द ग्रेट इंडियन जुमला ओलंपिक्स
जब लोकतंत्र एक रंगमंच बन जाए
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बृज खंडेलवाल
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भारत सिर्फ दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र नहीं है, यह दुनिया का सबसे बड़ा खुला रंगमंच भी है।
हमारे खूबसूरत मुल्क में चुनाव ऐसे आते हैं जैसे शादी, क्रिकेट फाइनल और पौराणिक धारावाहिक सबको मिलाकर एक विशाल सर्कस बना दिया गया हो। लाउडस्पीकर चीखते हैं। हेलिकॉप्टर फूल बरसाते हैं। टीवी एंकर अपनी आवाज़ खो बैठते हैं। और नेता लोग वादे ऐसे बांटते हैं जैसे भंडारे में हलवा पूरी।
सैलानियों के लिए भारत एक शानदार तमाशा पेश करता है, जिसका नाम है “द ग्रेट जुमला ओलंपिक्स।”
हर पांच साल में हर पार्टी के नेता इस पवित्र खेल प्रतियोगिता में जुटते हैं। किसी स्टेडियम की जरूरत नहीं। धूल वाला मैदान, प्लास्टिक की कुर्सियां और मुफ्त खाने के पैकेट काफी हैं। प्रतियोगी कई कठिन मुकाबलों में हिस्सा लेते हैं। स्पीच मैराथन, ब्लेम रिले, इमोशनल कुश्ती, यू टर्न जिम्नास्टिक और सबसे कठिन प्रतियोगिता “सिंक्रोनाइज्ड भूलने की कला।”
इस खेल की निर्विवाद दादा या नानी चैंपियन थीं इंदिरा गांधी, जिनका नारा था “गरीबी हटाओ।” गरीबी ने यह ऐलान सुना, हल्की मुस्कान दी और भारत में स्थायी किराये का मकान लेकर आराम से बैठी रही। पचास साल बाद भी गरीबी जिंदा है, तंदरुस्त है और कभी कभी खुद चुनाव भी लड़ लेती है。
फिर आया आधुनिक दौर का सबसे चर्चित जुमला “अच्छे दिन आने वाले हैं।” आह, भारतीय इतिहास के सबसे ज्यादा इंतजार किए गए मेहमान। भारतीय जनता अच्छे दिनों का इंतजार वैसे करती है जैसे यात्री छह घंटे लेट ट्रेन का करते हैं। हर साल कोई घोषणा करता है, “बस आने ही वाले हैं!” और भीड़ फिर तालियां बजा देती है。
एक और स्वर्ण पदक वाला प्रदर्शन था “इंडिया शाइनिंग” अभियान। शहरी भारत ने गर्व से सिर हिलाया, जबकि गांव का भारत सिर खुजलाकर पूछ बैठा, “शाइनिंग कहां हो रहा है भाई?” नारा इतना चमका कि मतदाताओं ने बैलेट बॉक्स की ही लाइट बंद कर दी।
ओलंपिक्स व्यक्तिगत प्रतिभा के बिना पूरे नहीं होते। मुलायम सिंह यादव ने अपने मशहूर बयान “लड़के हैं, लड़कों से गलती हो जाती है” से पूरे देश को हैरान कर दिया। उस बयान ने सिर्फ स्तर नहीं गिराया, बल्कि उसे सामान्य समझदारी के साथ जमीन के नीचे दफना दिया。
फिर कुछ नेताओं और खाप दर्शनशास्त्रियों की वैज्ञानिक खोज आई कि चाउमीन बलात्कार की वजह है। आखिरकार देश को असली खलनायक मिल गया। न पितृसत्ता, न अपराधी मानसिकता, न कमजोर पुलिस व्यवस्था। दोषी निकले नूडल्स! चीन में कोई नूडल बनाने वाला यह सुनकर शायद बेहोश हो गया होगा।
उधर नेता लोग गंगा यमुना सफाई का वादा करते रहे। अब हालत यह है कि नदी की मछलियां भी चुनावी नारे पहचानने लगी हैं। यमुना शायद दुनिया की इकलौती नदी है जिसे भाषणों में रोज साफ किया जाता है और हकीकत में हर घंटे गंदा। गडकरी का भला हो, उसने तो दिल्ली आगरा के बीच स्टीमर ही चलवा दिया होता, अगर नदी में जल होता!
