केंद्रीय सत्ता की जीत, जनतंत्र की हार! चुनाव आयोग और चुनावी तानाशाही पर राजेंद्र शर्मा का प्रहार

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Article Desk, tajnews.in | Tuesday, May 05, 2026, 09:15:30 PM IST

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Rajendra Sharma Writer
राजेंद्र शर्मा
वरिष्ठ पत्रकार
एवं संपादक, ‘लोकलहर’
वरिष्ठ पत्रकार और ‘लोकलहर’ के संपादक राजेंद्र शर्मा ने 2026 के विधानसभा चुनावों (विशेषकर पश्चिम बंगाल और असम) में चुनाव आयोग की संदिग्ध भूमिका, लोकतांत्रिक अधिकारों के हनन और सत्ता तंत्र के खुल्लमखुल्ला दुरुपयोग पर एक बेहद गंभीर और विचारोत्तेजक आलेख लिखा है। यह आलेख भारतीय जनतंत्र के सामने खड़ी मौजूदा चुनौतियों को बेनकाब करता है।
HIGHLIGHTS
  1. प. बंगाल और असम विधानसभा चुनावों में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल; धीमी मतगणना और पक्षपात के आरोप।
  2. मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण के नाम पर बंगाल में 25 लाख वैध मतदाताओं के नाम काटे जाने को लेखक ने जनतंत्र का ‘अपहरण’ करार दिया है।
  3. लेखक ने मौजूदा हालात की तुलना 1972 के बंगाल चुनावों से की है, जब सरकारी मशीनरी और पुलिस के दुरुपयोग से सत्ता हासिल की गई थी।
  4. तमिलनाडु में ‘टीवीके’ और केरल में ‘यूडीएफ’ की जीत से बदलते सियासी समीकरणों के बीच लोकतांत्रिक ताकतों की एकजुटता पर जोर।

केंद्रीय सत्ता की जीत, जनतंत्र की हार!
(आलेख : राजेंद्र शर्मा)

विधानसभा चुनाव के मौजूदा चक्र के संबंध में और खासतौर पर प. बंगाल के संबंध में जो बदतरीन आशंकाएं जतायी जा रही थीं, सच साबित हुई है। भाजपा पहली बार पश्चिम बंगाल में सत्ता पर काबिज हुई है। बेशक, पूरी तरह से अपनी साख खो चुके चुनाव आयोग ने, मतगणना में अपनी बची-खुची साख की भी बलि चढ़ा दी है। पहले बंगाल की ही बात करें, तो मतगणना के दिन दोपहर बाद, साढ़े तीन बजे तक 294 विधानसभा सीटों में से सिर्फ 3 सीटों के नतीजे चुनाव आयोग के वेबसाइट पर जारी किए गए थे। बेशक, चुनाव आयोग के वेबसाइट पर 200 सीटों पर लीड की जानकारी भी आ चुकी थी, लेकिन इस समय तक कुल वोट में से आधे से कुछ ही ज्यादा वोटों की गिनती हो पायी थी। हैरानी की बात नहीं है कि इस चुनाव में केंद्र की सत्ताधारी भाजपा की मुख्य प्रतिद्वंद्वी, तृणमूल कांग्रेस चुनाव आयोग पर मतगणना जान-बूझकर धीमी करने से लेकर, उसकी चुनावी रूप से मजबूत सीटों पर मतगणना की स्थिति छुपाने तक के आरोप लगा रही थी। याद दिला दें कि मतगणना की यह मंथर चाल, सिर्फ प. बंगाल में ही नहीं थी। यह तो जैसे चुनाव आयोग का नया नार्मल ही है। तभी तो पुड्डुचेरी जैसे छोटे राज्य (वास्तव में विधानसभा युक्त केंद्र शासित क्षेत्र) तक में, इस समय तक 25 में से कुल 17 सीटों के ही नतीजे जारी किए जा सके थे और बाकी 8 सीटों पर लीड ही बतायी जा रही थी。

बहरहाल, चुनावी मतगणना की विशेष रूप से धीमी रफ्तार, चुनावों के इस चक्र की असली समस्या नहीं है। यह तो एक लक्षण है, चुनाव आयोग के अपनी उस मूल संकल्पना से पूरी तरह से पीछा छुड़ाकर, सत्ताधारी भाजपा के राजनीतिक-चुनावी हितों को आगे बढ़ाने का एक घातक हथियार बन जाने का, जबकि उससे चुनाव प्रक्रिया तथा जनतंत्र के मुख्य हितधारकों के रूप में, सभी राजनीतिक पार्टियों का भरोसा जीतते हुए काम करने वाले, रेफरी की भूमिका निभाने की अपेक्षा की जाती है। चुनाव आयोग की इसी असंवैधानिक भूमिका के विभिन्न पहलू विधानसभा चुनावों के इस चक्र में और सबसे बढ़कर प. बंगाल तथा असम में सामने आए हैं, जिन्हें जीतने की उम्मीद में भाजपा ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी।

