सेल्फी की बीमारी!!!
एक तस्वीर के लिए मौत का खेल
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बृज खंडेलवाल द्वारा
10 मई 2026
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डेली यमुना किनारे, आरती स्थल के पास लड्डू गोपाल की विशाल मूर्ति के इर्द गिर्द, तमाम लोग सेल्फी लेते हैं, अजीब डांस करते हुए रील बनाते हैं। रोड पर कोई गिर जाए तो पहले वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हैं, बाद में हाल चल पूछते हैं। मैं और मेरा मोबाइल फोन, बस, और कुछ नहीं!
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दूर से ट्रेन की सीटी सुनाई देती है। चार लड़के मुस्कराते हुए मोबाइल कैमरे की तरफ देखते हैं। एक लड़का हाथ और आगे बढ़ाता है ताकि “परफेक्ट सेल्फी” आ सके। अगले ही पल तेज रफ्तार ट्रेन उन्हें कुचल देती है। उनकी तस्वीर कभी सोशल मीडिया तक नहीं पहुंचती。
भारत में सेल्फी का जुनून अब सिर्फ एक मासूम शौक नहीं रहा। यह एक खतरनाक सामाजिक बीमारी बन चुका है। रेलवे ट्रैक, नदी किनारे, पहाड़, झरने, पानी की टंकियां, चलती ट्रेनें, सब अब “रील” और “वायरल वीडियो” के मंच बन गए हैं। लाइक्स और व्यूज़ की भूख ने युवाओं को मौत से खेलना सिखा दिया है。
भारत को अब दुनिया की “सेल्फी रिपब्लिक” कहा जाने लगा है। कुछ लोग इसे “किलफी” संस्कृति भी कहते हैं, यानी ऐसी सेल्फी जो जान ले ले。
घटनाएं दिल दहला देती हैं。
2015 में मथुरा के पास तीन कॉलेज छात्र ताजमहल जाते समय रेलवे ट्रैक पर रुक गए। उन्हें पीछे आती ट्रेन के साथ एक “डेरिंग सेल्फी” चाहिए थी। ट्रेन नहीं रुकी। उनकी जिंदगी रुक गई。
2017 में दिल्ली में दो किशोर रेलवे ट्रैक पर सेल्फी लेते हुए ट्रेन की चपेट में आ गए। उन्हें लगा कि आखिरी पल में हट जाएंगे। मगर मौत ज्यादा तेज निकली。
2019 में पानीपत में तीन युवक एक ट्रेन से बचने के लिए दूसरे ट्रैक पर कूद गए। वहां दूसरी ट्रेन आ रही थी। तीनों की मौके पर मौत हो गई。
कानपुर में 2016 में सात छात्र गंगा में डूब गए। एक लड़का बांध के किनारे सेल्फी लेते समय फिसल गया। बाकी दोस्त उसे बचाने कूद पड़े। कोई वापस नहीं लौटा。
हाल ही में उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर में पांच किशोर वायरल रील बनाने के लिए पानी की ऊंची टंकी पर चढ़ गए। उतरते समय जंग लगी सीढ़ी टूट गई। एक की मौत हो गई, कई गंभीर घायल हुए。
फिर भी लोग नहीं संभल रहे।
आखिर क्यों?
मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि यह डिजिटल दौर की नई बीमारी है। सोशल मीडिया के एल्गोरिद्म (तरीके) सनसनी, खतरा और ड्रामा पसंद करते हैं। जितना खतरनाक वीडियो, उतने ज्यादा व्यूज़। मोबाइल स्क्रीन पर मिलने वाला हर “लाइक” दिमाग को छोटी सी खुशी देता है। धीरे धीरे यही आदत नशा बन जाती है。
आज का युवा सिर्फ जिंदगी नहीं जी रहा, वह हर पल “परफॉर्म” कर रहा है। हर किसी को वायरल होना है। हर कोई इंटरनेट का सितारा बनना चाहता है。
दोस्त भी उकसाते हैं。
“भाई, ये रील फाड़ देगी।”
“थोड़ा और आगे जा।”
“ट्रेन के पास खड़े हो, मजा आएगा।”
बस, यहीं हादसा जन्म लेता है。
सबसे दुखद बात यह है कि संवेदनाएं भी कमजोर पड़ रही हैं। सड़क हादसों में घायल लोगों की मदद करने के बजाय लोग वीडियो बनाते हैं। बाढ़, आग, अंतिम संस्कार, अस्पताल, यहां तक कि मौत के पास भी लोग सेल्फी लेते नजर आते हैं。
दुनिया अब दर्द को भी “कंटेंट” बना रही है。
पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं: “यह सिर्फ भारत की समस्या नहीं है। अमेरिका में लोग खाई और पहाड़ों से गिरकर मरे हैं। रूस में सरकार को “सेफ सेल्फी कैंपेन” चलाना पड़ा क्योंकि लोग हथियारों और चलती गाड़ियों के साथ तस्वीरें लेते हुए मर रहे थे। स्पेन और ऑस्ट्रेलिया में भी समुद्र किनारे और चट्टानों पर सेल्फी लेते हुए कई पर्यटकों की मौत हुई। मगर भारत की हालत ज्यादा गंभीर है।”
एक अरब से ज्यादा मोबाइल फोन। सस्ता इंटरनेट। युवा आबादी। सोशल मीडिया की अंधी दौड़। और कमजोर कानून व्यवस्था। यह मिश्रण बेहद खतरनाक है。
सरकार ने कई जगह “नो सेल्फी ज़ोन” बनाए हैं। रेलवे स्टेशन और झरनों के पास चेतावनी बोर्ड लगाए गए हैं। पुलिस जागरूकता अभियान चलाती है। मगर असर बहुत कम दिखता है。
सिर्फ बोर्ड लगाने से नशा नहीं रुकता。
असल सवाल कहीं ज्यादा गहरा है। क्या आज का इंसान “अनदेखा” होने से डरने लगा है? क्या हर खुशी, हर सफर, हर दुख, हर खाना, हर पल दुनिया को दिखाना जरूरी हो गया है?
अब जिंदगी जीने से ज्यादा उसे पोस्ट करना जरूरी लगता है。
मोबाइल कैमरा नया आईना बन चुका है। लोग खुद को दूसरों की नजर से देखने लगे हैं。
और इस “सेल्फी रिपब्लिक” की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि लोग जिंदगी रिकॉर्ड करते करते जिंदगी खो रहे हैं。
कोई भी सेल्फी इतनी जरूरी नहीं कि उसके बदले जनाज़ा उठे। कोई भी सेल्फी इतनी खूबसूरत नहीं कि उसकी कीमत एक मौत हो。
फिल्टर चेहरे बदल सकता है। कब्र नहीं。
ताज न्यूज़ का विशेष संपादकीय विश्लेषण: डिजिटल नार्सिसिज़्म और मृत होती संवेदनाएं
बृज खंडेलवाल जी का यह आलेख हमारे समय की सबसे बड़ी और खामोश महामारी—’डिजिटल नार्सिसिज़्म’ (Digital Narcissism) यानी आत्ममुग्धता के चरम पर एक गहरा प्रहार है। भारत, जो कभी अपनी गहरी पारिवारिक और सामाजिक संवेदनाओं के लिए जाना जाता था, आज एक ऐसी ‘डिजिटल भीड़’ में तब्दील हो चुका है जहाँ किसी सड़क हादसे में तड़पते इंसान को अस्पताल पहुँचाने से ज्यादा ज़रूरी उसका वीडियो बनाकर ‘फर्स्ट रिपोर्टर’ बनना हो गया है। जब हम श्मशान घाट या किसी की अंतिम विदाई में भी कैमरे का एंगल सेट करते हैं, तो समझ लेना चाहिए कि हमने सिर्फ अपना मानसिक संतुलन नहीं, बल्कि अपनी इंसानियत भी खो दी है।