हर पार्टी के पास अपने अपने जुमलों का डिब्बा है। गुलाबी सपनों से भरा डिब्बा। जैसे आम आदमी पार्टी का भ्रष्टाचार मुक्त भारत या ममता बनर्जी का “खेला होबे।” लोकतंत्र चुनावों पर चलता है। उसे भावनात्मक तूफान चाहिए, ऐसी लहर जो तर्क और सामान्य समझ को बहाकर ले जाए। अक्सर कहानियों में सिर्फ शोर और गुस्सा होता है, सार बहुत कम。
और वह जादुई “15 लाख रुपये” वाला वादा कौन भूल सकता है? काले धन की वापसी का सपना। करोड़ों भारतीयों ने अपने बैंक खाते वैसे जांचे जैसे बच्चे परीक्षा का रिजल्ट देखते हैं। कुछ लोगों ने तो पासबुक उतनी बार अपडेट कराई जितनी बार लोग व्हाट्सऐप स्टेटस बदलते हैं। बैंक शांत रहे। ये जुमला था, अफवाह थी, गलत रिपोर्टिंग थी, आज तक स्पष्ट नहीं है。
लेकिन असली ओलंपिक चैंपियन हैं यू टर्न जिम्नास्टिक टीम के खिलाड़ी। एक दिन नेता पूरी छाती ठोककर बयान देता है। अगले हफ्ते सफाई आती है। नया मतलब निकाला जाता है। फिर मीडिया पर दोष मढ़ा जाता है। और अंत में आता है भारतीय राजनीति का सबसे लोकप्रिय योगासन, “मेरा मतलब वह नहीं था।”
भारतीय नेताओं की रीढ़ की लचक देखकर सर्कस के बाजीगर भी जलन से रो पड़ते हैं。
लेकिन मतदाता भी भागीदारी पदक के हकदार हैं। हम शिकायतें करते हैं। राजनीतिक चुटकुले आगे भेजते हैं। मीम्स पर हंसते हैं। चाय की दुकान पर नेताओं को गालियां देते हैं। और फिर मुफ्त टोपी, बिरयानी और भावनात्मक भाषणों के लिए रैलियों में पहुंच जाते हैं। भारत में लोकतंत्र सिर्फ शासन नहीं है। यह जन मनोरंजन है。
और इस तरह जुमला ओलंपिक्स जारी रहते हैं। नए नारे आएंगे। पुराने वादे नए रंग रोगन के साथ लौटेंगे। घोषणापत्र पतंगों की तरह उड़ेंगे। टीवी बहसें बरसाती मौसम की सब्जी मंडी जैसी लगेंगी。
लेकिन एक बात तय है。
भारत में सरकारें बदल सकती हैं। पार्टियां टूट सकती हैं। विचारधाराएं कलाबाजी खा सकती हैं। मगर जुमले अमर हैं。
एक दिन सूरज ठंडा पड़ सकता है। चांद रिटायर हो सकता है। लेकिन कहीं न कहीं, किसी मंच पर, किसी विशाल कटआउट के नीचे, कोई नेता अब भी चिल्ला रहा होगा
“मित्रों… बस पांच साल और!”
