जनसांख्यिकी समिति और हिंदुत्व की व्यापक परियोजना: उच्च-स्तरीय समिति (HLC) का गठन और विस्थापन की वैचारिक मीमांसा

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Opinion Desk, Taj News | Wednesday, June 17, 2026, 08:31:08 PM IST

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Murlidharan
मुरलीधरन
केंद्रीय सचिवमंडल सदस्य, माकपा
(अनुवाद: संजय पराते)
माकपा के केंद्रीय सचिवमंडल सदस्य मुरलीधरन का यह प्रखर और गंभीर राजनैतिक-ऐतिहासिक आलेख (अंग्रेजी से अनुवाद: संजय पराते, उपाध्यक्ष, छत्तीसगढ़ किसान सभा) केंद्र सरकार द्वारा गठित उच्च-स्तरीय जनसांख्यिकी समिति (HLC) के नीतिगत निहितार्थों, वैश्विक ऐतिहासिक उदाहरणों और बहुसंख्यकवादी नागरिकता के नए ब्लूप्रिंट की विस्तृत विवेचना करता है।
HIGHLIGHTS
  1. उच्च-स्तरीय समिति (HLC) का गठन: अवैध आव्रजन और असामान्य बसावट के विश्लेषण हेतु जस्टिस प्रकाश प्रभाकर नवलेकर (सेवानिवृत्त) की अध्यक्षता में गठित पाँच सदस्यीय समिति के विधिक पक्ष पर कड़ा प्रहार।
  2. सांख्यिकीय अंतर्विरोध: राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे (NFHS) के आंकड़ों का हवाला देकर हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच निरंतर घटती प्रजनन दर (अंतर मात्र 0.42) के बावजूद जनसांख्यिकीय संकट का हौवा खड़ा करने की आलोचना।
  3. ऐतिहासिक व वैश्विक समानांतर: नाज़ी जर्मनी के 1935 के न्यूरेम्बर्ग कानूनों, नागरिकता संशोधन, विलियम शिरेर की प्रख्यात पुस्तक के उद्धरणों और एम.एस. गोलवलकर के वैचारिक ब्लूप्रिंट के साथ वर्तमान प्रशासनिक ढाँचे की तुलना।
  4. नागरिकता की बदलती परिभाषा: मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण और संस्थागत निगरानी के ज़रिए धर्मनिरपेक्ष भारतीय गणराज्य को बहुसंख्यकवादी बहुसंख्यक चेतना में तब्दील करने की रणनीति का मुकम्मल पर्दाफाश।

जनसांख्यिकी समिति और हिंदुत्व की व्यापक परियोजना

— मुरलीधरन (अनुवाद : संजय पराते)

केंद्र सरकार ने एक उच्च-स्तरीय समिति (एचएलसी) बनाने की घोषणा की है। इसका मकसद कथित तौर पर अवैध आव्रजन और असामान्य बसावट के तरीकों आदि से होने वाले “अस्वाभाविक” जनसांख्यिकीय बदलावों की जांच करना है। प्रेस सूचना ब्यूरो की विज्ञप्ति में कहा गया है कि “यह समिति धार्मिक और सामाजिक समुदायों के स्तर पर आबादी में होने वाले असामान्य बदलावों के पैटर्न का विश्लेषण करेगी और इस मुद्दे से निपटने के लिए एक सुनियोजित और समय-सीमा के भीतर लागू होने वाला समाधान पेश करेगी”।

जस्टिस प्रकाश प्रभाकर नवलेकर (सेवानिवृत्त) की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय समिति को एक साल के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपने का काम दिया गया है। यह बात दिलचस्प लग सकती है कि सरकार ने जनगणना की प्रक्रिया, जिससे जनसांख्यिकी से जुड़े आंकड़े सामने आते, पूरी होने का इंतज़ार करने के बजाय, जल्दबाज़ी में एचएलसी का गठन कर दिया है। सालों से, आरएसएस-भाजपा यह दिखाने की कोशिश कर रही है कि भारत आंतरिक जनसांख्यिकीय खतरे से जूझ रहा है। 2014 में केंद्र में सत्ता में आने के बाद से यह बात और ज़ोर-शोर से कही जाने लगी है। “दीमक” से लेकर “घुसपैठिए” तक, शब्द भले ही अलग-अलग हों, लेकिन निशाना एक ही है, मुख्य रूप से मुसलमान — जिन पर देश की “जनसांख्यिकीय संतुलन” को बिगाड़कर अस्थिरता पैदा करने का आरोप लगाया जाता है।

