दोहरा मापदंड: भारत पर सख़्त, चीन पर नरम क्यों है पश्चिमी मीडिया? पश्चिमी न्यूज़रूम्स के दोहरे चरित्र और औपनिवेशिक मानसिकता पर बृज खंडेलवाल का प्रखर प्रहार

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Article Desk, Taj News | Wednesday, May 20, 2026, 07:15:00 PM IST

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Brij Khandelwal Writer
बृज खंडेलवाल
वरिष्ठ पत्रकार
एवं विदेशी मामलों के विश्लेषक
वरिष्ठ पत्रकार और वैश्विक मामलों के विश्लेषक बृज खंडेलवाल ने भारत और चीन की कवरेज को लेकर पश्चिमी मीडिया (Western Media) की पक्षपातपूर्ण और दोहरी नीति का बेहद प्रखर विश्लेषण किया है। यह आलेख बेनकाब करता है कि कैसे पश्चिमी न्यूज़ रूम आज भी एक खास एजेंडे और औपनिवेशिक हैंगओवर के तहत भारत को लगातार नकारात्मक चश्मे से पेश करते हैं।
HIGHLIGHTS
  1. मई 2026 में पीएम मोदी के नॉर्वे दौरे पर उठाए गए प्रेस फ्रीडम के सवाल और पश्चिमी मीडिया की चुनिंदा नैतिकता का पर्दाफाश।
  2. चीन के शिनजियांग कैंपों और निरंकुशता पर ‘स्थिरता’ का ठप्पा, जबकि लोकतांत्रिक भारत के लिए ‘मेजॉरिटेरियन’ जैसे कड़े शब्दों का प्रयोग।
  3. भारत का खुला समाज और स्वतंत्र प्रेस ही उसकी आलोचना का कारण बनता है, जबकि बंद कम्युनिस्ट व्यवस्थाएं कड़े नैरेटिव से बच जाती हैं।
  4. ताज न्यूज़ का संपादकीय विश्लेषण: ग्लोबल साउथ (Global South) की बढ़ती आर्थिक और तकनीकी ताकत को पचा नहीं पा रहा है सदियों पुराना पश्चिमी न्यूज़रूम।

दोहड़ा मापदंड: भारत पर सख़्त, चीन पर नरम क्यों है पश्चिमी मीडिया?

— बृज खंडेलवाल

मई 2026 में जब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नॉर्वे दौरे पर गए, तो एक नॉर्वेजियन पत्रकार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस खत्म होने के बाद उनसे सवाल उछाल दिया। सवाल था : भारत प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में नॉर्वे से बहुत नीचे क्यों है?

वीडियो वायरल हो गया। पश्चिमी मीडिया ने इसे भारत में लोकतंत्र के “गिरते स्तर” की मिसाल बना दिया। लेकिन ज़रा ठहरिए। आख़िरी बार कब किसी पश्चिमी पत्रकार ने चीन के प्रेस फ्रीडम रिकॉर्ड पर इसी तरह सार्वजनिक तमाशा खड़ा किया था? चीन उन्हीं सूचियों में सबसे नीचे बैठा है। फिर भी उसकी आलोचना वैसी सुर्खियां नहीं बनाती जैसी भारत की बनती हैं।

यहीं से दोहरे मापदंड की कहानी शुरू होती है। पश्चिमी मीडिया भारत की कमियों को अक्सर तेज़ रोशनी में दिखाता है। सीएए (CAA) को मुसलमानों के खिलाफ़ कदम बताया गया। किसान आंदोलन को “तानाशाही प्रवृत्ति” का सबूत कहा गया। कोविड की दूसरी लहर की भयावह तस्वीरें पूरी दुनिया में दिखाई गईं। चुनावों की कवरेज में “हिंदू राष्ट्रवाद” और बहुसंख्यकवाद पर लगातार सवाल उठे।

पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी पूछते हैं, “इन मुद्दों पर रिपोर्टिंग होना गलत नहीं है। पत्रकारिता का काम ही सवाल पूछना है। मगर सवाल यह है कि भारत के लिए इस्तेमाल होने वाला लहजा इतना कड़ा क्यों होता है, जबकि चीन के मामले में वही तीखापन अक्सर गायब दिखता है?”

