राजनैतिक व्यंग्य: सत्ता के दोहरे चरित्र और दिखावे की राजनीति पर विष्णु नागर का प्रखर आलेख

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Article Desk, tajnews.in | Wednesday, May 13, 2026, 12:45:10 PM IST

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Vishnu Nagar Writer
विष्णु नागर
वरिष्ठ साहित्यकार
एवं स्वतंत्र पत्रकार
वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार विष्णु नागर ने अपने इस प्रखर राजनैतिक व्यंग्य में समकालीन सत्ता के दोहरे चरित्र, धार्मिक पाखंड और संस्थागत पतन का एक बेहद मारक और मनोवैज्ञानिक चित्र खींचा है। यह आलेख उन ‘प्रच्छन्न सत्ताधीशों’ की पहचान करता है जो मृदुभाषी होकर और दिखावे की राजनीति कर संविधान तथा न्याय प्रणाली को अपने अधीन कर रहे हैं।
HIGHLIGHTS
  1. विष्णु नागर का तीखा व्यंग्य: आज का समय उन लोगों का है जो सादगी और धर्म का चोला ओढ़कर हर सिंहासन पर काबिज़ हैं।
  2. राजनीति में दिखावे की संस्कृति: कैसे सत्ताधीश ऐसा ‘वातावरण’ बनाते हैं कि व्यवस्था पूरी तरह से उनके अधीन हो जाती है।
  3. कैमरों के सामने सत्तू खाना, दिखावटी ‘ईश्वर भक्ति’ और हर आपदा में ‘अवसर’ खोजना इस नए तंत्र की सबसे बड़ी पहचान है।
  4. ताज न्यूज़ का संपादकीय विश्लेषण: जब सत्ता संविधान और न्याय को अपनी सुविधानुसार मोड़ने लगे, तो वह लोकतंत्र की आत्मा के लिए सबसे बड़ा खतरा है।

राजनैतिक व्यंग्य-समागम

जालिमों और हत्यारों का समय : विष्णु नागर

हमारा समय जालिमों और हत्यारों का समय है। ये बहुत-सी शक्लों में पाए जाते हैं। इनके अलग-अलग ब्रांड और ब्रांड एंबेसडर हैं। हर सिंहासन पर अलग-अलग नामों और भिन्न-भिन्न चेहरों के साथ ये ही बैठे हैं। कहीं नेतावेश में, कहीं साधुवेश में, कहीं बहुरूपिया बन कर। कहीं श्वेत-पीत वस्त्रों में, तो कहीं सूट-टाई में। कभी साकार, तो कभी निराकार रूप में。

उन्होंने अपनी असंख्य प्रतिमाएं, अनगिनत रूपों-रंगों में देश के कोने-कोने में लगवा रखी हैं, जिनकी आरती भी वे खुद करते हैं और प्रसाद भी वे स्वयं चट करते हैं। मठ उनके हैं, मंदिर उनके हैं। नदियां, तालाब और समुद्र उनके हैं। हवा उनकी है, पानी उनका है। बरसात उनकी है, जंगल उनके हैं, पहाड़ और खदानें उनकी हैं। जहां तक उनकी नजर जाए, सब उनका है। जितना भी जिधर भी हरा है, नीला है, पीला है, सफेद और वासंती है, सब उनका है。

विश्वविद्यालय और कला-साहित्य केंद्र उनके हैं। प्रकाशन गृह और स्वयंसेवी संगठन उनके हैं। सरकार उनकी है, डंडा और गोली उनकी है। वकील उनके हैं, जज उनके हैं, फैसले उनके हैं। उनके चतुर्मुखी योगदान की प्राइम टाइम में हर चैनल पर हर दिन चर्चा उनकी है। वे अपनी छवि, अपने कपड़ों की तरह अत्यंत उज्ज्वल रखते हैं। उस पर सिलवट तक पड़ने नहीं देते। वे इतने ताकतवर और जरूरत पड़ने पर इतने विनम्र भी हैं कि कानून उन पर फंदा कस नहीं सकता और कभी कानून ऐसी गलती कर बैठता है, तो वे इतनी सफाई से, रात के अंधेरे में नहीं, दिनदहाड़े उसकी हत्या करवा देते हैं कि किसी को पता नहीं चलता और पता चल जाए, तो भी डर कैसा? वे ही कानून हैं, वे ही रक्षक हैं!

