नई कुली अर्थव्यवस्था: क्या भारत के स्टार्टअप आधुनिक गुलामी गढ़ रहे हैं? गिग इकोनॉमी और डिजिटल सामंतवाद पर बृज खंडेलवाल का प्रहार

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Article Desk | tajnews.in | Friday, May 29, 2026, 06:27:48 AM IST

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Brij Khandelwal
बृज खंडेलवाल
वरिष्ठ पत्रकार
एवं सामाजिक विश्लेषक
वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक विश्लेषक बृज खंडेलवाल ने भारत की चमकती गिग इकोनॉमी, स्टार्टअप्स की अरबों डॉलर की वैल्यूएशन और उसके पीछे छिपे ‘डिजिटल सामंतवाद’ के कड़वे यथार्थ पर यह प्रखर, मर्मस्पर्शी और विचारोत्तेजक विशेष आलेख तैयार किया है।
HIGHLIGHTS
  1. डिजिटल सामंतवाद का उदय: ‘गिग पार्टनर’ और ‘फ्लेक्सिबिलिटी’ जैसे आकर्षक शब्दों की ओट में महानगरों के प्रवासियों का अनियंत्रित श्रम दोहन।
  2. कौशल विकास का अभाव: मैन्युफैक्चरिंग और इंजीनियरिंग में विफलता के कारण अर्थव्यवस्था केवल १० मिनट के ‘सुविधा सेवा’ मोंडल पर आश्रित।
  3. इतिहास की पुनरावृत्ति: पहले आईटी (IT) और बीपीओ (BPO) सेक्टर में वैश्विक उद्योग के ‘रिप्लेसेबल पार्ट’ बने युवा, अब गिग अर्थव्यवस्था में संगठित ठहराव का शिकार।
  4. श्रमिकों की गरिमा का संकट: एल्गोरिद्म और तात्कालिक लाभ के चक्कर में युवाओं के स्वास्थ्य, मानसिक शांति और दीर्घकालिक सामाजिक सुरक्षा की घोर अनदेखी।

नई कुली अर्थव्यवस्था: क्या भारत के स्टार्टअप आधुनिक गुलामी गढ़ रहे हैं?

— बृज खंडेलवाल

28 वर्षीय युवक, उदय नाथ पीठ पर भारी बैग लटकाए ट्रैफिक चीरता भाग रहा है। बिहार से आया रमेश चौधरी चार मंज़िल सीढ़ियाँ चढ़कर राशन का सामान पहुँचा रहा है। उधर हलवाई की दुकान के बाहर बाबू लाल मोबाइल स्क्रीन पर टकटकी लगाए अगले ऑर्डर का इंतज़ार कर रहा है। मोतियाबिंदी अर्थ शास्त्री इसे “स्टार्टअप क्रांति” कहते हैं। लेकिन क्या यह सचमुच क्रांति है? या फिर पुरानी सामंती व्यवस्था का नया डिजिटल संस्करण?

चेहरे बदल गए हैं। लठैत जमींदार की जगह अब हूडी पहनने वाले फाउंडर हैं। कुली अब सूटकेस नहीं, फूड पैकेट और किराने के बैग ढो रहा है। ढांचा मगर वही है। भारत के महानगरों में लाखों प्रवासी युवक आज क्विक कॉमर्स, डिलीवरी ऐप्स, लॉजिस्टिक्स और प्लेटफॉर्म कंपनियों की रीढ़ बने हुए हैं। निवेशक अरबों डॉलर की वैल्यूएशन पर ताली बजाते हैं। स्टार्टअप फाउंडर नए भारत के “आइकॉन” कहलाते हैं। विज्ञापन इन्हें “डिलीवरी हीरो” और “पार्टनर” बताते हैं। लेकिन चमकदार शब्दों के पीछे एक कड़वी सच्चाई छिपी है। ये नव युग के कुली मेहनत करते हैं, कौशल प्रदर्शन नहीं।

दो सौ वर्षों से कुली गिरी चल रही है, पहले अंग्रेजों की, अब अमेरिकन्स की। या तो गोरे आदमी का मैन फ्राइडे, या बाबुओं का सामान ढोता कुली! बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश या राजस्थान से आया युवक दस-दस घंटे बाइक चलाता है। बारिश, धूप, प्रदूषण, दुर्घटना: सब झेलता है। पाँच साल बाद उसके पास क्या बचता है? बस टूटता शरीर और अनिश्चित भविष्य। यह रोजगार अवसर कम, श्रम दोहन अधिक है।

