‘नीचे दुकान, ऊपर मकान’: कंक्रीट के बोझ से उजड़ते भारतीय शहरों पर बृज खंडेलवाल का प्रखर आलेख

आर्टिकल Desk, Taj News | Monday, April 27, 2026, 02:45:00 PM IST

Taj News Logo
Taj News
Article Desk
Brij Khandelwal Writer
बृज खंडेलवाल
वरिष्ठ पत्रकार
एवं विश्लेषक
वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक बृज खंडेलवाल ने अपने इस बेहद मार्मिक आलेख में भारतीय शहरी नियोजन के पतन का कड़ा विश्लेषण किया है। उन्होंने बताया है कि कैसे पश्चिमी मॉडलों की अंधी नकल ने ‘नीचे दुकान, ऊपर मकान’ वाली हमारी जीवंत संस्कृति को खत्म कर दिया है। ‘चंडीगढ़ मॉडल’ और ले कोर्बुजिए की सोच ने कैसे मानवीय संबंधों को तोड़कर शहरों को केवल कंक्रीट, ट्रैफिक और अकेलेपन का ढांचा बना दिया है, यह समझने के लिए पढ़िए यह प्रखर आलेख:
HIGHLIGHTS
  1. भारतीय शहरी जीवन की पुरानी पहचान ‘नीचे दुकान, ऊपर मकान’ सामाजिक और भावनात्मक एकता का बेहतरीन प्रतीक थी।
  2. पश्चिमी देशों की अंधी नकल और ‘ज़ोनिंग’ मॉडल ने भारतीय शहरों को ट्रैफिक जाम और अकेलेपन का शिकार बना दिया है।
  3. ले कोर्बुजिए के ‘चंडीगढ़ मॉडल’ ने मानवीय संबंधों को तोड़कर शहरों को केवल कंक्रीट और ज्यामिति में समेट दिया।
  4. अब समय आ गया है कि भारत अपनी सांस्कृतिक जड़ों की ओर लौटे और ‘मिक्स्ड यूज़’ वाले जीवंत शहरों का निर्माण करे।

