माँ की विरासत: जन्म देने वाली माँ से लेकर मातृभूमि और मातृभाषा तक, डॉ. प्रमोद कुमार की भावपूर्ण रचना

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Article Desk, tajnews.in | Sunday, May 10, 2026, 12:45:00 PM IST

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Dr Pramod Kumar Writer
डॉ. प्रमोद कुमार
डिप्टी नोडल अधिकारी, MyGov
डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा
डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा के डॉ. प्रमोद कुमार ने ‘माँ’ शब्द की व्यापकता को दर्शाते हुए एक अत्यंत भावपूर्ण और मर्मस्पर्शी रचना प्रस्तुत की है। ‘माँ की विरासत’ शीर्षक से लिखी गई यह रचना केवल जन्मदात्री माँ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह रिश्तों की माँ, मातृभूमि और मातृभाषा जैसे जीवन के चार सबसे मजबूत आधारस्तंभों की वंदना करती है।
HIGHLIGHTS
  1. डॉ. प्रमोद कुमार की रचना ‘माँ की विरासत’ जीवन को पूर्ण बनाने वाली चार ‘माताओं’ का भावपूर्ण चित्रण है।
  2. जन्म देने वाली माँ के त्याग और पति-पत्नी की माँ (सास) द्वारा रिश्तों में अपनापन बोने की अद्भुत व्याख्या की गई है।
  3. मातृभूमि को केवल एक भौगोलिक सीमा नहीं, बल्कि इतिहास, संस्कृति और असंख्य बलिदानों की धड़कन बताया गया है।
  4. मातृभाषा के महत्व को रेखांकित करते हुए स्पष्ट किया गया है कि जो अपनी भाषा भूलता है, वह अपनी जड़ों का एक हिस्सा खो देता है।

“माँ की विरासत”

डॉ प्रमोद कुमार

माँ केवल वह नहीं
जो जन्म देकर हमें इस संसार में लाती है,
माँ वह भी है
जो जीवन के हर मोड़ पर
अपने अस्तित्व से हमें सँभालती है।

जन्म देने वाली माँ
अपने आँचल में पूरा आकाश समेट लेती है,
खुद भूखी रहकर भी
बच्चे की थाली में सपने परोस देती है。
उसकी हथेलियों की रेखाओं में
हमारा भविष्य लिखा होता है,
उसकी लोरियों में
दुनिया का सबसे मधुर संगीत बसता है。
वह रातों की अधूरी नींद है,
सुबह की पहली प्रार्थना है,
गिरने पर सहारा है,
और जीतने पर सबसे सच्ची मुस्कान है。
उसके त्याग का कोई मूल्य नहीं,
उसके प्रेम का कोई अंत नहीं。

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फिर जीवन में एक और माँ मिलती है,
पति या पत्नी की माँ के रूप में。
जो धीरे-धीरे परायेपन की दीवारें तोड़कर
अपनापन बोना सीख जाती है。
वह केवल रिश्तों की औपचारिकता नहीं,
दो परिवारों के बीच
विश्वास का पुल होती है。
कभी सास बनकर अनुशासन सिखाती है,
कभी माँ बनकर चुपचाप दुख समझ जाती है。
उसकी डाँट में भी चिंता छिपी होती है,
उसकी सलाह में अनुभव का प्रकाश。
यदि प्रेम और सम्मान का जल मिले,
तो यह रिश्ता भी
ममता के वृक्ष सा फलने लगता है。

और एक माँ है—
हमारी मातृभूमि。
जिसकी मिट्टी से शरीर बना,
जिसकी नदियों से जीवन बहा,
जिसकी हवाओं ने
हमारे फेफड़ों में पहली साँस भरी。
यह धरती माँ
सिर्फ खेत और सीमाएँ नहीं,
यह हमारे इतिहास, संस्कृति, संघर्ष
और असंख्य बलिदानों की धड़कन है。
जब सैनिक सीमा पर खड़ा होता है,
तो वह केवल जमीन नहीं बचाता,
अपनी माँ की अस्मिता की रक्षा करता है。
इस मिट्टी में
पूर्वजों की स्मृतियाँ बसती हैं,
हर कण में
असंख्य तप, त्याग और प्रेम की गाथाएँ हैं。
मातृभूमि हमें पहचान देती है,
जड़ें देती है,
और जीने का स्वाभिमान देती है。

