राजनैतिक व्यंग्य-समागम
चल चाणक्य अब पंजाब, जीत लिया बंगाल : राजेंद्र शर्मा
या-रब ये विरोधी न समझे हैं, न समझेंगे मोदी जी के मन की बात। बताइए, बंगाल फतेह करने के बाद, मोदी जी फौरन अपना वादा पूरा करने में जुट गए कि नहीं? मोदी जी ने अपने वादे, बल्कि अपनी गारंटी को पूरा किया कि नहीं कि बंगाल में, बंगाली को गद्दी पर बैठाएंगे ; बांग्ला बोलने वाले को गद्दी पर बैठाएंगे ; कोलकाता से राज करने वाले को बंगाल की गद्दी पर बैठाएंगे।
लेकिन, मजाल है कि एक बार फिर बाहर वालों के राज से बंगाल वालों की जान बख्शवाने के लिए, विपक्ष वालों ने मोदी जी को नाम को भी धन्यवाद दिया हो। उल्टे जब मोदी जी ब्रिगेड परेड मैदान में शुभेंदु अधिकारी का राजतिलक करा रहे थे, तब विपक्षी ब्रिगेड के बाहर सोशल मीडिया पर मोदी जी का ही दस साल पुराना वीडियो वायरल कर के, खुद मोदी जी के श्रीमुख से अधिकारी को महाभ्रष्ट कहलवा रहे थे!
नहीं, हम यह नहीं कह रहे हैं कि अधिकारी को खुद मोदी जी की आवाज में भ्रष्ट कहे जाने से, मोदी जी को कोई फर्क पड़ता है या शुभेंदु अधिकारी जी को ही कोई फर्क पड़ता है या बंगाल में ऐसे बदलाव के यज्ञ में आहुति देने वालों को कोई फर्क पड़ता है। जैसे नारदा घोटाले का वीडियो वायरल नहीं होता, तब भी शुभेंदु बाबू राजतिलक होता, वैसे ही वीडियो वायरल होने के बाद भी उनका राजतिलक हुआ। जैसे मोदी जी की आवाज में उनके घोटाले की याद दिलाए जाने के बिना, मोदी जी के आशीर्वाद से शुभेंदु बाबू का राजतिलक हुआ होता, वैसे ही खुद मोदी जी की आवाज में घोटाले की कथा पब्लिक को सुनाए जाने के बाद भी, मोदी जी के आशीर्वाद से उनका राजतिलक हुआ。
वास्तव में मोदी जी की यही तो खासियत है। मोदी जी जो करने की ठान लेते हैं, वह कर के ही मानते हैं। मोदी जो ठान लेते हैं, वह करने से उन्हें कोई रोक नहीं सकता है, बल्कि अब तो कोई रोकने की जुर्रत भी नहीं करता है, न कोई अदालत-वदालत और न कोई चुनाव आयोग वगैरह। शुरू से ही दिखाई दे रहा था कि मोदी जी इस बार बंगाल को फतेह कर के मानेंगे और फतेह कर के दिखाया भी。
बंगाल को फतेह करने के लिए, मोदी जी को चुनाव आयोग को अपने युद्ध-रथ में जोतना पड़ा, तो जोता। ईडी, सीबीआई, केंद्रीय बलों, सब को काम पर लगाना पड़ा, तो लगाया। धन्नासेठों की तिजोरियों से निकला पैसा पानी की तरह बहाना पड़ा, तो बहाया। देश की पूरी सरकार को महीनों कोलकाता ले जाकर बैठाना पड़ा, तो बैठाया। साम-दाम-दंड-भेद, हरेक हथियार खुलकर आजमाया, पर बंगाल फतेह कर के दिखाया। और अब शुभेंदु अधिकारी को गद्दी पर भी बैठा दिया。
मोदी जी का फैसला न टलना था और न टला। बस इतनी बात है कि खुशी के मौके पर ऐसा वीडियो वाइरल हो जाए, तो मुंह का जायका जरा बिगड़ जाता है। कहां मोदी जी के आशीर्वाद से इतिहास बन रहा था और कहां चोर-चोर के शोर को दबाने के लिए, शुभेंदु अधिकारी को भगवा वेश से लेकर जय श्रीराम के नारों तक का सहारा लेना पड़ गया। हिंदू राज में ऐसा होना चाहिए था क्या?