ताज न्यूज़ का विशेष संपादकीय विश्लेषण: ‘जुमला’ संस्कृति का मनोविज्ञान और भारतीय लोकतंत्र की त्रासदी
बृज खंडेलवाल जी का यह व्यंग्य पढ़ते हुए हंसी ज़रूर आती है, लेकिन इस हंसी के पीछे भारतीय लोकतंत्र की एक बहुत ही गहरी और स्याह त्रासदी छिपी हुई है। यह आलेख हमें इस बात का एहसास कराता है कि ‘जुमला’ (Jumla) शब्द अब भारतीय राजनीतिक शब्दकोश में कोई गाली नहीं, बल्कि एक स्वीकृत कला (Accepted Art Form) बन चुका है। राजनेताओं ने बड़ी चालाकी से झूठ बोलने, वादे तोड़ने और फिर मुकर जाने की प्रक्रिया को ‘मास्टरस्ट्रोक’ (Masterstroke) का नाम दे दिया है। जब एक देश का मतदाता झूठ को झूठ कहने के बजाय, उसे नेता की ‘चालाकी’ या ‘चुनावी रणनीति’ मानकर ताली बजाने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि वह समाज वैचारिक रूप से खोखला हो चुका है।
चुनावी घोषणापत्रों की मौत और ‘इमोशनल कुश्ती’:
एक दौर था जब चुनाव घोषणापत्र (Manifestos) बहुत ही पवित्र दस्तावेज़ माने जाते थे। विद्वान लोग बैठकर नीतियां बनाते थे। लेकिन आज के ‘जुमला ओलंपिक्स’ में घोषणापत्र महज़ पीआर एजेंसियों (PR Agencies) द्वारा तैयार किए गए रंग-बिरंगे ब्रोशर हैं, जिन्हें चुनाव के अगले दिन रद्दी में डाल दिया जाता है। विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार जैसे बुनियादी मुद्दे बहुत ही उबाऊ (Boring) माने जाते हैं। इसलिए नेताओं ने ‘इमोशनल कुश्ती’ का खेल ईजाद किया है। धर्म खतरे में है, राष्ट्र खतरे में है, फलां जाति खतरे में है—इन नारों का शोर इतना तेज़ कर दिया जाता है कि मतदाता अपने खाली बैंक खाते और पेट की भूख भूलकर राष्ट्रवाद और धर्म की अफीम के नशे में झूमने लगता है। राजनेताओं को मालूम है कि भूखे इंसान को राशन से ज्यादा ‘अस्मिता’ (Identity) की खुराक पिलाना आसान और सस्ता है।
डिजिटल युग: वॉट्सऐप यूनिवर्सिटी और ‘डीपफेक’ जुमले:
इंदिरा गांधी के ‘गरीबी हटाओ’ के दौर से लेकर आज के दौर तक, जुमलों की तकनीक बदल गई है। पहले जुमले पोस्टरों और भाषणों से आते थे, आज वे ‘वॉट्सऐप यूनिवर्सिटी’ के ज़रिए सीधे आपके दिमाग में ‘इन्जेक्ट’ (Inject) किए जाते हैं। 2026 के दौर में ‘डीपफेक’ (Deepfake) वीडियो और एआई-जनित (AI-Generated) प्रोपेगेंडा ने इस सर्कस को और भी खतरनाक बना दिया है। अब नेता केवल मंच से झूठ नहीं बोलते, बल्कि वे एल्गोरिदम (Algorithms) के ज़रिए आपके डर, आपकी असुरक्षा और आपके पूर्वाग्रहों (Prejudices) को ‘टार्गेट’ करते हैं। इस डिजिटल अखाड़े में सच और झूठ का फर्क पूरी तरह मिट चुका है।
जवाबदेही का अंत और मतदाता की ज़िम्मेदारी:
लेखक ने बिल्कुल सही कहा है कि इस सर्कस के लिए सिर्फ नेता ज़िम्मेदार नहीं हैं, हम मतदाता भी बराबर के दोषी हैं। हम ‘पार्टिसिपेशन मेडल’ (Participation Medal) के हकदार हैं क्योंकि हमने अपनी जवाबदेही मांगने की ताकत को मुफ्त की टोपियों, बिरयानी के पैकेटों और भावुक भाषणों के आगे सरेंडर कर दिया है। लोकतंत्र कोई ‘स्पेक्टेटर स्पोर्ट’ (Spectator Sport) या सिनेमा नहीं है जहाँ आप बैठकर ताली या सीटी बजाएं। यदि आप तमाशबीन (Spectator) बने रहेंगे, तो मदारी आपको हमेशा बेवकूफ ही बनाएगा। जुमला ओलंपिक्स तभी बंद होंगे जब मतदाता नेताओं को ‘सुपरस्टार’ या ‘अवतार’ मानना बंद कर देगा और उनसे एक ‘पब्लिक सर्वेंट’ (Public Servant) की तरह सवाल पूछना शुरू करेगा। जब तक ऐसा नहीं होता, हर पांच साल बाद कोई न कोई मदारी मंच पर आएगा और कहेगा—”मित्रों… बस पांच साल और!” और हम फिर से ठगे जाने के लिए तैयार खड़े होंगे।