नई कमिटी इसे संस्थागत रूप देगी। इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि कमिटी के किसी भी सदस्य का जनसांख्यिकी से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है। असल में, कमिटी के चेयरमैन प्रकाश प्रभाकर नवलेकर ने खुलकर कहा कि उन्हें “हैरानी” हुई है कि उन्हें कमिटी का प्रमुख बनाया गया है, और जनसांख्यिकी तथा अवैध प्रवास उनके लिए नए विषय हैं। आरएसएस के लिए यह मुद्दा कितना अहम है, यह बात ‘ऑर्गनाइज़र’ के 14 जून के अंक से एक बार फिर साफ़ होती है। इस अंक में इस विषय पर 27 पेज समर्पित किए गए हैं और साथ ही सुरक्षा और घुसपैठ के नज़रिए से “सिलीगुड़ी कॉरिडोर” पर भी चार पेज दिए गए हैं।

ताज न्यूज़ की रपट के अनुसार, आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत ने इस साल की शुरुआत में कहा था, “घुसपैठ को लेकर सरकार को बहुत कुछ करना है। उन्हें घुसपैठियों की पहचान करके उन्हें वापस भेजना होगा। अब तक ऐसा नहीं हो रहा था। लेकिन धीरे-धीरे यह काम शुरू हो गया है और आगे और तेज होगा। जब जनगणना या एसआईआर होता है, तो ऐसे कई लोग सामने आते हैं, जो इस देश के नागरिक नहीं हैं; उन्हें अपने आप इस प्रक्रिया से बाहर कर दिया जाता है। लेकिन हम एक काम कर सकते हैं: हम उनकी पहचान करने का काम कर सकते हैं। हमें उनकी पहचान करनी चाहिए और संबंधित अधिकारियों को इसकी सूचना देनी चाहिए। हमें पुलिस को बताना चाहिए कि हमें शक है कि ये लोग विदेशी हैं…”।

इस बात का उल्लेख करना ज़रूरी है कि मई 2026 में पश्चिम बंगाल में सत्ता संभालने के बाद भाजपा सरकार के शुरुआती फैसलों में से एक फैसला नौ ज़िलों में 142.79 एकड़ ज़मीन बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स (बीएसएफ) को सौंपने का है। भाजपा ने अपने घोषणापत्र में संवेदनशील भारत-बांग्लादेश सीमा पर कंटीले तारों की बाड़ और सीमाओं पर नई चौकियां बनाने के लिए 600 एकड़ ज़मीन हस्तांतरित करने का वादा किया था।

प्रजनन दर का यथार्थ बनाम जनसांख्यिकीय संकट का भय

एचएलसी का गठन हिंदुत्व की राजनीति के व्यापक दायरे में पूरी तरह से फिट बैठता है। नागरिकता संशोधन कानून, नागरिकों का राष्ट्रीय रजिस्टर (एनआरसी), धर्म-परिवर्तन विरोधी कानून, अलग-अलग धर्मों के लोगों के बीच रिश्तों पर हमले, कई राज्यों में समान नागरिक संहिता और “आबादी के असंतुलन” की बार-बार की जाने वाली बातें — ये सभी एक ही विचारधारा का हिस्सा हैं। इनमें सबसे गंभीर बात मतदाता सूची का ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ है। इन सभी कदमों का मकसद बहुसंख्यकवादी नज़रिए से नागरिकता की परिभाषा को बदलना है। धर्मनिरपेक्ष भारतीय गणराज्य को धीरे-धीरे एक ऐसे हिंदू राष्ट्र के रूप में बदला जा रहा है, जहाँ अल्पसंख्यकों का अस्तित्व शर्तों और शक के दायरे में है।

एचएलसी के काम करने के तरीके और मकसद से यह साफ़ पता चलता है कि इसका मकसद एक ऐसी सोच को संस्थागत वैधता देना है, जो लंबे समय से हिंदुत्व को बढ़ावा देने का मुख्य आधार रही है — यानी यह कि हिंदू बहुसंख्यक आबादी अपनी ही ज़मीन पर खतरे में है। यह सोच तब भी बनी हुई है, जब ऐसी आशंकाओं को साबित करने के लिए आबादी से जुड़ा कोई सबूत नहीं मिलता। भारत में सभी धार्मिक समुदायों में प्रजनन दर लगातार कम हो रही है। पिछले कुछ सालों में समुदायों के बीच का अंतर भी काफ़ी कम हुआ है।