फिर आती है
मातृभाषा की माँ。
जिसके शब्दों में
हम पहली बार “माँ” कहना सीखते हैं。
जिस भाषा में रोना सहज लगता है,
हँसी सबसे सच्ची लगती है,
और भाव बिना डर के बहते हैं。
मातृभाषा
केवल संवाद का माध्यम नहीं,
वह हमारी आत्मा का संगीत है。
उसमें लोकगीतों की मिठास है,
दादी-नानी की कहानियों की गर्माहट है,
और संस्कृति की अनमोल विरासत है。
जब कोई अपनी मातृभाषा भूलता है,
तो वह केवल शब्द नहीं खोता,
वह अपनी जड़ों का एक हिस्सा खो देता है。
भाषा हमें हमारी पहचान से जोड़ती है,
हमारे इतिहास और भविष्य के बीच
एक जीवित सेतु बनती है。

माँ के ये सभी रूप
जीवन को पूर्ण बनाते हैं。
जन्म देने वाली माँ जीवन देती है,
रिश्तों वाली माँ अपनापन देती है,
मातृभूमि अस्तित्व देती है,
और मातृभाषा अभिव्यक्ति देती है。

डॉ प्रमोद कुमार
डिप्टी नोडल अधिकारी, MyGov
डॉ भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा

ताज न्यूज़ का विशेष संपादकीय विश्लेषण: ‘माँ’ शब्द की असीमित व्यापकता और जीवन के चार आधारस्तंभ

डॉ. प्रमोद कुमार की यह कविता ‘माँ की विरासत’ केवल कुछ शब्दों या भावनाओं का संकलन नहीं है, बल्कि यह भारतीय दर्शन (Indian Philosophy) और सांस्कृतिक मनोविज्ञान का एक अत्यंत गहरा और विस्तृत दस्तावेज़ है। साहित्य में अक्सर ‘माँ’ शब्द को जन्मदात्री तक सीमित कर दिया जाता है, लेकिन डॉ. कुमार ने अपनी लेखनी से इस शब्द के क्षितिज (Horizon) को इतना विस्तार दे दिया है कि इसमें व्यक्ति का पूरा अस्तित्व ही समाहित हो गया है। एक आधुनिक समाज में, जहाँ रिश्ते भौतिकवादी (Materialistic) हो रहे हैं, लोग अपनी ज़मीन से कट रहे हैं और अपनी भाषा भूल रहे हैं, यह रचना एक ‘चेतावनी’ और एक ‘मार्गदर्शक’ दोनों के रूप में काम करती है।

पहला स्तंभ: जन्मदात्री – निस्वार्थ प्रेम का प्रतिमान
कविता का पहला चरण उस लौकिक और शाश्वत सत्य को नमन करता है जो हमारी शारीरिक उत्पत्ति का कारण है। जन्म देने वाली माँ का वर्णन करते हुए लेखक ने बहुत ही सुंदर बिंब (Imagery) गढ़े हैं—”वह रातों की अधूरी नींद है, सुबह की पहली प्रार्थना है।” आधुनिक मनोविज्ञान भी इस बात की पुष्टि करता है कि एक बच्चे का भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक ढांचा उसकी माँ की लोरियों और उसके स्पर्श से ही निर्मित होता है। आज के न्यूक्लियर फैमिली (Nuclear Family) के दौर में, जहाँ बच्चे डिप्रेशन और एकाकीपन का शिकार हो रहे हैं, माँ के इस निस्वार्थ प्रेम को समझना और उसका सम्मान करना समाज के मानसिक स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता बन गया है। जब तक समाज में जन्मदात्री का स्थान सर्वोच्च रहेगा, तब तक पीढ़ियां सुरक्षित रहेंगी।