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चीन पर आरोप हैं कि उसने शिनजियांग में लाखों उइगर मुसलमानों को कैंपों में रखा। यह खबरें भी छपती हैं। लेकिन चीन को लेकर पश्चिमी मीडिया में वैसा लगातार नैरेटिव नहीं बनता कि “लोकतंत्र खतरे में है” या “सिस्टम टूट रहा है।” क्यों? क्योंकि दुनिया ने चीन से लोकतंत्र की उम्मीद ही नहीं की। भारत लोकतांत्रिक देश है, इसलिए उससे ऊंचे आदर्शों की उम्मीद की जाती है। और जब वह उन आदर्शों पर पूरी तरह खरा नहीं उतरता, तो आलोचना कहीं ज्यादा कठोर हो जाती है।

शब्दों की राजनीति बहुत कुछ कहती है। मीडिया सिर्फ खबरों से नहीं, शब्दों से भी धारणा बनाता है, कहते हैं वरिष्ठ पत्रकार जोज़फ। भारत के लिए अक्सर शब्द सुनाई देते हैं; “बैकस्लाइडिंग” (Backsliding), “मेजॉरिटेरियन” (Majoritarian), “हिंदू नेशनलिज्म” (Hindu Nationalism)। हिंदू-मुस्लिम तनाव की रिपोर्टिंग में कई बार वही पुरानी औपनिवेशिक सोच झलकती है कि भारत एक बंटा हुआ, भावनात्मक और अव्यवस्थित समाज है।

दूसरी तरफ चीन के लिए “स्थिरता”, “कुशल प्रशासन” और “विकास” जैसे शब्द इस्तेमाल होते हैं। उसकी सख़्त सरकारी कार्रवाइयों को कभी-कभी “मजबूत शासन” कहकर पेश किया जाता है। आर्थिक विकास की तारीफ होती है, जबकि मानवाधिकार का मुद्दा पीछे छूट जाता है। यह सिर्फ मीडिया बायस नहीं, इतिहास की परछाईं भी है। ब्रिटिश औपनिवेशिक दौर में भारत को अक्सर अंधविश्वासी, अव्यवस्थित और “पश्चिमी मार्गदर्शन” का मोहताज बताकर शासन को जायज़ ठहराया गया था। आज वही सोच नए और अधिक परिष्कृत रूप में कई रिपोर्टों में दिखाई देती है।

खुलापन भी बनता है वजह; एक बड़ा कारण व्यावहारिक भी है। भारत में प्रेस अपेक्षाकृत खुला है, आजाद है। विदेशी पत्रकार यहां घूम सकते हैं, लोगों से मिल सकते हैं, विवादित मुद्दों पर रिपोर्ट कर सकते हैं। इसलिए भारत की कमियां ज्यादा बाहर आती हैं। चीन में विदेशी मीडिया पर सख़्त नियंत्रण है। वहां रिपोर्टिंग आसान नहीं। नतीजा यह कि कम खबरें बाहर निकलती हैं। इसका मतलब यह नहीं कि भारत बदतर है। कई बार इसका मतलब सिर्फ इतना होता है कि भारत ज्यादा खुला समाज है।

पश्चिमी देशों के चीन से बड़े कारोबारी और रणनीतिक रिश्ते हैं। यह हक़ीक़त मीडिया के माहौल को भी प्रभावित करती है, चाहे खुलकर हो या परोक्ष रूप से। चीन पर बहुत आक्रामक आलोचना कूटनीतिक तनाव बढ़ा सकती है। भारत पर सवाल उठाना अपेक्षाकृत आसान है, क्योंकि भारत लोकतांत्रिक साझेदार माना जाता है और वहां आलोचना की कुछ गुंजाइश मौजूद है।

