Article Desk, Taj News | Wednesday, May 20, 2026, 02:55:00 AM IST


एवं प्रखर सामाजिक चिंतक
ताज न्यूज़ का विशेष संपादकीय विश्लेषण: परीक्षा तंत्र का अपराधीकरण और कोचिंग माफिया का समानांतर साम्राज्य
यह आलेख भारतीय शिक्षा प्रणाली और परीक्षा आयोजित करने वाले सर्वोच्च राष्ट्रीय तंत्र के उस गंभीर नीतिगत खोखलेपन पर प्रहार करता है, जिसने देश के करोड़ों होनहार युवाओं के भविष्य को अंधकार में धकेल दिया है। राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) द्वारा आयोजित की जाने वाली परीक्षाओं में—चाहे वह NEET हो या NET—लगातार सामने आने वाली विसंगतियां और पेपर लीक की घटनाएं कोई आकस्मिक प्रशासनिक चूक नहीं हैं। यह एक बहुत ही सुविचारित और क्रूर ‘सिस्टमैटिक फेलियर’ (Systematic Failure) है। जब देश की सबसे बड़ी और संवेदनशील परीक्षा एजेंसी को संसद के कानून द्वारा स्थापित एक स्वायत्त संवैधानिक निकाय बनाने के बजाय एक साधारण ‘सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट’ के तहत एक एनजीओ (NGO) की तरह संचालित किया जाएगा, तो उसकी जवाबदेही और पारदर्शिता का पतन होना बिल्कुल तय है। सोसाइटी मॉडल का सीधा अर्थ है कि संसदीय संवीक्षा (Parliamentary Scrutiny) और कैग (CAG) के कड़े ऑडिट से बच निकलना, और यही अपारदर्शिता भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी जननी बनती है।
कोचिंग इकॉनमी (Coaching Economy) और ‘हितों का टकराव’:
आलेख का सबसे मारक और प्रासंगिक बिंदु वह है जहाँ ‘पेपर सेटर्स’ और ‘कोचिंग माफिया’ के बीच के नापाक अपवित्र गठबंधन (Conflict of Interest) की बात की गई है। आज भारत में प्रतियोगी परीक्षाएं ज्ञान या मेधा की परीक्षा नहीं रहीं, बल्कि वे अरबों रुपये के ‘कोचिंग उद्योग’ का एक व्यावसायिक औजार बन चुकी हैं। कोटा से लेकर दिल्ली तक फैले इस कोचिंग साम्राज्य का सालाना टर्नओवर हज़ारों करोड़ रुपये का है। जब इन संस्थानों के पास इतनी वित्तीय ताकत आ जाती है, तो वे परीक्षा नियामक बोर्डों के प्रोफेसरों, पेपर डिजाइनरों और प्रिंटिंग प्रेसों में अपनी पैठ बनाने लगते हैं। एक या दो प्रोफेसरों के बंद कमरों में बैठकर ‘मैनुअल’ तरीके से पेपर तैयार करने की जो आदिम व्यवस्था एनटीए ने अपना रखी है, वह लीक के जोखिम को सौ गुना बढ़ा देती है। आधुनिक युग में जहाँ रैंडमाइज्ड क्वेश्चन जनरेशन (Randomized Question Generation) और सुरक्षित कंप्यूटर एल्गोरिदम के माध्यम से पेपर सेट होने चाहिए, वहाँ पुरानी सामंती और केंद्रीकृत लीक-प्रूफ व्यवस्था का दावा करना हास्यास्पद और आपराधिक है।
चिकित्सा शिक्षा का ‘बाज़ारीकरण’ और सामाजिक त्रासदी:
जब मेडिकल और इंजीनियरिंग जैसी तकनीकी शिक्षा ‘पब्लिक सर्विस’ (लोक सेवा) के दायरे से बाहर निकलकर ‘मार्केट-ड्रिवेन मॉडल’ (Market-driven Model) में बदल जाती है, तो समाज में एक भयानक असंतुलन पैदा होता है। निजी मेडिकल कॉलेजों की फीस आज करोड़ों रुपये में है। एक गरीब या मध्यमवर्गीय छात्र जो दिन-रात एक करके पढ़ाई करता है, वह इस बाज़ार के सामने खुद को लाचार पाता है। जब डॉक्टर बनने की योग्यता मेधा से नहीं, बल्कि तिजोरी के आकार से तय होने लगे, तो पेपर लीक करने वाले दलाल (Paper Leak Mafias) सक्रिय हो जाते हैं। वे जानते हैं कि एक अमीर माता-पिता अपने बच्चे को डॉक्टर बनाने के लिए 50 लाख रुपये का paper खरीदने में संकोच नहीं करेंगे। यह केवल परीक्षा की चोरी नहीं है; यह उस गरीब माता-पिता के पसीने की कमाई और उस ईमानदार छात्र के आत्मविश्वास की ‘संवैधानिक हत्या’ है जो बिना किसी सिफारिश के अपनी किस्मत बदलना चाहता था।
निष्कर्ष: ‘आर्थिक और नैतिक आत्मदाह’ से बचना होगा:
‘ताज न्यूज़’ का यह स्पष्ट मानना है कि हर बार पेपर लीक होने पर कुछ छोटे कर्मचारियों को सस्पेंड कर देना या जाँच समितियों का गठन करना केवल जनता के गुस्से को शांत करने का एक ‘पीआर स्टंट’ (PR Stunt) है। जब तक एनटीए को भंग करके एक पूर्णतः वैधानिक, संसदीय जवाबदेही और कैग के कड़े नियंत्रण वाली संस्था के रूप में पुनर्गठित नहीं किया जाएगा, तब तक यह बीमारी ठीक नहीं होगी। इसके साथ ही, पेपर लीक को ‘गैर-जमानती संगीन अपराध’ मानकर इसके दोषियों को उम्रकैद और उनकी संपत्तियों की कुर्की जैसा कड़ा और निश्चित दंडात्मक प्रावधान लागू करना होगा। भारत आज दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी (Demographic Dividend) होने का गौरव मना रहा है, लेकिन अगर हमारे युवाओं के भरोसे को इसी तरह ‘पेपर लीक’ के भंवर में डुबोया जाता रहा, तो यह राष्ट्रीय आपदा बहुत जल्द एक सामाजिक विद्रोह में बदल जाएगी। व्यवस्था को अब इस कड़वे सच का सामना करना ही होगा कि लीक ‘दुर्घटना’ नहीं, बल्कि उनकी अपनी प्रशासनिक बेईमानी का स्वाभाविक परिणाम है।

Pawan Singh
7579990777



