वीबी-ग्राम-जी के प्रस्तावित नियमों में बेनकाब होता मज़दूर-विरोधी चरित्र

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Article Desk, 🌐 tajnews.in | Wednesday, 08 July, 2026, 05:59:17 AM IST.

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Dr. Vikram Singh
डॉ. विक्रम सिंह
संपादक व मज़दूर नेता
देश के प्रखर अर्थशास्त्री, वामपंथी चिंतक और ‘अखिल भारतीय खेत मजदूर यूनियन’ के राष्ट्रीय संयुक्त सचिव डॉ. विक्रम सिंह ग्रामीण अर्थव्यवस्था और श्रम सुधारों के नीतिगत मामलों के विशेषज्ञ हैं। ग्रामीण भारत के मज़दूरों, दलितों और शोषितों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए वे अकादमिक और ज़मीनी स्तर पर निरंतर संघर्षरत हैं। राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न आर्थिक नीतियों पर उनकी टिप्पणियाँ शासन व्यवस्था को जनहित के प्रति जवाबदेह बनाने का कार्य करती हैं।

वीबी-ग्राम-जी के प्रस्तावित नियमों में बेनकाब होता मज़दूर-विरोधी चरित्र

— डॉ. विक्रम सिंह

पूरे देश में ग्रामीण और खेत मज़दूरों तथा उनके जनवादी संगठनों के भारी और निरंतर विरोध के बावजूद भाजपा-नीत केंद्र सरकार ‘वीबी-ग्राम-जी’ को जबरन लागू करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। इसके तहत केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय ने वीबी-ग्राम-जी को लागू करने के लिए विधिक नियमों का एक विवादास्पद मसौदा (ड्राफ्ट) जारी किया है। इस सरकारी मसौदे में वीबी-ग्राम-जी योजना के तहत न्यूनतम मज़दूरी के भुगतान, बेरोज़गारी भत्ते, राज्यों को फंड आवंटन और योजना के क्रियान्वयन की प्रशासनिक निगरानी से जुड़े कई तानाशाही प्रावधान शामिल हैं। नियमों का यह ड्राफ्ट बीती 23 मई को जारी किया गया था और जनता से औपचारिक सुझाव व संशोधनों के लिए केवल एक महीने का संक्षिप्त समय दिया गया था। इसके साथ ही यह अधिसूचना भी जारी की गई है कि 1 जुलाई से मनरेगा (MGNREGA) को पूरी तरह समाप्त कर दिया जाएगा और इसके तहत होने वाले सभी कार्य वीबी-ग्राम-जी के अंतर्गत किए जाएंगे। अर्थात, मनरेगा और वीबी-ग्राम-जी के बीच जो संक्रमण काल था, वह अब विधिक रूप से खत्म हो चुका है, ऐसा साफ तौर पर समझा जाना चाहिए।

वीबी-ग्राम-जी को लागू करने के नियमों पर एक सरसरी नज़र डालें तो इस नए कानून को लेकर हमारी शुरू से जताई जा रही सारी शंकाएँ बिल्कुल सही साबित होती हैं। दरअसल ये नियम वीबी-ग्राम-जी की उस भयावह असलियत को और साफ़ करते हैं; यह मनरेगा की तरह देश के नागरिकों को ‘काम का विधिक अधिकार’ नहीं देता, बल्कि महज़ एक ऐसी रोज़गार योजना है जिसमें निर्णय लेने की सारी शक्तियाँ केवल केंद्र सरकार के पास केंद्रित हैं और ग्रामीण भारत में मज़दूरों की वास्तविक काम की माँग के अनुसार फंड देने की इसमें कोई कानूनी बाध्यता नहीं रखी गई है। इन मसौदा नियमों से अब यह पूरी तरह स्पष्ट हो गया है कि वीबी-ग्राम-जी मांग पर आधारित कानून नहीं है (जबकि मनरेगा की यही सबसे बड़ी ऐतिहासिक खासियत थी जो इसे काम का एक मजबूत अधिकार बनाती थी) और जनता को गुमराह करने के लिए इसमें किया गया 125 दिन के रोजगार का दावा बिलकुल ही झूठा और बेबुनियाद है।

