चौंकाने वाला सच!!! भारत के असली निर्माता चमचमाते एलीट स्कूल नहीं, साधारण स्कूल हैं

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Article Desk, Taj News | Friday, May 22, 2026, 05:01:08 PM IST

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Brij Khandelwal
बृज खंडेलवाल
वरिष्ठ पत्रकार
एवं सामाजिक विश्लेषक
वरिष्ठ पत्रकार बृज खंडेलवाल ने समाज में बढ़ती ‘एलीट इंटरनेशनल स्कूलों’ की अंधी दौड़ और शिक्षा के बाज़ारीकरण पर एक मर्मस्पर्शी आलेख लिखा है। यह विश्लेषण ऐतिहासिक साक्ष्यों और व्यावहारिक उदाहरणों से प्रमाणित करता है कि भारत की वास्तविक प्रगति की नींव आज भी सामान्य और सरकारी स्कूलों के संघर्षों से ही तैयार होती है।
HIGHLIGHTS
  1. आगरा सहित देश भर में तेजी से खुल रहे एलीट स्कूलों में माता-पिता अक्सर शिक्षा नहीं, बल्कि ‘स्टेटस सिंबल’ खरीद रहे हैं।
  2. ऐतिहासिक सच: भारत के शीर्ष राजनेता, वैज्ञानिक, सैनिक और बड़े उद्योगपति किसी शाही बोर्डिंग से नहीं, बल्कि साधारण स्कूलों से निकले हैं।
  3. सफलता का पैमाना: यूपीएससी (UPSC), सेना की चुनौतियाँ और खेल जगत के बड़े नायक अभाव और संघर्ष की ज़मीन पर ही तैयार हुए हैं।
  4. शिक्षा का मूल उद्देश्य: बच्चे की वास्तविक सफलता महंगे वातानुकूलित क्लासरूम से नहीं, बल्कि अनुशासन, जिज्ञासा और जमीनी संघर्ष से बनती है।

चौंकाने वाला सच!!! भारत के असली निर्माता चमचमाते एलीट स्कूल नहीं, साधारण स्कूल हैं

— बृज खंडेलवाल

आगरा में ही आधा दर्जन एलीट एक्सक्लूसिव स्कूल्स खुल चुके हैं जहां का खर्चा मां बाप से पूछिए। आख़िर इंसान को कामयाब क्या बनाता है? एयर कंडीशन्ड स्मार्ट क्लासरूम, विदेशी सिलेबस और चमकदार कैंपस? या फिर संघर्ष, मेहनत, भूख और आगे बढ़ने का जुनून?

आज भारत में एक अजीब मानसिकता घर कर गई है। महंगे, हाई प्रोफाइल और “इंटरनेशनल” स्कूलों को सफलता की गारंटी माना जाने लगा है। लाखों रुपये फीस। अंग्रेज़ी लहजे पर गर्व। स्कूल कम, फाइव स्टार होटल ज़्यादा लगते हैं। माता-पिता भी अक्सर स्कूल नहीं, “स्टेटस सिंबल” खरीदते दिखाई देते हैं। लेकिन भारत का इतिहास कुछ और कहानी सुनाता है।

Indian Ordinary Schools Education Duality
साधारण स्कूलों से ही बनती है देश की असली रीढ़।

आज़ाद भारत के असली निर्माता : प्रधानमंत्री, वैज्ञानिक, सैनिक, doctor, अफसर, उद्योगपति और खिलाड़ी, ज़्यादातर साधारण सरकारी स्कूलों, केन्द्रीय विद्यालयों, नगर निगम स्कूलों और सामान्य प्राइवेट स्कूलों से निकले हैं। देश की रीढ़ एलीट बोर्डिंग स्कूलों ने नहीं, आम स्कूलों ने तैयार की है। गुजरात के वडनगर में एक साधारण स्कूल में पढ़ने वाला एक लड़का आगे चलकर भारत का प्रधानमंत्री बना। उसका नाम था नरेंद्र मोदी। न कोई स्मार्ट क्लास। न आलीशान कैंपस। न विदेशी सिलेबस।

ऐसी कहानियां पूरे भारत में बिखरी पड़ी हैं। डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने तमिलनाडु के साधारण स्कूल में पढ़ाई की। लाल बहादुर शास्त्री सामान्य स्कूलों से निकलकर देश के प्रधानमंत्री बने। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और रामनाथ कोविंद भी सरकारी और स्थानीय शिक्षा व्यवस्था से आगे बढ़े। इन लोगों को विरासत में सुविधाएं नहीं मिलीं। इन्होंने भारत को करीब से देखा। गरीबी देखी। संघर्ष देखा। असमानता देखी। इन्हीं अनुभवों ने इन्हें मजबूत बनाया। इन्हें जमीन से जोड़े रखा।

बड़े एलीट स्कूलों से पढ़े लोग भी सफल होते हैं। उनमें आत्मविश्वास, नेटवर्क और एक्सपोजर होता है। लेकिन जब देश निर्माण की बात आती है, तब तस्वीर बदल जाती है। कारोबारी दुनिया को ही देख लीजिए। धीरूभाई अंबानी ने गुजरात के एक साधारण स्कूल से पढ़ाई की और फिर रिलायंस जैसा साम्राज्य खड़ा किया। इन्फोसिस के नारायण मूर्ति सरकारी स्कूलों में पढ़े। गौतम अडानी, शिव नाडर और सुनील मित्तल भी किसी शाही बोर्डिंग स्कूल की पैदाइश नहीं थे। इन लोगों ने संघर्ष से सीख हासिल की। अभाव ने इन्हें जुगाड़, धैर्य और जोखिम उठाना सिखाया। यही असली बिजनेस स्कूल था।