इस सिलसिले में प. बंगाल में जिस तरह, इस चुनाव की पूर्व-संध्या में मतदाता सूचियों के सघन पुनरीक्षण के नाम पर, लाखों की संख्या में वैध मतदाताओं के नाम काटने की मुहिम चलायी गयी थी, बंगाल के सवा करोड़ से ज्यादा मतदाताओं पर नागरिकता सत्यापन जैसी कसरत थोपी गयी थी और जिस तरह इस सब के चलते, अंतत: 25 लाख मतदाताओं को 2026 के विधानसभा चुनाव में मताधिकार से वंचित ही नहीं कर दिया गया है, आगे के लिए उनकी नागरिकता-मताधिकार पर सवालों का घेरा लगा छोड़ दिया गया है, उसके संंबंध में हम पहले भी अपने आलेखों में चर्चा कर चुके हैं। चुनाव आयोग की जिद पर और शीर्ष न्यायपालिका के अनुमोदन से, जिस तरह लाखों लोगों का मताधिकार छीना गया है, उसने जनतांत्रिक प्रक्रिया के रूप में चुनाव को जिस तरह से विकृत किया है, बल्कि एक तरह से चुनाव का अपहरण ही कर लिया है, वह भारतीय जनतंत्र के इतिहास में एक नये रसातल के छुए जाने को दिखाता है।

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केंद्र की सत्ताधारी पार्टी के बंगाल फतह करने के इस अभियान में जिस तरह पूरे तंत्र को जोता गया था और खासतौर पर शासन के पूरे दमन तंत्र को थोपा गया था, उसने प. बंगाल के ही तीन दशक से ज्यादा पहले के एक चुनाव की याद दिला दी। यह और भी उपयुक्त था कि प. बंगाल में ऐसा पहले भी हो चुका होने की याद, प्रख्यात भारतीय कार्टूनिस्ट आर के लक्ष्मण के पुर्नप्रकाशन के माध्यम से दिलायी गयी। यह 1972 का विधानसभा चुनाव था। पहले 1967 में सीपीआई (एम) की अग्रणी भूमिका के साथ बनी युक्त फ्रंट सरकार को, तब केंद्र में सत्ता में बैठी कांग्रेस ने गिराया। इसके बाद, 1969 में दोबारा और भी मजबूती से युक्त फ्रंट की सरकार आयी और कांग्रेस ने राज्यपाल का सहारा लेकर उसे भी गिराया। इसके बाद, 1972 का चुनाव इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने, इसी तरह किसी भी कीमत पर जीतने का फैसला लेकर कराया, जिसमें पुलिस बलों की ताकत का इस हद तक खुल्लमखुल्ला दुरुपयोग किया गया कि सीपीआई (एम) के नेतृत्व में विपक्ष को पहले मतगणना का और फिर विधानसभा का ही बहिष्कार करना पड़ा था।

इसके बाद, कांग्रेस प. बंगाल में सत्ता पर काबिज हो गयी, आज उन्हीं हथकंडों का सहारा लेकर भाजपा बंगाल में सत्ता पर काबिज हो रही है। और भाजपा भी यह न भूले कि इसके बाद बंगाल की जनता ने पहला मौका मिलते ही, 1977 में कांग्रेस को सत्ता से इस तरह बाहर किया था कि उसके बाद पांच दशक तक कांग्रेस बंगाल में सत्ता के आस-पास भी नहीं फटक सकी। दुर्भाग्य से हम बाकायदा तानाशाही के उसी रास्ते पर बढ़ रहे हैं। भाजपा का बंगाल में पहली बार सत्ता में पहुंचना और असम में दोबारा सत्ता पर काबिज होना, इसी का साधन बनने जा रहा है। यह इसलिए है कि यह किसी एक पार्टी के चुनाव में जीत कर सत्ता तक पहुंचने की सामान्य जनतांत्रिक प्रक्रिया का मामला नहीं है। यह जनतांत्रिक प्रक्रिया को पूरी तरह से तोड़-मरोड़कर सत्ता पर काबिज हुए जाने का मामला है।