यह फर्क क्यों मायने रखता है, क्योंकि मीडिया की छवि सिर्फ अखबार तक सीमित नहीं रहती। यह निवेशकों, नीति निर्माताओं और आम लोगों की सोच को प्रभावित करती है। व्यापार, विदेश नीति और वैश्विक जनमत पर इसका असर पड़ता है। 1.4 अरब लोगों का देश, जो करोड़ों लोगों को गरीबी से बाहर निकाल रहा है, दुनिया की सबसे बड़ी चुनावी प्रक्रिया चला रहा है और तेजी से टेक्नोलॉजी शक्ति बन रहा है; उसे अगर लगातार नकारात्मक चश्मे से दिखाया जाए, तो तस्वीर अधूरी बन जाती है।

अगर पश्चिमी मीडिया अपनी सारी नैतिक नाराज़गी सिर्फ खुले लोकतंत्रों पर खर्च कर देगा, तो बंद और कठोर व्यवस्थाओं पर जवाबदेही का दबाव कम हो जाएगा। पश्चिमी न्यूज़रूम में भारत और ग्लोबल साउथ (Global South) की आवाज़ों को ज्यादा जगह मिलनी चाहिए। भारत की तुलना सिर्फ पश्चिमी मॉडल से नहीं, बल्कि समान सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों वाले देशों से भी होनी चाहिए।

भारत में समस्याएं हैं। प्रेस फ्रीडम, सांप्रदायिक तनाव और राजनीतिक ध्रुवीकरण पर सवाल उठने चाहिए। लेकिन वही कसौटी चीन समेत हर देश पर भी बराबरी से लागू होनी चाहिए। फिलहाल ऐसा नहीं दिखता। और भारत तथा चीन की कवरेज में यही फर्क पश्चिमी मीडिया के नजरिए के बारे में उतना ही बताता है, जितना इन दोनों देशों के बारे में।

ताज न्यूज़ का विशेष संपादकीय विश्लेषण: न्यू-कॉलोनियलिज्म और ग्लोबल साउथ को दबाने का कूटनीतिक खेल

बृज खंडेलवाल जी का यह आलेख अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीति (Geopolitics) और वैश्विक मीडिया के उस छिपे हुए पूर्वाग्रह (Media Bias) का कच्चा चिट्ठा खोलता है, जिस पर भारतीय बौद्धिक जगत में अक्सर लीपापोती कर दी जाती है। न्यूयॉर्क टाइम्स (New York Times), बीबीसी (BBC), या गार्जियन (The Guardian) जैसे पश्चिमी मीडिया संस्थानों की कवरेज को यदि आप पिछले एक दशक में बारीक नज़र से देखें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि उनका दृष्टिकोण भारत के प्रति सुधारात्मक नहीं, बल्कि दमनकारी और उपदेशात्मक (Preachy) रहा है। मई 2026 में नॉर्वे के दौरे पर प्रधानमंत्री मोदी से पूछा गया सवाल इसका एक तात्कालिक उदाहरण है। भारत की कमियों पर बहस होना देश के भीतर लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन जब पश्चिमी न्यूज़रूम्स इसे ‘लोकतांत्रिक पतन’ (Democratic Backsliding) का नाम देकर वैश्विक मंचों पर भारत की छवि को धूमिल करने का एक संगठित प्रयास (Organized Campaign) बनाते हैं, तो इसके पीछे के कूटनीतिक और आर्थिक स्वार्थों को समझना बेहद आवश्यक हो जाता है।

औपनिवेशिक हैंगओवर (Colonial Hangover) और नस्लीय श्रेष्ठता का ढोंग:
समस्या की जड़ उस ‘सफेद चमड़ी की नस्लीय श्रेष्ठता’ (Racial Superiority Complex) में है जो आज भी मानती है कि ग्लोबल साउथ (विशेषकर भारत) को सुसंस्कृत और लोकतांत्रिक बनाने की ज़िम्मेदारी पश्चिम की है। ब्रिटिश शासनकाल में जिस ‘व्हाइट मैन्स बर्डन’ (White Man’s Burden) के सिद्धांत के सहारे भारत की लूट को सही ठहराया गया था, आज वही सिद्धांत ‘प्रेस फ्रीडम इंडेक्स’ और ‘ह्यूमन राइट्स वॉच’ जैसी रिपोर्टों के नए परिष्कृत रूप में जिंदा है। जब भारत डिजिटल इकॉनमी, स्पेस टेक्नोलॉजी और फार्मास्यूटिकल्स में पश्चिम के एकाधिकार को चुनौती देने लगता है, तो ये न्यूज़रूम्स भारत के आंतरिक सामाजिक अंतर्विरोधों (जैसे हिंदू-मुस्लिम तनाव या जातिगत विमर्श) को इस तरह बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं मानो भारत गृहयुद्ध की कगार पर खड़ा एक ‘अराजक समाज’ हो। इसके विपरीत, चीन जो एक खुली तानाशाही (Totalitarian State) है, जहाँ न कोई स्वतंत्र कोर्ट है, न विपक्षी दल और न ही कोई स्वतंत्र प्रेस, उसकी आलोचना करते समय पश्चिमी मीडिया के हाथ कांपते हैं।