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राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे के आंकड़ों के अनुसार, 2019-21 में हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच प्रजनन दर का अंतर प्रति महिला सिर्फ़ 0.42 बच्चे था, जबकि 1992 में यह अंतर 1.1 था। 1992-93 के बाद से मुस्लिमों में प्रजनन दर 46.5% कम हुआ है, जबकि हिंदुओं में यह 41.2% कम हुआ है — यानी मुस्लिमों में प्रजनन दर तेज़ी से कम हो रही है। पिछले 20 सालों में हिंदुओं में प्रजनन दर 30% कम हुई है, जबकि मुस्लिमों में यह कमी 35% रही है।

रिपोर्ट के अनुसार, जनसांख्यिकी से जुड़े डर की राजनीति एक साथ कई मकसद पूरे करती है। पहला, यह देश के भीतर ही एक स्थायी दुश्मन खड़ा कर देती है। नव-उदारवादी शासन की नाकामियों या कॉरपोरेट के हाथों में संपत्ति के संकेद्रण पर सवाल उठाने के बजाय, लोगों के एक हिस्से को यह यकीन दिलाया जाता है कि देश की समस्याएं घुसपैठियों, जनसांख्यिकीय साज़िशों या सांस्कृतिक रूप से बाहरी लोगों की वजह से पैदा हो रही हैं। दूसरी बात, जनसांख्यिकीय राजनीति, जातिगत विभाजनों के बावजूद, एक एकजुट हिंदू राजनीतिक पहचान बनाने में मदद करती है। हिंदुत्व ने एक व्यापक बहुसंख्यक चेतना पैदा करके हिंदू समाज के भीतर मौजूद अंतर्विरोधों को दबाने की कोशिश की है। सामाजिक चिंताओं का रुख जातिगत उत्पीड़न, बेरोजगारी या वर्गीय शोषण के बजाए धार्मिक ध्रुवीकरण की ओर मोड़ देता हैं।

तीसरी बात, जनसांख्यिकीय डर की वजह से सरकारी निगरानी और दस्तावेजीकरण का दायरा बढ़ता है। एक बार जब अप्रवासन और आबादी में बदलाव को सुरक्षा के नज़रिए से देखा जाने लगता है, तो कड़े या असाधारण कदमों को सही ठहराना आसान हो जाता है। देश की अखंडता की रक्षा के नाम पर नागरिकता की जांच, निवारक निरोध प्रणाली, सीमा पर पुलिस जांच, आंकड़े इकट्ठा करना और खास तौर पर कमज़ोर तबकों की जांच-पड़ताल जैसी चीज़ों को सामान्य माना जाने लगता है। ऐसी नीतियों का सबसे ज़्यादा बोझ गरीब, भूमिहीन, प्रवासी और बिना कागज़ात वाले लोगों को उठाना पड़ता है। एसआईआर इसका एक उदाहरण है, जहाँ एक करोड़ से ज़्यादा लोग न सिर्फ़ वोट देने के अधिकार से वंचित हो गए हैं, बल्कि वे ऐसे “संदिग्ध” नागरिक बन गए हैं जिन्हें उनके अधिकार और सुविधाओं से वंचित किया जा रहा है।

वैश्विक इतिहास: फासीवाद और न्यूरेम्बर्ग कानूनों का समानांतर

मदुरै में हुए सीपीआई(एम) के 24वें महाधिवेशन में केंद्र की मौजूदा सरकार को “नव-फासीवादी लक्षण” वाली बताया गया था। जर्मनी में जिस तरह का फासीवाद देखा गया था, उससे हमें यह सीख मिलती है कि लोकतांत्रिक समाज में डर, प्रचार और नौकरशाही की वैधता के ज़रिए धीरे-धीरे भेदभावपूर्ण राजनीति को सामान्य बनाया जा सकता है। एडॉल्फ हिटलर ने बार-बार यह तर्क दिया था कि जर्मनी को आबादी और सभ्यता के स्तर पर कथित तौर पर बाहरी आबादी, खासकर यहूदियों, से विनाश का खतरा है। नाज़ी प्रचार ने अल्पसंख्यकों को देश की शुद्धता, सुरक्षा और भविष्य के लिए अस्तित्व का खतरा बना दिया। आर्थिक तंगी और राजनीतिक अस्थिरता को देश के भीतर मौजूद दुश्मनों के प्रति नफ़रत में बदल दिया गया। 1935 के न्यूरेम्बर्ग कानूनों के तहत नागरिकता को नस्ल के आधार पर फिर से परिभाषित किया गया, जिससे यहूदियों को समान नागरिक अधिकार नहीं मिले।