और यह तोड़-मरोड़, सिर्फ बंगाल में पच्चीस लाख से ज्यादा लोगों का मताधिकार छीने जाने या असम में विधानसभा क्षेत्रों के इस तरह पुनर्सीमांकन का ही मामला नहीं है, जिसके जरिए यह सुनिश्चित किया गया था कि मुस्लिम मतदाताओं के प्रभाव वाली सीटों की संख्या कम से कम कर दी जाए। जाहिर है कि यह सब चुनाव आयोग के माध्यम से ही किया जा रहा था। लेकिन, इसके साथ ही चुनाव आयोग के माध्यम से ही इस चुनाव में यह भी सुनिश्चित किया जा रहा था कि संघ-भाजपा, किसी भी रोक-टोक के डर के बिना कम से कम असम और बंगाल में, कथित घुसपैठियों का झूठा हौवा खड़ाकर, खुल्लमखुल्ला सांप्रदायिक दुहाई पर आधारित चुनाव प्रचार कर सकें और धर्म के आधार पर मतदाताओं का — जाहिर है कि हिंदू मतदाताओं का — ज्यादा से ज्यादा ध्रुवीकरण कर सकें, जिसकी भारत का संविधान और चुनाव कानून हर्गिज इजाजत नहीं देते हैं。

मोदी राज के बारह सालों में, जनतंत्र को ही खोखला करने वाली ऐसी तमाम अवैधानिक तिकड़मों को, सबसे बढ़कर मीडिया पर अपने मुकम्मल नियंत्रण और न्यायपालिका के अनुकूलीकरण के जरिए, नया नार्मल बना दिया गया है। इसका प्रमुख साधन बना है चुनाव आयोग। और न्यायपालिका ने आम तौर पर इसे होने देने के जरिए, इस सब को नार्मल बनाने में मदद की है। हैरानी की बात नहीं होगी कि विधानसभा चुनाव के इस चक्र के बाद, चुनाव आयोग द्वारा टार्गेटेड तरीके से मतदाताओं का मताधिकार छीने जाने से लेकर, सत्ताधारी पार्टी को सारे अवैध हथकंडे खुलकर आजमाने देने तक, चुनाव और जनतंत्र का ही मजाक बनाने के इस खेल को और भी आगे बढ़ाया जाए। इसी प्रवृत्ति की एक बड़ी आजमाइश, अगले साल के शुरू में ही उत्तर प्रदेश में होने जा रही है। दुर्भाग्य से, मौजूदा चक्र में तमिलनाडु में डीएमके के नेतृत्ववाले मोर्चे को हराकर, फिल्म अभिनेता विजय की पार्टी टीवीके का और केरल में वामपंथी नेतृत्व वाले एलडीएफ को हराकर यूडीएफ का जीतना, तानाशाही की उक्त प्रवृत्ति के प्रतिरोध की ताकतों को कमजोर भी कर सकता है। जनतंत्र की रक्षा की परवाह करने वाली ताकतें एकजुट होकर इस प्रवृत्ति का मुकाबला करेंगी तभी बाकायदा तानाशाही के बढ़ते कदमों को रोका जा सकेगा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और साप्ताहिक पत्रिका ‘लोकलहर’ के संपादक हैं।)

ताज न्यूज़ का विशेष संपादकीय विश्लेषण: जनतंत्र के प्रहरी या सत्ता के मोहरे?

राजेंद्र शर्मा जी का यह आलेख भारतीय लोकतंत्र के उस नाज़ुक और चिंताजनक दौर का प्रामाणिक दस्तावेज़ है, जहाँ संस्थाओं की स्वायत्तता (Institutional Autonomy) और निष्पक्षता पर गंभीर और डरावने सवाल खड़े हो रहे हैं। 2026 के इन विधानसभा चुनावों ने केवल सत्ता का हस्तांतरण नहीं किया है, बल्कि चुनाव आयोग जैसी सर्वोच्च संवैधानिक संस्था की कार्यप्रणाली को कठघरे में ला खड़ा किया है। लोकतंत्र में चुनाव आयोग की भूमिका एक निष्पक्ष ‘रेफरी’ की होती है, लेकिन जब रेफरी ही किसी एक टीम के पक्ष में खेल के नियम बदलने लगे और मैदान की पिच को एकतरफा झुका दे, तो मैच का परिणाम चाहे जो भी हो, हार हमेशा ‘खेल भावना’ यानी जनतंत्र की ही होती है।