और ये विरोधियों ने उधार का मुख्यमंत्री, उधार का मुख्यमंत्री क्या लगा रखा है? शुभेंदु अधिकारी, पहले ममता बनर्जी की पार्टी में रहे थे, इसका मतलब यह थोड़े ही है कि उन्हें मोदी जी की पार्टी में उधार का मुख्यमंत्री कहा जाएगा। वैसे भी यह कोई पहला मौका थोड़े ही है जब, मोदी जी ने दूसरी पार्टी के नेताओं को अपनी पार्टी में आकर जनता की सेवा करने का चांस दिया है。
शुभेंदु अधिकारी को तो अब गद्दी मिली है, बगल में गुवाहाटी की गद्दी पर मोदी जी के आशीर्वाद से हिमंत बिस्वा शर्मा तो पांच साल पहले से सवार हैं। वह कभी कांग्रेस में हुआ करते थे। मणिपुर के पिछले मुख्यमंत्री, वीरेंद्र सिंह भी कभी कांग्रेस में ही हुआ करते थे। और बिहार के नये-नये बने मुख्यमंत्री, सम्राट चौधरी तो बिहार की करीब-करीब सभी पार्टियों में चक्कर लगाने के बाद, आखिर में मोदी जी की पार्टी में पहुंचे हैं। असल में मोदी जी पार्टियों के विभाजन से ऊपर, उठकर देश के हित को देखते हैं。
मोदी जी किसी नेता की पार्टी देखते ही नहीं हैं, जैसे अर्जुन निशाने की मछली की सिर्फ आंख देखता था, वैसे ही मोदी जी तो नेताओं की सिर्फ देश की सेवा की लगन देखते हैं और देश की सेवा के लिए संसाधन जुटाने की प्रतिभा। और जहां भी उन्हें राष्ट्र के काम की कोई प्रतिभा दिखाई देती है, उसे अपनी पार्टी में लाने में और राष्ट्र यानी संघ की सेवा में लगाने में, जरा भी देरी नहीं करते हैं। यह उधार के मुख्यमंत्री, मंत्री वगैरह का नहीं, राष्ट्रहित में देश भर से राजनीतिक प्रतिभाओं का संकलन करने का मामला है。
जाहिर है कि इस काम में भी बाधाएं आती हैं, पर मोदी जी बाधाओं के सामने पीछे हटने वालों में नहीं हैं। राष्ट्रहित के लिए है तब भी, दूसरी पार्टियों से नेताओं को खींचकर अपने साथ लाना आसान थोड़े ही होता है? राष्ट्र सेवा के लिए भी अक्सर लोगों को प्रलोभन देना पड़ता है। प्रलोभन भी काम नहीं आए तो उनके पीछे ईडी, सीबीआई वगैरह को छोड़ना पड़ता है। मामले-मुकद्दमे करने पड़ते हैं। जेल का डर दिखाना पड़ता है और कभी-कभी तो जेल भेजना भी पड़ता है। इस सब के लिए भ्रष्टाचार वगैरह के सच्चे-झूठे आरोप लगाने ही पड़ते हैं। पर यह सब तभी तक के लिए होता है, जब तक बंदा खूंटा तुड़ाकर, मोदी जी के थान पर आ नहीं पहुंचता है। जाहिर है कि उसके बाद सब भुला दिया जाता है। विरोधी इसके बाद भी, मोदी जी के आवाज के वीडियो पकड़कर बैठे रहना चाहते हैं, तो मोदी जी क्या कर सकते हैं?
और हां! उधार के नेताओं से याद आया, पंजाब के लिए भी तो मोदी जी को अपनी पार्टी का पहला सीएम मिल गया लगता है। जैसे शुभेंदु अधिकारी कभी तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो का खासमखास हुआ करता था, वैसे ही पंजाब में भी मोदी जी ने आप पार्टी सुप्रीमो का खासमखास खोज भी निकाला है और खरीद भी डाला है — वही राघव चड्ढा और कौन? बंगाल फतेह हो लिया, अब पीएमओ और गृह मंत्रालय, कोलकाता से उठकर चंडीगढ़ की तरफ निकल सकते हैं। ईडी, सीबीआई की टीमों के रूप में उसकी अग्रिम पार्टियों ने पहुंच कर अपना काम शुरू भी कर दिया है। अगला नंबर पंजाब का है। तुम कहां रह गए, ज्ञानेश?
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और ‘लोकलहर’ के संपादक हैं।)
ताज न्यूज़ का विशेष संपादकीय विश्लेषण: राजनैतिक व्यंग्य के आईने में वास्तविक राजनीति
राजेंद्र शर्मा जी का यह व्यंग्य भारतीय राजनीति के उस दौर की गहरी पड़ताल करता है, जहाँ विचारधाराओं की दीवारें ढह चुकी हैं और ‘सत्ता’ ही एकमात्र अंतिम सत्य बन गई है। यह आलेख तंज के आईने में वास्तविक राजनीति (Realpolitik) का चित्रण करता है। लेखक ने बंगाल में शुभेंदु अधिकारी के राजतिलक और उनके पुराने ‘भ्रष्टाचार’ वाले वीडियो के विरोधाभास को पकड़कर बीजेपी की कूटनीति पर करारा प्रहार किया है। जब सत्ता के लिए चुनाव आयोग, ईडी, सीबीआई और केंद्रीय बलों के ‘युद्ध-रथ’ में जोतने की बात की जाती है, तो यह लोकतंत्र की संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है।
‘उधार के नेताओं’ का बढ़ता दबदबा:
व्यंग्य में ‘उधार के मुख्यमंत्री’ मॉडल (जैसे हिमंत बिस्वा शर्मा, सम्राट चौधरी) का ज़िक्र यह दर्शाता है कि बीजेपी ने क्षेत्रीय दलों के क्षत्रपों को अपनी ओर खींचने में महारत हासिल कर ली है। यह मॉडल एक ओर पार्टी को नए क्षेत्रों में विस्तार करने में मदद करता है, लेकिन दूसरी ओर, यह मूल कार्यकर्ताओं और विचारधारा के प्रति निष्ठावान नेताओं के लिए एक बड़ा संकट पैदा करता है। जब दूसरी पार्टी के नेताओं को ‘देश की सेवा की लगन’ के आधार पर राष्ट्र सेवा (संघ सेवा) का चांस दिया जाता है, तो यह राजनीति में अवसरवाद को भी बढ़ावा देता है।
पंजाब की नई जंग:
आलेख का अंतिम हिस्सा पंजाब की ओर बीजेपी की भावी रणनीति की ओर इशारा करता है। बंगाल फतह के बाद अब ईडी और सीबीआई की टीमों के चंडीगढ़ पहुंचने की बात यह बताती है कि बीजेपी क्षेत्रीय दलों को कमजोर करने और अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल कर सकती है। क्या राघव चड्ढा बीजेपी के नए ‘चाणक्य’ के शिकार होंगे? यह तो भविष्य ही बताएगा, लेकिन यह निश्चित है कि पंजाब में अब एक नई और आक्रामक जंग शुरू होने वाली है।