बंद करो यूपी को बीमारू कहना! उत्तर प्रदेश है भारत की धड़कन, कोई बोझ नहीं: बृज खंडेलवाल का प्रखर आलेख

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Article Desk, tajnews.in | Sunday, May 10, 2026, 01:32:57 PM IST

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Brij Khandelwal Writer
बृज खंडेलवाल
वरिष्ठ पत्रकार
एवं विश्लेषक
वरिष्ठ पत्रकार बृज खंडेलवाल ने उत्तर प्रदेश को ‘बीमारू’ राज्य कहकर अपमानित करने वाली संकीर्ण क्षेत्रीय मानसिकता पर करारा प्रहार किया है। इस प्रखर आलेख में उन्होंने स्पष्ट किया है कि भारत की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और राजनीतिक पहचान उत्तर प्रदेश के बिना शून्य है। यह लेख यूपी के गौरवशाली इतिहास और उसकी सर्वसमावेशी ‘गंगा-जमुनी’ संस्कृति का अद्भुत दस्तावेज़ है।
HIGHLIGHTS
  1. उत्तर प्रदेश को ‘बीमारू’ कहकर अपमानित करने वाली संकीर्ण क्षेत्रीय मानसिकता पर बृज खंडेलवाल का करारा प्रहार।
  2. काशी, मथुरा और अयोध्या के बिना हिंदू धर्म और भारत की आध्यात्मिक पहचान की कल्पना भी असंभव है।
  3. 1857 की क्रांति से लेकर साहित्य और वास्तुकला तक, यूपी ने पूरे हिंदुस्तान की आत्मा को आकार दिया है।
  4. ताज न्यूज़ का संपादकीय: जो राज्य देश को सबसे ज्यादा प्रधानमंत्री और सांसद देता है, उसे विकास के नाम पर ‘बोझ’ बताना केवल एक खोखला राजनीतिक प्रोपेगेंडा है।

बंद करो यूपी को बीमारू कहना!
उत्तर प्रदेश है भारत की धड़कन, कोई बोझ नहीं

बिन काशी, मथुरा, अयोध्या, हिन्दू धर्म में क्या?

— बृज खंडेलवाल

जब दूसरे राज्य अपनी क्षेत्रीय शान का ढोल पीटते हैं, (तमिल प्राइड, मराठा गौरव, पंजाबियत, कश्मीरियत, बंगाली अस्मिता) तब उत्तर प्रदेश हमेशा “एक भारत” की बात करता है। पश्चिम और दक्षिण भारत के कुछ लोग जब यूपी को पिछड़ा बताकर उसकी जीडीपी या राष्ट्र निर्माण में योगदान पर सवाल उठाते हैं, तब वे एक बड़ी सच्चाई भूल जाते हैं। उत्तर प्रदेश सिर्फ नक्शे पर बना एक राज्य नहीं है। यह भारत की रूह, दिल, तहज़ीब और सियासत की धड़कन है。

उत्तर प्रदेश के प्राचीन घाटों से लेकर ताज महल की संगमरमरी शायरी तक, उत्तर प्रदेश, मां भारती के माथे पर सजे चमकते मुकुट जैसा दिखाई देता है। यहां गंगा, यमुना और सरयू की पवित्र धाराएं संतों, क्रांतिकारियों, कवियों और बादशाहों की कहानियां सुनाती हैं। यही वह धरती है जहां तुलसीदास ने अमर रामचरितमानस लिखी, जहां कबीर ने पाखंड पर करारी चोट की, और जहां मुंशी प्रेमचंद ने गांव, गरीब और भूले हुए इंसानों की आवाज़ दुनिया तक पहुंचाई। अयोध्या की घंटियों से लेकर वाराणसी की अनंत आरती तक, लखनऊ की तहज़ीब से प्रयागराज की सियासी विरासत तक, उत्तर प्रदेश कोई मामूली सूबा नहीं। यह भारत की सभ्यता की धड़कन है。

दशकों तक उत्तर प्रदेश को “बीमारू राज्य” कहकर हिकारत से देखा गया। इसे ऐसा बोझ बताया गया जो भारत की तरक्की रोक रहा है। टीवी बहसों, अखबारों और ड्रॉइंग रूम की चर्चाओं में यह शब्द फैशन बन गया। लेकिन जिन्होंने यह तमगा चिपकाया, उन्होंने कभी समझने की कोशिश नहीं की कि यूपी आखिर है क्या। उत्तर प्रदेश को सिर्फ गरीबी या आंकड़ों से मापना, हमारी सभ्यता को न समझ पाने जैसा है。

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आज भारत में एक अजीब रुझान बढ़ रहा है। क्षेत्रीय पहचान अब संकीर्ण सोच में बदलती जा रही है। हर राज्य अपनी अलग दीवार खड़ी करता दिखाई देता है। पहले भारत की बात होती थी, अब क्षेत्रों की。
लेकिन यूपी ने हमेशा अलग रास्ता चुना। उसने खुद को सिर्फ अपनी सीमाओं तक सीमित नहीं किया। यहां “बाहरी” और “भीतरी” की राजनीति कम हुई। उत्तर प्रदेश ने हमेशा जोड़ने का काम किया, तोड़ने का नहीं। उसकी पहचान भारत से अलग नहीं, बल्कि भारत के भीतर घुली हुई है。