वित्त आयोग का फार्मूला और रोजगार गारंटी का टकराव

पहले हम वीबी-ग्राम-जी में फण्ड के आवंटन की जटिल प्रक्रिया को लेते हैं। इसके नियम 396 (ई) में साफ तौर पर कहा गया है कि केंद्र सरकार कतिपय वस्तुनिष्ठ मापदंडों के आधार पर, प्रत्येक राज्य के लिए फण्ड का एक मानक आवंटन (नॉर्मेटिव एलोकेशन) निर्धारित करेगी। हालांकि यह कानून पहले ही ‘मांग-आधारित’ व्यवस्था से बदलकर ‘फंड आवंटन-आधारित’ व्यवस्था में विधिक रूप से बदल चुका है, जिसमें केंद्र सरकार केवल 60 प्रतिशत राशि का भुगतान करती है लेकिन यह नया नियम तो और ज्यादा समस्याग्रस्त है। नियम के अनुसार, “प्रत्येक वित्तीय वर्ष के लिए प्रामाणिक आवंटन निर्धारित करने के प्रयोजनार्थ, केंद्रीय सरकार सोलहवें वित्त आयोग द्वारा अनुशंसित तथा भारत सरकार द्वारा स्वीकृत, राज्यों के बीच क्षैतिज हस्तांतरण (हॉरिजॉन्टल डिवोल्यूशन) हेतु प्रयुक्त वस्तुनिष्ठ मापदंडों को ही अंगीकार करेगी”।

इसका सीधा और खतरनाक मतलब यह है कि केंद्र सरकार अब 16वें वित्त आयोग के राजनीतिक फ़ॉर्मूले के जरिये राज्यों में फण्ड का बंटवारा करेगी। गौरतलब है कि 16वें वित्त आयोग का हॉरिजॉन्टल डिवोल्यूशन का फ़ॉर्मूला एक खास वित्तीय और ढांचागत मकसद के लिए बनाया गया है। यह रोजगार गारंटी जैसे संवेदनशील और कल्याणकारी कार्यक्रम के लिए कभी भी उपयोग नहीं किया जा सकता। रोजगार गारंटी कार्यक्रम का बुनियादी लक्ष्य प्रदेश के सभी ग्रामीण बेरोजगार परिवारों के लिए तत्काल रोजगार उपलब्ध करवाना है, न कि आर्थिक आंकड़ों की बाजीगरी करना। वित्त आयोग में राज्यों के लिए फण्ड के बंटवारे का आधार बिल्कुल अलग रहता है; जैसे किसी राज्य की प्रति व्यक्ति (पर कैपिटा) सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP), देश के सबसे अमीर राज्यों से कितनी कम है, जिसे 42.5 परसेंट से भी ज़्यादा का भारी वेटेज दिया जाता है। इसके बाद सबसे ज़्यादा वेटेज राज्य की आबादी (17.5%) को दिया जाता है। इस सब तकनीकी मापदंडों का कानून के तहत काम मांगने वाले वास्तविक ग्रामीण मज़दूरों की तात्कालिक जरूरतों से दूर-दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं है। हमारा शुरू से ही यह स्पष्ट विधिक मत रहा है कि इस तरह के आवंटन का आधार केवल और केवल ग्रामीण मज़दूरों द्वारा की जाने वाली काम की मांग होनी चाहिए। यह सर्वथा संभव है कि छोटे राज्य, जहाँ सरकारें बेहतर ढंग से योजना को धरातल पर लागू कर रही हों और मज़दूरों को अधिक दिनों का काम दे रही हों, उन्हें अधिक आवंटन मिलना चाहिए।

