क्या कभी जूते भी सांस लेते हैं? जंग की आंच से आगरा के जूतों की अटकने लगीं धड़कनें!

आर्टिकल Desk, Taj News | Friday, May 01, 2026, 06:48:00 PM IST | tajnews.in

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Brij Khandelwal Senior Journalist
बृज खंडेलवाल
वरिष्ठ पत्रकार
एवं विश्लेषक
पश्चिम एशिया में भड़के युद्ध ने सात समंदर पार आगरा के विश्वप्रसिद्ध फुटवियर उद्योग की कमर तोड़ दी है। वरिष्ठ पत्रकार बृज खंडेलवाल का यह मार्मिक आलेख बताता है कि कैसे आपूर्ति श्रृंखला टूटने और माल ढुलाई महंगी होने से कच्चे माल की कीमतें आसमान छू रही हैं, जिससे सदियों पुरानी इस कला और इसमें लगे लाखों श्रमिकों के सामने रोजी-रोटी का गंभीर संकट खड़ा हो गया है।
HIGHLIGHTS
  1. पश्चिम एशिया के युद्ध के कारण वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला बुरी तरह प्रभावित हुई है, जिससे आगरा के जूता उद्योग को कच्चे माल की कीमतों में 30% तक उछाल का सामना करना पड़ रहा है।
  2. माल ढुलाई में देरी और बढ़ती लागत के कारण अंतरराष्ट्रीय ऑर्डर रद्द हो रहे हैं, जिससे 5,000 करोड़ रुपये का यह उद्योग 40% तक की भारी गिरावट की आशंका से जूझ रहा है।
  3. आगरा की लगभग पांच हजार छोटी इकाइयां न्यूनतम क्षमता पर काम कर रही हैं, जिसके कारण 3.5 से 4 लाख श्रमिकों की रोजी-रोटी पर संकट गहरा गया है।
  4. भारत के कुल फुटवियर निर्यात में 30% योगदान देने वाली आगरा की इस ऐतिहासिक विरासत को बचाने के लिए नए प्रयोग और संरचनात्मक सुधारों की सख्त जरूरत है।

क्या कभी जूते भी सांस लेते हैं?
जंग की आंच से आगरा के जूतों की अटकने लगीं धड़कनें!
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बृज खंडेलवाल द्वारा
1 मई, 2026
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आगरा का विश्वप्रसिद्ध फुटवियर हब इन दिनों एक ऐसे अभूतपूर्व संकट की चपेट में है, जिसने इस ऐतिहासिक शहर की आर्थिक रीढ़ को हिलाकर रख दिया है। पश्चिम एशिया के सुलगते मैदानों से उठी युद्ध की लपटें अब सात समंदर पार आगरा की उन तंग गलियों तक पहुँच चुकी हैं, जहाँ सदियों से जूतों के निर्माण की कला फलती-फूलती रही है। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं के छिन्न-भिन्न होने से निर्यात का पहिया थम सा गया है और अंतरराष्ट्रीय बाजारों से मिलने वाले नए ऑर्डर प्रभावित हो रहे हैं। इस भू-राजनीतिक अस्थिरता ने न केवल व्यापारिक मुनाफे को चोट पहुँचाई है, बल्कि उन लाखों हाथों को भी अनिश्चितता के अंधेरे में धकेल दिया है, जो हर सुबह उम्मीद के साथ कारखानों का रुख करते थे।

उद्योग के जानकारों और अनुभवी निर्यातकों का मानना है कि वर्तमान तनाव के कारण माल की आवाजाही लंबी देरी हो रही है। समुद्री रास्तों के असुरक्षित होने से माल ढुलाई की लागत में वृद्धि हुई है, जिसने वैश्विक खरीदारों के बीच एक गहरा अविश्वास पैदा कर दिया है। सबसे गंभीर मार कच्चे माल की कीमतों पर पड़ी है। पेट्रोलियम उत्पादों से तैयार होने वाले कृत्रिम चमड़े और विभिन्न प्रकार के तलवों जैसे सिंथेटिक सामग्री की कीमतों में तीस प्रतिशत तक का उछाल आया है। यह वृद्धि उस उद्योग के लिए कमर तोड़ने वाली साबित हो रही है, जो पहले से ही अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के कारण बहुत ही कम मार्जिन पर काम करने को मजबूर था। अब स्थिति यह है कि उत्पादन की लागत और बिक्री मूल्य के बीच का संतुलन पूरी तरह बिगड़ चुका है।