दूसरा स्तंभ: सास या रिश्तों की माँ – सामाजिक समरसता की धुरी
साहित्य और सिनेमा ने अक्सर ‘सास’ के चरित्र को एक खलनायिका (Vamp) के रूप में चित्रित किया है। लेकिन डॉ. कुमार ने इस रूढ़िवादी सोच (Stereotype) को तोड़ते हुए एक अत्यंत परिपक्व और सकारात्मक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। जब दो अजनबी परिवार विवाह के बंधन में बंधते हैं, तो परायेपन की दीवारें गिराने का सबसे अहम काम ‘रिश्तों की माँ’ ही करती है। “कभी सास बनकर अनुशासन सिखाती है, कभी माँ बनकर चुपचाप दुख समझ जाती है।” यह पंक्तियां भारतीय संयुक्त परिवार प्रणाली (Joint Family System) की उस ताकत को दर्शाती हैं, जो सम्मान और प्रेम के जल से सिंचित होकर दो परिवारों को एक मजबूत वटवृक्ष में बदल देती है। यह सामाजिक समरसता और पारिवारिक विघटन (Family Breakdown) को रोकने का सबसे कारगर मंत्र है।

तीसरा स्तंभ: मातृभूमि – अस्मिता और स्वाभिमान का स्रोत
किसी भी व्यक्ति का अस्तित्व हवा में नहीं तैरता; उसकी जड़ें एक विशिष्ट भूगोल (Geography), इतिहास और संस्कृति में होती हैं। मातृभूमि केवल खेतों और सरहदों का नाम नहीं है। यह उस ‘सामूहिक स्मृति’ (Collective Memory) का नाम है जिसे हमारे पूर्वजों ने अपने पसीने और रक्त से सींचा है। जब सैनिक सरहद पर खड़ा होता है, तो वह केवल मिट्टी के टुकड़े की नहीं, बल्कि उस ‘आत्मा’ की रक्षा कर रहा होता है जिसने हमें जन्म दिया है। आज जब वैश्वीकरण (Globalization) के दौर में युवा ‘ग्लोबल सिटिजन’ (Global Citizen) बनने की अंधी दौड़ में अपनी मिट्टी से कट रहे हैं, तब यह कविता याद दिलाती है कि बिना जड़ों के कोई भी पेड़ हरा-भरा नहीं रह सकता। मातृभूमि हमें वह स्वाभिमान देती है जो किसी अन्य देश की नागरिकता या पासपोर्ट कभी नहीं दे सकता। अपनी माटी से जुड़ाव ही एक राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति होती है।

चौथा स्तंभ: मातृभाषा – आत्मा की मौलिक अभिव्यक्ति
कविता का अंतिम और शायद सबसे मारक हिस्सा ‘मातृभाषा’ को समर्पित है। दुनिया भर के भाषाविद् (Linguists) और शिक्षाविद यह मानते हैं कि मातृभाषा केवल ‘कौशल’ (Skill) नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के सोचने, महसूस करने और सपने देखने का सबसे प्राकृतिक माध्यम है। डॉ. कुमार लिखते हैं, “जब कोई अपनी मातृभाषा भूलता है, तो वह केवल शब्द नहीं खोता, वह अपनी जड़ों का एक हिस्सा खो देता है।” आज के अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा के अंधानुकरण (Blind Imitation) में, हमने अपनी दादी-नानी की कहानियों, लोकगीतों की मिठास और उस सांस्कृतिक गर्माहट को खोना शुरू कर दिया है जो हमें हमारी मातृभाषा से मिलती है। व्यक्ति चाहे कितनी भी भाषाएं सीख ले, लेकिन जो भाव मातृभाषा में छलकते हैं, वे किसी ‘उधार की भाषा’ में व्यक्त नहीं किए जा सकते। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) भी मातृभाषा में प्रारंभिक शिक्षा पर जो ज़ोर दे रही है, यह कविता उसी दर्शन की साहित्यिक अभिव्यक्ति है।

अंततः, ‘ताज न्यूज़’ का यह मानना है कि डॉ. प्रमोद कुमार की यह रचना मात्र एक कविता नहीं, बल्कि जीवन जीने का एक संपूर्ण फलसफा (Philosophy) है। जन्मदात्री हमें जीवन देती है, रिश्तों वाली माँ हमें समाज में जीना सिखाती है, मातृभूमि हमें खड़े होने की ज़मीन देती है और मातृभाषा हमें हमारे विचार और स्वर देती है। इन चारों ‘माताओं’ का सम्मान किए बिना कोई भी समाज या राष्ट्र अपनी पूर्णता को प्राप्त नहीं कर सकता। आगरा विश्वविद्यालय के मंच से निकली यह बौद्धिक और मार्मिक आवाज़ हर भारतीय के हृदय तक पहुंचनी चाहिए।

Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News

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