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भारतीय सेना की कहानी भी यही कहती है। कारगिल के हीरो कैप्टन विक्रम बत्रा साधारण स्कूलों में पढ़े। फील्ड मार्शल करियप्पा सामान्य शिक्षा पृष्ठभूमि से आए। आज भी भारत की सीमाओं पर खड़े हजारों सैनिक और अफसर सरकारी स्कूलों, सैनिक स्कूलों और केन्द्रीय विद्यालयों से निकलते हैं। जंग के मैदान में गोली यह नहीं पूछती कि सैनिक किस “इंटरनेशनल स्कूल” से पढ़ा है। सेना में साहस, अनुशासन और प्रदर्शन मायने रखता है。

UPSC की परीक्षा तो इस मिथक को पूरी तरह तोड़ देती है। हर साल IAS, IPS और IFS के टॉपर छोटे शहरों, गांवों, केन्द्रीय विद्यालयों, नवोदय विद्यालयों और सामान्य स्कूलों से निकलते हैं। कई हिंदी माध्यम से पढ़े होते हैं। कई बेहद साधारण परिवारों से आते हैं। उनकी सफलता साबित करती है कि भारत में अब भी मेहनत, लगन और अनुशासन स्कूल के ब्रांड नाम से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।

डॉक्टरों और वैज्ञानिकों की दुनिया में भी यही तस्वीर दिखती है। AIIMS के कई डॉक्टर, वैज्ञानिक और सर्जन साधारण स्कूलों से आए हैं। NEET के टॉपर भी अक्सर सरकारी या सामान्य स्कूलों से निकलते हैं। उनकी सफलता महंगे कैंपस नहीं, घंटों की पढ़ाई और अथक मेहनत से बनती है। खेल जगत को देखिए। सचिन तेंदुलकर शारदाश्रम विद्यालय से पढ़े। महेंद्र सिंह धोनी जवाहर विद्या मंदिर से निकले। पी.टी. ऊषा ने सरकारी स्कूल में पढ़ाई की। इनकी प्रतिभा एयर कंडीशनर में नहीं, संघर्ष में निखरी।

फिर भी समाज महंगे स्कूलों का इतना दीवाना क्यों है? क्योंकि हमारे भीतर अब भी औपनिवेशिक मानसिकता जिंदा है। अंग्रेज़ी बोलने, चमकदार यूनिफॉर्म पहनने और महंगे स्कूल में पढ़ने को लोग श्रेष्ठता समझते हैं। आज स्कूल शिक्षा का मंदिर कम, सामाजिक दिखावे का मंच ज्यादा बन गए हैं। लेकिन शिक्षा फैशन शो नहीं है। बच्चे की सफलता इस बात पर ज्यादा निर्भर करती है कि उसमें अनुशासन कितना है, मेहनत कितनी है, जिज्ञासा कितनी है, और परिवार व शिक्षक उसे कितनी सही दिशा देते हैं।

साधारण स्कूल एक और बड़ी चीज़ सिखाते हैं, जीवन से लड़ना। वहां पढ़ने वाले बच्चे अक्सर बिजली कटौती में पढ़ते हैं। भीड़भाड़ वाली बसों में सफर करते हैं। किताबें बांटकर पढ़ते हैं। सीमित संसाधनों में सपने देखते हैं। यही संघर्ष उन्हें मानसिक रूप से मजबूत बनाता है। यही कारण है कि मुख्यधारा के स्कूल भारत की असली ताकत हैं। वे करोड़ों बच्चों को सपने देखने का अधिकार देते हैं। वे पहली पीढ़ी के अफसर, इंजीनियर, डॉक्टर और उद्यमी पैदा करते हैं। वे अवसरों की सीढ़ी को खुला रखते हैं।

भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था भी बराबरी का मौका देती है। IIT, AIIMS, NDA और UPSC जैसी परीक्षाएं गांव के बच्चे को भी राष्ट्रीय स्तर पर मुकाबला करने का अवसर देती हैं। यही भारत की असली खूबसूरती है। इसका मतलब यह नहीं कि सरकारी स्कूलों में समस्याएं नहीं हैं। वहां शिक्षक की कमी है। बुनियादी सुविधाओं की दिक्कत है। पुरानी पढ़ाई पद्धति है। इन कमियों को दूर करना बेहद जरूरी है।

लेकिन समाधान यह नहीं कि सिर्फ कुछ चमकदार एलीट स्कूल बना दिए जाएं। समाधान यह है कि हर बच्चे को अच्छी शिक्षा मिले। जब ओडिशा के किसी गांव का स्कूल अगला कलाम पैदा करता है, जब हिमाचल का साधारण स्कूल अगला विक्रम बत्रा देता है, तब भारत जीतता है। आधुनिक भारत की कहानी एलीट स्कूलों की नहीं, साधारण स्कूलों की कहानी है। यहीं भारत की असली प्रतिभा तैयार होती है। यहीं से देश के असली निर्माता निकलते हैं।

Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News

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