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सफल हत्यारे अनेक बार दिखने में फूलों से कोमल, मृदुभाषी और धार्मिक जैसे लगने का अभ्यास करते हैं। उनसे किसी बात पर अगर ठन न जाए, उनके अहम को चोट न पहुंचाई जाए, तो वे उदार हृदय होते हैं। स्वागत-सत्कार में अत्यंत प्रवीण, विनम्रता में एंटायर सब्जैक्ट्स में एम ए ही नहीं, पीएचडी होते हैं। सामने वाले को अहसानों के बोझ से इतना लाद देते हैं कि लाभार्थी उनके हत्यारे इरादों को जितना ज्यादा भांपने लग जाता है, उतना ही उसका उनसे डर बढ़ता जाता है और वह उनके और अधिक नजदीक आने लगता है। उनकी छत्रछाया में अपने को महफूज़ समझता है। लाभार्थी कभी हत्यारे के चंद बुरे क्षणों में उनसे छिटकने की कोशिश करता है, दूर दिखना चाहता है, तो हत्यारे इसे भांप कर प्यार से उसे अपने पास सटाते हैं, उसके गले में अपना हाथ डालकर उसकी और अपनी मुस्कुराती हुई तस्वीर खिंचवाते हैं, ताकि वक्त-जरूरत काम आए। हत्यारे हत्या के अलावा अपने हर काम का आडियो-विडियो और लिखित रिकार्ड रखते हैं और लाभार्थी को इसकी याद दिलाते रहते हैं कि हमारे पास तुम्हारा काला-पीला चिट्ठा है!

हत्यारे मंदिर जाते हैं। किसी दिन सोमनाथ, तो किसी दिन मंगलनाथ। किसी दिन केदारनाथ, तो किसी दिन रामेश्वरम। यही उनकी ईश्वर भक्ति और देश भक्ति का ठोस प्रमाण है। हत्यारे सब भूल सकते हैं, मगर मंदिर जाना कभी नहीं भूल सकते। उन्हें डर रहता है कि वे चार दिन मंदिर-मठ नहीं गए, तो उनका असली रूप खुल जाएगा। कभी वे भगवान से आशीर्वाद लेते हैं, तो कभी भगवान को आशीर्वाद भी देते हैं। उनकी नजर उठते-बैठते, खाते-पीते, बच्चों के साथ फुटबॉल खेलने का अभिनय करते हुए, झालमुड़ी या सत्तू खाते हुए कैमरे पर रहती है। कैमरे से न वे अपनी कोमलता छिपाते हैं, न मृदुता, न ईश्वर के प्रति अपना ‘अगाध और अटूट प्रेम’, न घंटी बजाना, न ढोल बजाना, न त्रिशूल उठाना। वे छिपाते हैं हत्याओं की अनगिनत दास्तानें। उनकी कोमलता, उनकी मृदुभाषिता, उनकी ईश्वर भक्ति, उनका कला-साहित्य प्रेम बिकाऊ है, जिसकी आड़ में वे अगली हत्याओं के इरादे और पिछली हत्याओं का इतिहास छुपाते हैं। वे बार-बार उन करोड़ों लोगों की बात करते हैं, जिनका इस्तेमाल वे नाक पोंछने वाले रूमाल की तरह, पसीना पोंछने वाले गमछे की तरह और टायलेट पेपर की मानिंद करते हैं。

