Article Desk, 🌐 tajnews.in | Friday, 10 July, 2026, 08:52:37 PM IST.


करोड़ों पौधे, फिर भी सूनी धरती! आखिर हर साल हरियाली जाती कहाँ है?
— बृज खंडेलवाल
बारिश की पहली फुहार पड़ते ही सरकारी दफ्तरों में प्रशासनिक हलचल बहुत तेजी से बढ़ जाती है। सरकारी नर्सरियों से छोटे-बड़े पौधों से भरे अनगिनत ट्रक और ट्रैक्टर थियेटर की तर्ज पर सड़कों पर निकल पड़ते हैं। आला अफसर हाथ में फावड़ा लेकर कैमरों के सामने कृत्रिम रूप से मुस्कुराते हैं, सफेदपोश नेता कतारबद्ध खड़े होकर पौधे लगाते हैं, कागजों पर नए विधिक रिकॉर्ड बनते हैं, और शाम होते-होते जनसंपर्क विभागों से चमकदार प्रेस विज्ञप्तियां जारी हो जाती हैं। हर साल मानसून के इस मौसमी विमर्श में करोड़ों पौधे लगाने के खोखले दावे बड़ी शान से किए जाते हैं। लेकिन कुछ ही महीने बाद वही बेबस धरती फिर से वैसी ही सूनी और बदहाल दिखाई देने लगती है। गर्मियों की तेज धूप पहले से ज्यादा चुभने लगती है, सड़कों के किनारे से प्राकृतिक छांव गायब हो जाती है, और तब एक यक्ष प्रश्न हर बार इस प्रदूषित हवा में तैरता है—अगर हर साल देश और सूबे में करोड़ों पौधे लगाए जा रहे हैं, तो वह गौरवशाली हरियाली आखिर किस पाताल में गायब हो रही है? क्या पेड़ सचमुच इस सूनी धरती पर उग रहे हैं या वे सिर्फ सरकारी फाइलों की हरी स्याही में ही पल्लवित हो रहे हैं?
इस वर्ष भी उत्तर प्रदेश सरकार ने 12 जुलाई को अपने महावृक्षारोपण अभियान के तहत समूचे सूबे में 35 करोड़ से अधिक पौधे लगाने का एक अत्यंत महत्वाकांक्षी विधिक लक्ष्य रखा है। लगभग 30 से अधिक प्रशासनिक विभाग इस विशाल मुहिम में सीधे भाग ले रहे हैं। माननीय उपमुख्यमंत्री ने प्रदेश के सभी जिलों में 150 हाईटेक नर्सरियां विधिक रूप से स्थापित करने की आधिकारिक घोषणा की है, जिन पर करीब 150 करोड़ रुपये का भारी-भरकम जन-धन खर्च किया जाएगा। सरकार का दावा है कि इस विशाल अभियान के जरिए एक नया गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया जाएगा, जिससे प्रदेश की साख अंतरराष्ट्रीय फलक पर मजबूत होगी। इस व्यापक कूटनीतिक मुहिम का एक बहुत बड़ा हिस्सा हमारा ऐतिहासिक जिला आगरा भी है। आगरा के जिलाधिकारी मनीष बंसल ने इस संबंध में सभी संबंधित विभागों को कड़े विधिक निर्देश जारी करते हुए इस पूरे सरकारी कार्यक्रम को एक व्यापक ‘जन आंदोलन’ में बदलने को कहा है। आगामी 12 जुलाई को सुबह सात बजे से शाम छह बजे तक पूरे जिले की भौगोलिक सीमाओं के भीतर सघन वृक्षारोपण किया जाएगा।
सरकारी कार्ययोजना के अनुसार, इस बार स्कूलों, कॉलेजों, ग्राम पंचायतों और विकास प्राधिकरण की कॉलोनियों में “एक स्कूल-एक गांव” की विशिष्ट थीम पर आधारित पौधे रोपे जाएंगे। इस विधिक अभियान में स्थानीय स्वयंसेवी संस्थाएं, एनएसएस (NSS), रोटरी क्लब, लायंस क्लब, विभिन्न महिला समूह और हजारों जागरूक विद्यार्थी भी सामाजिक जिम्मेदारी के तहत शामिल होंगे। इस वर्ष आगरा जिले को कुल 61 लाख 88 हजार पौधे लगाने का एक विशाल विधिक लक्ष्य मिला है। इस भारी-भरकम संख्या में से वन विभाग अकेले 19.68 लाख पौधे रोपेगा, जबकि अन्य प्रशासनिक व विधिक विभाग मिलकर 42.20 लाख पौधे लगाने की जिम्मेदारी संभालेंगे। उल्लेखनीय है कि इससे पहले भी इसी वर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर जिला प्रशासन द्वारा लगभग 7.94 लाख पौधे लगाने का दावा विधिक कागजों पर किया जा चुका है। यदि सरकारी आंकड़ों के पुराने इतिहास को खंगालें, तो आगरा में वर्ष 2018 में 20 लाख, 2019 में 28 लाख, 2020 में 38 लाख और 2021 में 45 लाख पौधे विधिक रूप से रोपे गए थे। वन विभाग का यह आधिकारिक दावा है कि इन अभियानों में लगाए गए लगभग 70 प्रतिशत पौधे धरातल पर पूरी तरह जीवित और सुरक्षित हैं।