अमेरिकी पत्रकार और इतिहासकार विलियम शिरेर ने अपनी मशहूर किताब ‘द राइज़ एंड फ़ॉल ऑफ़ द थर्ड राइख़’ में कहा है कि फ़ासीवाद का उदय सिर्फ़ किसी एक नेता की महत्वाकांक्षाओं की वजह से नहीं हुआ था, बल्कि इसलिए हुआ था, क्योंकि लोकतांत्रिक संस्थाएँ अंदर से कमज़ोर हो गई थीं और अभिजात वर्ग को लगता था कि वे तानाशाही ताक़तों के साथ अपनी पटरी बैठा सकते हैं और उन पर नियंत्रण रख सकते हैं। शिरेर लिखते हैं, “15 सितंबर 1935 के तथाकथित न्यूरेम्बर्ग कानूनों ने यहूदियों से जर्मन नागरिकता छीन ली और उन्हें सिर्फ़ ‘प्रजा’ का दर्जा दिया गया। कानून या नाज़ी आतंक के ज़रिए यहूदियों को सरकारी और निजी नौकरियों से इस हद तक बाहर कर दिया गया कि उनमें से लगभग आधे लोगों के पास आजीविका का कोई साधन नहीं बचा। ‘थर्ड राइख’ के पहले साल, यानी 1933 में, उन्हें सरकारी पदों, नागरिक सेवा, पत्रकारिता, रेडियो, खेती, शिक्षण, थिएटर और फ़िल्मों से बाहर कर दिया गया; 1934 में उन्हें स्टॉक एक्सचेंज से निकाल दिया गया।”

गोलवलकर का वैचारिक ब्लूप्रिंट और आधुनिक चिंताएं

ताज न्यूज़ की रपट के अनुसार, ‘दूसरे’ के प्रति यह नफ़रत हिंदुत्व के बड़े नेता एम.एस. गोलवलकर की शिक्षाओं में भी दिखती है। वे कहते हैं: “वे (मुसलमान और ईसाई) बेशक इसी भूमि पर पैदा हुए हैं, लेकिन क्या वे इस भूमि के प्रति नमकहलाल हैं? …नहीं। उनके धर्म बदलने के साथ ही, देश के प्रति प्रेम और समर्पण की भावना भी खत्म हो गई है।” यह कोई छिपी हुई बात नहीं है कि गोलवलकर हिटलर की खुलकर तारीफ़ करता था। 1939 में हिटलर के विनाशकारी युद्ध शुरू करने से कुछ महीने पहले छपी अपनी किताब ‘वी ऑर अवर नेशनहुड डिफाइंड’ में उन्होंने लिखा था: “अपनी नस्ल और संस्कृति की शुद्धता बनाए रखने के लिए, जर्मनी ने सेमिटिक नस्लों — यहूदियों — को देश से बाहर निकालकर दुनिया को चौंका दिया। यहाँ नस्लीय गर्व का सबसे ऊँचा रूप देखने को मिला।”

गोलवलकर ने मुसलमानों के मुकाबले देश पर हिंदुओं के खास दावे पर ज़ोर देते हुए तर्क दिया कि “हिंदुस्तान में रहने वाली विदेशी जातियों को या तो हिंदू संस्कृति और भाषा अपनानी होगी, हिंदू धर्म का सम्मान और आदर करना सीखना होगा, हिंदू जाति और संस्कृति यानी हिंदू राष्ट्र की महिमा के अलावा कोई और विचार नहीं रखना होगा और हिंदू जाति में घुलने-मिलने के लिए अपनी अलग पहचान छोड़नी होगी; या फिर वे देश में हिंदू राष्ट्र के पूरी तरह अधीन होकर, बिना किसी दावे या विशेषाधिकार के, रह सकते हैं, और उन्हें कोई खास सुविधाएं या नागरिक अधिकार भी नहीं मिलेंगे।” यह आज भी हिंदुत्व की परियोजना का ब्लूप्रिंट और आरएसएस की सोच का आधार बना हुआ है। गोलवलकर की दूसरी किताब ‘बंच ऑफ़ थॉट्स’ (विचार मीमांसा) में भी उन्हीं विचारों का सार था।

रिपोर्ट के अनुसार, हिंदुत्व के प्रचार में मुसलमानों को सालों से, बहुत ज़्यादा दिखने वाले और राजनीतिक रूप से संदिग्ध के तौर पर चित्रित करने की कोशिश की गई है। जनसांख्यिकीय समिति का गठन हिंदुत्व की परियोजना को आगे बढ़ाने का एक और माध्यम है। इससे नागरिक ऐसे जनसांख्यिकीय विषयों में बदल जाएंगे, जिनकी वैधता बड़े पैमाने पर पहचान, दस्तावेज़ों और राजनीतिक अनुरूपता पर निर्भर होकर रह जाएगी।

Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News

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