आर्थिक मजबूरियां और ‘बाज़ार’ का क्रूर अर्थशास्त्र:
लेखक ने अत्यंत सटीकता से लिखा है कि “दुनिया ने चीन से लोकतंत्र की उम्मीद ही नहीं की।” लेकिन यह आधा सच है; पूरा सच यह है कि पश्चिम की बड़ी-बड़ी टेक कंपनियाँ और वॉल स्ट्रीट (Wall Street) के निवेशक चीन के विशाल मैन्युफैक्चरिंग बाज़ार पर निर्भर हैं। चीन के खिलाफ कड़ा नैरेटिव बनाने का अर्थ है खरबों डॉलर के व्यापारिक हितों को दांव पर लगाना। इसलिए बीजिंग की निरंकुश कार्रवाइयों को ‘कुशल सुशासन’ (Efficient Governance) का नाम दे दिया जाता है। दूसरी ओर, भारत एक खुला और पारदर्शी लोकतंत्र है, जहाँ कानून का राज है। भारत में विदेशी पत्रकारों को जो आज़ादी मिलती है, वे उसी का इस्तेमाल करके भारत की गरीबी और मलिन बस्तियों की तस्वीरें बेचते हैं ताकि उनकी ‘सेंसेशनेलिज्म’ की भूख शांत हो सके। यह एक खुला समाज होने की वह कीमत है जो भारत चुका रहा है। बंद और दमनकारी व्यवस्थाएं अपनी क्रूरता को पर्दे के पीछे छिपाने में सफल हो जाती हैं, जबकि भारत का खुलापन ही उसके खिलाफ एक कूटनीतिक हथियार बना दिया जाता है।

निष्कर्ष: वैश्विक नैरेटिव का ‘डिकॉलोनाइजेशन’ अनिवार्य है:
‘ताज न्यूज़’ का यह दृढ़ मानना है कि जब तक वैश्विक विमर्श (Global Narrative) की कमान केवल कुछ चुनिंदा पश्चिमी न्यूज़रूम्स के हाथ में रहेगी, तब तक भारत और ग्लोबल साउथ के देशों के साथ यह न्यायसंगत व्यवहार नहीं होगा। 1.4 अरब की आबादी वाला भारत, जो हर साल पारदर्शी तरीके से दुनिया का सबसे बड़ा मानवीय चुनाव कराता है, उसे उन देशों से लोकतंत्र का सर्टिफिकेट लेने की आवश्यकता नहीं है जिनका अपना इतिहास साम्राज्यवाद, नस्लभेद और युद्धों से सना हुआ है। भारत में प्रेस की आज़ादी और सांप्रदायिक सद्भाव पर आंतरिक सुधार होने चाहिए, लेकिन वे सुधार हमारे अपने संवैधानिक मूल्यों के तहत होने चाहिए, न कि किसी पश्चिमी दबाव या चुनिंदा नैतिकता (Selective Morality) के तहत। अब समय आ गया है कि ग्लोबल साउथ अपनी खुद की मजबूत मीडिया संस्थाएं खड़ी करे, ताकि दुनिया को भारत की असली तस्वीर—जो विकास, मेधा और लोकतांत्रिक जीवंतता से भरी है—साफ और बेदाग नज़र आ सके।

Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News

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