गंगा जमुनी तहज़ीब कोई किताबों का जुमला नहीं। यह सदियों की साझी जिंदगी का नतीजा है। यहां हिंदू, मुस्लिम, जैन, बौद्ध और सिख परंपराएं साथ साथ सांस लेती रहीं। त्योहार साझा हुए, खानपान मिला, शायरी और संगीत ने दिलों को जोड़ा। अवध में अदब संस्कृति बन गया। बनारस में आस्था दर्शन बन गई। मथुरा और वृंदावन में भक्ति उत्सव बन गई。

यूपी की नदियां सिर्फ नदियां नहीं हैं। गंगा, यमुना और सरयू बहती हुई पवित्र कथाएं हैं। इनके किनारों ने संत, फकीर, सुधारक, बागी और सपने देखने वाले पैदा किए। आदि शंकराचार्य ने काशी में ज्ञान की बहसों को नई जान दी। चैतन्य महाप्रभु वृंदावन की भक्ति में डूब गए। सूफी संतों ने इंसानियत का पैगाम फैलाया। बौद्ध भिक्षु इन्हीं रास्तों से एशिया तक ज्ञान ले गए। सल्तनतें आईं और चली गईं, मगर सभ्यता की यह धारा बहती रही。

भारत के दो सबसे लोकप्रिय आराध्य भी इसी मिट्टी से जुड़े हैं। भगवान राम अयोध्या के हैं। भगवान कृष्ण मथुरा और वृंदावन के। करोड़ों भारतीयों की नैतिकता, भक्ति और कल्पना इन दोनों से आकार लेती है। यही वजह है कि उत्तर प्रदेश को भारत की आत्मा का केंद्र माना जाता है。

आजादी की लड़ाई में भी यूपी सबसे आगे रहा। 1857 की क्रांति मेरठ से ज्वालामुखी की तरह फूटी। कानपुर, लखनऊ और झांसी तक आग फैल गई। बेगम हजरत महल अंग्रेजों के सामने डटकर खड़ी रहीं। नाना साहब ने संघर्ष किया। हजारों गुमनाम गांव वालों ने बिना किसी इनाम की उम्मीद के अपनी जान दे दी। बाद में महात्मा गांधी के नेतृत्व में भी यूपी राष्ट्रीय आंदोलन का दिल बना रहा。

साहित्य की दुनिया में भी यूपी की विरासत बेमिसाल है। मीर तकी मीर, मिर्जा गालिब, नज़ीर अकबराबादी, हरिवंश राय बच्चन, महादेवी वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला और प्रेमचंद ने सिर्फ यूपी के लिए नहीं लिखा। उन्होंने पूरे हिंदुस्तान की आत्मा को शब्द दिए。

वास्तुकला में भी उत्तर प्रदेश किसी खुले संग्रहालय जैसा है। ताजमहल आज भी संगमरमर में जमी मोहब्बत की धुन लगता है। आगरा किला, फतेहपुर सीकरी, सारनाथ और अनगिनत मंदिर, मस्जिदें और मठ बताते हैं कि यहां कितनी सभ्यताएं आकर मिलीं। हिंदू, बौद्ध, जैन, फारसी, इस्लामी और लोक परंपराओं ने यहां एक दूसरे को अपनाया और नया रंग दिया。

राजनीति में भी उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा केंद्र बना हुआ है। सबसे ज्यादा सांसद यहीं से संसद पहुंचते हैं। ज्यादातर प्रधानमंत्री या तो यूपी से निकले या यूपी की जनता के सहारे दिल्ली पहुंचे। दिल्ली की सत्ता की सांसें आज भी यूपी से जुड़ी हैं。

अब “बीमारू” शब्द पुराना, खोखला और नासमझी भरा लगता है। उत्तर प्रदेश कोई बीमार मरीज नहीं जो अपनी अहमियत बचाने के लिए जूझ रहा हो। यह एक विशाल, जीवंत, आध्यात्मिक और जुझारू प्रदेश है, जो अपनी ताकत फिर पहचान रहा है। यहां समस्याएं हैं, भीड़ है, विरोधाभास हैं, मगर जिंदगी भी है, ऊर्जा भी है और अद्भुत सहनशक्ति भी。
असल में उत्तर प्रदेश भारत का छोटा रूप है। यहां भारत का दर्द भी है, गरीबी भी, आस्था भी, विविधता भी, संघर्ष भी और उम्मीद भी। यूपी को समझना, भारत को समझना है। शायद इसी कारण, तमाम आलोचनाओं के बावजूद, उत्तर प्रदेश आज भी भारत पर बोझ नहीं, बल्कि उसकी धड़कन बनकर खड़ा है。

ताज न्यूज़ का विशेष संपादकीय विश्लेषण: क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति, ‘बीमारू’ का भ्रम और उत्तर प्रदेश का यथार्थ