उदाहरण के लिए, देश के दक्षिणी राज्यों की आबादी अपेक्षाकृत कम है, लेकिन वे सामाजिक चेतना के कारण सबसे ज़्यादा औसत काम के दिन सृजित कर रहे हैं। जैसे केरल में मनरेगा में वार्षिक औसत काम के दिन (लगभग 66 दिन) राष्ट्रीय औसत से बहुत ज़्यादा हैं। अब आबादी को अधिक वेटेज देने के इस नए जनविरोधी नियम से केरल जैसे प्रगतिशील राज्यों के हिस्से में अपेक्षाकृत बेहद कम फंड आएगा, जिससे वहां की ग्रामीण रोजगार व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो जाएगी। हालांकि, मसौदा नियमों में डैमेज कंट्रोल के लिए यह चालाकी भरा प्रावधान जोड़ा गया है कि अधिनियम के लागू होने के दूसरे वर्ष से मानक आवंटन का एक हिस्सा “प्रदर्शन मानदंडों” (परफॉर्मेंस इंडिकेटर्स) पर आधारित होगा। इसके मायने यह हैं कि बेहतर परफ़ॉर्मेंस के लिए आवंटन का एक हिस्सा “इनाम” के तौर पर दिया जाएगा। इसमें “मजदूरी का समय पर विधिक भुगतान”, “सामाजिक लेखापरीक्षा (सोशल ऑडिट) आवश्यकताओं का अनुपालन”, “कार्यों के पूर्ण होने का प्रतिशत” और “कोई अन्य प्रदर्शन-संबंधी संकेतक” शामिल हैं जिन्हें केंद्र सरकार अपनी सुविधा के अनुसार अधिसूचित करेगी।

इन सब जटिल प्रशासनिक मानकों का उन गरीब मज़दूरों से कोई लेना-देना नहीं है, जिन्हें विधिक रूप से इस कानून के केंद्र में होना चाहिए था। यह केवल राज्य सरकारों की उस कार्यक्षमता या अक्षमता को दर्शाता है, जिसे केंद्र सरकार अपने नौकरशाही मानकों के आधार पर तय करती है, न कि स्थानीय स्तर पर काम की वास्तविक मांग का। राज्यों के बीच फंड के बंटवारे के लिए बताई गई यह पूरी प्रक्रिया पूरी तरह से केंद्र की कार्यपालिका की मर्ज़ी पर निर्भर है, और इसमें राज्यों की कोई स्वतंत्र भूमिका या लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व नहीं रखा गया है। इससे राज्य वित्तीय रूप से पूरी तरह केंद्र पर निर्भर हो जाएंगे, और इस केंद्रीयकृत प्रक्रिया का इस्तेमाल भविष्य में उन राज्यों के खिलाफ़ एक राजनैतिक हथियार के तौर पर आसानी से किया जा सकता है जो केंद्र के तानाशाही आदेशों का सख्ती से पालन नहीं करते या जहां विपक्षी दलों की सरकारें चुनी गई हैं।

125 दिनों के रोजगार का दावा

सरकारी आंकड़ों में उजागर होती कड़वी हकीकत और सरकार के अपने डेटा व प्रस्तावित फंड आवंटन के विश्लेषण से भी यह साफ पता चलता है कि वीबी-ग्राम-जी में हर परिवार को 125 दिनों के रोजगार की विधिक गारंटी देने का दावा पूरी तरह से खोखला और राजनीतिक छलावा है। यह वादा न तो देश के वर्तमान आर्थिक बजट के रूप में संभव है और न ही इसे प्रशासनिक रूप से धरातल पर लागू किया जा सकता है। प्रस्तावित अंतरिम आवंटन के विश्लेषण से पता चलता है कि हर सक्रिय जॉब कार्ड के लिए, प्रस्तावित आवंटन के तहत जितने काम के दिन सृजित किए जा सकते हैं, वे वादे के मुताबिक 125 दिनों से बहुत कम हैं। देश के किसी भी बड़े राज्य में प्रस्तावित वित्तीय आवंटन, वादे के मुताबिक मिलने वाले विधिक हक का आधा भी पूरा नहीं करता है। कई राज्यों में, इस आवंटन से 125 दिनों की गारंटी का बमुश्किल पांचवां हिस्सा ही पूरा हो पाएगा।