ताज न्यूज़ की रपट के अनुसार, मैन्युफैक्चरिंग और इंजीनियरिंग सेक्टर्स तो कुछ ज्यादा आगे नहीं बढ़ सके, लेकिन हौले हौले हमारी अर्थव्यवस्था “सुविधा सेवा” आधारित समाज बनती जा रही है। एक ऐसा समाज जहाँ मध्यम वर्ग अपनी सुविधा के लिए अलादीन का बटन दबाता है और कोई अदृश्य भूत, यानी श्रमिक दस मिनट में सामान लेकर दरवाज़े पर हाज़िर हो जाता है। आराम अब नया धर्म बन चुका है।

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देश कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल इंडिया और नवाचार की बातें करता है, मगर करोड़ों युवा आज भी बेहद प्राथमिक श्रम चक्र में फँसे हुए हैं। शहरों की सुविधा का बोझ इन्हीं कुलियों के कंधों पर लदा है, कहते हैं पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी। समाज शास्त्री टीपी श्रीवास्तव के मुताबिक, “हमारी भाषा भी अब सच्चाई छिपाने लगी है। कुली अब “गिग पार्टनर” बन गया है। नौकरी “फ्लेक्सिबिलिटी” कहलाने लगी। शोषण “ऑपर्च्युनिटी” बन गया। स्टार्टअप संस्कृति कई बार नई रंगाई-पुताई वाला पुराना हवेली तंत्र लगती है।”

यह समस्या केवल डिलीवरी ऐप्स तक सीमित नहीं है। भारत पहले भी ऐसा दौर देख चुका है। बीपीओ और आईटी सर्विस सेक्टर के उभार के समय लाखों युवा कॉल सेंटर और आउटसोर्सिंग नौकरियों में चुक गए। शुरुआती वर्षों में यह आर्थिक चमत्कार जैसा लगा। वेतन बढ़े। अंग्रेज़ी बोलने वाली पीढ़ी तैयार हुई। परिवार खुश हुए। लेकिन दो दशक बाद तस्वीर उतनी चमकदार नहीं दिखती।

बहुत बड़ी संख्या में युवाओं ने सीमित और दोहराव वाले कौशल सीखे। वे वैश्विक सेवा उद्योग के “रिप्लेसेबल पार्ट” बनकर रह गए। देश ने डिग्रीधारी युवाओं की फौज तो पैदा कर ली, मगर नवाचार, अनुसंधान और विनिर्माण क्षमता उतनी विकसित नहीं हुई। आज की गिग अर्थव्यवस्था उसी गलती को और बड़े पैमाने पर दोहरा रही है। एक डिलीवरी बॉय रोज़ी तो कमा सकता है, मगर क्या यही किसी युवा राष्ट्र का सपना होना चाहिए? रोजगार अगर व्यक्ति को ऊपर उठाने की बजाय वहीं जकड़ दे, तो वह विकास नहीं, संगठित ठहराव है। सबसे खतरनाक असर मानसिक है।

शहरी भारत आज प्रवासी श्रमिकों पर पूरी तरह निर्भर है। गरम खाना इसलिए पहुँचता है क्योंकि कोई बारिश में भीग रहा है। रातोंरात पार्सल इसलिए आता है क्योंकि किसी ने नींद छोड़ा है। दस मिनट में किराना इसलिए मिलता है क्योंकि किसी ने अपनी सेहत दाँव पर लगाई है। लेकिन कोई यह नहीं पूछता; चालीस साल की उम्र में उस डिलीवरी राइडर का क्या होगा? उसकी टूटी कमर का इलाज कौन करेगा? एल्गोरिद्म उसे बेकार कर देंगे तो नया कौशल कौन देगा?

किसी सभ्यता की असली पहचान उसके अरबपतियों से नहीं, उसके श्रमिकों की गरिमा से होती है। मज़दूरी सीढ़ी बननी चाहिए, दलदल नहीं। देश तब आगे बढ़ते हैं जब श्रमिक मांसपेशियों से कौशल की ओर बढ़ते हैं। यह आधुनिकता नहीं। यह डिजिटल सामंतवाद है। स्टार्टअप कहानी केवल यूनिकॉर्न पैदा करने की नहीं होनी चाहिए। उसे कुशल नागरिक भी पैदा करने चाहिए। क्योंकि जो अर्थव्यवस्था दस मिनट में बर्गर पहुँचा सकती है, लेकिन दस साल में श्रमिक को गरिमा नहीं दे सकती, वह वास्तव में प्रगति नहीं कर रही। वह बस गोल-गोल दौड़ रही है, लाइक एलिस इन वंडरलैंड।

Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News

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