लेकिन, पर्यावरणविदों और जागरूक नागरिकों के मन में असली विधिक सवाल यहीं से उठना शुरू होता है। यदि बीते वर्षों में लगाए गए लाखों-करोड़ों पौधे सचमुच धरातल पर जीवित हैं, तो फिर आगरा का भौगोलिक क्षेत्र पहले से ज्यादा हरा-भरा क्यों नहीं दिखाई देता? शहर का औसत तापमान हर साल रिकॉर्ड तोड़ते हुए खतरनाक स्तर तक क्यों बढ़ रहा है? हमारी ऐतिहासिक सड़कों के किनारे लगे छायादार और पारंपरिक पेड़ तेजी से कम क्यों होते जा रहे हैं? आखिर क्या वजह है कि हर मानसून के आते ही प्रशासन को एक नए सिरे से पौधारोपण का नया अभियान शुरू करने की विधिक जरूरत आन पड़ती है? ‘रिवर कनेक्ट कैंपेन’ से लंबे समय से जुड़े समर्पित पर्यावरण कार्यकर्ताओं का साफ तौर पर कहना है कि ये पेड़ केवल फाइलों और डिजिटल आंकड़ों में ही लहलहाते हैं, जमीन पर इनका कोई वजूद नहीं बचता। उनका विधिक तर्क है कि किसी भी वृक्षारोपण अभियान की वास्तविक सफलता पौधे लगाने की संख्या से नहीं, बल्कि रोपे जाने के तीन-चार साल बाद उनके धरातल पर जीवित रहने की वैज्ञानिक दर से मापी जानी चाहिए।
इस सिलसिले में कुछ वर्ष पूर्व यमुना नदी के किनारे घटित हुई एक बेहद शर्मनाक घटना आज भी आगरा के लोगों के जेहन में पूरी तरह जिंदा है। तत्कालीन महापौर नवीन जैन ने बड़े तामझाम के साथ यमुना नदी की विधिक तलहटी (फ्लड प्लेन) के भीतर लगभग 12 हजार बहुमूल्य पौधे रोपने का अभियान चलाया था। लेकिन प्रशासनिक अदूरदर्शिता के कारण, जैसे ही अगस्त के महीने में यमुना का जलस्तर बढ़ा, वे सभी 12 हजार पौधे बह गए। जनता की गाढ़ी कमाई के करोड़ों रुपये की मेहनत कुछ ही दिनों में नदी के मटमैले पानी में विधिक रूप से समा गई और इस गंभीर लापरवाही की विधिक जांच आज तक किसी भी तार्किक नतीजे पर नहीं पहुंच सकी है। ‘रिवर कनेक्ट कैंपेन’ की प्रखर कार्यकर्ता पद्मिनी अय्यर कहती हैं कि कैमरे के सामने पौधा लगाना बेहद आसान काम है, लेकिन उसे एक मुकम्मल पेड़ बनाना अत्यंत कठिन है। कम से कम शुरुआती तीन वर्षों तक नियमित सिंचाई, मवेशियों से सुरक्षा, सही खाद और निरंतर वैज्ञानिक निगरानी के बिना अधिकांश पौधे रोपे जाने के शुरुआती हफ्तों में ही दम तोड़ देते हैं। प्रशासन पौधे लगाने के बाद उनकी विधिक देखभाल को अक्सर भगवान भरोसे छोड़कर अपने बजट ठिकाने लगाने में व्यस्त हो जाता है।
वरिष्ठ पर्यावरणविद् डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य का कहना है कि ताज ट्रेपेजियम जोन (TTZ) में कथित विकास और कंक्रीटीकरण के नाम पर वास्तविक हरियाली का बेरहमी से कत्ल किया गया है। यमुना एक्सप्रेसवे, आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे, इनर रिंग रोड, बड़े-बड़े फ्लाईओवर, राष्ट्रीय राजमार्गों का अंधाधुंध चौड़ीकरण और अवैध रूप से कटती नई कॉलोनियों ने आगरा के हजारों पुराने, विशालकाय और छायादार