उदाहरण के लिए, हरियाणा के लिए केंद्र सरकार से केवल 590 करोड़ रुपये का आवंटन मिला है। इसमें राज्य के हिस्से के 40% (393 करोड़ रुपये) जोड़ने पर यह कुल 984 करोड़ रुपये हो जाएगा। अब राज्य में 4.85 लाख सक्रिय जॉब कार्ड पंजीकृत हैं, जिन्हें यदि प्रति कार्यदिवस 882.94 रुपये की न्यूनतम दर के हिसाब से भुगतान किया जाए, तो पूरे साल में केवल 23 दिन का रोजगार ही मिल सकता है। 125 दिन का दावा यहाँ स्वतः दम तोड़ देता है। हालाँकि वर्ष 2025 और 2026 के पहले पाँच महीनों में उत्पन्न काम के दिनों की तुलना यह साफ दिखाती है कि अधिकांश राज्यों में रोजगार सृजन में उल्लेखनीय गिरावट आई है। यह गिरावट विशेष रूप से बड़े ग्रामीण राज्यों में अधिक गंभीर है। जनवरी से मई 2026 के दौरान उत्तर प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, केरल, आंध्र प्रदेश और झारखंड जैसे राज्यों में वर्ष 2025 की तुलना में उत्पन्न व्यक्ति-दिवसों (पर्सन-डेज़) में भारी कमी दर्ज की गई। कुल मिलाकर जनवरी से जून 2026 के बीच काम के दिनों में औसतन 29.62% से लेकर 46.71% तक की भारी गिरावट आई है, जो ग्रामीण संकट को बयां करती है।

राष्ट्रीय संचालन समिति : शक्तियों का केंद्रीकरण और राज्यों की उपेक्षा

प्रस्तावित नियमों में एक ‘राष्ट्रीय संचालन समिति, 2026’ के गठन का विधिक प्रावधान है, जो पूरी तरह से केंद्रीयकृत और एक शुद्ध नौकरशाही निकाय है, जिसमें राज्यों का प्रतिनिधित्व बिल्कुल न्यूनतम रखा गया है। यह शक्तिशाली कमिटी स्टैंडर्ड, गाइडलाइन, कन्वर्जेंस, फ्रेमवर्क, मॉनिटरिंग सिस्टम और इम्प्लीमेंटेशन के लिए डिजिटल और जियोस्पेशियल इंफ्रास्ट्रक्चर तय करने जैसे बड़े नीतिगत कामों के अलावा, “राज्यों को नॉर्मेटिव एलोकेशन (मानक आवंटन) से जुड़े फ़ैसलों के लिए सिफ़ारिश” भी करेगी। शक्तियों का इस तरह का केंद्रीकरण एक अत्यधिक तानाशाही ढांचा बनाता है और हमारे देश के लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण की आत्मा को कमजोर करता है। 16 सदस्यों वाली इस शक्तिशाली कमिटी के प्रमुख केंद्रीय ग्रामीण विकास विभाग के सचिव होंगे और इसमें केंद्र द्वारा नॉमिनेट किए गए राज्य सरकारों के केवल पांच प्रतिनिधि ही शामिल किए जाएंगे। देखने की बात तो यह है कि राज्य वीबी-ग्राम-जी में कुल लागत का 40 प्रतिशत हिस्सा अपनी जेब से दे रहे हैं, फिर भी उनके साथ संघीय ढांचे में बहुत अन्यायपूर्ण व्यवहार करते हुए उन्हें उचित प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया है।

