कब तक तेल के भरोसे? अब सूरज से चलेगा भारत: पश्चिम एशिया के संकट के बीच ऊर्जा आत्मनिर्भरता की नई कहानी

आर्टिकल Desk, Taj News | Saturday, May 02, 2026, 01:21:00 PM IST | tajnews.in

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Brij Khandelwal Senior Journalist
बृज खंडेलवाल
वरिष्ठ पत्रकार
एवं विश्लेषक
वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक बृज खंडेलवाल ने भारत के ऊर्जा परिदृश्य पर एक बेहद सकारात्मक और उम्मीद जगाने वाला आलेख लिखा है। पश्चिम एशिया के अस्थिर माहौल और कच्चे तेल पर निर्भरता के बीच, कैसे पीएम सूर्य घर योजना और सोलर ऊर्जा भारत के गांवों की छतों तक पहुँचकर एक आत्मनिर्भर और स्वच्छ ‘ग्रीन इंडिया’ की नींव रख रही है, पढ़ें यह विस्तृत रिपोर्ट।
HIGHLIGHTS
  1. पश्चिम एशिया के तनाव और तेल की बढ़ती कीमतों के बीच भारत आयातित ईंधन से हटकर सौर ऊर्जा के जरिए ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में बढ़ रहा है।
  2. ‘पीएम सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना’ के तहत अब तक 31 लाख से अधिक घर उपभोक्ता से ‘उत्पादक’ बन चुके हैं, जो अतिरिक्त बिजली ग्रिड में बेच रहे हैं।
  3. सोलर ऊर्जा के उत्पादन में साल-दर-साल 24% की वृद्धि हुई है, जबकि कोयला आधारित बिजली उत्पादन 1% घटा है, जो पर्यावरण के लिए एक शुभ संकेत है।
  4. बड़ी चुनौती: पैदा हुई स्वच्छ ऊर्जा का पूरा इस्तेमाल नहीं हो पा रहा (कर्टेलमेंट), जिसके लिए ट्रांसमिशन नेटवर्क और बैटरी स्टोरेज में सुधार की तत्काल आवश्यकता है।

कब तक तेल के भरोसे? अब सूरज से चलेगा भारत
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पश्चिम एशिया के संकट के बीच, सोलर एनर्जी की चमक से भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिखी जा रही है
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बृज खंडेलवाल
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पश्चिम एशिया में चल रहा संघर्ष। दूर जल रही आग की तपिश भारत तक साफ महसूस हो रही है। तेल और गैस की कीमतों में उतार-चढ़ाव, आपूर्ति की अनिश्चितता और आयात पर बढ़ती निर्भरता भारत के लिए गंभीर खतरे हैं। देश अभी भी अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयातित ईंधन से पूरा करता है। ऐसे में वैश्विक तनाव सीधे हमारे ऊर्जा बिल पर असर डालते हैं।

हर संकट अवसर भी लेकर आता है। एक रिपोर्ट
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धूप में नहाया, उत्तर प्रदेश का एक छोटा सा गांव। सरसों के पीले खेतों के बीच से गुजरती कच्ची पगडंडी। दूर कहीं एक घर की छत पर चमकते सोलर पैनल। आंगन में धीरे-धीरे घूमता पंखा, मोबाइल चार्ज हो रहा है, और शाम ढलते ही बच्चों की किताबों पर स्थिर, चमकदार रोशनी फैल रही है, टिमटिमाती ढिबरी या लालटेन की जगह।

यकीन करना मुश्किल है, लेकिन यही वो भारत है जो महज 25 साल पहले अंधेरे से जूझ रहा था। तब सूरज ढलते ही गांव सिमट जाता था। दीए की कांपती लौ में रात कटती, और बिजली एक मेहमान की तरह आती-जाती रहती। इन्वर्टर अमीरों की शान था, जनरेटर शोर मचाता और डीजल की तेज गंध हवा में घुली रहती।

आज तस्वीर पूरी तरह पलट चुकी है। छतों पर सोलर पैनल चमक रहे हैं, खेतों के किनारे मिनी ग्रिड काम कर रहे हैं, और गांव खुद अपनी ऊर्जा गढ़ रहा है।

भारत आज ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक स्थिर लेकिन निर्णायक यात्रा पर है। यह कोई अचानक छलांग नहीं, बल्कि निरंतर प्रयासों की कहानी है।

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वित्तीय वर्ष 2025-26 की चौथी तिमाही में देश की बिजली मांग ने नया रिकॉर्ड बनाया। 25 अप्रैल 2026 को दोपहर करीब 3:38 बजे पीक डिमांड 256.1 गीगावॉट तक पहुंच गई। गर्मी की लहर और बढ़ती आर्थिक गतिविधियों ने इस मांग को और तेज किया। बढ़ती अर्थव्यवस्था, हर घर बिजली पहुंचाने के प्रयास, शहरीकरण और जलवायु परिवर्तन से तेज होती गर्मी; सब मिलकर ऊर्जा की भूख को बढ़ा रहे हैं।