बृज खंडेलवाल जी का यह आलेख उन तमाम आलोचकों और छद्म बुद्धिजीवियों (Pseudo-intellectuals) के लिए एक बौद्धिक तमाचा है, जो भारत के हृदय स्थल—उत्तर प्रदेश—को केवल प्रति व्यक्ति आय (Per Capita Income) या जीडीपी (GDP) के सीमित तराजू पर तौलते हैं। 1980 के दशक में जनसांख्यिकी विशेषज्ञ आशीष बोस द्वारा गढ़ा गया शब्द ‘बीमारू’ (BIMARU – बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश) मूल रूप से जनसंख्या वृद्धि को लेकर एक अकादमिक टिप्पणी थी। लेकिन समय के साथ, दक्षिण और पश्चिम भारत के कुछ राजनीतिक दलों ने इसे अपनी ‘क्षेत्रीय श्रेष्ठता’ (Regional Supremacy) साबित करने के लिए एक राजनीतिक गाली (Political Slur) बना दिया। यह आलेख उसी हीन भावना के खिलाफ यूपी के आत्मसम्मान का शंखनाद है।

सांस्कृतिक वर्चस्व और सर्वसमावेशी चरित्र:
जैसा कि आलेख में सटीक रूप से दर्शाया गया है, जब देश के अन्य हिस्से भाषा या क्षेत्रीयता के नाम पर दीवारें खड़ी कर रहे होते हैं (जैसे तमिलनाडु में हिंदी का विरोध या महाराष्ट्र में मराठा अस्मिता के नाम पर प्रवासियों का उत्पीड़न), तब उत्तर प्रदेश अकेला ऐसा राज्य है जो कभी भी ‘बाहरी बनाम भीतरी’ (Outsider vs Insider) का कार्ड नहीं खेलता। यूपी की गोद इतनी विशाल है कि उसने पारसियों की गज़ल, मुगलों की वास्तुकला, बौद्धों के दर्शन और सनातन धर्म के सबसे पवित्र प्रतीकों को एक साथ सींचा है। ‘गंगा-जमुनी’ तहज़ीब कोई राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि बनारस के घाटों पर गूंजती बिस्मिल्लाह खान की शहनाई का वह सच है, जिसे कोई भी संकीर्ण विचारधारा नकार नहीं सकती। यदि उत्तर प्रदेश भारत के नक्शे से अपनी सांस्कृतिक विरासत वापस खींच ले, तो ‘सनातन’ का पूरा ढांचा और भारत का पूरा इतिहास खोखला हो जाएगा। बिना काशी के शिव, बिना मथुरा के कृष्ण और बिना अयोध्या के राम की कल्पना क्या संभव है?

आर्थिक पुनरुत्थान: ‘बीमारू’ से ‘पावरहाउस’ तक का सफर:
जो लोग आज भी यूपी को 90 के दशक के चश्मे से देखते हैं, वे वास्तविकता से कोसों दूर हैं। 2026 का उत्तर प्रदेश अब केवल गन्ने और गेहूं का प्रदेश नहीं रहा। आज यह राज्य एक्सप्रेसवे का हब (Expressway Hub) बन चुका है। जेवर एयरपोर्ट, डिफेंस कॉरिडोर, और बुंदेलखंड से लेकर पूर्वांचल तक बिछता इंफ्रास्ट्रक्चर का जाल इस बात का प्रमाण है कि यूपी अब बीमार नहीं, बल्कि दौड़ने के लिए तैयार एक एथलीट है। जब दक्षिण भारत की फैक्ट्रियों में उत्पादन होता है, तो उसे चलाने वाला पसीना इसी यूपी और बिहार के मज़दूरों का होता है। बिना यूपी के मानव संसाधन (Human Resource) के, भारत की कोई भी औद्योगिक क्रांति सफल नहीं हो सकती। इसलिए, यूपी को बोझ बताना देश के सबसे बड़े वर्कफोर्स (Workforce) का अपमान है।

राजनीतिक गुरुत्वाकर्षण का केंद्र:
लोकतंत्र संख्या बल का खेल है, और यूपी के 80 लोकसभा सांसद ही यह तय करते हैं कि लाल किले की प्राचीर से तिरंगा कौन फहराएगा। यह राज्य की राजनीतिक परिपक्वता ही है कि उसने कभी देश की अखंडता को चुनौती नहीं दी। जब अन्य राज्य केंद्र से अधिक स्वायत्तता (Autonomy) या अलग झंडे की मांग करते हैं, तो यूपी का किसान या नौजवान सिर्फ ‘भारत माता की जय’ बोलता है। ‘ताज न्यूज़’ का यह दृढ़ मत है कि उत्तर प्रदेश की आलोचना करना आसान है, लेकिन यूपी के बिना भारत की कल्पना करना असंभव है। बृज खंडेलवाल का यह लेख केवल यूपीवासियों के लिए नहीं, बल्कि हर उस भारतीय के लिए है जो यह समझता है कि एक शरीर किसी कमज़ोर अंग के साथ तो जीवित रह सकता है, लेकिन बिना धड़कते हुए दिल के नहीं। उत्तर प्रदेश कल भी भारत का दिल था, आज भी है, और कल भी रहेगा!

Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News

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