अंतरराष्ट्रीय नृत्य दिवस: सीटी, पायल और सिनेमा… जब बॉलीवुड ने दी डांस को नई ज़िंदगी! विशेष आलेख

आर्टिकल Desk, tajnews.in | Wednesday, April 29, 2026, 07:15:00 PM IST

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Brij Khandelwal Writer
बृज खंडेलवाल
वरिष्ठ पत्रकार
एवं विश्लेषक
वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक बृज खंडेलवाल ने ‘अंतरराष्ट्रीय नृत्य दिवस’ (29 अप्रैल) के मौके पर अपने इस बेहद खूबसूरत आलेख में बताया है कि कैसे भारतीय सिनेमा (बॉलीवुड) ने नृत्य को सिर्फ शारीरिक गति से निकालकर आत्मा की अभिव्यक्ति बना दिया। ‘पाकीज़ा’ की मीना कुमारी से लेकर ‘दिल से’ के शाहरुख खान और ऑस्कर विजेता ‘नाटू-नाटू’ तक, बॉलीवुड ने शास्त्रीय और लोक कलाओं को कैसे एक नई ज़िंदगी और वैश्विक पहचान दी है, जानिए इस शानदार लेख में:
HIGHLIGHTS
  1. 29 अप्रैल (अंतरराष्ट्रीय नृत्य दिवस) के मौके पर जानिए कैसे बॉलीवुड ने भारतीय नृत्य कला को एक नई पहचान और वैश्विक ज़िंदगी दी है।
  2. ‘पाकीज़ा’ से लेकर ‘दिल से’ और ‘देवदास’ तक, हिंदी सिनेमा ने शास्त्रीय (Classical) और लोक नृत्य (Folk Dance) को घर-घर तक पहुँचाया है।
  3. बॉलीवुड में नृत्य केवल शरीर की गति नहीं, बल्कि भावनाओं, तड़प और आत्मा की सच्ची अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम बन गया है।
  4. ‘डिस्को डांसर’ से लेकर ऑस्कर विजेता ‘नाटू-नाटू’ (RRR) तक, भारतीय सिनेमा के फ्यूजन डांस ने पूरी दुनिया में अपनी ताकत और लय दिखाई है।

आओ डांस करें
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नृत्य दिवस, 29 अप्रैल
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सीटी, पायल और सिनेमा: जब बॉलीवुड ने नृत्य को दी नई ज़िंदगी
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सीटी बजाती रेल दूर अंधेरे में गुम हो रही है। धुएं की लकीर हवा में तैरती है। कोठे की रोशनी में पायल छनकती है, और मीना कुमारी धीमे-धीमे थिरक उठती हैं。
पाकीज़ा का “यूँ ही कोई मिल गया था”: यह सिर्फ एक गीत नहीं, दर्द, नज़ाकत और तड़प का नृत्य है। जैसे हर कदम में एक अधूरी मोहब्बत सांस ले रही हो。
यहीं से समझ आता है; नृत्य केवल शरीर की गति नहीं, आत्मा की अभिव्यक्ति है。
इंसान नाचता है, जब खुशी छलकती है। और तब भी, जब भीतर कुछ टूटता है。
भारत में नृत्य भक्ति है, साधना है, तड़पन है, विरक्ति है। तांडव डराता है, रास लीला लुभाती है। हर नृत्य का रंग गहरा है। नृत्य जीवन का हिस्सा है। और इस जीवन को सबसे ज्यादा गति, सबसे ज्यादा ऑक्सीजन, अगर किसी ने दी है, तो वह है बॉलीवुड, जहां हर कदम कहानी कहता है, हर थिरकन में भाव है, संदेश है। बॉलीवुड में हर इशारा एक संवाद है। हर ठुमका एक कथानक。
फिल्म दिल से का “छैयां छैयां”, चलती ट्रेन पर शाहरुख खान का नृत्य, सिनेमा की सबसे साहसी कल्पनाओं में से एक है。
वहीं देवदास का “ढोला रे ढोला”, माधुरी दीक्षित और ऐश्वर्या राय के साथ शास्त्रीय सौंदर्य की जीवंत तस्वीर बन जाता है。
बॉलीवुड ने नृत्य को सिर्फ दिखाया नहीं, उसे जिया है, उसे कहानी का हिस्सा बनाया है। शास्त्रीय और लोक को नई सांस दी है。
एक समय था जब भरतनाट्यम, कथक और ओडिसी मंदिरों और विशेष मंचों तक सीमित थे。
फिल्मों ने इन्हें घर-घर पहुंचाया। अब ये सिर्फ परंपरा नहीं, लोकप्रिय संस्कृति का हिस्सा हैं。
लोक नृत्य भी फिल्मों में खिल उठे। घूमर, गरबा और भांगड़ा; इनकी मिट्टी की खुशबू अब दुनिया भर में महसूस होती है。
पद्मावत का घूमर हो या बाजीराव मस्तानी का “पिंगा”, बॉलीवुड ने लोक को ग्लैमर और पहचान दी。
भावनाओं का सबसे सच्चा रूप होता है नृत्य। नृत्य तब जन्म लेता है जब शब्द कम पड़ जाते हैं。
एक दूजे के लिए में कमल हासन का नृत्य, गुस्से और हताशा का विस्फोट है। हर हरकत में बेचैनी है。
वहीं गाइड में वहीदा रहमान का “आज फिर जीने की तमन्ना”, जैसे आत्मा को आज़ादी मिल गई हो。
बॉलीवुड ने इन भावनाओं को दृश्य बना दिया। उन्हें एक चेहरा दिया, एक लय दी。
और आजकल, कंटेंपरेरी शैलियां तो कमाल कर रही हैं。
बॉलीवुड नृत्य की सबसे बड़ी ताकत है उसका फ्यूजन。
यह परंपरा और आधुनिकता का संगम है, जहां कथक के चक्कर, भरतनाट्यम की मुद्राएं और लोक की ऊर्जा, ट्विस्ट, रॉक एंड रोल और हिप-हॉप के साथ मिलकर कुछ नया रचते हैं। मिथुन दा का डिस्को डांसर एक नए युग का आगाज था。
तेज़ाब का “एक दो तीन”, इस फ्यूजन का क्लासिक उदाहरण है。
और आरआरआर का “नाटू नाटू”, जिसने ऑस्कर जीतकर दुनिया को भारतीय नृत्य की ताकत दिखाई。
टीवी शो जैसे डांस इंडिया डांस ने इस क्रांति को और गति दी। अब हर गली, हर शहर से नर्तक उभर रहे हैं。
नृत्य जो कभी थमता नहीं
बॉलीवुड ने नृत्य को सिर्फ मंच नहीं दिया, उसे जीवन दिया。
हर फिल्म, हर गीत, एक नई सांस है, एक नया विस्तार。
और शायद यही इसकी सबसे बड़ी खूबसूरती है; यह बदलता है, लेकिन अपनी जड़ों को नहीं छोड़ता। जब भी कहीं संगीत बजता है, যখন भी दिल में कोई लहर उठती है; नृत्य जन्म लेता है। क्योंकि नृत्य…सिर्फ देखा नहीं जाता, महसूस किया जाता है。

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Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News
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