नीचे लाला की दुकान, ऊपर गोरी का मकान
पश्चिमी प्लानिंग और कंक्रीट के बोझ से उजड़ते हमारे शहर
_________
बृज खंडेलवाल
_________
यह महज एक तुकबंदी नहीं, बल्कि भारतीय शहरी जीवन का जीवंत दर्शन है। यह उस दौर की गूंज है जब व्यापार और बसेरा एक ही छत के नीचे सांस लेते थे। नीचे दुकान की गहमागहमी, ऊपर घर की शांति , यही हमारे बाजारों की रूह थी। पूरा परिवार व्यापार की ढाल था, समय की बचत था और सुरक्षा का अभेद्य कवच भी। छोटे-छोटे बच्चे दुकान पर ग्राहकों से बातें सीखते, महिलाएं घरेलू काम के साथ ही व्यापार संभालतीं और बुजुर्ग अनुभव की रोशनी बिखेरते। यह सिर्फ आर्थिक व्यवस्था नहीं थी, बल्कि सामाजिक और भावनात्मक एकता का सुंदर उदाहरण था。
किंतु आधुनिक शहरीकरण के नाम पर हमने पश्चिम की अंधी नकल में अपनी इस विरासत का गला घोंट दिया। हमने ‘काम’ और ‘रिहाइश’ के बीच ऐसी लकीर खींच दी कि आज शहर ट्रैफिक की जंजीरों में जकड़े हुए हैं। सुबह घर से निकलकर ऑफिस पहुंचने में घंटों लग जाते हैं। शाम को वापसी में फिर वही थकान और इंतजार। इस दौड़ में परिवार के साथ समय बिताने की गुंजाइश लगभग खत्म हो गई है。
पश्चिमी मॉडल की देन साफ दिखती है : सड़कों पर रेंगता धुआं और अंतहीन जाम, घंटों की आवाजाही जो खुशियां निगल रही है, और वीरान होते बाजार तथा सूने रिहायशी इलाके जो असुरक्षा को जन्म देते हैं। महिलाएं अकेले घर लौटने में डर महसूस करती हैं। बच्चे खेलने के लिए सुरक्षित जगह नहीं पाते। बुजुर्गों को अकेलापन घेर लेता है。
चांदनी चौक से लेकर आगरा के बेलनगंज, वाराणसी, जयपुर के पुराने शहरों तक, हमारे जैविक शहर नदी किनारे धड़कते दिल की तरह विकसित हुए थे। लोग वहां पैदल चलते, गलियों में रुककर बातें करते और रोजमर्रा की जरूरतें आसानी से पूरी कर लेते। चंडीगढ़ जैसे सेक्टोरल मॉडल ने हमारी सामाजिक बुनावट को खंडित कर दिया है। अब समय आ गया है कि हम फ्रांसीसी नगर-नियोजक ले कोर्बुजिए के थोपे हुए खाकों से बाहर निकलें। हमें आवासीय क्षेत्रों में लघु व्यापार को फिर से जगह देनी होगी। भारत को अपनी जड़ों की ओर लौटना होगा ; अपनी संस्कृति, अपनी जलवायु, अपनी सामाजिक जरूरतों और अपनी हकीकत के अनुरूप शहर बसाने के लिए。
कभी भारतीय शहर सांस लेते थे। दुकान नीचे होती थी, घर ऊपर। व्यापार और परिवार एक ही छत के नीचे पलते थे। सुबह दुकान की खटखट से दिन खुलता था। दोपहर में चूल्हे की खुशबू फैलती थी। शाम को बच्चों की हंसी, ग्राहकों की मोलभाव, पड़ोसियों की गपशप और कभी-कभी कोई स्थानीय उत्सव ; सब एक साथ बहते थे। शहर नक्शा नहीं था, रिश्ता था। वह रिश्ता मोहल्ले की एकता में, दुकानदार और ग्राहक के विश्वास में और परिवार की निकटता में झलकता था。
अब वह रिश्ता ढीला पड़ गया है। कहीं-कहीं टूट भी गया है। आज का शहर बंटा हुआ है , घर अलग, काम अलग, बाजार कहीं और और बीच में लंबी दूरी। सुबह बच्चे स्कूल बस पकड़ते हैं, पिता घंटों ट्रैफिक में फंसकर ऑफिस पहुंचते हैं और मां अकेले घर संभालती हैं। शाम को जब सब थके-हारे लौटते हैं तो बातचीत की जगह मोबाइल स्क्रीन ले लेती है。
पश्चिमी मॉडल की नकल में शहरों को ‘जोन’ में बांट दिया गया। रिहायश अलग, व्यापार अलग, औद्योगिक क्षेत्र और भी दूर। कागज पर यह साफ-सुथरा लगता है, जमीन पर यह बिखराव बन जाता है। परिणामस्वरूप शहरों में वाहनों की संख्या बढ़ी, प्रदूषण बढ़ा और सामाजिक जुड़ाव कम हुआ。
पहले शहर परतों में बनते थे , धीरे-धीरे, रिश्तों की तरह। अब वे फाइलों में बंटते हैं: सेक्टर, प्लॉट, श्रेणी। जैसे किसी ने जिंदगी को अलमारी में रख दिया हो। मानवीय जरूरतों को नजरअंदाज कर केवल ज्यामिति और नियमों को प्राथमिकता दी जा रही है。

