है। पीढ़ियां लग जाती हैं, बहुत कुछ दुरुस्त करने में!

(कई पुरस्कारों से सम्मानित विष्णु नागर साहित्यकार और स्वतंत्र पत्रकार हैं। जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं।)

ताज न्यूज़ का विशेष संपादकीय विश्लेषण: संस्थागत क्षरण, भय का साम्राज्य और निरंकुशता का मनोवैज्ञानिक अंत

वरिष्ठ साहित्यकार विष्णु नागर का यह राजनैतिक व्यंग्य आधुनिक लोकतंत्रों के भीतर छिपे अधिनायकवाद (Authoritarianism) का वह गहरा मनोवैज्ञानिक एक्स-रे है, जो पाठकों को हँसाता नहीं, बल्कि एक गहरी वैचारिक बेचैनी से भर देता है। इतिहास इस बात का गवाह है कि कोई भी तानाशाह अमर नहीं होता, लेकिन जब वह सत्ता के शीर्ष पर होता है, तो उसे यह भ्रम हो जाता है कि उसका साम्राज्य अविनाशी है। लेखक ने अत्यंत सूक्ष्मता से तानाशाहों की उस शाश्वत कमज़ोरी पर चोट की है, जिसे ‘छवि का पैबंद’ कहा जाता है। एक लोकतांत्रिक समाज में जहाँ स्वतंत्र संस्थाएँ शासक की निरंकुशता पर अंकुश लगाती हैं, वहाँ तानाशाह की पहली प्राथमिकता उन संस्थाओं की रीढ़ तोड़ना होती है। ‘चुनाव आयोग’ को महज एक सरकारी विभाग में तब्दील कर देने की टिप्पणी आज के वैश्विक परिदृश्य में लोकतांत्रिक संस्थाओं (Democratic Institutions) के संस्थागत क्षरण (Institutional Decay) की ओर एक तीखा और सीधा इशारा है।

सहयोगियों का भय और इतिहास की गुप्त डायरी:
आलेख का सबसे मारक बिंदु वह है जहाँ लेखक तानाशाह के अपने करीबियों और वफादारों के भीतर छिपे डर का विश्लेषण करते हैं। निरंकुश सत्ताएँ केवल विरोधियों में ही खौफ पैदा नहीं करतीं, बल्कि वे अपने ही कुनबे को एक गहरे अविश्वास और भय के पाश में जकड़ कर रखती हैं। आज जो लोग तानाशाह के आगे साष्टांग लम्बलोट हैं, वे ही अंदर ही अंदर उसके ‘कच्चे चिट्ठे’ और पापों का लेखा-जोखा रख रहे हैं। यह इतिहास का वह न्याय है जो पर्दे के पीछे हमेशा सक्रिय रहता है। उन्हें डर है कि जब पांसा पलटेगा—और इतिहास गवाह है कि पांसा हमेशा पलटता है—तो उनका गला भी नापा जा सकता है। इसलिए, निरंकुश शासकों के पतन की चिनगारी अक्सर किसी बाहरी मोर्चे से नहीं, बल्कि उनके अपने ही सिस्टम के भीतर से निकलती है, जिसे वे अपनी सबसे बड़ी ताकत समझते हैं।

निर्विकल्प होने का ढोंग और पीढ़ियों का नुकसान:
विष्णु नागर स्पष्ट करते हैं कि तानाशाह को भली-भांति पता होता है कि वह कभी महात्मा गांधी या जवाहरलाल नेहरू जैसी ऐतिहासिक और नैतिक ऊंचाई हासिल नहीं कर सकता। उसकी पूजा केवल भय और चाटुकारिता के बल पर होती है, सम्मान के बल पर नहीं। इसीलिए वह ‘निर्विकल्प’ बनने का प्रपंच रचता है; वह अपने विरोधियों को केंद्रीय एजेंसियों और गोदी मीडिया के माध्यम से इतना बदनाम कर देना चाहता है कि जनता के सामने कोई विकल्प ही न बचे। लेकिन इस ‘अहंकार’ की जो कीमत देश चुकाता है, वह डरावनी है। आलेख का अंतिम वाक्य इस पूरे विश्लेषण का निचोड़ है—”युद्ध से हुए नुकसान की भरपाई हो सकती है, तानाशाह के किये नुकसान की बहुत मुश्किल होती है। पीढ़ियां लग जाती हैं, बहुत कुछ दुरुस्त करने में!” जब एक समाज की तार्किक चेतना को नष्ट कर दिया जाता है, जब नफरत को सामाजिक habit बना दिया जाता है, और जब अदालतों से लेकर स्वतंत्र संस्थाओं तक की साख मिटा दी जाती है, तो उस नैतिक मलबे से दोबारा एक स्वस्थ राष्ट्र का निर्माण करने में दशकों लग जाते हैं। यह व्यंग्य समकालीन दौर के लिए एक ऐतिहासिक चेतावनी है।

Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News

खबर शेयर कीजिए

Leave a Comment