पेड़ों की विधिक बलि ले ली है। इस विनाशकारी कदम का सीधा प्रतिकूल असर केवल स्थानीय पर्यावरण पर ही नहीं, बल्कि दुनिया के अजूबे ताजमहल की विधिक सुरक्षा पर भी पड़ रहा है। पड़ोसी राज्य राजस्थान की ओर से आने वाली भीषण धूल भरी गर्म हवाओं को रोकने वाली आगरा की जो प्राकृतिक हरित पट्टी (इकोलॉजिकल ग्रीन बेल्ट) थी, वह अब पूरी तरह से कमजोर और छिन्न-भिन्न हो चुकी है। विडंबना देखिए कि ताज ट्रेपेजियम जोन का गठन ही सुप्रीम कोर्ट द्वारा ताजमहल और उसके आसपास के पर्यावरण की रक्षा के लिए विधिक रूप से किया गया था।
वर्ष 1996 में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद टीटीजेड (TTZ) के भीतर प्रदूषण को नियंत्रित करने, खतरनाक उद्योगों को स्थानांतरित करने और बड़े पैमाने पर सघन ग्रीन बेल्ट विकसित करने की एक विधिक योजना तैयार हुई थी। राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (NEERI) ने भी आगरा के हरित क्षेत्र को तेजी से बढ़ाने की मजबूत सिफारिश की थी। उस समय यह उम्मीद जगी थी कि आगरा फिर से हरियाली की घनी चादर ओढ़ लेगा, लेकिन तीन दशक बीत जाने के बाद आज की जमीनी तस्वीर बेहद निराशाजनक है। वर्तमान में टीटीजेड में कुल वन और हरित आवरण (ग्रीन कवर) घटकर केवल छह प्रतिशत या उससे भी कम रह गया है, जबकि हमारा विधिक राष्ट्रीय लक्ष्य 33 प्रतिशत का है। वर्ष 2021 की वन रिपोर्ट के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2017 से 2019 के बीच ही आगरा का वास्तविक वन क्षेत्र सिकुड़कर केवल 657.71 वर्ग किलोमीटर रह गया। शहर के सैकड़ों प्राचीन तालाब और जलाशय या तो भू-माफियाओं के कब्जे के कारण पूरी तरह सूख गए या फिर औद्योगिक प्रदूषण की विधिक चपेट में आकर कचरे के ढेर में तब्दील हो गए।
वर्ष 2015 में देश की सर्वोच्च अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार को कागजों पर पेड़ लगाने के इस तरह के बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए गए दावों पर कड़ी विधिक फटकार भी लगाई थी। लेकिन दूसरी ओर, स्थानीय स्तर पर हरे पेड़ों की अवैध कटाई का धंधा धड़ल्ले से जारी रहा। कई गंभीर मामलों में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) और अदालतों ने अवैध कटाई के जिम्मेदार लोगों पर प्रति पेड़ 25 हजार रुपये तक का भारी विधिक जुर्माना भी लगाया, मगर विकास की अंधी दौड़ ने हरियाली को लगातार निगलना जारी रखा। इसी वर्ष एनजीटी ने टीटीजेड के भीतर हो रहे गंभीर पर्यावरणीय उल्लंघनों पर कड़ा संज्ञान लेते हुए प्रशासन को कारण बताओ नोटिस भी जारी किया है। आगरा की हवा की गुणवत्ता (AQI) में कोई अपेक्षित सुधार नहीं हो रहा है; हवा में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और पीएम-10 जैसे खतरनाक कणों का स्तर विधिक सीमाओं को पार कर रहा है।
वृक्षों की सहायक नदियों और धाराओं का हाल भी कम दर्दनाक नहीं है; वे या तो भू-माफियाओं के अवैध कब्जे में हैं या फिर गंदे नालों में तब्दील हो चुकी हैं। कोई भी मुख्य नदी अकेले नहीं जी सकती, उसकी सहायक जलधाराएं ही उसकी असली सांस होती हैं। यदि सांसें ही बंद कर दी जाएं, तो नदी का विधिक अस्तित्व समाप्त होना तय है। उधर, हमारा आगरा शहर रोज़ाना लगभग 286 मिलियन लीटर (MLD) खतरनाक सीवेज पैदा करता है। हालांकि सीवेज शोधन संयंत्रों (STP) की संख्या विधिक रूप से बढ़ाई गई है, लेकिन आज भी बड़ी मात्रा में शोधित और अशोधित गंदा पानी सीधे हमारी जीवनदायिनी यमुना में बहाया जा रहा है। एक तरफ हम उसी प्रदूषित नदी से पीने का पानी मांगते हैं और दूसरी तरफ उसमें जहर घोलते हैं।