यह भी पढ़ें

इस बदलाव का सबसे चमकदार चेहरा है मॉल। कांच की दीवारें, एस्केलेटर, ठंडी हवा, एक जैसी दुकानें। सब कुछ व्यवस्थित, सब कुछ आकर्षक। और शायद, सब कुछ थोड़ा अनजाना। इस चमक की कीमत भी है। छोटे दुकानदारों का अस्तित्व संकट में पड़ गया है। वे जो कभी मोहल्ले के अभिन्न अंग थे, आज बड़े-बड़े ब्रांडों के सामने संघर्ष कर रहे हैं。
मोहल्ले का दुकानदार, जो कभी समाज की धुरी था, अब किनारे खड़ा है। उसका छोटा-सा कारोबार उस विशाल, बेनाम बाजार में खो गया है जहां ग्राहक ‘फुटफॉल’ बन जाते हैं और रिश्ता ‘ट्रांजेक्शन’। उसकी दुकान पर जो व्यक्तिगत विश्वास और सलाह मिलती थी, वह अब गायब है。
यह सिर्फ अर्थशास्त्र नहीं, समाजशास्त्र भी है। जब बाजार मोहल्ले से हटता है तो बातचीत भी चली जाती है। जब काम घर से दूर होता है तो परिवार का समय सिकुड़ जाता है। बच्चों के साथ खेलने, बुजुर्गों की देखभाल और पड़ोसियों से जुड़ने के अवसर कम हो जाते हैं। और फिर हम हैरान होते हैं , लोग इतने अकेले क्यों हैं? मानसिक स्वास्थ्य की समस्याएं क्यों बढ़ रही हैं?
हम शहरों को ‘यूजर’ के लिए डिजाइन कर रहे हैं, ‘निवासी’ के लिए नहीं। यूजर केवल उपयोग करता है, निवासी शहर से जुड़ता है, उसे अपनाता है और उसमें योगदान देता है。
यह गलती नई नहीं है, इसकी जड़ें गहरी हैं। 1951 में जब ले कोर्बुजिए भारत आए और चंडीगढ़ का नक्शा बनाया, तो वे सिर्फ इमारतें नहीं बना रहे थे। वे एक सोच ला रहे थे , कि आधुनिकता की एक ही शक्ल है और वह यूरोपीय है。
तत्कालीन नेतृत्व एक नए भारत का सपना देख रहा था : साफ, व्यवस्थित, अतीत से मुक्त। चंडीगढ़ उसी सपने का प्रतीक बना : चौड़ी सड़कें, सटीक सेक्टर, हर चीज अपनी जगह। पर एक सवाल अनसुना रह गया: क्या यह शहर भारतीय जीवन की लय को समझता है?
न वहां गली में बहती चाय की दुकान थी, न मंदिर जो बाजार की दीवार से सटकर खड़ा हो, न वह प्यारी-सी उलझन जहां घर, दुकान, आस्था और रोजमर्रा एक साथ सांस लेते हैं। चंडीगढ़ ने उस जीवन को जगह नहीं दी, बल्कि उससे दूरी बना ली。
समस्या यहीं नहीं रुकी। यह मॉडल देश भर में फैल गया। योजनाकारों ने वही नक्शे छोटे कस्बों पर थोप दिए, जिनकी अपनी अलग धड़कन थी। राजस्थान के रंगीन बाजारों पर यूरोपीय जोनिंग लागू हुई। पैदल चलने वाले शहरों पर दूरी के नियम लाद दिए गए。
और धीरे-धीरे, वह जीवंत, मिला-जुला शहरी ताना-बाना : जिसने सदियों तक अर्थव्यवस्था को थामा ; ‘अवैध’ कहकर मिटा दिया गया。
जो बचा, वह व्यवस्था नहीं थी ; वह वीरानी थी। ऐसे चौक जहां कोई रुकता नहीं। ऐसे फुटपाथ जिन पर कोई चलता नहीं। ऐसे बाजार जो शाम होते ही बंद हो जाते हैं, क्योंकि वहां कोई रहता ही नहीं। भारतीय गली, जो कभी मंजिल थी, अब सिर्फ रास्ता बन गई है。
बेशक, सारा दोष ले कोर्बुजिए का नहीं है। वे अपने समय और अपनी सोच के प्रतिनिधि थे। असल चूक हमारी थी ; हमने बिना सवाल किए एक पूरा मॉडल उधार ले लिया। हमने कंक्रीट को तरक्की समझ लिया और जिंदगी को नियमों में कैद कर दिया。
अब दुनिया फिर सोच रही है। ‘मिक्स्ड यूज’ की बात हो रही है ; जहां घर के पास ही काम हो, छोटी दुकानें हों, होम-ऑफिस हों, स्थानीय सेवाएं हों। कई विकसित देश अब पुरानी गलतियों को सुधार रहे हैं और मिश्रित उपयोग वाले इलाकों को बढ़ावा दे रहे हैं。
यानी वही, जो कभी हमारे शहरों में स्वाभाविक था。
बेशक, हर चीज को खुली छूट नहीं मिल सकती। प्रदूषण फैलाने वाले उद्योग दूर ही रहने चाहिए। पर क्या हर छोटी दुकान भी ‘गलत’ है? क्या हर घर से चलता काम ‘अवैध’ है? क्या हमारी सांस्कृतिक और आर्थिक वास्तविकता को पूरी तरह नजरअंदाज किया जा सकता है?
शहर तभी जीवित रहते हैं जब वे मिश्रित होते हैं ; जब रास्ते सिर्फ आने-जाने के लिए नहीं, मिलने-जुलने के लिए भी होते हैं। जब दुकानें मोहल्ले की जान होती हैं और घर व्यापार का हिस्सा बनते हैं。
आज जरूरत नई इमारतों की नहीं, नई सोच की है। ऐसी सोच जो नक्शे से आगे इंसान को देखे। जो दूरी नहीं, नजदीकी बनाए। जो ‘स्पेस’ नहीं, ‘रिश्ते’ डिजाइन करे। जो भारतीय जीवन की गर्माहट, विविधता और लचीलेपन को जगह दे。
वरना शहर और चमकेंगे। मॉल और बड़े होंगे। सड़कें और चौड़ी होंगी। पर भीतर एक खालीपन गूंजेगा。
और शायद तब हम समझेंगे , हमने शहर तो बना लिए, पर जिंदगी कहीं पीछे छूट गई

Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News
#UrbanPlanning, #IndianCities, #BrijKhandelwal, #बृज_खंडेलवाल_आलेख, #SmartCities, #WesternModel, #CityDevelopment, #TajNewsOpinion, #AgraNews, #ChandigarhModel, #CultureAndSociety, #TajNewsViral

Leave a Comment