सोलर ऊर्जा का उत्पादन साल-दर-साल 24 प्रतिशत बढ़ा है। कुल बिजली उत्पादन में करीब 3 प्रतिशत की वृद्धि हुई, और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से गैर-जीवाश्म स्रोतों से आई। कोयला और लिग्नाइट आधारित उत्पादन में 1 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। यानी विकास और प्रदूषण के पुराने रिश्ते में अब दरार पड़ रही है।

संकेत और भी साफ हैं। पिछले 90 दिनों में से 88 दिन ऐसे रहे जब बिजली की सबसे ज्यादा मांग दिन के समय दर्ज हुई, जब सूरज चरम पर होता है। इसका मतलब है कि सोलर ऊर्जा अब महज विकल्प नहीं रह गई है, बल्कि मुख्यधारा बनती जा रही है।

इसी बदलाव को घर-घर तक पहुंचाने वाली एक बड़ी पहल है पीएम सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना। इस योजना का उद्देश्य साधारण परिवारों की छतों को छोटे-छोटे पावर प्लांट में बदलना है। सरकार सब्सिडी मुहैया करा रही है, आसान ऋण की व्यवस्था कर रही है और लोगों को अपनी बिजली खुद उत्पन्न करने के लिए प्रोत्साहित कर रही है। अब तक इस योजना के तहत 31 लाख से ज्यादा घरों को फायदा पहुंच चुका है, जबकि लाखों आवेदन लंबित हैं。

गांवों में जहां कभी बिजली आने का इंतजार किया जाता था, वहां अब लोग खुद बिजली पैदा कर रहे हैं। बिजली का बिल काफी कम हो रहा है, और अतिरिक्त ऊर्जा को ग्रिड में बेचकर अतिरिक्त आय का नया जरिया भी बन रहा है। यह सिर्फ एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि ऊर्जा के लोकतंत्रीकरण की दिशा में एक सामाजिक बदलाव है। आम आदमी अब ऊर्जा का उपभोक्ता नहीं, बल्कि उत्पादक भी बन रहा है。

महंगे आयातित तेल-गैस के मुकाबले सोलर और पवन ऊर्जा अब केवल पर्यावरणीय विकल्प नहीं, बल्कि आर्थिक मजबूरी भी बन गई है। जब वैश्विक बाजार अस्थिर हों, तब सूरज की रोशनी और हवा की ताकत सबसे भरोसेमंद साथी साबित होते हैं。

इसलिए सरकार सोलर पार्क, विंड एनर्जी कॉरिडोर और ग्रीन हाइड्रोजन जैसी परियोजनाओं पर तेजी से काम कर रही है। निजी क्षेत्र का निवेश भी बढ़ रहा है, क्योंकि साफ ऊर्जा अब भविष्य की बात नहीं, तुरंत की जरूरत बन गई है। ऊर्जा सुरक्षा और जलवायु लक्ष्य दोनों एक ही रास्ते पर दिख रहे हैं。

हालांकि सोलर और पवन ऊर्जा की क्षमता तेजी से बढ़ रही है, लेकिन इसका पूरा उपयोग नहीं हो पा रहा। “कर्टेलमेंट”; यानी पैदा हुई साफ ऊर्जा को व्यर्थ जाना, एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। चौथी तिमाही में करीब 27 गीगावॉट सोलर और 4 गीगावॉट पवन ऊर्जा को सीधे कर्टेल किया गया, जबकि ट्रांसमिशन रिजर्व के तहत और भी बड़ी मात्रा प्रभावित हुई。

यह विडंबना है, एक ओर देश प्रदूषण कम करने की कोशिश कर रहा है, दूसरी ओर साफ ऊर्जा को मजबूरी में रोकना पड़ रहा है। समस्या उत्पादन की नहीं, बल्कि व्यवस्था की है। हमने सोलर प्लांट तो तेजी से लगाए, लेकिन बिजली को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने वाले ट्रांसमिशन नेटवर्क की गति उससे मेल नहीं खा पाई। राजस्थान, गुजरात और तमिलनाडु जैसे राज्यों में सूरज और हवा से भरपूर ऊर्जा पैदा हो रही है, लेकिन उसे उपभोक्ता केंद्रों तक पहुंचाने में अड़चनें बनी हुई हैं。

भंडारण की कमी भी एक बड़ी बाधा है। दिन में पैदा हुई अतिरिक्त सोलर ऊर्जा को शाम या रात के लिए संग्रहित करने की क्षमता अभी सीमित है। बैटरी स्टोरेज और पंप्ड स्टोरेज हाइड्रो जैसी तकनीकें अभी शुरुआती चरण में हैं। नतीजा यह होता है कि दोपहर में बिजली की अधिकता और शाम को फिर वही दबाव。