हालांकि, इस निराशाजनक विडंबना के बीच आगरा ने शोधित जल के दोबारा इस्तेमाल (Water Reuse) की दिशा में कुछ सकारात्मक विधिक कदम भी उठाए हैं। वर्तमान में नौ सीवेज शोधन संयंत्र 220 एमएलडी से अधिक की विधिक क्षमता के साथ काम कर रहे हैं और तीन नए संयंत्रों का निर्माण कार्य प्रगति पर है। अब इस शोधित पानी को पाइपलाइनों के जरिए खेतों, रेलवे, मेट्रो स्टेशनों, पार्कों और कीठम पक्षी विहार की झील तक पहुंचाने की लगभग 93 करोड़ रुपये की विधिक योजनाएं आकार ले रही हैं, जिससे रोज़ 42 एमएलडी पानी दोबारा काम आ सकेगा। लेकिन कड़वा सच यही है कि कोई भी कृत्रिम पाइपलाइन या तकनीक इंसानी लापरवाही और प्रशासनिक पाखंड की भरपाई कतई नहीं कर सकती।
वृंदावन के प्रसिद्ध पर्यावरण कार्यकर्ता जगन्नाथ पोद्दार कहते हैं कि कभी पूरे ब्रज मंडल में बारह विशाल और घने वन हुआ करते थे, लेकिन आज उन वनों की पहचान केवल धार्मिक ग्रंथों और संकीर्ण स्थानों के नाम तक ही सिमटकर रह गई है। उन घने जंगलों की जगह अब कंक्रीट और सीमेंट का एक बदसूरत जंगल खड़ा हो चुका है। पर्यावरण प्रेमी प्रशासन से एक बुनियादी सवाल पूछते हैं कि जब हर साल एक्सप्रेसवे, चौड़ी सड़कें, हवाई अड्डे, कंक्रीट की टाउनशिप, मॉल और औद्योगिक परियोजनाएं हजारों एकड़ उपजाऊ जमीन को विधिक रूप से घेर रही हैं, तो फिर हर साल करोड़ों नए पौधे लगाने के लिए इतनी खाली सरकारी जमीन आखिर किस जादू से आ जाती है? इसके साथ ही बंदरों और लावारिस पशुओं द्वारा पौधों को उखाड़े जाने की समस्या से निपटने का कोई ठोस विधिक खाका प्रशासन के पास नहीं होता।
इन्हीं गंभीर अंतर्विरोधों के कारण, ब्रज मंडल के समर्पित पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने अब तक हुए सभी सरकारी वृक्षारोपण अभियानों का एक स्वतंत्र ‘सामाजिक और वैज्ञानिक ऑडिट’ (Independent Social & Scientific Audit) कराने की विधिक मांग तेज कर दी है। उनका साफ तौर पर कहना है कि केवल रोपे गए पौधों की कागजी संख्या गिनकर वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाना देश और पर्यावरण के साथ धोखा है। इस बार लगाए जाने वाले हर एक पौधे को विधिक रूप से ‘जियो-टैग’ (Geo-Tag) किया जाना चाहिए, उसकी सैटेलाइट से तीन साल तक निरंतर मॉनिटरिंग हो, और जीवित बचे पेड़ों की एक प्रामाणिक ऑडिट रिपोर्ट जनता के सामने सार्वजनिक की जाए। पेड़ लगाना महज़ एक दिन का फोटो-अप हो सकता है, लेकिन पेड़ बनाना एक लंबी विधिक साधना है। इस मानसून में भी लाखों पौधे रोपे जाएंगे, कैमरों की फ्लैश चमकेगी, रिकॉर्ड बनेंगे, लेकिन असली परीक्षा अगले मानसून में होगी। तब यह देश और आने वाली पीढ़ी प्रशासन से यही सवाल पूछेगी कि क्या वे पौधे सचमुच वृक्ष बने या वे हमेशा के लिए सरकारी फाइलों की हरी स्याही के भीतर ही दफन हो गए? सच से आंखें चुराना अब बंद होना चाहिए।
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Pawan Singh
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