Article Desk, Taj News | Wednesday, May 20, 2026, 03:36:15 AM IST


एवं स्वतंत्र पत्रकार
ताज न्यूज़ का विशेष संपादकीय विश्लेषण: संस्थागत क्षरण, भय का साम्राज्य और निरंकुशता का मनोवैज्ञानिक अंत
वरिष्ठ साहित्यकार विष्णु नागर का यह राजनैतिक व्यंग्य आधुनिक लोकतंत्रों के भीतर छिपे अधिनायकवाद (Authoritarianism) का वह गहरा मनोवैज्ञानिक एक्स-रे है, जो पाठकों को हँसाता नहीं, बल्कि एक गहरी वैचारिक बेचैनी से भर देता है। इतिहास इस बात का गवाह है कि कोई भी तानाशाह अमर नहीं होता, लेकिन जब वह सत्ता के शीर्ष पर होता है, तो उसे यह भ्रम हो जाता है कि उसका साम्राज्य अविनाशी है। लेखक ने अत्यंत सूक्ष्मता से तानाशाहों की उस शाश्वत कमज़ोरी पर चोट की है, जिसे ‘छवि का पैबंद’ कहा जाता है। एक लोकतांत्रिक समाज में जहाँ स्वतंत्र संस्थाएँ शासक की निरंकुशता पर अंकुश लगाती हैं, वहाँ तानाशाह की पहली प्राथमिकता उन संस्थाओं की रीढ़ तोड़ना होती है। ‘चुनाव आयोग’ को महज एक सरकारी विभाग में तब्दील कर देने की टिप्पणी आज के वैश्विक परिदृश्य में लोकतांत्रिक संस्थाओं (Democratic Institutions) के संस्थागत क्षरण (Institutional Decay) की ओर एक तीखा और सीधा इशारा है।
सहयोगियों का भय और इतिहास की गुप्त डायरी:
आलेख का सबसे मारक बिंदु वह है जहाँ लेखक तानाशाह के अपने करीबियों और वफादारों के भीतर छिपे डर का विश्लेषण करते हैं। निरंकुश सत्ताएँ केवल विरोधियों में ही खौफ पैदा नहीं करतीं, बल्कि वे अपने ही कुनबे को एक गहरे अविश्वास और भय के पाश में जकड़ कर रखती हैं। आज जो लोग तानाशाह के आगे साष्टांग लम्बलोट हैं, वे ही अंदर ही अंदर उसके ‘कच्चे चिट्ठे’ और पापों का लेखा-जोखा रख रहे हैं। यह इतिहास का वह न्याय है जो पर्दे के पीछे हमेशा सक्रिय रहता है। उन्हें डर है कि जब पांसा पलटेगा—और इतिहास गवाह है कि पांसा हमेशा पलटता है—तो उनका गला भी नापा जा सकता है। इसलिए, निरंकुश शासकों के पतन की चिनगारी अक्सर किसी बाहरी मोर्चे से नहीं, बल्कि उनके अपने ही सिस्टम के भीतर से निकलती है, जिसे वे अपनी सबसे बड़ी ताकत समझते हैं।
निर्विकल्प होने का ढोंग और पीढ़ियों का नुकसान:
विष्णु नागर स्पष्ट करते हैं कि तानाशाह को भली-भांति पता होता है कि वह कभी महात्मा गांधी या जवाहरलाल नेहरू जैसी ऐतिहासिक और नैतिक ऊंचाई हासिल नहीं कर सकता। उसकी पूजा केवल भय और चाटुकारिता के बल पर होती है, सम्मान के बल पर नहीं। इसीलिए वह ‘निर्विकल्प’ बनने का प्रपंच रचता है; वह अपने विरोधियों को केंद्रीय एजेंसियों और गोदी मीडिया के माध्यम से इतना बदनाम कर देना चाहता है कि जनता के सामने कोई विकल्प ही न बचे। लेकिन इस ‘अहंकार’ की जो कीमत देश चुकाता है, वह डरावनी है। आलेख का अंतिम वाक्य इस पूरे विश्लेषण का निचोड़ है—”युद्ध से हुए नुकसान की भरपाई हो सकती है, तानाशाह के किये नुकसान की बहुत मुश्किल होती है। पीढ़ियां लग जाती हैं, बहुत कुछ दुरुस्त करने में!” जब एक समाज की तार्किक चेतना को नष्ट कर दिया जाता है, जब नफरत को सामाजिक habit बना दिया जाता है, और जब अदालतों से लेकर स्वतंत्र संस्थाओं तक की साख मिटा दी जाती है, तो उस नैतिक मलबे से दोबारा एक स्वस्थ राष्ट्र का निर्माण करने में दशकों लग जाते हैं। यह व्यंग्य समकालीन दौर के लिए एक ऐतिहासिक चेतावनी है।

Pawan Singh
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