कोयला आधारित प्लांट्स की कहानी भी बदल रही है। प्लांट लोड फैक्टर 72 प्रतिशत से घटकर 69 प्रतिशत रह गया है। कोयला अब “राजा” की जगह बैकअप की भूमिका निभा रहा है। पर्यावरण की दृष्टि से यह सकारात्मक है, लेकिन पुराने प्लांट्स की कार्यक्षमता और लागत पर नए सवाल खड़े हो रहे हैं。

तो क्या भारत की ऊर्जा स्वतंत्रता की राह रुक गई है? बिल्कुल नहीं। रुकावटें जरूर हैं: ट्रांसमिशन नेटवर्क की कमी, भंडारण की चुनौती, नीतिगत स्पष्टता की जरूरत और राज्यों के बीच समन्वय की कमी। लेकिन राह बंद नहीं है。

असल जरूरत संतुलित विकास की है। उत्पादन के साथ-साथ वितरण, भंडारण और स्मार्ट ग्रिड पर बराबर ध्यान देना होगा। ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर को तेजी से पूरा करना, बैटरी स्टोरेज में बड़े पैमाने पर निवेश और टाइम-ऑफ-डे टैरिफ जैसी व्यवस्थाएं इस संक्रमण को आसान बना सकती हैं। अगर निवेशकों को नीतिगत निश्चितता और समय पर भुगतान मिले, तो निजी क्षेत्र और तेजी से आगे आएगा。

आज गांव की छत पर चमकता सोलर पैनल सिर्फ बिजली नहीं दे रहा। वह आत्मनिर्भरता, पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक सशक्तिकरण का प्रतीक बन गया है। जहां कभी अंधेरा स्थायी लगता था, वहां अब रोशनी अपने दम पर जल रही है。

भारत की यह यात्रा अभी अधूरी है। बढ़ते भारत की यह “ग्रोइंग पेन” की कहानी है; पुरानी ऊर्जा से नई, स्वच्छ और आत्मनिर्भर ऊर्जा की ओर एक साहसिक संक्रमण की。

ताज न्यूज़ का विशेष संपादकीय विश्लेषण

बृज खंडेलवाल जी का यह आलेख भारत की ऊर्जा संप्रभुता के उस अहम पड़ाव को रेखांकित करता है, जहाँ हम आयातित जीवाश्म ईंधनों की गुलामी से बाहर निकलकर प्रकृति की असीम ऊर्जा—सूर्य—की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। पश्चिम एशिया में चल रही भू-राजनीतिक उथल-पुथल ने यह स्पष्ट संदेश दे दिया है कि केवल पेट्रोल और डीजल के भरोसे देश की विकास दर को स्थिर नहीं रखा जा सकता। ऐसे में सौर ऊर्जा न केवल एक पर्यावरणीय विकल्प है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता का एक मजबूत हथियार बन चुकी है। 256.1 गीगावॉट की रिकॉर्ड बिजली मांग इस बात का प्रमाण है कि विकासशील भारत की ऊर्जा की भूख अभूतपूर्व गति से बढ़ रही है।

इस संक्रमण का सबसे खूबसूरत पहलू ‘ऊर्जा का लोकतंत्रीकरण’ है। ‘पीएम सूर्य घर योजना’ ने बिजली उत्पादन के एकाधिकार को बड़े पावर प्लांट्स से निकालकर सीधे आम आदमी के आंगन तक पहुंचा दिया है। एक समय था जब गांव का किसान केवल ‘उपभोक्ता’ था, आज वह ‘उत्पादक’ बन गया है। छतों पर चमकते सोलर पैनल ग्रामीण भारत की बदलती हुई आर्थिक तस्वीर के नए प्रतीक बन गए हैं। हालाँकि, ‘कर्टेलमेंट’ यानी स्वच्छ ऊर्जा की बर्बादी हमारी ढांचागत विफलताओं की ओर इशारा करती है। 27 गीगावॉट सोलर ऊर्जा सिर्फ इसलिए रोक दी गई क्योंकि हमारे पास उसे वितरित और स्टोर करने की क्षमता नहीं है।

राजस्थान और गुजरात में पैदा हो रही ऊर्जा को औद्योगिक केंद्रों तक पहुंचाने के लिए ‘ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर’ का निर्माण युद्ध स्तर पर किया जाना चाहिए। साथ ही, बैटरी स्टोरेज में भारी निवेश की आवश्यकता है ताकि दिन की अतिरिक्त सौर ऊर्जा का उपयोग रात में किया जा सके। निष्कर्षतः, यह ऊर्जा संक्रमण आसान नहीं है, लेकिन सरकार, निजी क्षेत्र और आम नागरिकों के साझा प्रयासों से ही हम उस ‘आत्मनिर्भर भारत’ का सपना पूरा कर सकते हैं, जो कच्चे तेल पर निर्भर न रहकर अपने सूरज के बल पर दुनिया का नेतृत्व करेगा।

Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News

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