डोपामाइन का खेल और एल्गोरिदम का जाल:
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें, तो यह पूरी ‘रील’ और ‘सेल्फी’ संस्कृति हमारे दिमाग के ‘रिवॉर्ड सिस्टम’ (Reward System) को हैक कर चुकी है। जब किसी युवा के वीडियो पर ‘लाइक्स’ (Likes) आते हैं, तो उसके दिमाग में ‘डोपामाइन’ (Dopamine) नाम का एक केमिकल रिलीज़ होता है, जो ठीक उसी तरह की खुशी और नशे का अहसास कराता है, जैसा किसी ड्रग्स के सेवन से होता है। सिलिकॉन वैली की टेक कंपनियों ने अपने एल्गोरिदम इस तरह से डिज़ाइन किए हैं कि वे आपको हर वक्त स्क्रीन से चिपकाए रखें। सनसनी (Sensationalism) हमेशा तेज़ी से वायरल होती है। यही कारण है कि युवा रेलवे ट्रैक, ऊंची बिल्डिंगों की छतों और बहती नदियों में कूदकर वो स्टंट करते हैं, जिसकी कीमत उन्हें अपनी जान देकर चुकानी पड़ती है। यह ‘किलफी’ (Killfie) सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि एक सुनियोजित ‘डिजिटल हत्या’ है, जहाँ हत्यारा वह अदृश्य समाज है जो ऐसे खतरनाक वीडियो को शेयर और लाइक करता है।
सामाजिक शून्यता और ‘अनदेखा’ होने का डर (FOMO):
इस पूरी समस्या की जड़ में वह गहरा मनोवैज्ञानिक डर छिपा है जिसे ‘FOMO’ (Fear of Missing Out) कहा जाता है। आज का युवा खुद को इस दुनिया में तभी ‘अस्तित्व’ (Exist) में मानता है, जब उसकी डिजिटल उपस्थिति (Digital Presence) को सराहा जाए। अगर उसने कोई अच्छा खाना खाया और उसकी फोटो इंस्टाग्राम पर नहीं डाली, तो उसे लगता है कि उसने वो खाना खाया ही नहीं। यह आत्म-पहचान का एक भयानक संकट है। असली दुनिया के दोस्त अब ‘वर्चुअल फॉलोअर्स’ में बदल गए हैं। जब ‘पीयर प्रेशर’ (Peer Pressure) में आकर दोस्त कहते हैं कि “ट्रेन के और करीब जा”, तो वे वास्तव में एक-दूसरे की जान ले रहे होते हैं।
समाधान की दिशा में: एक सामूहिक जिम्मेदारी:
सरकार के ‘नो सेल्फी ज़ोन’ के बोर्ड इस समस्या का मात्र एक ‘सुपरफिशियल’ (Superficial) इलाज हैं। असली इलाज घर की दहलीज से शुरू होना चाहिए। माता-पिता को अपने बच्चों के स्क्रीन टाइम और उनकी डिजिटल गतिविधियों पर नज़र रखनी होगी। स्कूलों में ‘डिजिटल वेलबीइंग’ (Digital Wellbeing) और सोशल मीडिया की ‘मीडिया साक्षरता’ (Media Literacy) पर कक्षाएं अनिवार्य होनी चाहिए। युवाओं को यह समझना होगा कि ‘वर्चुअल लाइक्स’ कभी भी ‘रियल लाइफ’ की जगह नहीं ले सकते। एक तस्वीर के लिए अपनी जान दांव पर लगाना बहादुरी नहीं, बल्कि एक मानसिक दिवालियापन है। “फिल्टर चेहरे बदल सकता है, कब्र नहीं”—यह एक ऐसी कड़वी सच्चाई है जिसे हर उस स्मार्टफोन यूजर को याद रखना चाहिए जो एक ‘परफेक्ट फ्रेम’ के लिए अपनी जिंदगी को दांव पर लगा रहा है। हमें कैमरे के लेंस से बाहर निकलकर, अपनी आंखों से जिंदगी जीना फिर से सीखना होगा।