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आर्थिक आंकड़ों के आइने में देखें तो आगरा का फुटवियर उद्योग प्रतिवर्ष लगभग चार से पांच हजार करोड़ रुपये का विदेशी मुद्रा भंडार देश के लिए जुटाता है। वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए कारोबारियों में इस बात का भारी भय व्याप्त है कि व्यापार में बीस से पच्चीस प्रतिशत की सीधी गिरावट आ सकती है। यदि युद्ध की यह स्थिति लंबी खिंचती है, तो नुकसान का यह आंकड़ा चालीस प्रतिशत तक भी पहुँच सकता है। यूरोप और अमेरिका जैसे संपन्न बाजारों तक पहुँचने में लगने वाले अतिरिक्त समय ने उत्पादन के पूरे चक्र को ही अस्त-व्यस्त कर दिया है। जब समय पर माल नहीं पहुँचता, तो विदेशी खरीदार अपने ऑर्डर रद्द कर देते हैं, जिससे न केवल आर्थिक क्षति होती है बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में आगरा की साख पर भी बट्टा लगता है。

इस संकट का सबसे मार्मिक और मानवीय पक्ष उन सूक्ष्म एवं लघु इकाइयों से जुड़ा है, जो इस पूरे उद्योग का आधार हैं। आगरा की लगभग पांच हजार छोटी इकाइयाँ आज अपनी उत्पादन क्षमता के न्यूनतम स्तर पर काम कर रही हैं। इन कारखानों में काम करने वाले साढ़े तीन से चार लाख श्रमिक आज असमंजस में हैं। सुबह की पहली किरण के साथ जिस शहर में मशीनों की घरघराहट और हथौड़ों की गूँज सुनाई देती थी, वहाँ अब एक अजीब सा सन्नाटा पसरने लगा है। कई छोटी कार्यशालाओं में काम आधा हो चुका है और मजदूरों को मजबूरी में छुट्टी पर भेजा जा रहा है। दूर देश में छिड़ी जंग की लहरें यहाँ के कारीगरों की रसोई तक पहुँच गई हैं, जिससे उनकी दैनिक आजीविका पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं。

आगरा का जूता उद्योग केवल ईंट-पत्थर की फैक्ट्रियां नहीं, बल्कि एक जीवंत विरासत है जो मुगल काल से निरंतर चली आ रही है। पीढ़ी दर पीढ़ी कारीगरों ने अपने खून-पसीने से इस हुनर को सींचा है। भारत के कुल फुटवियर निर्यात में लगभग अट्ठाइस से तीस प्रतिशत का योगदान देने वाला यह शहर घरेलू बाजार की भी पैंसठ प्रतिशत मांग को पूरा करता है। आधुनिकता की दौड़ में यहाँ के कारीगरों ने खुद को बदला भी है और मशीनी तकनीक को हाथ की सफाई के साथ जोड़ा है। चीन और वियतनाम जैसे देशों के दबाव के बावजूद आगरा अपनी रचनात्मकता और छोटे ऑर्डरों को कुशलता से पूरा करने की क्षमता के कारण टिका हुआ है। भौगोलिक संकेतक अर्थात जीआई टैग मिलने से इस शहर की पहचान को एक नई संजीवनी मिली थी, लेकिन युद्ध के इस दौर ने उन तमाम कोशिशों पर पानी फेरने की चुनौती पेश की है。

आज जब हम भविष्य की ओर देखते हैं, तो जेवर के पास बन रहे नए हवाई अड्डे और प्रस्तावित फुटवियर पार्क जैसी बुनियादी ढांचागत योजनाएं उम्मीद तो जगाती हैं, लेकिन तात्कालिक चुनौतियां कहीं अधिक विकराल हैं। महंगे कर्ज, जटिल नियम और पर्यावरण संबंधी चिंताओं के बीच अब युद्ध की यह मार इस उद्योग के लिए ‘करेला और नीम चढ़ा’ वाली स्थिति बन गई है। फिर भी, इस शहर की मिट्टी में संघर्ष और सृजन का अद्भुत संगम है। यहाँ के युवा डिजाइनर और महिलाएं अब नए प्रयोगों के साथ इस संकट से निकलने की राह खोज रहे हैं। सवाल अब केवल आर्थिक लाभ का नहीं, बल्कि उस हुनर को बचाने का है जिसने सदियों से आगरा को दुनिया के नक्शे पर चमकाया है। ताजमहल को निहारने आने वाली दुनिया को शायद अब उन कारीगरों के हाथों के छालों और उनकी मेहनत को भी पहचानना होगा, क्योंकि हर जूते की जोड़ी के पीछे एक परिवार की जीवटता और संघर्ष की अनकही कहानी छिपी होती है。