इस पूरी समिति में खेत मज़दूरों या उनके प्रतिनिधि संगठनों का कोई प्रतिनिधित्व नहीं रखा गया है। गौरतलब है कि अभी तक मनरेगा में देश के कुल मज़दूरों का 8 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति (ST) और 17 प्रतिशत अनुसूचित जाति (SC) हैं, और 50 प्रतिशत से ज़्यादा ग्रामीण महिलाएँ काम करती हैं, लेकिन इनसे जुड़े किसी भी सामाजिक मंत्रालय का प्रतिनिधित्व इस कमिटी में नहीं है। जनजातीय मामलों के मंत्रालय, सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय तथा महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को इसमें पूरी तरह से बाहर रखा गया है; जबकि इसमें पंचायती राज मंत्रालय, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण विभाग, पेयजल और स्वच्छता विभाग, कृषि और किसान कल्याण विभाग, भूमि संसाधन विभाग, तथा राष्ट्रीय सूचना-विज्ञान केंद्र (NIC) के आला अधिकारियों के प्रतिनिधि शामिल होंगे। इस अधिकार-आधारित रोज़गार कार्यक्रम को लागू करने और उसकी निगरानी का काम सिर्फ़ ठंडे कमरों में बैठने वाली नौकरशाही पर नहीं छोड़ा जा सकता; इसके लिए उन लोगों की सीधी भागीदारी सुनिश्चित करना ज़रूरी है, जिनके जीवन और आजीविका पर इसके फ़ैसलों का सीधा असर पड़ता है। इसके अतिरिक्त एक केंद्रीय परिषद के गठन का भी प्रावधान है जिसमें “गैर-सरकारी” सदस्य और ST, SC तथा महिलाओं आदि के प्रतिनिधि शामिल हैं। लेकिन दिक्कत यह है कि इस परिषद के पास कोई वास्तविक विधिक अधिकार नहीं है। यह केवल कागजी सिफारिशें कर सकती है जिन्हें संसद के समक्ष रखा जाएगा, लेकिन वे सरकार के लिए बाध्यकारी नहीं हैं।

अतिरिक्त खर्च का बोझ राज्यों को दंडित करने की व्यवस्था

मसौदे के नियम 4(3) में यह तानाशाही प्रावधान है कि “किसी राज्य/संघ राज्यक्षेत्र द्वारा अपने मानक आवंटन से अधिक किया गया कोई भी व्यय अधिनियम की धारा 22 की उप-धारा (5) के तहत पूरी तरह से संबंधित राज्य सरकार द्वारा वहन किया जाएगा।” राज्यों द्वारा अपने नागरिकों को ज्यादा काम के दिन उपलब्ध करवाने के लिए किए गए जनहित के प्रयासों पर होने वाले खर्च को केंद्र सरकार द्वारा “अतिरिक्त खर्च” कहना ही वीबी-ग्राम-जी के क्रूर मज़दूर विरोधी चरित्र को साफ तौर पर उजागर करता है। सिर्फ़ इसलिए कि धरातल पर काम की मांग पहले से तय केंद्रीय आवंटन से ज़्यादा है, गरीब मज़दूरों को रोज़गार के उनके बुनियादी कानूनी अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। मज़दूरों की मांग के अनुसार योजना को मानवीय ढंग से लागू करने के लिए कल्याणकारी राज्य सरकारों को इस तरह वित्तीय रूप से दंडित नहीं किया जाना चाहिए।

ई-केवाईसी की बाध्यता: करोड़ों मज़दूरों से काम का हक़ छीनने का औजार

ड्राफ़्ट नियम (397 ई) के अनुसार, वीबी-ग्राम-जी के तहत केवल उन्हीं पुराने मनरेगा जॉब कार्ड को मान्य माना जाएगा जिन्हें ‘ई-केवाईसी’ (e-KYC) के ज़रिए पूरी तरह से रिन्यू और वेरिफ़ाई किया गया है। यह ग्रामीण भारत के लिए एक अत्यंत गंभीर चिंता का विषय है क्योंकि देश की एक बहुत बड़ी संख्या में ग्रामीण मज़दूर ई-केवाईसी की सख़्त और जटिल तकनीकी ज़रूरतों को पूरा करने में असमर्थ रहे हैं। हम भली-भांति जानते हैं कि इससे पहले भी डिजिटल भुगतान प्रणाली को अनिवार्य किए जाने के बाद से, गरीब मज़दूरों को नामों की स्पेलिंग की गलतियों, उंगलियों के निशान (बायोमेट्रिक) न मिलने, डेटा में अंतर और बैकएंड की तकनीकी समस्याओं के कारण इस प्रक्रिया को पूरा करने में कितनी भारी विधिक दिक्कतों का सामना करना पड़ा है। ई-केवाईसी वेरिफ़िकेशन में इन तकनीकी नाकामियों के कारण देश भर में पहले ही लाखों गरीब परिवारों के जॉब कार्ड क्रूरतापूर्वक रद्द कर दिए गए हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि देश के वे करोड़ों खेतिहर मज़दूर जिनका ई-केवाईसी वेरिफ़िकेशन तकनीकी खामियों के कारण नहीं हुआ है, वे वीबी-ग्राम-जी के लागू होते ही अपने काम के अधिकार से हमेशा के लिए महरूम हो जायेंगे।