सफल हत्यारे खुद हत्या करना छोड़ देते हैं। वे इतने पहुंचे हुए हो चुके होते हैं कि किसी से कहते नहीं कि तुम हत्या करो। वे ऐसा वातावरण निर्मित करते हैं कि वे जिनकी हत्या करवाना चाहते हैं, अपने आप हो जाती है और उनके हाथ खून से नहीं सनते! हत्या के बाद उनके हाथ, हाथ नहीं रहते, कर-कमल हो जाते हैं और रिबन काटने के काम आते हैं。

हत्यारे दुख प्रकट करने में सबसे आगे रहते हैं, खासकर वहां, जहां ऊंगली उन पर उठ सकती है! वे शोकाकुल परिवार से इतनी ‘गहरी सहानुभूति’ प्रकट करते हैं कि वह परिवार सोच भी नहीं सकता कि असली हत्यारा तो यही है। अगले दिन हत्यारे के चित्र के साथ उसके शोक संदेश से अखबार पटे होते हैं और टीवी पर उसका विडियो संदेश सबसे ज्यादा बार प्रसारित होता है। हत्यारे हर आपदा में अवसर ढूंढते हैं, चाहे वह कोरोना हो! हत्या की उच्च स्तरीय जांच के आदेश वे देते हैं और पांच साल बाद हत्या के पक्के सबूत न मिलने के आधार पर अपने सहयोगी हत्यारों को छुड़वाते भी वही हैं। इस तरह हत्या के हर मोर्चे पर वे सक्रिय रहते हैं。

उनसे आप आदमी या लोगों के समूह की ही नहीं, सिद्धांतों की, न्याय की, संविधान की, धर्मनिरपेक्षता की यानी किसी भी किस्म की हत्या करवा सकते हैं, बशर्ते उससे उन्हें फायदा हो। हत्या ही उनका भोजन है, मिठाई है, पान, सिगरेट और दारू है। हत्या ही उनका साहित्य और संगीतप्रेम है। हत्या ही उनका रंगमंच है, जिसकी साधना में वे रत रहते हैं。

(कई पुरस्कारों से सम्मानित विष्णु नागर साहित्यकार और स्वतंत्र पत्रकार हैं। जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं।)

ताज न्यूज़ का विशेष संपादकीय विश्लेषण: संस्थागत पतन और ‘दिखावे की राजनीति’ का मनोवैज्ञानिक चेहरा

वरिष्ठ साहित्यकार विष्णु नागर का यह व्यंग्य आधुनिक भारतीय राजनीति का वह ‘एक्स-रे’ (X-Ray) है, जिसमें प्रत्यक्ष घाव तो नहीं दिखते, लेकिन अंदर ही अंदर टूटता हुआ लोकतंत्र का ढांचा साफ नज़र आता है। यह आलेख केवल कुछ व्यक्तियों पर प्रहार नहीं है; यह उस पूरी ‘व्यवस्था’ और ‘मनोविज्ञान’ पर एक सर्जिकल स्ट्राइक है, जहाँ सत्ता और अपराध के बीच की रेखा पूरी तरह मिट चुकी है। नागर जी ने जिस ‘प्रच्छन्न सत्ताधीश’ की परिभाषा गढ़ी है, वह आज के राजनीतिक यथार्थ की सबसे डरावनी और सटीक तस्वीर है। आज व्यवस्थाएं छुरों या बंदूकों से खत्म नहीं होतीं; आज व्यवस्थाएं ‘संस्थाओं’ (Institutions) को पंगु बनाकर, कानूनों को अपनी सुविधानुसार मोड़ कर और एक ऐसा ‘माहौल’ बनाकर खत्म की जाती हैं जहाँ असहमतियों को देशद्रोह मान लिया जाता है।