ताज न्यूज़ का विशेष संपादकीय विश्लेषण

बृज खंडेलवाल जी का यह आलेख आगरा के फुटवियर उद्योग के उस दर्द को बयां करता है जो अक्सर चमकदार शोरूम और महंगे जूतों के पीछे छिप जाता है। पश्चिम एशिया का मौजूदा संकट इस बात का जीता-जागता उदाहरण है कि भूमंडलीकरण के इस दौर में दुनिया किस कदर एक-दूसरे से जुड़ी हुई है। हजारों किलोमीटर दूर चल रही मिसाइलों और ड्रोन हमलों का सीधा असर आगरा की उन तंग गलियों में काम करने वाले कारीगरों की थाली पर पड़ रहा है, यह स्थिति वैश्वीकरण की उस कड़वी हकीकत को सामने लाती है, जहां स्थानीय अर्थव्यवस्थाएं अंतरराष्ट्रीय घटनाओं के सामने पूरी तरह से असहाय नजर आती हैं।

आगरा का जूता उद्योग केवल अर्थव्यवस्था का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह इस शहर की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान का एक अभिन्न अंग है। मुगल काल से चली आ रही चमड़े और जूते निर्माण की यह कला आज आधुनिकता और मशीनीकरण के चौराहे पर खड़ी है। लेकिन, सबसे बड़ा संकट इस उद्योग की रीढ़ यानी उन सूक्ष्म और लघु इकाइयों (MSMEs) पर है, जो न केवल भारी संख्या में रोजगार सृजन करती हैं, बल्कि आगरा को अंतरराष्ट्रीय पटल पर एक विशिष्ट पहचान भी दिलाती हैं। आज जब कच्चे माल की कीमतें 30% तक बढ़ गई हैं और माल ढुलाई की लागत आसमान छू रही है, तो ये छोटी इकाइयां बंद होने के कगार पर पहुँच गई हैं। बड़े कॉरपोरेट्स शायद इस झटके को सह जाएं, लेकिन एक छोटे कारीगर के लिए एक दिन का काम रुकना भी उसके परिवार के लिए भुखमरी का कारण बन सकता है।

यह संकट नीति निर्माताओं और सरकार के लिए भी एक गंभीर चेतावनी है। केवल जेवर एयरपोर्ट या नए फुटवियर पार्क जैसी दीर्घकालिक योजनाएं इस उद्योग को तात्कालिक राहत नहीं दे सकतीं। जरूरत इस बात की है कि सरकार ऐसे संकटकालीन समय में निर्यातकों और विशेष रूप से छोटी इकाइयों के लिए राहत पैकेज की घोषणा करे। उन्हें आसान और सस्ते ऋण उपलब्ध कराए जाएं और कच्चे माल के आयात पर लगने वाले शुल्कों में अस्थायी छूट दी जाए ताकि उत्पादन की लागत को संतुलित किया जा सके। इसके अलावा, भारत को अपने घरेलू कच्चे माल के उत्पादन को बढ़ावा देने की भी आवश्यकता है ताकि अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखलाओं पर हमारी निर्भरता कम हो सके। ‘आत्मनिर्भर भारत’ का सपना तभी साकार होगा जब हम अपनी स्थानीय कलाओं और उद्योगों को वैश्विक झटकों से बचाने के लिए एक मजबूत ढांचा तैयार करेंगे।

इसके साथ ही, आगरा के जूता उद्योग को चीन और वियतनाम जैसे देशों से मिल रही कड़ी प्रतिस्पर्धा से निपटने के लिए नवाचार और आधुनिकीकरण पर भी ध्यान केंद्रित करना होगा। युवाओं और नए डिजाइनरों को इस उद्योग से जोड़ना, नए वैश्विक बाजारों की तलाश करना और गुणवत्ता में सुधार करना समय की मांग है। जीआई टैग (GI Tag) मिलने के बाद इस उद्योग को जो बढ़त मिली थी, उसे बरकरार रखने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक आक्रामक ब्रांडिंग रणनीति की भी जरूरत है। अंततः, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि आगरा का हर जूता सिर्फ एक उत्पाद नहीं है, बल्कि वह उन लाखों कारीगरों के पसीने, संघर्ष और उम्मीदों का प्रतीक है, जिन्हें आज हमारे समर्थन और संरक्षण की सबसे अधिक आवश्यकता है।

Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News

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