हालांकि, इन नियमों के अनुसार काम न मिलने, मज़दूरी के विधिक भुगतान में होने वाली देरी, भ्रष्टाचार, प्रशासनिक खामियों और मज़दूरों के अधिकारों के उल्लंघन से जुड़ी शिकायतों की जांच के लिए राष्ट्रीय, राज्य और ज़िला स्तर पर एक स्वतंत्र लोकपाल (ओम्बड्समैन) की व्यवस्था की बात कही गई है, जिसके पास बाध्यकारी सिफारिशें करने का अधिकार होगा। हमने पहले भी देखा है कि ग्रामीण स्तर पर भ्रष्टाचार से लड़ने और जवाबदेही तय करने में ‘सोशल ऑडिट’ की कितनी ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका रही है, इसलिए सोशल ऑडिट का काम करने के लिए एक पूरी तरह से स्वतंत्र और स्वायत्त संस्था होनी चाहिए। सोशल ऑडिट के नतीजों को अनिवार्य रूप से सार्वजनिक किया जाना चाहिए और विधिक समीक्षा व जवाबदेही के लिए संसद और राज्य विधानसभाओं के सामने पेश किया जाना चाहिए।

कुल मिलाकर, वीबी-ग्राम-जी के ये नए नियम साफ़ तौर पर दिखाते हैं कि यह मनरेगा की जगह लेने वाला कोई मज़बूत अधिकार-आधारित कानून नहीं, बल्कि एक बेहद सीमित, अत्यधिक केंद्रीकृत और आवंटन-आधारित सरकारी योजना है, जिसमें मज़दूरों की काम की मांग, उनकी भागीदारी और उनके लोकतांत्रिक अधिकारों की बजाय केंद्र की कार्यपालिका की मर्ज़ी, नौकरशाही नियंत्रण और तयशुदा बजटीय सीमाओं को प्राथमिकता दी गई है। यह ढांचा न केवल ग्रामीण रोज़गार की कानूनी गारंटी को कमजोर करता है, बल्कि राज्यों की स्वायत्तता, लोकतांत्रिक जवाबदेही और सामाजिक न्याय के बुनियादी संवैधानिक सिद्धांतों पर भी गहरी चोट करता है। ऐसे समय में जब ग्रामीण भारत में बेरोज़गारी, भुखमरी, विस्थापन और आर्थिक असुरक्षा लगातार बढ़ रही है, रोजगार गारंटी जैसी जीवनरेखा को कमजोर करना करोड़ों खेत मज़दूरों और गरीब परिवारों की आजीविका पर सीधा कुठाराघात है। इसलिए आज समय की मांग है कि इन नियमों और पूरे वीबी-ग्राम-जी ढांचे के खिलाफ एक व्यापक और शांतिपूर्ण जनप्रतिरोध खड़ा किया जाए, मनरेगा के अधिकार-आधारित स्वरूप की रक्षा की जाए, और यह विधिक रूप से सुनिश्चित किया जाए कि ग्रामीण रोज़गार का सवाल किसी सरकारी कृपा का नहीं, बल्कि देश के मेहनतकश मज़दूरों के कानूनी और लोकतांत्रिक अधिकार का प्रश्न बना रहे।

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Pawan Singh

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Chief Editor, Taj News

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