मताधिकार हनन: लोकतंत्र की हत्या का ‘नया नार्मल’
बंगाल में 25 लाख मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से गायब कर देना कोई सामान्य प्रशासनिक त्रुटि नहीं हो सकती। यह ‘डिसएनफ्रैंचाइजमेंट’ (Disenfranchisement) यानी मताधिकार से वंचित करने का एक ऐसा घातक हथियार है, जो सीधे तौर पर नागरिक अधिकारों पर प्रहार करता है। असम में परिसीमन (Delimitation) के माध्यम से जनसांख्यिकीय प्रभाव को कम करने की रणनीति भी इसी कड़ी का हिस्सा है। जब एक लोकतांत्रिक देश में नागरिकों से उनका सबसे बड़ा अधिकार—वोट देने का अधिकार—छीन लिया जाए और उन्हें नागरिकता साबित करने की अग्निपरीक्षा में झोंक दिया जाए, तो वह व्यवस्था धीरे-धीरे चुनावी तानाशाही (Electoral Autocracy) में तब्दील होने लगती है।

इतिहास की चेतावनी: 1972 से 1977 का सबक
लेखक ने 1972 के बंगाल चुनावों की याद दिलाकर एक बहुत ही सटीक ऐतिहासिक संदर्भ दिया है। उस समय भी राज्य की पुलिस और प्रशासन का भारी दुरुपयोग कर सत्ता हासिल की गई थी, जिसका परिणाम यह हुआ कि बंगाल की जनता का असंतोष उबल पड़ा और अगले ही चुनाव (1977) में वामदलों ने उस सत्ता को उखाड़ फेंका और दशकों तक कांग्रेस को वापस नहीं आने दिया। इतिहास गवाह है कि जब-जब सत्ता तंत्र का दुरुपयोग कर जनादेश को कुचलने या ‘मैन्युफैक्चर’ (Manufacture) करने का प्रयास किया जाता है, जनता का गुस्सा एक ज्वालामुखी बनकर फूटता है। आज जो दल इन संस्थागत हथकंडों का जश्न मना रहे हैं, उन्हें इतिहास के इस कड़वे सच को नहीं भूलना चाहिए कि जनता की अदालत में ‘न्याय’ भले ही देर से मिले, लेकिन वह निर्मम होता है。

दक्षिण भारत के संकेत और 2029 की आहट
दक्षिण भारत के चुनावी परिणाम भी राष्ट्रीय राजनीति के लिए गहरे संदेश दे रहे हैं। तमिलनाडु में थलापति विजय की पार्टी ‘टीवीके’ (TVK) का शानदार उदय और द्रमुक (DMK) का पतन, तथा केरल में वामपंथियों (LDF) को हटाकर कांग्रेस नीत ‘यूडीएफ’ (UDF) की सत्ता में वापसी, यह दर्शाती है कि दक्षिण भारत की राजनीति एक नई करवट ले रही है। हालाँकि लेखक इसे प्रतिरोध की ताकतों के कमजोर होने के रूप में देखते हैं, लेकिन यह क्षेत्रीय आकांक्षाओं और सत्ता-विरोधी लहर (Anti-Incumbency) का भी एक मजबूत प्रतीक है। इसके साथ ही, उत्तर प्रदेश के आगामी चुनावों में ‘ध्रुवीकरण’ की यह प्रयोग-शाला अपनी चरम सीमा पर होगी, जिसका असर सीधे 2029 के आम चुनावों पर पड़ेगा।

कुल मिलाकर, यह आलेख और मौजूदा चुनावी नतीजे भारतीय लोकतंत्र के लिए एक ‘वेक-अप कॉल’ (Wake-up Call) हैं। अगर न्यायपालिका, मीडिया और चुनाव आयोग जैसी स्वतंत्र संस्थाएं सत्ता के दबाव में झुकती रहीं, तो ‘न्यू इंडिया’ का यह मॉडल उस तानाशाही की ओर ले जाएगा जहाँ चुनाव सिर्फ एक रस्म अदायगी (Ritual) बनकर रह जाएंगे। लोकतंत्र को बचाने के लिए अब केवल राजनीतिक दलों की एकजुटता ही काफी नहीं है, बल्कि देश के हर नागरिक को अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रति सजग और मुखर होना पड़ेगा। जब संस्थाएं मौन हो जाएं, तो जनता की आवाज़ ही जनतंत्र का आखिरी कवच होती है।

Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News

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