दिखावे की संस्कृति और ‘पीआर’ (PR) का पाखंड:
आलेख का सबसे मारक बिंदु वह है जहाँ लेखक आधुनिक नायकों के मृदुभाषी और धार्मिक चोले का वर्णन करते हैं। आज की राजनीति पूरी तरह से ‘परसेप्शन’ (Perception) यानी दिखावे का खेल बन गई है। कैमरे के सामने सत्तू खाना, फुटबॉल खेलना या केदारनाथ-सोमनाथ की यात्राएं करना महज़ ‘इवेंट मैनेजमेंट’ (Event Management) के टूल हैं। ये ‘धार्मिक यात्राएं’ और ‘सादगी का प्रदर्शन’ वास्तव में उस क्रूर चेहरे को छिपाने का एक आवरण (Cover) हैं, जो पर्दे के पीछे से जल-जंगल-ज़मीन, रोज़गार और संवैधानिक अधिकारों को निगल रहा है। जब राजनेता भगवान से ‘आशीर्वाद’ लेने के बजाय, कैमरे के एंगल सेट करके भगवान को ही ‘आशीर्वाद’ देने की मुद्रा में आ जाएं, तो समझ लेना चाहिए कि सत्ता के अहंकार ने चरम सीमा पार कर ली है और वह स्वयं को ‘ईश्वर’ के समकक्ष स्थापित करने का प्रयास कर रही है।

सिस्टम का ‘निजीकरण’ और डर की राजनीति:
लेखक ने अत्यंत सटीकता से लिखा है कि आज “वकील उनके हैं, जज उनके हैं, फैसले उनके हैं।” यह एक ऐसे ‘अधिनायकवाद’ (Authoritarianism) की ओर इशारा है जहाँ सत्ता किसी एक व्यक्ति या समूह की ‘निजी जागीर’ बन गई है। तंत्र का महारथी वह है जो अपने खिलाफ उठने वाली हर आवाज़ को डरा कर, ब्लैकमेल करके या झूठे अहसानों तले दबाकर खामोश कर देता है। ऑडियो-वीडियो की रिकॉर्डिंग और ‘काले-पीले चिट्ठे’ (Dossiers) का ज़िक्र आज की उस ‘फाइल-पॉलिटिक्स’ (Dossier Politics) की ओर स्पष्ट संकेत है, जिसका इस्तेमाल विपक्षी नेताओं, पत्रकारों और असहमत नागरिकों की आवाज़ को दबाने (Extortion/Blackmail) के लिए केंद्रीय एजेंसियों के माध्यम से किया जा रहा है। ये चिट्ठे किसी को सुधारने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें हमेशा के लिए अपने नियंत्रण में रखने के लिए बनाए जाते हैं।

निष्कर्ष: वैचारिक पतन का यह दौर:
विष्णु नागर का यह व्यंग्य हमें सचेत करता है कि सबसे खतरनाक प्रहार वे नहीं होते जिनमें इंसानों का खून बहता है; सबसे खतरनाक प्रहार वे होते हैं जिनमें ‘सिद्धांतों, न्याय, संविधान और धर्मनिरपेक्षता’ का गला घोंट दिया जाता है। जब शासक ‘उच्च-स्तरीय जांच’ का दिखावा करता है और अंततः सबूतों के अभाव में दोषियों को छोड़ दिया जाता है, तो यह ‘न्याय प्रणाली’ (Justice System) की सबसे बड़ी हार होती है। आज आम नागरिक का इस्तेमाल केवल ‘रूमाल या टॉयलेट पेपर’ की तरह किया जा रहा है—वोट लेने के लिए इस्तेमाल करो और फिर फेंक दो। ‘ताज न्यूज़’ का यह मानना है कि जब तक इस ‘दिखावटी सादगी’ और ‘धार्मिक पाखंड’ के पीछे छिपे असली चेहरों को नहीं पहचाना जाएगा, तब तक लोकतंत्र रूपी रंगमंच पर इस क्रूर ‘नाटक’ का मंचन जारी रहेगा। यह व्यंग्य हमें हंसाता नहीं है, बल्कि हमारे भीतर एक गहरी बेचैनी (Unrest) और सवाल छोड़ जाता है कि क्या हम भी इस तंत्र के मूक दर्शक (Silent Audience) बन चुके हैं? इस चुप्पी को तोड़ना ही इस व्यंग्य का असल उद्देश्य है।

Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News

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